“वर्तमान वितरण प्रणाली में थोक व्यापारी अनावश्यक है। उनको जितनी जल्दी समाप्त कर दिया जाये समाज के लिए उतना अच्छा है।” क्या आप इस कथन से सहमत है ? विवेचना कीजिए।

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थोक व्यापारी वह व्यापारी है जो उत्पादकों से भारी मात्रा में माल खरीदकर फुटकर व्यापारियों को उनकी आवश्यकता के अनुरूप थोड़ी-थोड़ी मात्रा में विक्रय करता रहता है। जिससे समाज के अधिक-से-अधिक लोगों को विभिन्न वस्तुओं को उपभोग करने का अवसर मिल सके।

मध्यस्थों को हटाने व न हटाने दोनों ही प्रकार की बातें सुनाई देती हैं। मध्यस्थों में इस दलाल, आदतियों, बैंक, अन्य सेवा संस्थाओं संग्रहकर्त्ता आदि की तथा योक व्यापारी को भी सम्मिलित करते हैं। बहुत से लोगों के मस्तिष्कों में मध्यस्थ थोक व्यापार का ही समानार्थी शब्द है। अतः यहाँ पर हम स्पष्ट करना चाहेंगे कि मध्यस्थों में थोक व्यापारी को हटाने के पश्चात् भी वितरण कार्य सम्पादित हो सकता है, किन्तु सभी प्रकार के मध्यस्थों को हटाया जाना सम्भव नहीं है। यही कारण है कि जब भी मध्यस्थों की चर्चा होती है तो थोक व्यापारी ही चर्चा का विषय बनता है।

मध्यस्थों या थोक विक्रेताओं को हटाने के कारण (Reasons for Eliminating Middlemen or Wholesalers) : आधुनिक युग में सभी उन्नतिशील देशों में मध्यस्थ थोक विक्रेता को वितरण माध्यम की कड़ी से निकालने की प्रकृति पाई जाती है। इसके लिए थोक विक्रेता के सम्बन्ध में आलोचकों द्वारा कई आरोप लगाये जाते हैं, जिनमें से प्रमुख निम्न प्रकार हैं

(1) वस्तु की कीमत में अनावश्यक वृद्धि (Unnecesary Increase in the Price of a Product) – थोक व्यापारी वस्तु की कीमत में अनावश्यक वृद्धि कर देते हैं, क्योंकि एक वस्तु विभिन्न थोक व्यापारियों के हाथों से गुजरती है और प्रत्येक थोक व्यापारी उन पर कमीशन या लाभ लेता है। अतः इस कारण वस्तु की कीमत बढ़ जाना स्वाभाविक ही है। इस प्रकार उपभोक्ताओं पर थोक व्यापारियों के लाभ का अनावश्यक भार पड़ता है।

(2) भण्डार कार्य के निष्पादन में विफलता (Failure to Perform Storage Functions) – आधुनिक परिवहन साधनों में थोक विक्रेता के लिए वह सुलभ कर दिया है कि वे वस्तुओं को अपनी आवश्यकतानुसार मात्रा में कम करें। इससे निर्माता पर इस बात का दबाव बढ़ जाता है कि वे सभी आदेशों की पूर्ति हेतु पर्याप्त मात्रा में स्टॉक (Stock) रखें और मूल्यों में घटा-बढ़ी की जोखिम को भी सहन करें। स्टॉक रखने का यह कार्य पहले थोक विक्रेता ही करता था और मूल्यों की घटा-बढ़ी की जोखिम भी वही सहन करता था। इस प्रकार थोक विक्रेता को हटाने में पहला कारण योक विक्रेता की भण्डार कार्य के निष्पादन में विफलता है।

(3) ब्राण्ड और विज्ञापन का व्यापक प्रयोग (Wide Use of Brands and Advertisements) – कुछ आलोचकों का कहना है कि गत वर्षों से निर्माता ट्रेडमाकों का अधिक प्रयोग करने लगे और वे विज्ञापन को अपना माल विक्रय करने के लिए थोक व्यापारियों पर निर्भर रहने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि फुटकर व्यापारी सीधे ही उत्पादकों से माल मैंगा सकते हैं।

(4) वस्तुओं के प्रवर्तन में विफलता (Failure in Promoting Products)- निर्माता की वस्तुओं की अधिक मात्रा में बेचने के लिए थोक विक्रेता के द्वारा प्रवर्तन सम्बन्धी क्रियाओं का सहारा नहीं लिया जाता। वे न तो विज्ञापन ही करते हैं और न विशेष छूट या उधार योजना ही चलाते हैं और न फुटकर विक्रेताओं के सहयोग से विज्ञापन व अन्य प्रवर्तन योजनाओं में ही सहायता करते हैं।

(5) बाजार के साथ निकट सम्पर्क (Closer Market Contact)- वे वस्तुएँ व सेवाएँ जिनमें ग्राहक व विक्रेता का सीधा व समीपता का सम्बन्ध आवश्यक होता है उनमें भी मध्यस्थों को हटा दिया जाता है जैसे-मरम्मत करने वाली संस्थाएँ, सेवा देने वाली संस्थाएँ व मशीनें व अन्य प्रकार की वस्तुओं को लगाने वाली संस्थाएँ। ये सभी सेवाएँ फुटकर विक्रेता द्वारा अच्छी प्रकार से दी जा सकती है।

(6) थोक विक्रेताओं की सेवाओं की लागत (Cost of Wholesaler Services)- थोक विक्रेताओं को हटाने में एक कारण उनके द्वारा वस्तु का मूल्य बढ़ाना है। थोक विक्रेता वस्तु के मूल्यों में वस्तु सम्बन्धी व्यय व कुछ लाभ जोड़ देते हैं, जबकि वे ही सेवाएँ निर्माता द्वारा कम व्यय में दी जाती हैं।

(7) निर्माताओं द्वारा प्रत्यक्ष विक्रय (Direct Sale by Manufacturers)- आधुनिक समय में निर्माता स्वयं भी अपनी-अपनी वस्तुओं को बेचने के लिए फुटकर दुकानें खोलने लगे हैं; जैसे-दिल्ली क्लॉथ मिल्स, एलगिन मिल्स, बाटा शू- कम्पनी, कैरोना शू कम्पनी, ऊषा इन्जीनियरिंग कम्पनी आदि।

(8) निजी व्यापारिक चिन्हों का प्रयोग (Use of Private Trade Marks) – थोक व्यापारी उत्पादक के माल पर अपना व्यक्तिगत व्यापारिक चिन्ह लगाकर एक ओर तो उत्पादकों की प्रतिष्ठा समाप्त कर देते हैं और दूसरी ओर वितरण पर एकाधिकार प्राप्त करके उपभोक्ताओं का शोषण करते हैं।

(9) अत्यधिक लाभ कमाने की मनोवृत्ति (Psychology to Earn More and More Profits)- थोक व्यापारी उन उत्पादकों के माल में अधिक रुचि लेते हैं जो उन्हें अधिक कमीशन देते है चाहे उनकी वस्तु की किस्म कैसी भी क्यों न हो। अतः थोक व्यापारियों की अत्यधिक लाभ कमाने की दूषित मनोवृत्ति न तो उत्पादकों के लिए ही लाभदायक है और न ही उपभोक्ता के लिए।

(10) चोरबाजारी को प्रोत्साहन देना (To Ensourage Black Marketing)- आलोचकों के इस मत में काफी सत्यता है कि चोरबाजारी थोक व्यापारियों की ही देन है। ये माल को छिपाकर बाजार में कृत्रिम कमी उत्पन्न कर देते हैं और कीमतें बढ़ाकर माल बेचते रहते हैं। इससे उत्पादकों की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचती है और उपभोक्ताओं का शोषण होता है। थोक व्यापार में अन्तर्निहित दोषों और वितरण के आधुनिक साधनों के विकास के आधार पर यह कहा जा सकता है कि थोक व्यापारी वस्तुओं की कीमतों में अनावश्यक वृद्धि करके उपभोक्ताओं का शोषण करते हैं और उत्पादकों की लाभ सीमा कम करते हैं। इसी कारण आधुनिक विपणियों ने योक व्यापारियों के प्रयोग को अनावश्यक कर दिया है।

अतः ऐसा प्रतीत होता है कि थोक व्यापारी पराश्रयी के प्रयोग को अनावश्यक कर दिया है। इसी कारण आधुनिक विपणियों ने थोक व्यापारियों के प्रयोग को अनावश्यक कर दिया है। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि थोक व्यापारी पराश्रयी हैं इनको वितरण श्रृंखला से हटा देना चाहिए। परन्तु जहाँ इनके दोष है, वहाँ दूसरी ओर वे निर्माता, फुटकर व्यापारी और उपभोक्ताओं को अनेक सेवाएँ भी प्रदान करते हैं। इनके अभाव में विपणन कार्य असम्भव तो नहीं लेकिन कठिन अवश्य हो जायेगा। अतः थोक व्यापारियों को हटाना न तो वांछित ही है और न ही लाभदायक। हाँ यह हो सकता है कि इनका प्रयोग कम किया जाये।

जे. एफ. पायले ने अपनी पुस्तक ‘Marketing Principles’ में निम्न विचार व्यक्त किये हैं, “वोक व्यापारी की अग्नि परीक्षा की जा रही है कि क्या अब भी उसका स्थान हमारी विपणन व्यवस्था में है ? अब तक वह अन्य संस्थाओं की अपेक्षा विपणन सेवाओं को अधिक सन्तोषजनक स्थिति में कर सकता है अथवा करता है, उसे लाभप्रद स्थान मिलता रहेगा, जब तक उत्पादक अपने प्रमुख ध्यान को उत्पादन की ओर लगाना तथा वस्तुओं के विक्रय का कार्य विपणन की संस्थाओं को सौंपना अधिक लाभदायक समझता है, जब तक उपभोक्ता अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति उत्पादन से करने के बजाय फुटकर विक्रेता से करना अधिक सुविधाजनक समझता है, हमें मध्यस्थों की सेवाओं को जीवित रखने की आशा रखनी चाहिए।”