मूल्यांकन शैली की परिभाषा लिखते हुए इसकी विशेषतों पर प्रकाश डालिए ।

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किसी भी घटना अथवा व्यक्ति के संबंध में देखने या सुनने वाले के मानस में प्रतिक्रिया होती है। यह प्रतिक्रिया ही भाषा प्रयोग में मूल्यांकनपरक शैली को प्रेरित करती है। वक्ता जब किसी जानकारी को विभिन्न तरीकों से समझाता है तो उस क्रिया को मूल्यांकनपरक शैली कहते हैं। अर्थात् मूल्यांकन शैली का अर्थ है-निष्कर्ष निकालना या मूल्य आँकना इसे आलोचना शैली अथवा समीक्षात्मक शैली भी कहते है। इसमें व्यक्ति अपनी सोच या दृष्टि से मूल्यांकन करता है। अतः इसमें वैयक्तिकता को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त होता है। किसी भी वस्तु का मूल्यांकन उसके स्वरूप, गुण-दोष, उपयोगिता अनुपयोगिता आदि पर निर्भर है। इस प्रकार मूल्यांकन सीमित और असीमित संक्षिप्त या सम्पूर्ण दोनों में किया जा सकता है,

अतः मूल्यांकनपरक शैली के मुख्यतः दो रूप हैं-1. समग्र रूप में मूल्यांकन, 2. खंड रूप में मूल्यांकन ।

1. समग्र रूप में मूल्यांकन – किसी भी वस्तु के गुण-दोष, स्वरूप, उपयोगिता, अनुपयोगिता, लाभ-हानि, प्रदेयता आदि से किये जाने वाले मूल्यांकन को समग्र रूप से किया मूल्यांकन कहा जाता है जैसे भारत की राष्ट्रीय आय ‘मलेरिया’ या ‘गोदान’ उपन्यास पर किया गया मूल्यांकन समय मूल्यांकन कहा जायेगा।

2. खंड रूप में मूल्यांकन- किसी भी वस्तु के सम्पूर्ण कलेवर की अपेक्षा उसके किसी एक अंग, हिस्से या रूप या किया जाने वाला मूल्यांकन खंड रूप में किया मूल्यांकन कहा जाएगा। जैसे ‘हमारे नगर के नवयुवकों को जवाहर रोजगार योजना से लाभ’ अथवा ‘मलेरिया से बचाव के तरीके’ अथवा ‘गोदान के पात्र होरी का चरित्र चित्रण खंड रूप का मूल्यांकन है। इसमें जवाहर रोजगार योजना, मलेरिया अथवा गोदान की सम्पूर्ण जानकारी नहीं है।

मूल्यांकन अथवा मूल्यांकनपरक कथन शैली की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

1. मूल्यांकन शैली को आलोचनात्मक या समीक्षात्मक शैली भी कहते हैं।

2. इसमें किसी व्यक्ति, घटना या विषय-वस्तु के संबंध में निष्कर्ष प्रस्तुत किया जाता है।

3. इसमें वक्ता अपनी दृष्टि से मूल्यांकन करता है। इसलिये मेरा मत है कि’, ‘मेरी दृष्टि में’ आदि शब्दों का प्रयोग करता है। 4. इसमें जिस वस्तु, व्यक्ति या घटना का मूल्यांकन किया जाता है, उसके गुणों का विवरण देकर उस विषय की उपयोगिता या अनुपयोगिता दी जाती है।

इसलिए, अन्तः, निष्कर्षतः, संक्षेप में अंततः, आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है।

5. इस शैली में मूल्यांकनकर्ता अपनी बात को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए तर्क प्रस्तुत करता है। इस हेतु वह किन्तु, परन्तु, मगर, यदि, तो, यद्यपि, तथापि आदि शब्दों का प्रयोग करता है।

6. कभी-कभी मूल्यांकन को प्रभावपूर्ण बनाने के लिए दूसरों से तुलना भी की जाती है। इसके लिए जितनी उतनी, कैसा-वैसा, जब-तब आदि तुलनात्मक सूचक शब्दों का प्रयोग होता है।

7. इसमें वाक्यों में आपस में तर्कसम्मत तालमेल होना चाहिए, अतः इसमें वक्ता स्वयं प्रश्न करके भी मूल्यांकन कर सकता है। इसमें कारण, कार्यसूचक वाक्य और प्रश्न वाक्यों का भी महत्व है।

8. इसमें मिश्र वाक्यों का प्रयोग होता है।

9. निष्कर्षतः इसमें तीन अवस्थाएँ होती है- (अ) कथन, (ब) कथन पर विभिन्न विद्वानों के *मत, प्रतिक्रिया और (स) इनके आधार पर उनका मूल्यांकन व निष्कर्ष

10. इसमें प्रतिक्रिया, गुण-दोष, तर्क, विभिन्न मतों का अधिक महत्व होने के कारण व्यक्ति का महत्व भी प्रकट होता है। 11. यह शैली शिक्षा, विज्ञान तथा किसी समस्या के निराकरण में काम आती है। मूल्यांकन शैली के उदाहरण

(1) विज्ञान के विषय में मूल्यांकन शैली- शहरी कुष्ठ कार्यक्रमों का लेखा-जोखा तब तक पूर्ण नहीं होगा, जब तक इन रोगियों की कमियों व पुनर्व्यस्थापन की बात सामने नहीं आती। गंदी बस्तियों में ऐसे मरीजों पर सर्वेक्षण करने के बाद यह पाया गया है कि रोग की प्राथमिक अवस्था में ही उपचार साधनों के प्रयोग के लिए इन्हें प्रोत्साहित नहीं किया गया। वहाँ ऐसे मरीज अधिक संख्या में पाए जाते हैं, जिससे रोग की प्राथमिक अवस्था में कुरूपता आ जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि अर्ध चिकित्सीय कर्मचारियों, समाज सेवियों आदि के दल बनाए जाए जो उन्हें आवश्यक जानकारी दे। कुष्ठ रोग से निपटने के लिए दो तरह से अभियान चलाया जाना चाहिए। प्रथम यह कि प्रभावशाली दवाओं के द्वारा ऐसे मरीजों का उपचार करके उनकी संख्या कम की जानी चाहिए। दूसरा सर्वेक्षण दल इस रोग से बचने के बारे में सलाह दें।

(2) कला के विषय में मूल्यांकन शैली अरस्तु पाश्चात्य काव्य शास्त्र के आद्याचार्य है। ऐतिहासिक दृष्टि से उनका स्थान नहीं है जो भारतीय काव्य शास्त्र में भरत का। यद्यपि भारत में भरत मुनि से पूर्व, शिलालि आदि अनेक आचार्य इस क्षेत्र में कार्य कर चुके थे, किन्तु काव्य का सर्वप्रथम व्यवस्थित विवेचन आज भरत मुनि के नाट्य शास्त्र में ही उपलब्ध है। इसी प्रकार यूरोप में भी अरस्तु से पहले प्रोतगोरस, हिप्पिअस, अरिस्तोफनेस और प्लेटो आदि विद्वान काव्य के विभिन्न अंगों का सैद्धांतिक विवेचन कर चुके थे। परन्तु उनमें से किसी का विवेचन इतना नियमित एवं व्यवस्थित नहीं था कि उसे काव्य शास्त्र की कोटि में रखा जा सके। प्लेटो ने यूँ तो काव्य और कवि के विषय में बहुत कुछ कहा है किन्तु इस विषय में उनका दृष्टिकोण निषेधात्मक ही था। अतः कतिपय रचनाओं को स्वीकार करते हुए भी उन्हें काव्य शास्त्र के प्रथम आचार्य पद पर अधिष्ठित करना अनुचित होगा। यह गौरव केवल अरस्तु को ही प्राप्त है।