विचारात्मक या विचारपरक शैली किसे कहते हैं? उदाहरण देते हुए उसके प्रमुख लक्षण लिखिए।

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उत्तर-विचारपरक या विचारात्मक शैली में विचारों की प्रधानता रहती है। इसमें सारे संचरक वाक्य किसी एक विचार या उसके विभिन्न पक्षों को प्रस्तुत करते हैं। इस शैली में वक्ता या लेखक को विवरण मूल्यांकन अथवा व्याख्या को प्रस्तुत नहीं करना होता है। हिन्दी में कुछ संरचनाएँ ऐसी मिलती हैं, जिनके विभिन्न पक्ष तो प्रस्तुत हो जाते हैं, किन्तु उनका विवरण या मूल्यांकन नहीं होता, व्याख्या भी वैसी नहीं होती, जैसी व्याख्यात्मक शैली में होती है। इस प्रकार की शैली को विचारात्मक शैली नाम दिया गया है। निम्नलिखित उदाहरण में विचारों की प्रधानता स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है—“स्त्री अपने बालक को हृदय से लगाकर जितनी निर्भर है, उतनी किसी और अवस्था में नहीं। वह अपनी संतान की रक्षा के समय जैसी उग्र चंडी है, वैसी और किसी स्थिति में नहीं। इसी से कदाचित लोलुप संसार उसे अपने चक्रव्यूह में घेरकर बाणों से छलनी करने के पूर्व इसी कवच को छीनने का विधान करता है ।”

उपर्युक्त संरचना में मातृत्व और बालक की रक्षा के प्रति माता की भावना प्रदर्शित की गई है। इसमें न तो विवरण है और न व्याख्या, अपितु एक विचार है।

विचारात्मक शैली के लक्षण या विशेषताएँ-

1. विचारात्मक शैली में विचारों की प्रधानता रहती है।

2. इस शैली में भाषा सरल, सुबोध, सुसंगठित और प्रभावोत्पादक होती है।

3. इस शैली में बुद्धि तत्व की प्रधानता रहती है और तर्कपूर्ण विश्लेषण का अधिक प्रयोग किया जाता है।

4. इसमें एक-एक वाक्य किसी एक विचारक या उसके विभिन्न पक्षों के लिए प्रयोग किया जाता है।

5. इस शैली में लेखक विवरणात्मक शैली की भाँति तटस्थ नहीं रहता है।

6. इसमें वाक्य सरल और वर्णन को सजीव बनाने में सहायक होते हैं।

7. इसमें लेखक विभिन्न प्रकार के क्रियापदों के प्रयोग से प्रकृति के विभिन्न रंगों को उजागर करता है।