प्राप्यों के रख-रखाव के उद्देश्य क्या है ? प्राप्यों में विनियोग के आकार को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए। What is the purpose of receivables maintenance? Describe the factors affecting the size of investment in receivables.

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प्राप्यों के प्रबन्ध का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Management of Receivables)

एक सुदृढ़ प्रबन्धकीय नियन्त्रण के अन्तर्गत प्राप्यों का समुचित प्रबन्ध करना आवश्यक होता है। प्राप्यों का आशय देनदारों एवं प्राप्य विपत्रों के योग से है। प्राप्य चल सम्पत्तियों के अंग होते हैं एवं इनका सृजन उधार बिक्री के फलस्वरूप होता है। इसमें व्यवसाय की कार्यशील पूंजी का एक महत्वपूर्ण भाग निरन्तर विनियोजित रहता है।

वर्तमान औद्योगिक एवं व्यावसायिक युग साख या उधार (Credit) का युग है। साख का विक्रय से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है तथा विक्रय के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही साख नीतियों को अपनाया जाता है। अतः वर्तमान परिस्थितियों में कोई भी व्यवसाय तब तक तीव्र गति से प्रगति नहीं कर सकता जब तक कि वह अपने ग्राहकों को साख की सुविधा प्रदान नहीं करता। सभी व्यावसायिक उपक्रमों द्वारा अपने माल तथा सेवाओं को उधार बेचा जाता है जिसके बदले में उन्हें ग्राहकों से रोकड़ न मिलकर प्राप्य बिल प्राप्त होते हैं। विभिन्न प्रकृति की व्यावसायिक कम्पनियों में कुल सम्पत्तियों का 5% से 25% भाग प्राप्य बिलों में विनियोजित होता है। यह अनुपात निर्माणक कम्पनियों में 5% से 10% तक और व्यापारिक कम्पनियों में 20% से 25% तक होता है। इस अनुपात में कम्पनियों की पूँजी संरचना में प्राप्तियों का महत्वपूर्ण स्थान स्पष्ट हो जाता है। अतः कम्पनी के सफल संचालन के लिये प्राप्तियों का भी समुचित प्रबन्ध किया जाना आवश्यक होता है।

प्राप्यों के प्रबन्ध में हम यह निश्चित करते हैं कि प्राप्यों की राशि कितनी हो, उधार किसे दिया जाये और किसे नहीं उधार कितनी अवधि के लिए दिया जाये ? उधार कब दिया जाये और कब नहीं ? उधार की वसूली, कब, कैसे और किसके द्वारा की जायेगी ? प्राप्यों में विनियोजित कोष का भाग न तो आवश्यकता से अधिक होना चाहिए और न ही आवश्यकता से कम। इस सम्बन्ध में यह कहना अत्यधिक उपयुक्त होगा कि प्राप्यों के विनियोजन की सीमा को अनुकूलतम स्तर पर बनाये रखना ही प्राप्यों के प्रबन्ध का सार है।

  • प्रो. एस. सी. कुच्छल के अनुसार, “प्राप्यों के प्रबन्ध का आशय आन्तरिक अल्पकालीन परिचालन प्रक्रिया के एक भाग के रूप में इस सम्पत्ति में कोर्यों के विनियोजन से सम्बन्धित निर्णय लेना है।”

प्राप्यों के प्रबन्ध का उद्देश्य (Objective of Receivables Management) : प्राप्यों के प्रबन्ध का मुख्य उद्देश्य साख नीति अपनाने के फलस्वरूप प्राप्यों में किये गये विनियोग से अधिकतम लाभ कमाना है। प्राप्यों के प्रबन्ध के प्रमुख उद्देश्यों को निम्न प्रकार से स्पष्ट कर सकते हैं

(1) अधिकतम लाभदायकता अधिकतम लाभ अर्जित करने के उद्देश्य से भी प्राप्य स्तर बनाये रखना प्राप्य प्रबन्ध का प्रमुख उद्देश्य है।

(2) डूबत ऋण सम्बन्धी हानि को कम करना प्राप्यों के प्रबन्ध का मुख्य उद्देश्य डूबत ऋणों से होने वाली हानि को कम से कम करने के प्रयास करने चाहिए।

(3) वित्तीय सुदृढ़ता बनाये रखना–यदि कोई व्यावसायिक संस्था प्राप्यों के प्रबन्ध पर उचित ध्यान न दे तो वित्तीय सुदृढ़ता बनाये रखना काफी कठिन होता है। अतः वित्तीय सुदृढ़ता बनाये रखना भी प्राप्य प्रबन्ध का प्रमुख उद्देश्य होता है।

(4) विनियोजित रकम पर उचित प्रतिफल को प्राप्त करना प्रत्येक संस्था यह चाहती है कि प्राप्यों में विनियोजित रकम पर उचित प्रतिफल प्राप्त हो सके, यह भी प्राप्यों का मुख्य उद्देश्य होता है।

(5) उचित साख नीति का निर्धारण प्राप्यों के प्रबन्ध के अन्तर्गत साख नीति का निर्धारण किया जाता है। साख नीति में साख की मात्रा, साख की अवधि एवं साख के पक्षकारों का निर्धारण किया जाता है।

प्राप्यों में विनियोग के आकार को प्रभावित करने वाले घटक (Factors Affecting the Size of Investment in Receivables)

प्राप्तियों में निवेश के प्रबन्ध का आशय इसमें विनियोग स्तर के सम्बन्ध में निर्णय लेने से है। प्राप्तियों में निवेश का प्रबन्ध साख विभाग द्वारा किया जाता है यह विभाग साख का सृजन और वसूली करता है तथा समय-समय पर इस बारे में वित्त प्रबन्ध को प्रतिवेदनों के द्वारा सूचित करता है। प्राप्तियों में निवेश का मूल उद्देश्य अधिकतम प्रतिफल प्राप्त करना है ताकि अंशधारियों की ऊँची दर से लाभांश वितरित किया जा सके। किन्तु माल को उधार बेचना जोखिमपूर्ण हो सकता है। अतः साख पर माल बेचने से जोखिम का उचित अनुमान लगाया जाना आवश्यक होता है। अतः प्राप्तियों में निवेश के आकार को निश्चित करने से पूर्व वित्त प्रबन्धक को निम्नलिखित तत्वों पर विचार कर लेना चाहिए

(1) उधार विक्रय की मात्रा-प्राप्तियों में निवेश के आकार को उधार बिक्री की मात्रा प्रभावित करती है। प्राप्तियों में निवेश के आकार तथा उधार विक्रय की मात्रा में प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है। यदि किसी कम्पनी द्वारा अधिक मात्रा में उधार बिक्री करने का निर्णय लिया जाता है तो निश्चित ही प्राप्तियों में निवेश का आकार बढ़ेगा। इसके विपरीत, यदि कम मात्रा में माल की उधार बिक्री की जाती है तो प्राप्तियों में निवेश का आकार घटेगा।

(2) विक्रय की शर्तें-प्राप्तियों में निवेश के आकार को निर्धारण तत्वों में विक्रय की शर्तें भी महत्त्वपूर्ण तत्व है, ऐसे उपक्रम या संगठन जो साख पर विक्रय न करने का निश्चय कर लेते हैं, वहाँ इसका कोई अस्तित्व ही नहीं होता और न ही प्राप्तियों के निवेश के प्रबन्ध की आवश्यकता ही उत्पन्न होती है। उदाहरण के लिए, विभागीय भण्डार, श्रृंखलाबद्ध दुकानें तथा सुपर बाजार आदि माल का उधार विक्रय नहीं है और न ही उन्हें प्राप्तियों का प्रबन्ध करना पड़ता है।

(3) उधार विक्रय की नीतियाँ एवं व्यवहार प्राप्तियों में निवेश के आकार का एक प्रमुख उल्लेख निर्धारक तत्व उपक्रम की उधार विक्रय की नीतियाँ एवं व्यवहार भी हैं। यदि अल्प अवधि में यही माल बेचा जाता है तो बिक्री के साथ सदैव कम रहेगा। इसके विपरीत यही लम्बी अवधि के लिये माल की उधार बिक्री की जाती है तो प्राप्तियों में निवेश के आकार का अनुपात बढ़ जायेगा।

(4) उघार वसूली नीति प्राप्तियों में निवेश के आकार का एक उल्लेखनीय निर्धारक तत्व उपक्रम की साख की वसूली नीति भी है। यदि साख विभाग की उधार देने की नीति उदारतापूर्वक है तो प्राप्तियों के लिए निवेश का आकार बड़ा होता है। इसके विपरीत यदि उपक्रम की नीति कठोर है तो स्वाभाविक रूप से प्राप्तियों में निवेश का आकार छोटा होगा। इसी प्रकार वित्त विभाग की उधार वसूली सम्बन्धी नीति एवं क्षमता भी प्राप्तियाँ निवेश के आकार को प्रभावित करते हैं।

(5) नकद छूट की नीति-नकद छूट का आकार भी किसी उपक्रम की पूँजी लागत और प्राप्तियों में निम्न आकार को निर्धारित करने वाला एक महत्वपूर्ण तत्व है। यदि उपक्रम की पूँजी लागत कम है। तथा उसके द्वारा दी जाने वाली नकद छूट अधिक है तो ऐसी स्थिति में नकद छूट देने से उपक्रम को कम हानि होगी। यदि उपक्रम की पूँजी लागत तथा दी जाने वाली नकद छूट समान है तो नकद छूट का फर्म पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। यदि नकद छूट की दर कम है और पूँजी लागत की दर अधिक है तो ऐसी स्थिति में नकद छूट देने से उपक्रम उधार विक्रयका वर्तमान मूल्य भी ऊँचा होगा।

(6) सामान्य घटक—प्राप्तियों में विनियोग के आकार को प्रभावित करने वाले उपयुक्त घटकों के अतिरिक्त ऐसे घटक भी सम्मिलित किये जाते हैं जो उपक्रम की सम्पूर्ण सम्पत्तियों में विनियोग से सम्बन्धित निर्णयों को प्रभावित करते हैं; जैसे–व्यवसाय की प्रकृति एवं उसका स्वभाव, विक्रय का आकार, मूल्य स्तर, उच्चावचन, कोषों की उपलब्धता, व्यवसाय का आकार, प्रबन्धकों का दृष्टिकोण आदि।