नकदी रखने के क्या उद्देश्य है ? नकद प्रबंधन के उद्देश्यों की व्याख्या कीजिए। नकद प्रबन्धन के कार्यों की चर्चा कीजिए।

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रोकड का प्रबन्ध का अर्थ (Meaning of Cash Management) : व्यावसायिक उपक्रमों में रोकड़ प्रबन्ध की प्रभावी व्यवस्था का अभाव देखा जाता है। सामान्यतया बैंक खातों में आवश्यकता रोकड़ शेष होते हैं जिनका अनुकूलतम उपयोग नहीं किया जाता है। एक व्यावसायिक संस्था की विभिन्न इकाइयाँ रोकड़ को अलग-अलग बैंकों से रखती हैं। जिससे अनावश्यक रूप से रोकड़ की अधिक आवश्यकता होती है। रोकड़ का उचित प्रबन्ध व्यावसायिक प्रबन्धकों का सबसे बड़ा सिरदर्द होता है तथा किसी व्यावसायिक उपक्रम के सफलतापूर्वक संचालन हेतु पर्याप्त सम्पत्तियों की व्यवस्था करना आवश्यक होता है।

यदि चालू दायित्वों की पूर्ति के लिए पर्याप्त मात्रा में तरल सम्पत्तियों का अभाव होता है तो ऐसी स्थिति में, कम्पनी वित्तीय संकट में पड़ सकती है। पर्याप्त मात्रा में तरल सम्पत्तियों की उपस्थिति किसी उपक्रम की वित्तीय सुदृढ़ता की प्रतीक होती है। तरल सम्पत्तियों के अभाव में कम्पनी के प्रबन्धकों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों के मनोबल एवं आत्मविश्वास में कमी आती है। ऋणदाताओं एवं अंशधारियों को कम्पनी की आर्थिक स्थिति पर सन्देह होने लगता है। संस्था के कार्य संचालन में बाधायें उत्पन्न हो सकती हैं, जिसके कारण उसकी लाभार्जन क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है तथा उसकी ख्याति में भी कमी आ सकती है। अतः किसी उपक्रम की तरल स्थिति को सुदृढ़ बनाये रखना अति आवश्यक होता है। तरल सम्पत्तियों में रोकड़-शेष, बैंक शेष तथा ऐसी अन्य प्रतिभूतियों को सम्मिलित किया जाता है, जिन्हें आवश्यकता पड़ने पर तत्काल ही रोकड़ में परिवर्तित किया जा सके।

रोकड़ प्रबन्ध के उद्देश्य (Objectives of Cash Management) : एक व्यावसायिक संस्था द्वारा रोकड़ एवं रोकड़ तुल्य सम्पत्तियाँ रखने के मुख्य प्रयोजनों या उद्देश्यों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) भुगतान सम्बन्धी व्यवस्था-व्यापार के सामान्य संचालन में प्रत्येक संस्था को माल के पूर्तिकर्ताओं, कर्मचारियों आदि को बिस्तर नकद भुगतान करने होते हैं। यदि भुगतान सही समय पर नहीं किए जायें, तो व्यावसायिक चक्र में बाधा उत्पन्न हो जाती है, अतः रोकड़ प्रबन्ध का मुख्य उद्देश्य व्यवसाय से सम्बन्धित विभिन्न भुगतानों को करने हेतु आवश्यक नकद राशि प्राप्त कराना है। उचित रोकड़ शेष रखने से संस्था को अग्र लाभ प्राप्त हो सकते हैं

(2) व्यापारिक छूट का लाभ उचित रोकड़ शेष रखने वाली संस्था समय पर भुगतान करने के बाद व्यापारिक छूट का लाभ उठा सकती है जिससे संस्था के लाभों में वृद्धि होती है।

(3) व्यावसायिक अवसरों का लाभ-उचित रोकड़ शेष रखने वाली संस्थाएँ अनुकूल व्यावसायिक अवसरों का लाभ उठाती है-जैसे बाजार में आकस्मिक रूप से कच्चे माल के मूल्यों में कमी होने पर माल का अधिक मात्रा में स्टॉक करना, समृद्धि काल में व्यवसाय का विस्तार करना आदि।

(4) अप्रत्याशित घटनाओं का सामना एक व्यावसायिक संस्था द्वारा रोकड़ एवं रोकड़ तुल्य सम्पत्तियों रखने का एक उद्देश्य अप्रत्याशित आकस्मिकताओं का सामना करना भी हो सकता है। प्रायः किसी-किसी संस्था को ऐसी आकस्मिकताओं का सामना करना पड़ सकता है जिनके सम्बन्ध में पहले कोई विचार नहीं किया गया है। जैसे हड़ताल, आग लग जाना आदि अप्रत्याशित घटनाओं के समय पर्याप्त रोकड़ शेष रखने वाली संस्थाएँ इन अप्रत्याशित घटनाओं का सामना आसानी से कर सकती है।

रोकड़ के स्तर को निर्धारित करने वाले घटक (Factors Determining Cash Balance) : किसी फर्म में कितना नकदी रखी जाये, यह बताना बहुत कठिन है। इस बारे में निम्न तत्व सामने आते हैं.

(1) व्यापारिक साख की उपलब्धता (Availability of Trade Credit)– यदि कोई व्यापारिक फर्म किसी क्षेत्र में काफी समय से काम कर रही है और बाजार में उसकी ख्याति अच्छी है तो उसको आसानी से व्यापारिक साख उपलब्ध होती है। व्यापारिक साख की आसानी से प्राप्ति नकदी की कम आवश्यकता पर बल देती है। इसके प्रतिकूल जिन संस्थाओं को साख की सुविधा नहीं मिलती उन्हें अधिक नकद कोश रखने पड़ते हैं। इसी कारण व्यवसाय की स्थापना के प्रारम्भिक वर्षों में अधिक नकद कोषों की आवश्यकता होती है।

(2) उत्पादन नीति (Production Policy) यदि फर्म की उत्पादन करने की नीति माँग के अनुसार उत्पादन करने की है, तो कच्चे माल फर्म की उतनी मात्रा क्रय की जायेगी, जो वर्तमान माँग के अनुसार उत्पादन करने के लिए आवश्यक है, तो फर्म को कम रोकड़ रखने की आवश्यकता होगी।

(3) उत्पादन चक्र की अवधि (Duration of Production Cycle) यदि उत्पादन चक्र की अवधि अधिक है तो अधिक नकदी की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत यदि उत्पादन चक्र छोटा है तो कम नकदी से भी काम चल सकता है।

(4) माल की माँग की प्रकृति (Nature of Product’s Demand)–किसी फर्म द्वारा यदि ऐसी वस्तुएँ बेची जाती हैं जिनकी मनुष्य को प्रतिदिन आवश्यकता पड़ती है एवं वह अक्सर निरन्तर खरीदता रहता है तो ऐसी स्थिति में अधिक नकद कोषों की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि इसके क्रय-विक्रय में रोकड़ का प्रवाह नियमित रूप से होता रहता है। इसके विपरीत पूँजीगत वस्तुओं के उत्पादकों को अधिक रोकड़ शेषों से ही काम चल जायेगा।

(5) क्रय-विक्रय की शर्तें (Term of Purchase and Sale)-यदि किसी फर्म को उचित शर्तों पर कच्चा माल प्राप्त हो जाता है तथा तैयार माल नकदी के रूप में बिक जाता है। तो कम रोकड़ की आवश्यकता होगी, अन्यथा अधिक रोकड़ की आवश्यकता होगी।

(6) संग्रहण नीति (Collection Policy) यदि संस्था की संग्रहण या वसूली नीति कुशल एवं प्रभावशाली है, तो संस्था को समय पर रोकड़ प्राप्त होती रहेगी तथा डूबत ऋण भी कम होंगे। अतः संस्था को कम रोकड़ रखने की आवश्यकता होगी। इसके विपरीत स्थिति में संस्था को अधिक रोकड़ रखने की आवश्यकता होगी।

(7) बैंकों से सम्बन्ध (Banker’s Relations) यदि फर्म के बैंकों में लेन-देन के सम्बन्ध अच्छे हैं तथा अधिविकर्ष (Overdraft) की सुविधा मिलती है तो कम रोकड़ रखने की आवश्यकता होगी।

(8) प्रबन्धकीय नीति (Managerial Policy)–फर्म द्वारा रखी जाने वाली नकदी की मात्रा प्रबन्ध की तरलता पसन्दगी, जोखिम सहन करने की क्षमता, स्कन्ध व विनियोग सम्बन्धी नीति आदि पर निर्भर करती है।