क्रय प्रेरणा क्या है ? क्रय प्रेरणाओं का वर्गीकरण कर उनकी व्याख्या कीजिए।

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क्रय प्रेरणा का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Buying Motive) : प्रत्येक मानव जब भी कभी कोई क्रय करता है तो उसके पीछे कोई न कोई प्रेरणा कार्य कर रही होती है एवं कोई न कोई उद्देश्य अवश्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति की प्रेरणायें एवं उद्देश्य भी भिन्न-भिन्न होते हैं। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक वस्तु के क्रय के पीछे भी समान प्रेरणायें कार्य नहीं करती है। एक व्यक्ति कोई वस्तु विशेष प्रेरणा एवं उद्देश्य से क्रय करता है तो दूसरा व्यक्ति उसी वस्तु को किसी अन्य प्रेरणा के कारण क्रय कर सकता है। क्रय प्रेरणा वह शक्ति, प्रभाव, विचार या लालसा है जो क्रेताओं को उनकी आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए किन्हीं विशिष्ट वस्तुओं एवं सेवाओं को खरीदने की प्रेरणा प्रदान करती है। दूसरे शब्दों में, क्रय प्रेरणा यह आन्तरिक इच्छा या लालसा है जिससे प्रेरित होकर कोई व्यक्ति किसी विशेष को खरीदता है।

  • वस्तु डी. जे. दूरियन (D. J. Durian) के अनुसार, “क्रय-प्रेरणाएँ वे शक्तियों या तत्व है जो क्रय करने का आवेग उत्पन्न करते हैं, अथवा वस्तु या सेवा के क्रय करने में प्रेरणा देते हैं या रुचि निर्धारित करते हैं।
  • विलियम जे स्टाण्टन (William J. Stanton) के अनुसार, “एक प्रेरणा उस समय क्रय प्रेरणा बन जाती है, जब व्यक्ति किसी वस्तु के क्रय द्वारा सन्तुष्टि प्राप्त करने का प्रयास करता है।” के. के. गुप्ता (K. K. Gupta) के अनुसार, क्रय प्रेरणा वह आन्तरिक शक्ति है जो क्रेता को अपनी आवश्यकताओं की सन्तुष्टि हेतु किसी वस्तु या सेवा को क्रय करने के लिए प्रेरित करती है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि क्रय प्रेरणा से आशय उन आन्तरिक भावना, शक्तियों, आवेग या लालसा से है जो क्रेता को किसी वस्तु या सेवा को खरीदने के लिए प्रोत्साहित करती है।

  • हेम्पटन तथा जबीन (Hampton and Zabin) के अनुसार, “क्रय प्रेरणा वह विचार, भावना या दशा है जो किसी भी व्यक्ति को क्रय करने के लिए प्रोत्साहित करती है।”

क्रय प्रेरणाओं का वर्गीकरण (Classification of Buying Motives)

प्रत्येक व्यक्ति स्वहित में रूचि रखने वाला होता है और स्वयं की इच्छाओं, भावनाओं, लालसाओं एवं बुद्धि के अनुरूप व्यवहार करता है। यही कारण है कि विपणन व्यवहार के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार की क्रय प्रेरणाएँ दिखायी देती है। विभिन्न विद्वानों ने क्रय-प्रेरणाओं को अलग-अलग ढंग से वर्गीकृत किया है। प्रमुख विद्वानों द्वारा क्रय प्रेरणा का वर्गीकरण निम्न प्रकार किया गया है

  • ई. जे. मेककार्थी (E.J. McCarthy) ने आठ क्रय प्रेरणाएँ बताई हैं, जिन्हें निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

(i) आराम एवं मनोरंजन, (ii) विलक्षणता (Curiosity), (iii) परिचय करना, (iv) मिलनसार, (v) अभिमान, (vi) भय, (vii) विषय सुख की सन्तुष्टि चार्ल्स बी. रोध (Charles B. Roth) ने भूख, आदत, सैक्स, ईर्ष्या, भय, दुश्मनी, संघर्ष, उत्सुकता, सामाजिक प्रतिष्ठा, प्यार, आडम्बर, आराम, लालच, वैयक्तिक विकास आदि को क्रय-प्रेरणाऐं माना है। विलियम जी. कार्टर (William G. Carter) ने भी इसी प्रकार की कुछ क्रय प्रेरणाओं का प्रमुख उल्लेख किया है जो निम्न प्रकार है पैसा, आडम्बर, उपलब्धि की इच्छा, प्रतिस्पर्द्धा की भावना, शृंगार, स्वच्छता, संग्रह, मनोरंजन, रचना, साथ, मानसिक संस्कृति, अनुमोदन प्रवृत्ति, महत्वाकांक्षा, आदर-सत्कार, स्नेह, सामाजिक उपलब्धि, आराम, कलात्मक रुचि, सैक्स, नकल, उत्सुकता, आत्म-रक्षा, सहानुभूति, कृतज्ञता, देश भक्ति आदि।

  • मेलविन एस. हैटविक (Melvin S. Hatvick) ने क्रय प्रेरणाओं को दो वर्गों में विभाजित किया है 1. प्राथमिक क्रय प्रेरणाएँ (Primary Buying Motives) प्राथमिक क्रय प्रेरणाएँ वे हैं जो व्यक्ति में जन्मजात होती हैं। ये प्रेरणाएँ व्यक्ति के जीवित रहने की इच्छा के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती है। दूसरे शब्दों में इन प्रेरणाओं के पीछे मुख्य रूप से मनुष्य की आवश्यक आवश्यकताएँ होती हैं। एक विद्वान ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि, “इन प्रेरणाओं को कोई भी व्यक्ति सीखता नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति इन प्रेरणाओं के साथ ही पैदा होता है और इन जीवन पर्यन्त ये प्रेरणायें उसके साथ रहती हैं।”

प्राथमिक क्रय प्रेरणाओं को आवश्यकताओं के अतिरिक्त अन्य वातें भी प्रभावित करती है। मेलविन के अनुसार, प्राथमिक क्रय प्रेरणाओं को प्रभावित करने वाले प्रमुख तथ्य निम्न प्रकार है (i) एवं पीना, (11) आराम, (iii) विपरीत लिंग को आकर्षित करना, (iv) प्रिय व्यक्तियों का भला करना, (v) भय एवं खतरे से मुक्ति प्राप्त करना, (vi) श्रेष्ठतर (vii) सामाजिक मान्यता प्राप्त करना, (vin) दीर्घकाल तक जीवित रहना आदि।

2. गौण या सहायक क्रय प्रेरणाएँ (Secondary Buying Motives) गौण या सहायक क्रय प्रेरणाएँ समाज या वातावरण से उत्पन्न होती है। मेलदिन में गौण क्रय प्रेरणाओं के नौ प्रकार बताएँ है

जो निम्नानुसार है

(1) सौदेबाजी, (ii) सूचना, (iii), (iv) कार्यकुशलता, (v) सुविधा, (vi) विश्वसनीयता तथा उच्च किस्म (vii) स्टाइल एवं सुन्दरता (viii)एवं तथा (ix) उत्सुकता। अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से क्रय प्रेरणाओं को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) भावात्मक एवं विदेकात्मक प्रेरणा (Emotional and Rotaional Buying Motives) – भावात्मक क्रय प्रेरणाओं से ऐसी क्रय प्रेरणाओं से है जिनमें मस्तिष्क अथवा विवेक के स्थान पर हृदय या भावना की प्रधानता रहती है। व्यवहार में अनेक भावात्मक प्रेरणायें क्रेता को वस्तु करने के लिए अभिप्रेरित करती है, जैसे-भूख प्यास, साथी की इच्छा, प्रतिष्ठा, अहंकार, गौरव-भाव, ईर्ष्या, प्रेम, सेक्स, सुरक्षा, शत्रुता, सुन्दरता आदि विकर्ता भावात्मक क्रय प्रेरणाओं का पता लगाकर उनके प्रचार द्वारा उपभोक्ता की भावना को प्रेरित करता है, जैसे-लक्स नहाने के साबुन का निर्माता यह विज्ञान करता है कि हेमा मालिनी कहती है कि, “लक्स से मेरा रंग-रूप निखर आता है।” शृंगार प्रसाधन बनाने वाली संस्थायें अपनी क्रीम के विज्ञापन में एक सुन्दर स्त्री का चित्र देकर उसमें सुझावात्मक विचार प्रस्तुत करती है कि, “यदि आप और आकर्षक चाहती हैं तो आप इस क्रीम का प्रयोग करें” विवेकपूर्ण क्रय प्रेरणाओं से आशय ऐसी क्रय प्रेरणाओं से है जिसमें भावनाओं की अपेक्षा मस्तिष्क या विवेक की प्रधानता अधिक होती है। विवेकपूर्ण क्रय प्रेरणाओं के अन्तर्गत क्रय की जाने वाली वस्तु की कीमत, मितव्ययिता, प्रयोग, टिकाकता, उपयोगिता, सेवा, विश्वसनीयता, सुविधा, कार्यकुशलता आदि अनेक तत्वों पर विचार करके वस्तु को क्रय करने के निर्णय लिए जाते हैं। विवेकपूर्ण प्रेरणाओं से प्रेरित क्रेता वस्तु के क्रय करने में अधिक समय लगता है, अर्थात् वस्तु के गुण-दोषों पर पर्याप्त विचार करता है। विपणनकर्ता दिवेकपूर्ण प्रेरणाओं का पता लगाकर अपने विज्ञापन में इन प्रेरक तत्वों का प्रचार करते हैं। जैसे-कुकर के निर्माता अपने विज्ञापन में समय तथा ईंधन की बचत की बात कहते हैं। पंखों के निर्माता अपने विज्ञापन में अपने पंखों की हवा और टिकाऊपन पर अधिक महत्व देते हैं। सामान्यतः प्रत्येक क्रेता विवेकपूर्ण क्रय करने का प्रयत्न करता है लेकिन कभी-कभी क्रेता मित्रता, प्रेम, ख्याति, ईर्ष्या आदि भावात्मक तत्वों से प्रभावित होकर क्रय निर्णय में विवेक का प्रयोग कर पाते हैं।

2. अर्जित एवं अन्तर्यर्ती क्रय-प्रेरणायें (Acquired or Inherent Buying Motives) अर्जित क्रय-प्रेरणायें, ऐसी प्रेरणायें हैं, जो सीखी हुई हैं और क्रेताओं के वातावरण से सम्बन्धित होती हैं। इन्हें ‘गौण’ अथवा ‘सहायक’ क्रय प्रेरणायें भी कहा जाता है। उपभोक्ता को इन क्रय प्रेरणाओं का विकास करना होता है। वे अपने सामाजिक परिवेश एवं वातावरण को देखकर इन क्रय प्रेरणाओं का विकास करते हैं। इन क्रय प्रेरणाओं में मितव्ययता, सूचनायें, कार्यकुशलता, लाभ, स्वच्छता, सुविधा, किस्म, विश्वसनीयता या निर्भरता, सौन्दर्य, फैशन, टिकाऊपन, विलक्षणता, सामाजिक प्रतिष्ठा, मान्यता आदि को सम्मिलित किया जा सकता है। उपभोक्ताओं को इनमें मिलने वाली सन्तुष्टि ही इन प्रेरणाओं का मूल्यांकन आधार बनती है। इन क्रय प्रेरणाओं पर सामाजिक-आर्थिक स्थितियों और शिक्षा स्तर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं।

अन्तर्वर्ती क्रय-प्रेरणायें, ऐसी प्रेरणायें हैं जिन्हें सीखना नहीं पड़ता है। इसके विपरीत, ये प्रेरणायें हर क्रेता में जन्म से ही विद्यमान होती हैं। हर सामान्य व्यक्ति इन प्रेरणाओं के साथ ही जन्म लेता है अथवा उनको विकसित करने की क्षमता के साथ जन्म लेता है। इन प्रेरणाओं में भौतिक, मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की खरीद को प्रोत्साहित करने वाली प्रेरणाओं को सम्मिलित किया जाता है। अन्य शब्दों में भूख, प्यास, नींद, आराम, प्रशंसा, शक्ति-प्राप्ति, सुरक्षा, क्रीड़ा एवं आनन्द, अस्तित्व-रक्षण, प्रियजनों का कल्याण आदि से सम्बद्ध प्रेरणायें अन्तर्वती क्रय प्रेरणायें हैं। संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि अन्तर्वर्ती क्रय-प्रेरणायें सहज एवं मूल मानवीय प्रवृत्तियों से सम्बन्ध रखती है, जबकि अर्जित क्रय-प्रेरणायें वातावरण से सम्बन्धित होती है। अन्तर्वर्ती क्रय-प्रेरणायें प्राथमिक प्रेरणायें हैं और अत्यधिक स्पष्ट है, सुनिश्चित है। किन्तु अर्जित क्रय-प्रेरणायें गौण प्रेरणायें है और अपेक्षाकृत कम स्पष्ट है।

3. उत्पाद एवं संरक्षण क्रय-प्रेरणायें (Product and Patronage Buying Motives)— उत्पाद क्रय-प्रेरणायें, वे प्रेरणायें हैं जो किसी विशिष्ट उत्पाद को खरीद हेतु प्रोत्साहित करती है। ऐसा प्रोत्साहन उस विशिष्ट वस्तु के भौतिक अथवा मनोवैज्ञानिक आकर्षणों से उत्पन्न होता है। वस्तु की डिजाइन, रंग, आकार, निष्पादन, पैकेज अथवा कीमत उत्पाद क्रय-प्रेरणाओं का आधार होती है। संरक्षण क्रय-प्रेरणायें वे प्रेरणायें हैं जो क्रेताओं को किसी विशिष्ट विक्रेता से ही वस्तुएँ क्रय करने को प्रोत्साहित होती है। विक्रेताओं में निर्माता, योक व्यापारी, फुटकर व्यापारी और फुटकर विक्रेता भी सम्मिलित होते हैं। कोपलैण्ड लिखते हैं कि “उपभोक्ता और मध्यस्थ दोनों ही खरीद करते समय उन घटकों को अधिक महत्व देते हैं जो कि प्रत्यक्ष रूप से वस्तुओं से सम्बन्ध नहीं रखते हैं, बल्कि वे विक्रेताओं के साथ अपने पिछले अनुभवों अथवा सतत् भावी सम्बन्धों की समस्या से सम्बद्ध होते हैं। इन घटकों को ही संरक्षण-प्रेरणायें कहा जाता है।” कोपलैण्ड के विचारानुसार विक्रेता की विश्वसनीयता, सुपुर्दगी में समय की पावन्दी, सुपुर्दगी में शीघ्रता, वस्तुओं से पूर्ण सन्तुष्टि, विभिन्न किस्में और विश्वसनीयता मरम्मत सेवाओं की इन्जीनियरिंग एवं डिजायनिंग वे घटक है जो संरक्षण क्रय-प्रेरणाओं के आधार है। किर्कपेट्रिक लिखते हैं कि विक्रेता-क्रेताओं को सेवाओं, दुकान की स्थिति, विभिन्न किस्में, कर्मचारी, पारस्परिक सौजन्यता एवं कीमत के आधार पर ही दुकान से वस्तुएँ खरीदने की प्रेरणायें देते है जिन्हें संरक्षण क्रय प्रेरणाएँ कहा जाता है। प्रदर्शन, सजावट, उधार सुविधायें, वापसी सुविधायें, गृह सुपुर्दगी, ख्याति आदि भी वे घटक है जो संरक्षण क्रय प्रेरणाओं के आधार बनते हैं।

4. भौतिक मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक क्रय-प्रेरणाएँ (Physical, Psychological and Sociological Buying Motives)—भौतिक क्रिया-प्रेरणाएँ भूख, प्यास, नीद यौन, आयम एवं जीवन संचालन से सम्बद्ध प्रेरणाओं को स्वयं में सम्मिलित करती है। मनोवैज्ञानिक क्रय-प्रेरणायें व्यक्तिपरक होती हैं और इनमें गर्व, भय आदि प्रेरणाओं को सम्मिलित किया जाता है। सामाजिक क्रय-प्रेरणायें वर्तमान एवं अपेक्षित सामाजिक स्थिति से सम्बद्ध प्रेरणाओं का समूह होती है।

5. प्राथमिक एवं चयनात्मक क्रय-प्रेरणायें (Primary and Selective Buying Mo (tives)–-प्राथमिक क्रय-प्रेरणायें, वे क्रय प्रेरणायें हैं जो वस्तुओं के क्रय-सामान्य क्रय हेतु प्रेरणा देती है। उदाहरण के लिए, रेडियो अथवा टेलीविजन अथवा कार अथवा मोटरसाइकिल आदि के क्रय को प्रोत्साहित करने वाली प्रेरणायें प्राथमिक क्रय प्रेरणाएँ’ कहलाती हैं। ये प्रेरणाएँ वस्तुओं की सामान्य माँग को बढ़ाने वाली मानी गयी है और किसी ब्राण्ड विशेष की खरीद हेतु प्रेरणा नहीं देती हैं। चयनात्मक क्रय-प्रेरणाये, ये प्रेरणायें है जो किसी विशिष्ट ब्राण्ड की खरीद के निर्णय को प्रभावित करती है अन्य शब्दों में, किस ब्राण्ड की खरीद को प्रोत्साहित करने वाली प्रेरणायें, चयनात्मक क्रय-प्रेरणायें कही जाती है। उदाहरण के लिए, एजदी मोटर साइकिल अथवा बजाज स्कूटर अथवा हिन्द साइकिल के क्रय हेतु प्रोत्साहित करने वाली प्रेरणाओं को चयनात्मक क्रय-प्रेरणाऐं कहा गया है। किर्कपेट्रिक ने चयनात्मक क्रथ-प्रेरणाओं के क्षेत्र को व्यापक बनाते हुए उसमें केवल ब्राण्ड चयन को ही नहीं, अपितु विक्रेता चयन को भी सम्मिलित करने पर बल दिया है। वे लिखते हैं कि चयनात्मक विचार उपभोक्ता की ब्राण्ड पसन्दगी, स्रोत (निर्माता) पसन्दगी या फुटकर विक्रेता पसन्दगी अथवा विक्रय व्यक्ति पसन्दगी) आदेशित करते हैं।

6. जागरूक एवं सुप्त क्रय-प्रेरणाएँ (Concious and Dormant Buying Motives) – ‘जागरूक क्रय-प्रेरणाएँ वे प्रेरणाएँ हैं जिन्हें क्रेता विपणन क्रियाओं की सहायता के बिना ही स्पष्टतापूर्वक पहचान लेते हैं और अभिव्यक्ति करते हैं। अन्य शब्दों में, सचेतन धरातल पर विद्यमान आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु क्रेताओं की खरीद को प्रोत्साहित करने वाली क्रय-प्रेरणायें ‘जागरूक प्रेरणाएँ’ कही जाती हैं। ये प्रेरणाएँ स्वतः ही क्रेताओं के मस्तिष्क में उत्पन्न होती रहती है। बाहरी वातावरण की आवश्यकता इन प्रेरणाओं की उत्पत्ति के लिये अपेक्षाकृत कम होती है। किन्तु बाहरी वातावरण एवं विपणन कार्यक्रम इन क्रय-प्रेरणाओं में तीव्रता पैदा कर सकते हैं। ‘सुप्त क्रय-प्रेरणाएँ वे प्रेरणाएँ हैं जिन्हें क्रेता उस समय तक नहीं पहचान पाते हैं जब तक कि विपणन क्रियाओं द्वारा उनका ध्यान क्रय-प्रेरणाओं की ओर आकृष्ट न किया जाये। ये प्रेरणायें उन आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु क्रेताओं का ध्यान आकृष्ट करती हैं जिनके बारे में क्रेताओं को स्वयं ही ध्यान नहीं होता है और जो अघेतन धरातल पर विद्यमान होती है।