वैयक्तिक विक्रय क्या है ? वैयक्तिक विक्रय की प्रविधि का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

67

वैयक्तिक विक्रय का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Personal Selling)

व्यवसाय में वैयक्तिक विक्रय का बहुत अधिक महत्व है। इसमें वस्तुओं के विक्रय के लिए ग्राहक एवं विक्रयकर्ता में आमने-सामने बातचीत होती है और विक्रयकर्ता ग्राहक को प्रभावित कर विक्रय करने की चेष्टा करता है। वैयक्तिक विक्रय विपणन की रीढ़ है। वैयक्तिक विक्रय विक्रेताओं द्वारा किया जाता है। वैयक्तिक विक्रय में उत्पाद के भावी क्रेताओं के साथ उत्पाद के विक्रय उद्देश्य से प्रत्यक्ष रूप में वार्तालाप की जाती है, जिसमें उत्पाद के बारे में आवश्यक बातें एवं प्रयोग विधि आदि सभी का वर्णन किया जाता है।

  • (1) रिचार्ड बसकिर्क (Richard Buskirk) के अनुसार, “वैयक्तिक विक्रय वह विक्रय है. जिसमें किसी वस्तु के सम्भावित क्रेताओं से व्यक्तिगत सम्पर्क स्थापित किया जाता है।”
  • (2) विलियम जे. स्टाण्टन (William J. Stanton) के अनुसार, “वैयक्तिक विक्रय में अकेला व्यक्तिगत सन्देश शामिल होता है जो अव्यक्तिगत सन्देश, विज्ञापन, विक्रय संवर्द्धन व अन्य संवर्द्धन उपकरणों के विपरीत है।”
  • (3) अमेरिकन मार्केटिंग एसोसिएशन (American Marketing Association) के अनुसार, “वह एक या अधिक भावी क्रेताओं के साथ बातचीत में विक्रय करने के इरादे से की गयी मौखिक प्रस्तुति है।”

वैयक्तिक विक्रय की विशेषताएँ (Characteristics of Personal Selling)

वैयक्तिक विक्रय में निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ पायी जाती हैं (1) इसमें विक्रयकर्ता एवं ग्राहक के मध्य प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है।

(2) इसमें व्यक्तिगत रूप से वस्तुओं या उत्पादों का विक्रय किया जाता है।

(3) इसमें वस्तु के गुणों कीमतों, प्रयोग विधि आदि का वर्णन मौखिक रूप में किया जाता है।

(4) इसमें व्यक्तिगत एवं सामाजिक व्यवहार दोनों का समावेश होता है।

(5) इसमें ग्राहक एवं विक्रयकर्ता दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।

(6) वैयक्तिक विक्रय वस्तुओं के विक्रय का प्राचीनतम तरीका है।

(7) वैयक्तिक विक्रय, बिक्री करने का अधिकतम प्रभावी ढंग है।

वैयक्तिक विक्रय के लाभ (Advantages of Personal Selling)

वस्तुओं का विक्रय दो प्रकार से होता है-एक तो वैयक्तिक व दूसरा अवैयक्तिक वैयक्तिक विक्रय में वस्तुओं के क्रेता व विक्रेता आमने-सामने होते हैं, लेकिन अवैयक्तिक विक्रय पत्र-व्यवहार व टेलीफोन आदि से होता है। वैयक्तिक विक्रय में अवैयक्तिक विक्रय की तुलना में कुछ लाभ हैं, जो निम्न हैं

(1) भावी ग्राहकों का पता लगाना वैयक्तिक विक्रय का सबसे पहला लाभ यह है कि इस तरीके से पूर्व ग्राहकों का पता लग जाता है जो या तो उनकी वस्तु के ग्राहक है या वे ग्राहक बन सकते है। इससे विक्रयकर्ता अपना ध्यान उस ओर एकाग्र होकर लगा सकता है। विज्ञापन व विक्रय संवर्द्धन इन बातों का पता नहीं लगा सकते हैं।

(2) शंकाओं का समाधान वैयक्तिक विक्रय में क्रेताओं की शंकाओं का समाधान उचित रूप से किया जा सकता है। उनकी आपत्तियों का निवारण कर क्रथ के लिए उचित वातावरण बना सकते हैं। ऐसा करने से आदेश मिलने की सम्भावनाएँ बढ़ जाती है।

(3) वस्तु का प्रदर्शन-ग्राहक को वस्तु का लाभप्रदता व उसकी वांछनीयता का विश्वास दिलाने के लिए आवश्यक है कि उसको वस्तु का प्रयोग करने का उचित अवसर देते हुए उसका वास्तविक प्रदर्शन किया जाए। वैयक्तिक विक्रय वस्तुओं का प्रत्यक्ष प्रदर्शन करके यह अवसर प्रदान करता है।

(4) विक्रय समाप्ति में सहायक वैयक्तिक विक्रय का एक लाभ यह भी है कि यह विक्रय समाप्ति में सहायता देता है। यह शंकाओं का समाधान कर विक्रय के लिए दबाव डालता है। विज्ञापन व विक्रय संवर्द्धन तो क्रेता को क्रय करने के लिए प्रेरित करते हैं लेकिन वे इतने प्रभावशाली नहीं होते जितना कि वैयक्तिक विक्रय।

(5) समय सामंजस्य- इसमें विक्रयकर्ता ऐसी व्यवस्था कर लेता है कि जब कभी भी क्रेता वस्तु को क्रय करने के लिए तैयार होता है विक्रयकर्ता उसी समय उपस्थित हो जाता है और उसको तुख्त सेवा दे देता है।

(6) संचार सुविधा प्रदान करना वैयक्तिक विक्रय निर्माताओं के लिए संचार सुविधाएँ प्रदान करता है। विक्रयकर्ता को वस्तुओं के विक्रय के सम्बन्ध में बहुत-सी सूचनाएँ प्राप्त होती है, जैसे-बाजार दशाएँ, प्रतियोगी क्रियाएँ, संस्था की नीतियों के बारे में ग्राहक की प्रतिक्रियाएँ आदि। विक्रयकर्ता इन सभी बातों को निर्माता तक पहुँचाता है जिससे कि निर्माता अपनी नीतियों व वस्तुओं में आवश्यक परिवर्तन कर अपने विक्री बढ़ाने में सफल हो सके।

(7) गैर-विक्रय कार्य करना एक विक्रयकर्ता का मुख्य कार्य विक्रय करना है, लेकिन यह अपने विक्रय कार्य के अतिरिक्त अन्य गैर-विक्रय कार्य भी करता है जो निर्माता को लाभकारी होते हैं, जैसे-बाजार अनुसन्धान करना, मरम्मत सेवा प्रदान करना, ग्राहकों की शिकायतों का निवारण करना आदि।

(8) सामाजिक प्रेरणा प्रदान करना-वैयक्तिक विक्रय ग्राहक व विक्रयकर्ता के बीच एक मित्र जैसा सामाजिक सम्बन्ध बना देता है जिसका परिणाम यह होता है कि उसको आदेश मिलते रहते हैं और वह अपनी वस्तु बेचने में सफल होता रहता है।

वैयक्तिक विक्रय के दोष (Disadvantages of Personal Selling) वैयक्तिक विक्रय के निम्न दोष पाये जाते हैं

(1) लागते- वैयक्तिक विक्रय का सबसे बड़ा दोष लागत है। वैयक्तिक विक्रय में विक्रयकर्ता को पारिश्रमिक यात्रा व्यय, भत्ते व अन्य सुविधाएँ देनी होती हैं जिनका कुल योग काफी होता है जो वस्तु की विक्रय लागत को बढ़ा देता है, लेकिन यदि व्यक्तिगत सम्पर्क, टेलीफोन व पत्र व्यवहार से किया जाता है तो लागत बहुत कम पड़ती है।

(2) सही समय पर उपस्थित होने में कठिनाई वैयक्तिक विक्रय की दूसरी कठिनाई यह बतायी जाती है कि इसमें विक्रयकर्ता ग्राहक के पास उस समय नहीं पहुँच पाता जबकि ग्राहक क्रय सम्बन्धी निर्णय लेने की स्थिति में हो। साथ ही क्रय आदेश लेने के लिए विक्रयकर्ता को कई बार सम्भावित ग्राहक से मुलाकात करनी पड़ती है।

(3) अच्छे विक्रयकर्ताओं का अभाव वैयक्तिक विक्रय का एक दोष यह भी बताया जाता है कि अच्छे विक्रेताओं का प्रत्येक देश में अभाव है, इसमें भी कोई सत्यता दिखायी नहीं देती है। वास्तव में अच्छे विक्रेता जन्मजात पैदा नहीं होते बल्कि उचित प्रशिक्षण देकर उन्हें तैयार किया जाता है।

वैयक्तिक विक्रय की प्रविधि (Technique of Personal Selling)

वैयक्तिक विक्रय को प्रविधि विक्रय की ऐसी वैज्ञानिक विधि है, जिसके द्वारा ग्राहकों को अधिकतम सन्तुष्टि प्रदान करते हुए न्यनतम समय एवं लागत पर वस्तुओं का अधिकतम विक्रय किया जाता है। विक्रय प्रविधि के प्रमुख चरणों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(I) ध्यान आकर्षित करना-विक्रय प्रक्रिया का सर्वप्रथम कदम ग्राहक का ध्यान आकर्षित करना है यह ध्यान (i) विज्ञापन, (ii) संकेत बोर्ड, (iii) विद्युत प्रदर्शन, (iv) द्वार प्रदर्शन व (v) वातायन प्रदर्शन (Window display) आदि से आकर्षित किया जा सकता है, जब ग्राहक विज्ञापन से प्रभावित होकर दुकान की ओर आता है तो संकेत, बोर्ड विद्युत प्रदर्शन व वातायन प्रदर्शन उसको दुकान के अन्दर प्रवेश करने के लिए विवश करते हैं। अतः दुकान का बाहरी एवं भीतरी आवरण आकर्षण एवं मनमोहक होना चाहिए जिससे कि ग्राहक उन वस्तुओं के देखने में रुचि ले और दुकान के अन्दर आने की कृपा करे।

(II) रुचि जाग्रत करना-क्रेता का वस्तु की ओर प्रभावशाली विज्ञापन व प्रदर्शन के द्वारा ध्यान आकृष्ट करने के पश्चात् उस वस्तु में उसकी रुचि उत्पन्न करनी चाहिए। ध्यानकर्षण का प्रभाव अल्पकालिक होते हैं और जब तक उसे रूचि में परिवर्तित न कर दिया जाये, विक्रय नहीं हो सकता। अतः विक्रयकर्ता को चतुराई से वस्तु के प्रति क्रेता की रुचि जायत करनी चाहिए। रुचि जाग्रत करने में दो बातें आती है

(a) ग्राहक का स्वागत-जब ग्राहक दुकान के अन्दर आता है तो फिर उसमें रूचि प्राप्त करने का कार्य करना पड़ता है इसके लिए जैसे ही वह दुकान के अन्दर आता है उसका आदर-सूचक शब्दों से स्वागत किया जाता है जैसे-‘आइए’, ‘पचारिए’। यह स्वागत रूखे शब्दों के द्वारा न होकर बड़े प्रफुल्लित मन से होना चाहिए जिससे कि ग्राहक पर यह प्रभाव पड़े कि उसका दुकान पर आना दुकानदार के लिए प्रसन्नता की बात है। साथ-ही-साथ स्वागत अभिवादन के साथ होना चाहिए। यह अभिवादन ग्राहक की विशिष्टता के आधार पर हो। जैसे यदि ग्राहक लाला है जो ‘सेठजी नमस्कार’, ‘सेठजी जै राम जी’ आदि शब्दों से और यदि वह अंग्रेजी पढ़ा-लिखा है तो ‘गुड ईवनिंग सर, आदि शब्दों से स्वागत एवं अभिवादन के पश्चात् यह कहना चाहिए “कहिए मैं आपकी क्या सेवा करुँ ?”, “मैं आपको क्या दिखाऊँ ?” यदि दुकान पर बैठने की उचित व्यवस्था है तो इस प्रकार कहना चाहिए, “पधारिए साहब, कहिए क्या दिखाऊँ ?” आजकल तो कुछ दुकानदार ग्राहक के आते ही उसके लिए चाय, कॉफी, लिम्का, पैप्सी मँगाने का उद्देश्य ग्राहक को अपनी दुकान पर कुछ समय के लिए रोके रखना है जिससे कि वह दुकान की अन्य वस्तुओं को भी देख सके और यदि उसकी जेब अनुमति दे तो खरीद सके।

(b) विक्रय वार्तालाप आरम्भ-एक विक्रयकर्ता के प्रारम्भिक शब्द बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं। यहाँ प्रारम्भिक शब्दों से अर्थ, विक्रयकर्ता के बातचीत करने के तरीके, उसकी आकृति एवं ग्राहक को खरीदने अथवा न खरीदने की राय देने अथवा न देने से सम्बन्धित होते हैं। यदि विक्रयकर्ता का व्यवहार अच्छा होता है तो उसका ग्राहक पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है।

एक विक्रयकर्ता को विक्रय-प्रारम्भ के शब्द से सोच लेने चाहिए। कभी-कभी विक्रयकर्ता के द्वारा ऐसे प्रारम्भिक शब्द कह दिये जाते हैं जो अनावश्यक होते हैं और ग्राहक को अच्छे नहीं लगते हैं, जैसे-यदि विक्रयकर्ता यह कहे कि “आज आप खरीदना नहीं चाहते ” या “आपकी मृत्यु के बाद आपका परिवार क्या करेगा” यह दोनों ही प्रश्न शिष्टाचार के नाते उचित नहीं है। कभी-कभी विक्रयकर्ता बात को बढ़ा-चढ़ाकर भी कहता है। यह भी उचित नहीं है। जैसे “यह स्कूटर सबसे अच्छा है।”

(III) इच्छा जाग्रत करना-विक्रय प्रक्रिया का तीसरा चरण क्रेता के मस्तिष्क में वस्तु के प्रति इच्छा जाग्रत करना है। इच्छा एक ऐसी प्रकृति है जो मनुष्य को कोई वस्तु रखने अथवा उसका आनन्द उठाने के लिए प्रेरित करती है। एक क्रेता बहुत-सी वस्तुओं में रुचि रख सकता है किन्तु उन सबकी इच्छा नहीं रख सकता है। यह विक्रयकर्ता का उत्तरदायित्व है कि यह उसकी रुचि को इच्छा में परिवर्तित करे। ऐसा करते हुए वह ग्राहकों को इस बात का अनुभव करने के लिए बाध्य कर देना चाहिए कि वह वस्तु उसके लिए आवश्यक है। ऐसा वह निम्न दो तरीकों से कर सकता है

(a) वस्तु की प्रकृति–एक अच्छे विक्रयकर्ता को ज्योंही ग्राहक की आवश्यकता का आभास होता है वह उस वस्तु को ग्राहक के समक्ष प्रस्तुत कर देता है ऐसा करते समय उसे निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए

(i) वस्तु ग्राहक की आवश्यकता, रुधि एवं गुण के अनुकूल हो।

(ii) वस्तु का मूल्य ग्राहक की क्षमता के अनुकूल हो ।

(iii) प्रस्तुत की जाने वाली वस्तु साफ-सुथरी होनी चाहिए।

(iv) जो वस्तु नाप से खरीदी जाती है उन्हें पहनाकर दिखाना चाहिए जैसे radymade

(v) मूल्यवान व कलात्मक वस्तुओं की प्रस्तुति आकर्षक ढंग से होनी चाहिए।

(b) वस्तु प्रदर्शन-प्रदर्शन द्वारा ग्राहक का वस्तु में विश्वास जाग्रत होता है जिसके क्रेता को क्रय निर्णय में सहायता मिलती है तथा विक्रेता का विक्रय का उद्देश्य पूरा होता है। ग्राहक के सम्मुख वस्तुओं का क्रियात्मक प्रदर्शन किया जाना विक्रय के लिए आवश्यक है। श्री बी. आर. केनफील्ड के अनुसार, “क्रेता को वस्तु प्रमाण व उदाहरण के साथ बताना कि वस्तु या सेवा किस प्रकार लाभकारी है, क्रियात्मक प्रदर्शन कहलाता है।” इसमें वस्तु को साक्षात् रूप में दिखाया जाता है, उसकी कार्यविधि समझायी जाती है और वस्तु के गुणों का बखान किया जाता है। प्रदर्शन से ग्राहक बहुत प्रभावित होता है और उसमें वस्तु के प्रति विश्वास जाग्रत होता है जो क्रय करने में सहायक होता है और विक्रेता के उद्देश्य की पूर्ति में योगदान देता है। वस्तु का क्रियात्मक प्रदर्शन कब किया जाये, यह एक विचारणीय प्रश्न है। वस्तु का क्रियात्मक प्रदर्शन न तो एकदम प्रारम्भ में किया जाना चाहिए और न इतने बाद में कि ग्राहक की वस्तु देखने की इच्छा ही मन्द पड़ जाये। वास्तव में, विक्रय वार्तालाप के दौरान जब ग्राहक की आवश्यकता का सही अनुमान हो जाये, तभी वस्तु क्रियात्मक प्रदर्शन करना चाहिए और क्रियात्मक प्रदर्शन के साथ-साथ वस्तु के गुणों की व्याख्या भी करनी चाहिए।

(IV) विश्वास जीतना-विक्रय प्रक्रिया के अन्तर्गत अगला कदम ग्राहकों का विश्वास प्राप्त करना है। ग्राहकों के मस्तिष्क में वस्तु के प्रति इच्छा जाग्रत करने के पश्चात् उनके मन से वस्तु के प्रति उत्पन्न होने वाले सभी सन्देहों को दूर करना चाहिए। एक विक्रयकर्ता का यह उत्तरदायित्व है कि वह ग्राहकों के मन में यह विश्वास उत्पन्न करे कि वस्तु उपयोगी व ठीक है। इसके सम्बन्ध में उत्पन्न होने वाली सभी आपत्तियों को दूर करना चाहिए तथा ग्राहक को इस बात का अनुभव करने के लिए विवश कर देना चाहिए कि वस्तु क्रय करने योग्य है। ग्राहकों द्वारा उठाई जाने वाली आपत्तियों के सम्बन्ध में अनेक प्रश्न उपस्थित होते हैं, जैसे-ग्राहक आपत्ति क्यों करते हैं ? विक्रयकर्ता किस प्रकार की आपत्तियों की आशा करता है ? क्रेता कब तथा आपत्तियों उठाते हैं ? आपत्तियों का सफलतापूर्वक उत्तर देने के लिए विक्रेता को क्या तैयारी करनी चाहिए ? तथा आपत्तियों का उत्तर देने की कौन-सी रीतियाँ व तकनीकियाँ हैं ? ये प्रश्न इतने व्यापक हैं कि यहाँ इनके विषय में विस्तारपूर्वक अध्ययन करना असम्भव नहीं है।

(V) विक्रय समाप्त करना-विक्रय प्रक्रिया में विक्रय को पूरा करना अन्तिम अवस्था है। चूँकि विक्रयकर्ता का मुख्य उद्देश्य विक्रय करना होता है अतः यह चरण विक्रय पूरा करने का है। विक्रयकर्ता के द्वारा किये गये सभी प्रयास जैसे ध्यानाकर्षण, रुचि उत्पन्न करना, इच्छा जाग्रत करना तथा विश्वास उत्पन्न करने का कोई महत्व नहीं है। यदि यह विक्रय में परिवर्तित नहीं होता। इसलिए विक्रयकर्ता की दृष्टि से यह सबसे महत्वपूर्ण अवस्था है। इस चरण पर क्रेता क्रय करने या न करने का निर्णय लेता है। विक्रयकर्ताओं की सारी मेहनत और योग्यताओं के प्रदर्शन की सफलता इस चरण पर निर्भर करती है। व्यवहार में, अधिक छूट देकर या कीमत में कमी करके विक्रय करना उत्तम विक्रयकला नहीं है। लाभकारी रूप में बेचना ही विक्रयकर्ताओं की योग्यताओं और निपुणताओं की कसौटी है। सामान्यतः निम्न दबाव का समापन ‘उच्च दबाव विक्रय’ की तुलना में आसान होता है। निम्न दबाव विक्रय में सम्भावित क्रेता को जितना अधिक यह अनुभव होने दिया जाता है कि वह स्वयं ही विवेकपूर्ण चिन्तन के जरिये क्रय निर्णयों तक पहुँच रहा है, उतना कि विक्रय का समापन शीघ्र करना सम्भव होता है। उच्च दबाव विक्रय में विक्रयकर्ता ग्राहकों की भावनाओं को प्रभावित करने और उन्हें क्रथ के निर्णयों की ओर धकेलने का प्रयास करता है। यदि विक्रय के समापन की स्थिति पर पहुँचते-पहुँचते कोई ग्राहक सामान्य अवस्था में लौट आता है तब विक्रय का समापन दुष्कर हो जाता है।