आधुनिक विपणन अवधारणा क्या है ? भारत में आधुनिक विपणन अवधारणा के महत्व को समझाइये।

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विपणन अवधारणा (विचारधारा) का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Marketing Concept)

विपणन अवधारणा की उत्पत्ति व्यवसाय के क्षेत्र में ग्राहक की भूमिका ज्ञात करने के लिए हुई है। व्यवसाय के क्षेत्र में ग्राहक के निरन्तर बढ़ते हुए महत्व ने व्यवसाय में एक नवीन चिन्तन को जन्म दिया है जिसे ‘विपणन अवधारणा’ की संज्ञा दी जाती है। श्री जान ई. वेकफील्ड के अनुसार, “विपणन अवधारणा व्यवसाय का दर्शन है।” विपणन अवधारणा व्यवसाय वह दर्शन है जो ग्राहकों की सन्तुष्टि के द्वारा उचित लाभ अर्जित करने पर बल देता है। यह ग्राहक की प्रभुसत्ता को सहर्ष स्वीकार करती है। आधुनिक व्यवसाय का मूलभूत लक्ष्य ग्राहक का सृजन करना एवं उसे अधिकतम सन्तुष्टि प्रदान करना तथा व्यवसायी को उचित लाभ अर्जित कराना है। यह कार्य व्यवसाय विपणन अवधारणा के माध्यम से सम्पन्न करता है। यदि देखा जाये तो विपणन अवधारणा एक प्रबन्धकीय प्रक्रिया है। जिसके अन्तर्गत उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं के अनुरूप वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है तथा उन्हें सन्तुष्टि प्रदान करके उचित लाभ अर्जित किया जाता है।

  • (1) ए. फेल्टन (A. Felton) के अनुसार, “विपणन अवधारणा एक दर्शन है जो कि व्यवसाय के संचालन में लागू की जाती है जिसमें ग्राहक एवं उपभोक्ता की आवश्यकताएँ सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती हैं। यह आवश्यकताएँ व्यवसाय के प्रत्येक कार्य तथा समस्त योजना के लिए पृथक् नियोजन संचालित करेंगी जिनका लक्ष्य पूर्व-निर्धारित लाभ उद्देश्यों को प्राप्त करना है। “
  • (2) शोएल एवं गिल्टीनन (Shoell and Guiltinan) के अनुसार, “विपणन अवधारणा व्यवसाय का एक नवीन दर्शन है जो यह मानता है कि व्यवसाय अपने ग्राहकों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कार्य करता है, प्रबन्धकीय प्रणाली दृष्टिकोण के आधार पर निर्णय लेता है तथा अपने स्वामियों के विनियोग के प्रतिफल के रूप में उचित लाभार्जन करता है।”

विपणन की परम्परागत अथवा प्राचीन अवधारणा (Traditional or Old Concept of Marketing)

सामान्यतः विपणन की सूक्ष्म अथवा परम्परागत अवधारणा से आशय वस्तुओं के क्रय-विक्रय से लगाया जाता है। विपणन की सूक्ष्म अथवा परम्परागत अवधारणा ऐसी प्रक्रिया है जो किसी फर्म द्वारा ऐसी व्यूहरचनाओं का निर्माण एवं लागू करने (जैसे-मूल्यांकन, उत्पाद विकास, संवर्द्धन, वितरण आदि) के लिए की जाती है जोकि लाभ पर सन्तुष्टि देने वाले माल तथा सेवाओं के प्रवाह को चालू रखती है। इस अवधारणा के अनुसार सूक्ष्म अथवा परम्परागत अवधारणाएँ विशिष्ट प्रकार के ग्राहकों को सन्तुष्टि प्रदान करने पर ही चल देती थी। इसके अनुसार विपणन का मूलभूत कार्य वस्तुओं को उत्पादक अथवा निर्माता से उपभोक्ताओं तक पहुँचाना था विपणन की सूक्ष्म अथवा परम्परागत अवधारणा में विपणन कार्यों में या तो कोई परस्पर सम्बन्ध ही नहीं या अथवा बहुत कम था। यह वस्तु संचालन थी। अधिकतम लाभ कमाना विपणन की सूक्ष्म अथवा परम्परागत अवधारणा का मूलभूत उद्देश्य था। विपणन की सूक्ष्म अथवा परम्परागत अवधारणा में उपभोक्ता कल्याण, अनुसंधान अथवा सामाजिक उत्तरदायित्व आदि के लिए कोई स्थान नहीं था। उत्पाद की किस्म की ओर भी ध्यान नहीं दिया जाता था। जैसा माल आता था, वैसा ही बिक जाता था। यह विपणन की अत्यन्त प्राचीन अथवा संकीर्ण विचारधारा है, जिसमें विभिन्न वस्तुओं का उत्पादन करने के लिए क्रय एवं इन उत्पादित वस्तुओं को ग्राहकों तक पहुँचाने के लिए विक्रय आदि क्रियाओं को विपणन में सम्मिलित किया जाता है अर्थात् इस विचारधारा के अनुसार वस्तुओं का उत्पादन एवं उनके भौतिक वितरण से सम्बन्धित क्रियाएँ विपणन के क्षेत्र के अन्तर्गत आती है। इस विचारधारा के अनुसार विपणन को निम्न प्रकार परिभाषित किया जाता है हैं। ”

(1) पाइल (Pyle) के अनुसार, “विपणन में क्रय एवं विक्रय दोनों ही क्रियायें सम्मिलित होती

(2) टाउसले, क्लार्क एवं क्लार्क (Tousley, Clark and Clark) के अनुसार, “विपणन में वे सभी प्रयत्न सम्मिलित होते हैं, जो वस्तुओं और सेवाओं के स्वामित्व हस्तान्तरण एवं उनके भौतिक वितरण में सहायता प्रदान करते हैं।”

(3) एडवर्ड एवं डेविड (Edward and David) के अनुसार, “विपणन एक आर्थिक रीति है जिसके द्वारा वस्तुओं एवं सेवाओं को बदला जाता है तथा उनके मूल्य मुद्रा में तय किये जाते हैं।”

(4) अमेरिकन विपणन परिषद् (American Marketing Association) के अनुसार, “विपणन से आशय उन व्यावसायिक क्रियाओं के निष्पादन से है, जो उत्पादक से उपभोक्ता प्रयोगकर्ता तक वस्तुओं और सेवाओं के प्रवाह को निर्दिष्ट करती है।”

उपर्युक्त से स्पष्ट है कि इस विचारधारा के अनुसार विपणन कार्य उत्पादन हो जाने के पश्चात् प्रारम्भ होता है और उत्पादक स्वयं ही यह जानते हैं कि ग्राहक के लिए किस वस्तु का उत्पादन किया जाना चाहिए। साथ ही विपणन कार्य वहाँ पर समाप्त हो जाता है जबकि ग्राहक अथवा उपभोक्ता को वस्तु बेच दी जाती है। यह विचारधारा आज के युग में उचित प्रतीत नहीं होती क्योंकि विपणन क्रियाओं की आवश्यकता उत्पादन से पूर्व और विक्रय के पश्चात् भी पड़ती है अतः यह कहना ठीक होगा कि विपणन के अन्तर्गत उत्पादन से पूर्व एवं वस्तु के विक्रय के बाद की क्रियायें भी शामिल होती हैं। आधुनिक विपणन अवधारणा अथवा विपणन अवधारणा (Modern Marketing Concept or Marketing Concept) आधुनिक प्रबन्ध में विपणन की विशेष महत्ता है और यह प्रबन्ध की महत्वपूर्ण अवधारणाओं में से है। जब तक इसे भली-भाँति न समझा जाय एवं इसे व्यवहार में न लाया जाए तब तक अधिकांश व्यावसायिक अथवा औद्योगिक संस्थान या तो शक्तिविहीन होकर समाप्त हो जायेंगे अथवा असफल हो जायेंगे अतएव आधुनिक विपणन अवधारणा का अर्थ समझना एवं उसे व्यवहार में लाना परम आवश्यक है। यह तब स्पष्ट होगा जबकि हम यह स्वीकार करने के लिए तत्पर होंगे कि विपणन एक ग्राहकोन्मुखी क्रिया है।

यह निम्न तीन मूलभूत अवधारणाओं पर आधारित है—

(i) कम्पनी की नीतियाँ एवं क्रियाएँ ग्राहकोन्मुखी हैं। अतएव समस्त व्यावसायिक निर्णय ग्राहकोन्मुखी, न कि उत्पादनोन्मुखी होने चाहिए। इस बात पर बल देना होगा कि समस्त व्यावसायिक क्रियाओं का प्राथमिक उद्देश्य ग्राहकों की इच्छाओं एवं आवश्यकताओं को प्रभावी ढंग से सन्तुष्टि करना है।

(ii) व्यवसाय का लक्ष्य उचित लाभप्रद विक्रय करना है। आधुनिक विपणन अवधारणा मात्र एक क्रिया नहीं है अपितु इसमें वे सभी क्रियाएँ सन्निहित हैं जोकि उत्पाद को उसके उत्पत्ति के स्थान- अन्तिम उपभोक्ताओं एवं उपयोगकर्ता उद्योगों के हाथों में सौंपती है और उन्हें सन्तुष्टि प्रदान करती है।

(iii) आधुनिक विपणन अवधारणा का प्रारम्भ उस समय से होता है जबकि किसी उत्पाद को निर्मित करने के विचार का सृजन होता है और इसका अन्त उस समय हो जाता है जबकि एक ओर ग्राहक को पूर्णतः सन्तुष्टि प्राप्त हो जाती है और दूसरी ओर, निर्माता को उत्पाद के विक्रय से उचित प्रतिफल (लाभ) प्राप्त हो जाता है। यह आधुनिक विचारधारा वस्तु के स्थान पर ग्राहकों को अधिक महत्व देती है। इसलिए इसे ग्राहक अभिमुखी विचारधारा कहते हैं। इस विचारधारा के अनुसार ऐसी वस्तुओं का निर्माण किया जाता है जोकि अधिकांश ग्राहकों की विभिन्न आवश्यकताओं अभिरुचियों आदि के अनुरूप हो। इसके पश्चात् वस्तुओं का विक्रय भी ग्राहक की सुविधा को ध्यान में रखकर किया जाता है और यदि आवश्यकता हो तो विक्रयोपरान्त सेवा की व्यवस्था भी की जाती है। इस विचारधारा के अनुसार विपणन को निम्न प्रकार परिभाषित किया गया है

(1) पाल मजूर (Paul Mazur) के अनुसार, “विपणन समाज को जीवन-स्तर प्रदान करता है।”

(2) प्रो. मेल्कम मेकनेयर (Malcom Menair) के अनुसार, “विपणन से अर्थ जीवन स्तर का सृजन करने एवं उसे उपलब्ध करने से है।”

(3) कण्डिफ, स्टिल एवं गोवोनी (Condiff, Still and Govoni) के अनुसार, “विपणन एक प्रबन्धकीय क्रिया है जिसके द्वारा बाजारों की आवश्यकताओं के अनुरूप वस्तुयें बनायी जाती है और उनके स्वामित्व का हस्तान्तरण किया जाता है।”

(4) मैकार्थी के अनुसार, उपभोक्ता माँगों की आवश्यकताओं के अनुरूप उत्पादन योग्यताओं को समायोजित करने की आवश्यकता का व्यापारियों द्वारा दिया जाने वाला उत्तर विपणन कहलाता है।” उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि उत्पादन अभिमुखी विचारधारा विक्रेता बाजार में तो उपयोगी सिद्ध हो सकती है विक्रेता बाजार से आशय ऐसे बाजार से है जिसमें विक्रेता जिस वस्तु को चाहे बेच सकता है अर्थात् ऐसी स्थिति में ग्राहकों को अधिक महत्व नहीं दिया जाता है, परन्तु क्रेता बाजार में उत्पादमुखी विचारधारा कभी सफल नहीं हो सकती। आधुनिक समय में बड़े पैमाने पर वस्तुओं का उत्पादन कड़ी प्रतिस्पर्द्धा तीव्र बाजार परिवर्तन की दर आदि विशेषताओं के कारण ग्राहक अधिमुखी विचारधारा अत्यन्त आवश्यक है। इस विचारधारा के अनुसार, विपणन क्रिया वस्तु विचार के उत्पन्न होने से आरम्भ होती है और तब तक चलती रहती है जब तक कि ग्राहक सन्तुष्ट न हो जाये। अतः यह कहा जा सकता है कि इस विचारधारा के अनुसार विपणन क्रिया ग्राहक से प्रारम्भ होती है तथा वस्तु ग्राहक तक पहुँचकर समाप्त हो जाती है।

आधुनिक विपणन अवधारणा का महत्व (Importance of Modern Marketing Concept) आधुनिक विपणन अवधारणा के महत्व को निम्न शीर्षकों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है

(1) औद्योगीकरण को प्रोत्साहन-आज जिन देशों में आधुनिक विपणन व्यवस्था है, वे देश औद्योगिक क्षेत्र में शिखर पर है। इस प्रकार विपणन व्यवस्था अच्छी होने से औद्योगीकरण को प्रोत्साहन मिलता है जिसकी कि भारत जैसे विकासशील देशों को नितान्त आवश्यकता है।

(2) निर्यात में वृद्धि-इतिहास इस बात का साक्षी है कि आधुनिक सुदृढ़ विपणन व्यवस्था के कारण जो देश औद्योगीकरण के शिखर पर हैं, जैसे-अमेरिका, जर्मनी, इंग्लैण्ड, जापान आदि, वे निर्यात अधिक करते हैं और आयात कम भारत जैसे विकासशील देश को आज निर्यात में वृद्धि की सबसे अधिक आवश्यकता है और इसी कारण विकासशील देशों (भारत सहित) में आधुनिक विपणन का महत्व है।

(3) प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम उपयोग-आधुनिक सुदृढ़ विपणन व्यवस्था प्राकृतिक संसाधनों का देश के हित में विदोहन तथा अधिकतम उपयोग को सक्रिय सहयोग प्रदान करती है जिसकी कि विकासशील देशों में नितान्त आवश्यकता है।

(4) वस्तुओं के मूल्यों में कमी- एक सुव्यवस्थित एवं प्रभावी आधुनिक विपणन व्यवस्था के होने से जहाँ एक ओर अधिक मॉंग होने के कारण उत्पादन की मात्रा बढ़ जाती है जिसके परिणामस्वरूप उत्पादन लागत कम हो जाती है और दूसरी ओर, वितरण लागतों में पर्याप्त कमी आती है। इन सबका परिणाम यह होता है कि प्रतियोगिता बढ़ जाती है और परिणामस्वरूप वस्तुओं के मूल्यों में कमी हो जाती है। फलतः उपभोक्ता अधिक मात्रा में वस्तुओं का उपभोग करना प्रारम्भ कर देते हैं।

(5) ग्राहक सन्तुष्टि-आधुनिक विपणन विचार का आधार स्तम्भ ग्राहक सन्तुष्टि है। इसके अन्तर्गत व्यवसाय के सभी निर्णय ग्राहक को केन्द्र बिन्दु मानकर लिये जाते हैं और इस बात का पूरा प्रयास किया जाता है कि ग्राहकों की आवश्यकताओं को पूर्ण रूप से सन्तुष्ट किया जाए। इस प्रकार विपणन लोगों की आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करके समाज को लाभ पहुँचाता है।

(6) ग्राहकों के ज्ञान में वृद्धि-विपणन ग्राहकों को उनकी छिपी हुई आवश्यकताओं का ज्ञान कराता है और उन आवश्यकताओं के अनुरूप उत्पाद व सेवाओं का निर्माण करके उनकी जानकारी ग्राहकों को देता है जिससे उन आवश्यकताओं की सन्तुष्टि सम्भव न हो सके विपणन के कारण ग्राहकों को नवीन वस्तुओं के निर्माण व उनके प्रयोग की जानकारी भी मिलती है।

(7) रहन-सहन का स्तर ऊँचा उठाना- आधुनिक विपणन अवधारणा जन-साधारण को उपभोग के लिए बड़े पैमाने पर नई-नई वस्तुओं की जानकारी देकर एवं उपलब्ध कराकर रहन-सहन के स्तर को ऊँचा उठाने में सक्रिय सहयोग प्रदान करती है।

(8) रोजगार की सुविधा-आधुनिक विपणन अवधारणा रोजगार के अवसरों में वृद्धि करके बेरोजगारी एवं अर्द्ध-बेरोजगारी के उन्मूलन में सक्रिय सहयोग प्रदान करती है। उदाहरण के लिए, आज भारत में 2 करोड़ से भी अधिक लोग विपणन क्रियाओं में संलग्न हैं। आज विपणन क्षेत्र भारत में रोजगार प्रदान करने का प्रमुख स्रोत माना जाता है।

(9) राष्ट्रीय आय में वृद्धि जब आधुनिक विपणन सुविधाओं के कारण विभिन्न प्रकार के ग्राहकों की आवश्यकतानुसार वस्तुओं का उत्पादन एवं निर्माण किया जाता है तो देश की कुल वस्तुओं और सेवाओं में वृद्धि होती है जिसके परिणामस्वरूप देश की कुल राष्ट्रीय आय दोनों में वृद्धि होती है।