बाजार विभक्तिकरण से क्या आशय है? बाजार विभक्तिकरण के प्रमुख उद्देश्यों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

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बाजार विभक्तिकरण का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Market Segmentation) : बाजार विभक्तिकरण की अवधारणा इस तथ्य पर आधारित है कि वस्तुओं के बाजार समजातीय होने के बजाय विजातीय होते हैं। किसी वस्तु के दो उपभोक्ताओं या क्रेताओं के स्वभाव, गुण, रुचि, आदत, आय, क्रय करने का ढंग आदि में असमानता या एकरूपता नहीं होती। ग्राहकों को इन लक्षणों के आधार पर कुछ खण्डों (segments) में विभक्त किया जा सकता है। प्रत्येक खण्डों के ग्राहकों की विशेषतायें अन्य खण्डों के ग्राहकों से भिन्न-भिन्न होती हैं और प्रत्येक खण्ड के ग्राहकों की विशेषताओं अथवा लक्षणों में समानता पाई जाती है। इस प्रकार बाजार विभक्तिकरण से आशय बाजार को समजातीय के आधार पर विभिन्न खण्डों में विभक्त करने से है। बाजार विभक्तिकरण से प्रत्येक खण्ड के ग्राहकों को सन्तुष्ट करने के लिए पृथक्-पृथक् प्रभावी विपणन कार्यक्रम बनाया जा सकता है।

बाजार विभक्तिकरण से आशय किसी वस्तु के सम्पूर्ण बाजार को ग्राहकों की विशेषताओं, प्रकृति अथवा विक्रय क्षेत्रों के आधार पर विभिन्न उपबाजारों तथा खण्डों में विभक्त करने से है। वस्तुओं के गुण अर्थात् समजातीय व विजातीय आधार पर बाजार को विरक्त किया जाता है। बाजार के लक्षण और प्रकृति सामान्यतया विपणन की सम्भावनाओं व प्रगति के अवसरों को सीमित करते हैं तथा प्रबन्धकों के समक्ष बाजार को सफलतापूर्वक प्राप्त करने की समस्या प्रमुख रूप से बनी रहती है। इसके लिए आवश्यक है कि बाजार का सम्पूर्ण विश्लेषण कर उसका पृथक्कीकरण कर लिया जाये। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि, बाजार को प्रभावपूर्ण बनाने तथा अधिक-से-अधिक क्रेताओं को प्राप्त करने के उद्देश्य से उन्हें आवश्यकतानुसार बाँटने की कला को बाजार विभक्तिकरण कहा जाता है।

  • फिलिप कोटलर के अनुसार, “ग्राहकों के समजातीय उपवर्गोंों में बाजार के उप-विभाजन बाजार विभक्तिकरण कहते हैं।
  • विलियम जे. स्टेण्टन के अनुसार, “बाजार विभक्तिकरण से आशय किसी उत्पाद के सम्पूर्ण विजातीय बाजार को अनेक उप बाजारों या उप-खण्डों में इस प्रकार विभाजित करने से है कि प्रत्येक उप बाजार उप-खण्ड में सभी महत्वपूर्ण पहलुओं में समजातीयता हो। “
  • ए. राबर्ट के अनुसार, “बाजार विभक्तिकरण बाजारों को टुकड़ों में बाँटने की रीति-नीति है, ताकि उस पर विजय प्राप्त की जा सके।”
  • अमेरिकन मार्केटिंग ऐसोसिएशन के अनुसार, “बाजार विभक्तिकरण से आशय एक विजातीय बाजार के सापेक्षिक समजातीय लक्षणों वाले छोटे ग्राहक खण्डों में, जिन्हें फर्म सन्तुष्ट कर सकती है, विभक्त करने से है।”

बाजार विभक्तिकरण का उद्देश्य (Objectives of Market Segmentation)

“किसी वस्तु के सभी क्रेताओं की विशेषताओं में समानता तो नहीं होती लेकिन बहुत-सी विशेषताएँ एक समान होती है। क्रेता जिस प्रकार के होंगे उनका क्रय करने का ढंग भी उसी प्रकार का होगा। बाजार विभक्तिकरण का मुख्य उद्देश्य क्रेताओं के क्रय व्यवहार का ही पता लगाना है जिससे कि विक्रेता के द्वारा उन्हीं के अनुरूप विपणन के ढंगों को अपनाया जा सके। संक्षेप में बाजार विभक्तिकरण के निम्न उद्देश्य होते हैं

(1) समजातीय वर्गों में बाँटना-ग्राहकों को उनकी समान प्रकृति, स्वभाव व गुणों के आधार पर समजातीय वर्गों में बाँटना जिससे कि प्रत्येक वर्ग के लिए उपयुक्त कार्यक्रम बनाया जा सके।

(2) वरीयताओं का पता लगाना-ग्राहकों की रुचि, क्रय, आदतें, आवश्यकताएँ तथा वस्तु वरीयताओं का पता लगाना विभक्तिकरण का दूसरा उद्देश्य है जिससे कि यह तय हो सके कि क्या सभी ग्राहकों के लिए एक विपणन प्रत्येक उपयुक्त होंगे या नहीं।

(3) क्षेत्रों का पता लगाना बाजार विभक्तिकरण का तीसरा उद्देश्य यह पता लगाना होता है कि किन क्षेत्रों में प्रयत्न करने पर नवीन ग्राहक बनाये जा सकते हैं।

(4) क्रय सम्भाव्य का पता लगाना- बाजार विभक्तिकरण का चौथा उद्देश्य विभिन्न ग्राहक समूहों के क्रय सम्भाव्य का पता लगाना है जिससे कि विपणन लक्ष्य निर्धारित किये जा सकें।

(5) संस्था को ग्राहक अभिमुखी बनाना बाजार विभक्तिकरण का अन्तिम उद्देश्य संस्था को हक अभिमुखी बनाना है। जिससे कि ग्राहकों को सन्तुष्ट रखकर लाभ कमाया जा सके। बाजार विभक्तिकरण के विकास के कारण (Reasons for the Development of Market Segmentation) बाजार विभक्तिकरण के विकास के बहुत से कारण है, इनमें से कुछ प्रमुख कारणों को

प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है निम्न

(1) वस्तुओं की कमी की संख्या में वृद्धि होने के कारण विक्रेताओं में क्रेता के रुपये के लिए प्रतियोगिता बढ़ गयी है। इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक विक्रेता, क्रेता को अपनी वस्तु बेचकर उसके रुपये को प्राप्त करना चाहता है।

(2) स्व-सेवा (Self-service) और इससे मिलती-जुलती लागत कम करने वाली तकनीकों (Cost Reducing Techniques) को अपनाने की वजह से उत्पाद व उसकी माँग में अच्छा समायोजन होना आवश्यक हो गया है। बाजार खण्ड के अनुरूप उत्पाद-पूर्ति से उत्पाद और उसकी मॉंग में अच्छे समायोजन की सम्भावना होती है।

(3) तकनीकी विकास के कारण अनेक वस्तुओं की कुशल निर्माणी इकाई (Manufacturing unit) के न्यूनतम आकार में कमी आ गई है, अतः इन वस्तुओं का उत्पादन छोटे पैमाने पर भी उतने ही प्रति इकाई की लागत पर किया जा सकता है जितना कि पहले किया जाता रहा है। इससे भिन्न-भिन्न वर्ग-समूहों (Market Segments) के लिए उनकी आवश्यकतानुसार वस्तुएँ उत्पादन करना सम्भव हो गया है।

(4) पिछले कुछ दशकों से क्रेता वस्तु-क्रय सावधानी से क्रय करने लगा है। क्रेता की आय में वृद्धि होने से वह अपनी रुचि के अनुरूप वस्तु प्राप्त करने पर अधिक जोर देने लगा है, चाहे उसे अधिक मूल्य क्यों न देना पड़े। बाजार विभक्तिकरण द्वारा उनकी रुचि के अनुकूल वस्तुओं की पूर्ति करना सुगम हो जाता है।

((5) संवर्द्धन के कुछ समय बाद विकास के लिए बाजार विभक्तिकरण आवश्यक हो जाता है। इसका कारण यह है कि एक सामान्य आकार पर संचालित विपणन कार्यक्रम पर किया जाने वाला खर्च सभी बाजारों के लिए घटते हुए प्रतिफल देने लगता है।

(6) अनेक व्यावसायिक फर्मों में कुल लागत का अधिकांश भाग स्थायी लागत के रूप में होता है। अतः विक्रय में कुल मिलाकर स्थिरता लाना आवश्यक हो जाता है। बाजार विभक्तिकरण इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह इस सिद्धान्त पर आधारित है कि प्रत्येक क्रेता एक-दूसरे से भिन्न है।

(7) वस्तुओं की किस्मों और उनकी स्थानापन्न वस्तुओं (Substitutes) के बढ़ जाने से बाजार ग्राहकोन्मुखी होता जा रहा है। प्रत्येक विक्रेता अपनी वस्तु बेचने के लिए क्रेता को खोजता रहता है।

बाजार विभक्तिकरण द्वारा विक्रेता को इस कार्य में सहायता प्राप्त होती है।

बाजार विभक्तिकरण के आधार (Bases of Market Segmentation)

बाजार विभक्तिकरण के आधार बहुत-से हो सकते हैं, जैसे-आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक प्रतियोगिता, उपभोक्ताओं की आयु, शिक्षा व्यय करने का ढंग, रहने का स्थान, उपभोग की मात्रा आदि। कण्डिफ एवं स्टिल ने बाजार विभक्तिकरण के आधारों को निम्न प्रकार से बताया है

उपभोक्ता बाजार के लिए आधार- 1. उपभोक्ता की आय, 2. उपभोक्ता की आयु, 3. उपभोक्ता का लिंग, 4. उपभोक्ता में नगरीकरण की स्थिति, 5. उपभोक्ता का औद्योगिक विभाजन, 6. उपभोक्ता की शिक्षा, 7. उपभोक्ता का धर्म। औद्योगिक बाजार के आधार- 1. व्यवसाय की किस्म, 2. सामान्य क्रय का तरीका 3. उपभोक्ता का आकार, 4. भौगोलिक विभाजन।

फिलिप कोटलर ने बाजार विभक्तिकरण के निम्नलिखित आधार बताये हैं

(1) भौगोलिक- बाजार विभक्तिकरण का यह पहला आधार है जिसमें सम्पूर्ण बाजार को भौगोलिक आधार पर बाँट दिया जाता है, जैसे-गर्म क्षेत्र व ठण्डा क्षेत्र, शहरी क्षेत्र व ग्रामीण क्षेत्र एक राष्ट्रीय निर्माता अपने ग्राहकों को विक्रय क्षेत्र के अनुसार भी बाँट सकता है।

(2) मनोवैज्ञानिक बाजार विभक्तिकरण मनोवैज्ञानिक आधार पर भी हो सकता है। समाज में कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो नवीनतम वस्तुओं को क्रय करना अपना उच्च स्तर मानते हैं जबकि कुछ व्यक्ति सादा वस्तुओं को क्रय करना पसन्द करते हैं। इस प्रकार ग्राहक का मनोवैज्ञानिक आधार पर भी विभक्तिकरण हो सकता है और वस्तुओं का निर्माण ग्राहक के मनोवैज्ञानिक आधार पर करके अधिक लाभ कमाया जा सकता है।

(3) लाभ-लाभ के आधार पर भी बाजार विभक्तिकरण हो सकता है। यहाँ लाभ का अर्थ वस्तु के उस लाभ से है जो उपभोक्ता को उस वस्तु के प्रयोग करने से मिलते हैं, जैसे-नहाने के साबुन के सम्बन्ध में कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो सफाई व कीटाणुनाशक गुण को अधिक पसन्द करते हैं। एक निर्माता इन ग्राहकों के लाभों को ध्यान में रखकर बाजार विभक्तिकरण कर सकता है और अपने विज्ञापन को उस ओर इंगित करके लाभ कमा सकता है।

(4) जनांकिकी-इसमें निर्माता अपने ग्राहकों के समूह को उनकी आय, आयु, व्यवसाय शिक्षा, राष्ट्रीयता, सामाजिक जाति, धर्म, परिवार आकार आदि के आधार पर बना सकता है। यहीं नहीं, इन आधारों को और आगे भी उप-विभाजित किया जा सकता है; जैसे-आयु के बच्चों, किशोर, बालिग व वृद्ध में विभाजित किया जा सकता है। इन सूचनाओं के आधार पर प्रत्येक विभक्तिकरण में अधिकतम लाभ प्राप्त करने के प्रयत्न किये जा सकते हैं।

(5) विपणन-बाजार विभक्तिकरण का आधार विपणन भी हो सकता है। इसमें वस्तु का मूल्य, वस्तु की वचालिटी, फुटकर विज्ञापन आदि घटक आते हैं। इस प्रकार बाजार का विभक्तिकरण इन आधारों पर भी किया जा सकता है।

(6) मात्रा- इसमें वस्तु के क्रेताओं की क्रय मात्रा के आधार पर बाजार का विभक्तिकरण हो सकता है, जैसे-कुछ ग्राहक भारी क्रेता होते हैं तो कुछ हल्के जबकि कुछ मध्यम श्रेणी के एक विक्रेता इस आधार पर विभक्तिकरण कर सकता है।

(7) वस्तु सतह-यह विभक्तिकरण का आधुनिक आधार है। इसके अन्तर्गत एक स्थान विशेष पर ग्राहकों से आग्रह किया जाता है कि वे उस निर्माता की वस्तु व अन्य निर्माताओं में तुलना करें जिससे उनकी वरीयता का पता लगाया जा सके। इस वरीयता के आधार पर ग्राहकों के समूह बनाये जा सकते हैं और बाजार विभक्तिकरण का लाभ उठाया जा सकता है।

बाजार विभक्तिकरण का महत्व (Importance of Market Segmentation) बाजार विभक्तिकरण के महत्व को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) विक्रय संवर्द्धन में सहायक बाजार विभक्तिकरण उपयुक्त विक्रय संवर्द्धन विधि के चुनाव में सहायता प्रदान करता है। सही विक्रय संवर्द्धन कार्य-कलापों की प्रभावशीलता बढ़ जाती है।

(2) उत्पाद-निष्ठा में वृद्धि-विपणक जो किसी बाजार-खण्ड की आवश्यकतानुसार विपणन मिश्रण तैयार करते हैं, वे ग्राहकों में उत्पाद-निष्ठा उत्पन्न करने में सफल होते हैं। वे इस प्रकार प्रतिस्पर्द्धा उत्पादों के सामने भी ठहर पाते हैं। करके

(3) एक लघु फर्म को लाभ-बाजार विभक्तिकरण की संकेन्द्रित विपणन रीति-रिवाज का प्रयोग एक छोटी फर्म भी बाजार में सफलता प्राप्त कर सकती है।

(4) प्रतियोगिता का सामना करना सम्भव-बाजार विभक्तिकरण द्वारा विभिन्न बाजार खण्डों के लिए प्रतिस्पर्द्धा के अनुरूप भिन्न-भिन्न विपणन रीति-नीति (Strategy) का प्रयोग करके प्रतिस्पर्द्धा का प्रभावशाली ढंग से सामना किया जा सकता है।

(5) उपयुक्त विज्ञापन अपील करने में सुविधा- अलग-अलग बाजार खण्डों के लिए अलग-अलग विज्ञापन माध्यमों का प्रयोग करके विज्ञापन अपील को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

(6) विपणन बजट का बँटवारा-एक निर्माता बाजार विभक्तिकरण के आधार पर अपने विपणन बजट का बँटवारा करके समुचित लाभ कमा सकता है। जिन स्थानों पर विक्रय की सम्भावनाएँ कम हों, उन स्थानों में विपणन बजट में कमी करके विक्रय बजट में वृद्धि की जा सकती है जहाँ विक्रय की सम्भावनाएँ अधिक हों।

(7) उपयुक्त उत्पाद पंक्ति का चयन करने में सहायक-विक्रेता ऐसी उत्पाद पंक्ति का बनाना चाहता है जो सभी ग्राहक समूहों की माँग को पूरा कर सके। बाजार विभक्तिकरण के विश्लेषण के बिना यह सम्भव नहीं होता। कई बार विक्रेता ऐसी वस्तु बाजार में ले आते हैं जो कुछ ग्राहक-समूहों की तो आवश्यकता पूर्ति करती है परन्तु अन्य ग्राहकों को उसकी आवश्यकता पूर्ति से वंचित रखती है। बाजार खण्डों के विश्लेषण से प्रत्येक ग्राहक समूह वस्तु सम्बन्धी आवश्यकता का पता लग जाता है और उत्पाद पंक्ति में उन वस्तुओं को शामिल किया जाता है जिनके द्वारा प्रत्येक ग्राहक समूहों की आवश्यकता की पूर्ति होती हो।

(8) साधनों का उचित उपयोग सम्भव-विभक्तिकरण द्वारा एक विक्रेता अपने साधनों का अधिक अच्छा उपयोग करने में सफल हो जाता है। विभिन्न बाजार खण्डों की आवश्यकताओं के अनुरूप वह अपने वित्तीय एवं विपणन साधनों का प्रयोग कर सकता है। जिन बाजार खण्डों में विपणन सम्भावनाएँ कम होती है, वहाँ विपणन बजट भी कम रखा जाता है। इस प्रकार साधनों की व्यर्थ बर्बादी से बचा जा सकता है।