लाभांश से क्या अभिप्राय है? लाभांश के विभिन्न प्रकारों की व्याख्या कीजिए।

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लाभांश का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Dividend)

लाभांश किसी कम्पनी के लाभ का वह अंश है जो अंशों के सममूल्य के प्रतिशत के रूप में अथवा प्रति अंश एक निश्चित ीिश के रूप में कम्पनी के संचालक मण्डल के निर्णय एवं विकल्प के अन्तर्गत घोषित एवं वितरित किया जाता है। लाभांश वस्तुतः कुल आय में समस्त व्ययों के घटाने पर विभिन्न प्रकार के कोष एवं करों आदि के लिए उचित प्रावधान करने के बाद बचे अधिशेष का ही एक अंश होता है। इस अधिशेष पर वस्तुतः कम्पनी के सदस्यों का ही अधिकार होता है, यद्यपि वे इसके तत्काल वितरण पर जोर नहीं दे सकते। यदि कम्पनी को पूँजी की आवश्यकता हो तो कम्पनी लाभ के समस्त भाग को लाभांश के रूप में न देखकर व्यवसाय में ही धारित कर सकती है। ऐसी दशा में लाभांश की घोषणा नहीं की जाती तथा समस्त लाभ को विभिन्न कोष के रूप में ही रहने दिया जाता है। इस बात का निर्णय संचालक मण्डल करता है कि लाभ का कितना भाग लाभांश के रूप में घोषित किया जाय तथा कितना भाग व्यवसाय के विकास के लिए कम्पनी में ही विनियोजित किया जाये। कम्पनी की वित्तीय आवश्यकता तथा लाभ के विषय में अंशचारियों की आशाओं के बीच यह एक प्रकार का समझौता है जिसका प्रमुख आधार कम्पनी के संचालकों का विवेक होता है।

  • एम. एम. शाह के अनुसार, “लाभांश एक व्यावसायिक कम्पनी के लाभ है जो उसके सदस्यों में अंशों के अनुपात में बाँटा जाता है।” सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, “लाभांश कम्पनी के लाभों का वह भाग है जो अंशचारियों में बाँटने के लिए नियत कर दिया जाता है।”

इस प्रकार लाभांश से आशय कम्पनी द्वारा अर्जित लाभ में से उसके अंशचारियों को वितरित की जाने वाली उस राशि से है जो निश्चित या अनिश्चित दर से दी जाती है।

लाभांश के प्रकार या रूप (Forms or Types of Dividend)

कम्पनियों द्वारा अपने अंशधारियों या सदस्यों को लाभांश विभिन्न रूपों में वितरित किया जा सकता है। साधारणतया यह नकद रूप में ही वितरित किया जाता है, किन्तु यह बोनस अंशों के रूप में भी वितरित किया जा सकता है। लाभांश नकद या बोनस अंशों के अतिरिक्त अन्य रूपों का भी दिया जा सकता है। लाभांश के प्रमुख रूप निम्न है

(1) नकद लाभांश (Cash Dividend)-लाभांश का सबसे प्राचीन एवं लोकप्रिय रूप नकद लाभांश देना है। इसे अंशधारी सबसे अधिक पसन्द करते हैं। जिन कम्पनियों की तरल स्थिति ठीक होती है वे कम्पनियों नकद लाभांश देना ही अधिक पसन्द करती है।

(2) स्कन्ध लाभांश (Stock Dividend) जिन कम्पनियों की तरल स्थिति ठीक नहीं होती है, वे साधारणतया अपने लाभों का पूँजीकरण करके स्कन्ध लाभांश वितरित करती हैं। इसके अन्तर्गत कम्पनी नकद लाभांश नहीं देती अपितु घोषित रकम के बराबर नये अंशधारियों को आबंटित कर देती है। ऐसे अंशों को बोनस अंश के नाम से जाना जाता है।

(3) बन्ध-पत्रों के रूप में लाभांश (Bond Dividend) कम्पनी नकद लाभांश न देकर बन्ध-पत्र अथवा ऋण-पत्रों के रूप में भी लाभांश दे सकती है। ये बन्ध-पत्र दीर्घकालीन हो सकते हैं। इसे स्क्रिप लाभांश भी कहा जाता है।

(4) सम्पत्ति लाभांश (Property Dividend) नकद के स्थान पर लाभांश सम्पत्ति के रूप में भी दिया जा सकता है। अन्य कम्पनियों की एवं सरकार की प्रतिभूतियों को लाभांश के रूप में वितरित किया जा सकता है।

(5) संयुक्त लाभांश (Composite Dividend) जब लाभांश आंशिक रूप से नकद एवं शेष सम्पत्ति के रूप में वितरित किया जाता है तो इसे संयुक्त लाभांश कहते हैं।

(6) नियमित लाभांश (Regular Dividend)—एक कम्पनी द्वारा वित्त वर्ष की समाप्ति के पश्चात् संचालक मण्डल द्वारा प्रस्तावित तथा साधारण वार्षिक सभा द्वारा पारित लाभांश भुगतान को नियमित लाभांश के नाम से जाना जाता है।

(7) वैकल्पिक लाभांश (Optional Dividend) जब कम्पनी अपने सदस्यों को यह विकल्प दे सकती है कि वे चाहे तो लाभांश नकद में ले अथवा सम्पत्ति के रूप में लें तो इसे वैकल्पिक लाभांश कहते हैं।

(8) अन्तरिम लाभांश (Interim Dividend) जब कम्पनी यह महसूस करे कि व्यवसाय में लाभ पर्याप्त मात्रा में अर्जित कर लिए गये हैं, ऐसी स्थिति में वर्ष की समाप्ति के पूर्व ही कुछ लाभांश घोषित कर देती है तो इसे अन्तरिम लाभांश कहते हैं। इसके बाद कम्पनी अन्तिम लाभांश भी घोषित करती है।

लाभांश नीति के प्रकार (Types of Dividend Policy) कम्पनियों द्वारा प्रायः निम्न तीन प्रकार की लाभांश नीतियाँ अपनायी जाती है

(अ) रूढ़िवादी या कठोर लाभांश नीति रूढ़िवादी लाभांश नीति उसे कहते हैं, जब प्रबन्ध अत्यधिक लाभ होने पर भी कुछ ही लाभांश के रूप में वितरित करते हैं। इस नीति के अन्तर्गत लाभ का अधिकांश भाग व्यवसाय में ही पुनर्विनियोजित किया जाता है और अंशधारियों को लाभांश कम से कम दिया जाता है। इस प्रकार इस नीति को अपनाने पर प्रबन्ध कम्पनी की वित्तीय सुदृढ़ता एवं व्यवसाय की दशा को सर्वोपरि रखते हैं और अंशधारियों की वर्तमान आशाओं को गौण स्थान पर रखते हैं। इस नीति में भुगतान अनुपात (Payout ratio) बहुत ही कम या कभी-कभी शून्य होता है। इस प्रकार की नीति उस कम्पनी की दशा में अच्छी व बुद्धिमत्तापूर्ण मानी जाती है, जो विकासशील हो और जिसे सुधार व विस्तार कार्यक्रमों के लिए अधिक अतिरिक्त पूँजी की आवश्यकता हो। ऐसी कम्पनी के अंशधारियों को इस नीति से दीर्घकाल में लाभ मिलता है। परन्तु ऐसी नीति का पालन करते समय यह सतर्कता बरतनी चाहिए कि अंशधारियों का धैर्य सीमा को पार न कर जाए।

(ब) उदार लाभांश नीति- जब प्रबन्ध लाभ के अधिकांश भाग का वितरण अंशधारियों में लाभांश के रूप में बांट देते हैं, तो उसे उदार लाभांश नीति कहते हैं। लाभ का उतना ही भाग प्रतिधारित किया जाता है जितना अत्यन्त आवश्यक होता है। इस नीति में भुगतान अनुपात बहुत ही ऊँचा होता है और प्रतिधारित अनुपात (Retenton ratio) बहुत ही नीचा होता है। इस नीति में अंशधारियों के दीर्घकालीन हितों की अपेक्षा वर्तमान हित को अधिक महत्व दिया जाता है। स्पष्ट है कि इस नीति के अनुपालन से कम्पनी के विकास, विस्तार व प्रतिस्थापन कार्यक्रमों के लिए फण्ड की कमी आ सकती है तथा अंशों का सट्टा मूल्य भी बढ़ जाता है जिससे नई अंश पूँजी उगाहने में कम्पनी को कठिनाई होती है और उसकी वित्तीय सुदृढ़ता को हानि पहुँच सकती है।

(स) सुदृढ़ या सुस्थिर लाभांश नीति-लाभांश भुगतान की यह नीति दीर्घकालीन होती है तथा एक अरसे तक इसमें कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं किए जाते हैं। यह नीति कम्पनी की भावी आवश्यकताओं एवं अंशधारियों की वर्तमान अपेक्षाओं को समान महत्व देती है और इसमें यथोचित तालमेल बैठाती है। सामान्यतः लाभांश वितरण की राशि व प्रतिधारित आय की राशि करीब-करीब बराबर होती है। सम्पन्न वर्षों में दिया गया लाभांश ही उतना ही होता है जितना कि सामान्य या प्रतिकूल वर्षों में। जब लाभ अधिक होता है, तो उस समय पर्याप्त कोषों का निर्माण कर लिया जाता है जिनका प्रयोग उस अवधि में लाभांश वितरण के रूप में किया जाता है, जब लाभ में कमी आ गई हो, ताकि लाभांश दर को स्थिर बनाए रखा जा सके। इस प्रकार यह एक मध्यवर्गी नीति है। निश्चित व अनिश्चित सभी प्रकार की सम्भावनाओं के लिए पर्याप्त आयोजन कर लिए जाते हैं, अतः यह नीति कम्पनी की साख व प्रतिष्ठा बनाए रखने में सहायक होती है।

सुदृढ़ लाभांश नीति में प्रबन्ध द्वारा यह प्रयास किया जाता है कि अंशधारियों को दिए जाने वाले लाभांश की दर में यथासम्भव परिवर्तन न हो। यह स्मरणीय है कि कम्पनी के प्रबन्ध को सुस्थिर भुगतान अनुपात की अपेक्षा सुस्थिर लाभांश दर की नीति अपनानी चाहिए।

सुदृढ़ लाभांश नीति के लाभ (Advantages of Sound Dividend Policy) सुदृद लाभांश नीति की प्रमुख विशेषता लाभांश की स्थिरता एवं नियमितता है। जब लाभांश नीति में स्थायित्व का अभाव होता है, तो अंशों के बाजार मूल्य में उच्चावचन होता रहता है जिससे कम्पनी और अंशधारी दोनों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। ऐसी स्थिति का लाभ सटोरिए उठाते हैं और कभी-कभी यह स्थिति कम्पनी के अस्तित्व को भी चुनौती दे सकती है। एक सुदृढ़ लाभांश नीति के निम्नलिखित लाभ हो सकते हैं

(i) अंशधारियों में सन्तोष कुछ अंशधारी (जैसे—मध्यम वर्गीय या वृद्ध व्यक्ति या पेंशन प्राप्त व्यक्ति) आय के प्रति बहुत ही जागरुक एवं सतर्क होते हैं और वे नियमित रूप से प्रतिवर्ष मिलने वाले लाभांश को अधिक महत्व देते हैं। एक सुदृढ़ लाभांश नीति के द्वारा ऐसे अंशधारियों को सन्तुष्ट रखा जा सकता है।

(ii) अंशधारियों में विश्वास जगाना एक स्थाई व नियमित लाभांश की राशि प्राप्त करने से अंशधारियों के मन में अंशों के प्रति विश्वास जग जाता है। किसी वर्ष लाभांश कम होने पर कम्पनी लाभांश में कटौती नहीं करती है और कोषों में से विनियोजन करके लाभांश बांटती है। इसके कारण पूंजी बाजार में इन अंशों की साख अच्छी बनी रहती है।

(iii) अंशों के बाजार मूल्य में स्थिरता-जिन अंशों पर नियमित दर से लाभांश मिलता है, उनके बाजार मूल्यों में अपेक्षाकृत कम उच्चावचन होते हैं तथा ऐसे अंशों में सट्टेबाजी की सम्भावनाएँ कम रहती हैं। यही नहीं, कम्पनी की साख में भी वृद्धि होती है जिसका अनुकूल प्रभाव अंशों के बाजार मूल्य पर पड़ता है।

(iv) दीर्घकालीन योजनाओं में सहायक सुदृद लाभांश नीति के अन्तर्गत वित्तीय आवश्यकताओं तथा उनकी पूर्ति के साधनों का सही मूल्यांकन किया जा सकता है जिसके आधार पर दीर्घकालीन योजनाओं का निर्माण सरलतापूर्वक किया जा सकता है।

(v) राष्ट्रीय आय में स्थायित्व-यदि देश में कार्यरत सभी या अधिकांश कम्पनियाँ सुदृढ़ लाभांश नीति का पालन करने लगेंगी, तो इसके कारण राष्ट्रीय आय में स्थिरता आएगी, जो सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था के स्थायित्व का सूचक होगी।