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सकल कुल आय क्या है ?

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कुल आय What is gross total income

What is gross total income

आय पर लगने वाला कर आयकर कहलाता है। आयकर अधिनियम में ‘आय’ शब्द का महत्वपूर्ण स्थान है। परन्तु आयकर अधिनियम में ‘आय’ शब्द की कहीं पर भी स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है। हाँ, आयकर अधिनियम की धारा 2(24) में यह अवश्य उल्लेख किया गया है कि आय में क्या-क्या शामिल है, अर्थात् कौन-कौन सी प्राप्तियाँ आय की श्रेणी में आयेंगी।

धारा 2(24) में निम्न को आय की श्रेणी में सम्मिलित किया गया है-

(a) लाभ एवं प्राप्तियाँ, (b) लाभांश, (c) पुण्यार्थ अथवा धार्मिक उद्देश्यों के लिए स्थापित ट्रस्ट अथवा संस्था, वैज्ञानिक शोध संघ, खेलकूद संघ, पुण्यार्थ फण्ड एवं सार्वजनिक ट्रस्ट द्वारा स्वेच्छा से प्राप्त किये गये चन्दों से आय, (d) कर्मचारी को प्राप्त अनुलाभ या वेतन के बदले में मिले हुए लाभ, (e) करदाता को अपने कर्त्तव्यों का पालन करने के लिए आवश्यक व्ययों की पूर्ति हेतु प्राप्त विशेष भत्ता अथवा लाभ,(f) सेवा स्वल या निवास स्थल पर कर्त्तव्यपालन हेतु किये गये निजी व्ययों की पूर्ति हेतु करदाता को प्राप्त कोई भत्ता या जीवन-निर्वाह की बढ़ी हुई लागत की पूर्ति के लिए प्राप्त क्षतिपूरक भत्ता, (g) कम्पनी के संचालक या कम्पनी में सारवान हित रखने वाले व्यक्ति को या उसके किसी रिश्तेदार को कम्पनी से प्राप्त लाभ या अनुलाभ का मूल्य, (h) प्रतिनिधि करदाता या लाभ प्राप्तकर्ता द्वारा प्राप्त कोई लाभ या अनुलाभ का मूल्य, (i) व्यापार अथवा पेशे से आय (लाभ प्राप्ति, क्षतिपूर्ति, डूबत ऋण की वापसी, सीमा शुल्क की वापसी आदि, ( j )फर्म से साझेदार को प्राप्त ब्याज एवं पारिश्रमिक, पूँजी लाभ (k) एक पारस्परिक बीमा कम्पनी या सहकारी समिति के बीमा व्यवसाय के लाभ, शर्त से आ अन्य किसी फण्ड हेतु प्राप्त किये गये अंशदा (n) की मेन (key man) बीमा पॉलिसी के अन्तर्गत प्राप्त धन, (बोनस सहित

"उत्पाद नियोजन कुल विपणन नियोजन का एक महत्वपूर्ण अंग है।" इस कथन की समीक्षा कीजिए।

(1) लॉटरी, क्रासवर्ड पहेली, घुड़दौड़ आदि के इनाम, ताश तथा अन्य खेलों में जीत अथवा जुए या (m) करदाता द्वारा अपने कर्मचारियों से प्रॉविडेण्ट फण्ड अथवा सुपर एनुएशन फण्ड अथवा कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 के अन्तर्गत स्थापित फण्ड या कर्मचारियों के कल्याण हे

यह परिभाषा न ही पूर्ण है और न ही स्पष्ट है। आयकर अधिनियम में और बहुत-सी आय हैं जो इस परिभाषा में शामिल नहीं की गई है। अतः आयकर की दृष्टि से उन्हें हम मुख्यतः पाँच शीर्षकों में दिखा सकते हैं।

(i) वेतन से आय, (ii) सम्पत्ति से आय, (iii) व्यापार एवं पेशे से आय, (iv) पूँजी सम्पत्तियों विक्रय से आय, (v) अन्य आय।

आय के मुख्य सिद्धान्त (Important principles of income) कुछ निम्न महत्वपूर्ण सिद्धान्त है, जिनके आधार पर यह ज्ञात किया जा सकता है कि विशिष्ट प्राप्ति आय है अथवा नहीं :-

(1) आय बाहर से प्राप्त होनी चाहिए-एक क्लब के सदस्य आपस में चन्दा एकत्रित करके क्लब चलाते हैं। चन्दे में एकत्रित राशि में से क्लब के व्यय घटाने के बाद बचा हुआ आधिक्य करयोग्य आय नहीं मानी जा सकती, क्योंकि यह बाहर से प्राप्त नहीं हुई है। किन्तु बाहरी व्यक्तियों से, जो क्लब के सदस्य नहीं हैं, प्राप्त चन्दा या शुल्क या क्लब की पूँजी सम्पत्तियों के प्रयोग से प्राप्ति आय मानी जायेगी।

(2) आय की वैधानिकता आयकर वैधानिक एवं अवैधानिक दोनों ही प्रकार की आयों पर लगता है। इस प्रकार, कालाबाजारी या तस्करी से होने वाली प्राप्ति आय मानी जायेगी।

(3) मौद्रिक एवं अमौद्रिक आय-आय चाहे मुद्रा में प्राप्त हो या सेवा के रूप में प्राप्त हो, दोनों ही कर योग्य होती है। वस्तु या सेवा के रूप में प्राप्त आय का मुद्रा में मूल्यांकन कर लिया जाता है।

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(4) नियमित या अनियमित आय आय नियमित रूप से, जैसे- साप्ताहिक, मासिक, त्रैमासिक भी प्राप्त हो सकती है और वर्ष में एक बार भी प्राप्त हो सकती है, दोनों ही करयोग्य आय है।

(5) स्थायी या अस्थायी आय-यह आवश्यक नहीं है कि आय स्थायी ही हो आय अस्थायी प्रकृति की भी हो सकती है, अर्थात् कभी आय हो गई और कभी नहीं हुई। स्थायी आय सामान्यतः वेतन, ब्याज, कमीशन तथा फीस आदि की होती है। व्यापार और पेशा तथा पूँजी लाभों में अस्थायी प्रकृति की आय भी होती है। माल की नीलामी क्रय करके लाभ कमाने वालों की आय अस्थायी प्रकृति की होती है। कभी एक ही वर्ष में अनेक नीलामी मिल जाय तथा कभी वर्षों तक एक भी नीलामी न मिले।

(6) प्राप्त या अर्जित आय आयकर की दृष्टि से प्राप्त आय और अर्जित आय दोनों ही कर योग्य होते हैं। करदाता यदि प्राप्ति के आधार पर ही कर देना चाहता है तो वह प्राप्ति आय को ही आधार मानकर आयकर देगा। अर्जित आय की जब तक प्राप्ति नहीं होगी, आय नहीं मानेगा। किन्तु यदि वह अर्जित आय पर आयकर देता है तो आय के अर्जित होते ही वह उस पर आयकर देगा।

(7) व्ययों पर ऋणों से मुक्ति कभी-कभी किसी व्यक्ति को कुछ व्ययों या कुछ ऋणों का भुगतान करने से मुक्ति मिल जाती है। इस प्रकार, जिन व्ययों एवं ऋणों के भुगतान से उसे मुक्ति मिलती है, वह एक प्रकार से उसके लिए लाभ हुआ। किन्तु आयकर की दृष्टि से वह आय नहीं है।

(8) व्यक्तिगत उपहार-यदि किसी व्यक्ति को प्रेम, स्नेह तथा व्यक्तिगत सम्बन्धों के कारण उपहारस्वरूप कोई आय होती है तो वह आयकर अधिनियम के उद्देश्य के लिए आय नहीं मानी जाती है, किन्तु यदि कोई व्यक्ति अपने शिष्यों से उपहार पाता है तो वह कर योग्य आय होगी।