ऋण इक्विटी अनुपात क्या है ? क्या कोई प्रामाणिक ऋण इक्विटी अनुपात है? एक संस्था में विनियोजित ऋऋण तथा इक्विटी में सन्तुलन रखना क्यों आवश्यक है ?

39

ऋण-पूँजी अनुपात (Debt-Equity Ratio)

इसे ऋण समता अनुपात भी कहते हैं किसी भी व्यावसायिक संस्था की कुल वित्तीय आवश्यकता की पूर्ति स्वामी पूँजी तथा बाह्य ऋणों द्वारा की जाती है। कुल पूँजीकरण में कितनी धनराशि स्वामियों द्वारा प्रदान की गयी है और कितना धन बाहरी व्यक्तियों द्वारा दिया गया है, इसका गहरा प्रभाव संस्था की शोधन क्षमता पर पड़ता है। अतः किसी भी व्यवसाय में स्वामियों और ऋणदाताओं के हित की मात्रा का अध्ययन करना आवश्यक है। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु ऋण-पूँजी अनुपात ज्ञात करते हैं।

नवीन परियोजनाओं की पूर्ति के लिए अंश-पूँजी अपर्याप्त होती है और इसलिए अधिक मात्रा में विविध सूत्रों से ऋण प्राप्त करना अनिवार्य हो जाता है। अतः प्रवर्तकों द्वारा जुटायी गयी जोखिम-पूँजी उसके लिए अपर्याप्त रहती है और परियोजना लागत के शेष भाग की पूर्ति सरकारी, अर्द्ध-सरकारी, देशी एवं विदेशी साख संस्थाओं से दीर्घकालीन ऋण लेकर की जाती है। जिसमें स्थगित भुगतान के आधार पर प्राप्त मशीनें एवं संयन्त्र भी सम्मिलित हैं। इस प्रकार इन समस्त कारणों की सम्मिलित प्रतिक्रिया के फलस्वरूप भारत में नवीन कम्पनियों की कुल पूँजी में अंश-पूँजी की अपेक्षा ऋण-पूँजी का अनुपात अधिक हो गया है और अनेक नवीन कम्पनियों में ऋण-पूँजी की मात्रा अंश पूँजी की तुलना में दुगुनी अथवा तिगुनी हो गयी है। आज स्थिति यह है कि नयी प्रवर्तित की जाने वाली कम्पनी को अंश-पूंजी के अतिरिक्त अनेक अन्य साधनों से दीर्घकालीन एवं मध्यकालीन ऋण लेकर पूँजी की व्यवस्था करनी होती है। नवीन औद्योगिक नीति के अन्तर्गत उच्च प्राथमिकता वाले 34 उद्योगों में अब 51 प्रतिशत तक विदेशी इक्विटी पूँजी की अनुमति उदारता से दी जा रही है। साथ ही विदेशी संस्थागत निवेशकों को भी भारतीय पूँजी बाजार में पोर्ट फोलियो निवेश की अनुमति दी गयी है। अतः अब प्रस्तावित नयी कम्पनियों के लिए पर्याप्त इक्विटी पूँजी जुटाने की सम्भावनाएँ बढ़ गयी है। ऋण समता अनुपात, ऋण-पूँजी तथा समता के मध्य पाये जाने वाले सम्बन्ध को स्पष्ट करता है।

ऋण-समता अनुपात ज्ञात करने के लिए निम्न सूत्र का प्रयोग किया जाता है

Debt Equity Ratio= External Liabilities/Outside Liabilities.

Owners Equity/Proprietors Fund

प्रामाणिक ऋण इक्विटी अनुपात (Standard Debt-equity Ratio)

ऋण पूँजी अनुपात पर नई दिल्ली के प्रबन्ध विकास संस्थागत द्वारा सन् 1978 में अध्ययन किया गया। यह कार्य भारत सरकार की ओर से इस संस्थान के अध्यापक श्री बी. के. मदान द्वारा पूरा किया गया। श्री मदान द्वारा दी गई रिपोर्ट में यह विचार व्यक्त किया गया कि सामान्यतः सरकार एवं वित्तीय निगमों द्वारा अब तक ऋण-पूँजी अनुपात के लिए 2:1 का प्रमाप अपनाया जाता रहा है, जिसे पूँजी ढाँचे के निर्माण में एक दिशा सूचक एवं मार्गदर्शक सिद्धान्त के रूप में अपनाया जाता रहा है, एक कट्टर अचल अथवा अपरिवर्तनीय सिद्धान्त के रूप में नहीं। विशाल पूँजीपरक परियोजनाओं के लिए एवं छोटी औद्योगिक परियोजनाओं के लिए इसमें रियायतें दी गयी हैं। ऐसी परियोजनाओं के लिए 31 का ऋण-पूँजी अनुपात भी निर्धारित किया गया है। वस्तुतः कठिनाई मध्यम आकार की परियोजनाओं की दिशा में उत्पन्न होती है जिनके लिए 2: 1 का ऋण पूँजी अनुपात कठोरता से निर्धारित किया जाता है। इस विषय में चयनात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। विशेष परिस्थितियों में नयी परियोजनाओं तथा विद्यमान उपक्रमों के विस्तार के लिए ऊंचे ऋण-पूँजी अनुपात की अनुमति दी जानी चाहिए। इसके लिए आवश्यक सुरक्षात्मक शर्तें लगायी जा सकती हैं। उदाहरण के लिए एक समयावधि निर्धारित की जा सकती है जिनके अन्दर ऐसे उपक्रम अपने ऋण-पूँजी अनुपात को ठीक स्तर पर ले आयें। अधिक लाभदायकता के वर्षों में ऋणों के एक भाग का भुगतान करके यह सन्तुलन स्थापित किया जा सकता है। ऋण-समता अनुपात निम्न के अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है