पूँजीकरण क्या है? किसी कम्पनी में अतिपूँजीकरण एवं अल्प पूँजीकरण का क्या प्रभाव पड़ता है?

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पूंजीकरण पूजी की वह मात्रा है जिसका प्रतिनिधित्व अंशधारियों द्वारा धारित कुल अंशों तथा निर्गमित ऋणपत्रों या बन्ध पत्रों द्वारा होता है। कम्पनी द्वारा निर्मित तथा अंशधारियों द्वारा अभिदत्त एवं धारित समस्त अंश पूंजी ऋणपत्रों और बन्धपत्रों के आधार पर कम्पनी द्वारा पात्र दीर्घकालीन ऋण की कुल राशि पूँजीकरण में सम्मिलित की जाती है, किन्तु पूँजीकरण की यह व्याख्या भी पूर्ण नहीं है; क्योंकि अंश पूँजी एवं दीर्घकालीन ऋणों के अतिरिक्त कम्पनी में लाभ के पुनर्विनियोग के द्वारा एकत्रित कोष एवं अधिशेष की राशि भी होती है। अतः पूँजीकरण की कोई भी व्याख्या उस समय तक पूर्ण नहीं मानी जा सकती है जब तक कि वह सुरक्षित कोषों एवं अधिशेष को सम्मिलित नहीं करती। पूँजीकरण में अंश पूँजी विधित ऋण एवं अधिशेष तीनों को सम्मिलित करना युक्तिसंगत होगा। व्यावहारिक दृष्टि से पूँजीकरण का अर्थ किसी संस्था में नियमित रूप से प्रयुक्त कुल पूँजी के सकल लेखा-मूल्य से है। पूँजीकरण का महत्व कम्पनी के प्रवर्तन के समय ही होता है, किन्तु यह धारणा गलत है। प्रवर्तन के बाद भी और कम्पनी के जीवनकाल में कभी भी कम्पनी के कुल पूँजीकरण का मूल्यांकन करने की आवश्यकता प्रतीत हो सकती है। इस अर्थ में “पूँजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कम्पनी की सम्भावित आय के वर्तमान मूल्यांकन के आधार पर उसकी कुल सम्पत्ति के वर्तमान विनियोग मूल्य का अनुमान लगाया जाता है।”

लिलियन डोरिस (Lillian Doris) के अनुसार, पूँजीकरण में निगम की स्वामित्व पूँजी शामिल होती है, जो इसके दीर्घकालीन ऋण द्वारा दिखायी जाती है।” गेस्टनबर्ग (Gestenberg) के अनुसार, “पूँजीकरण का आशय व्यवसाय में नियमित रूप से लगायी गयी सम्पूर्ण पूँजी के कुल लेखांकन मूल्य से होता है।”

पूँजीकरण की स्थिति का निर्धारण (Determination of Situation of Capitalisation)

(A) अति-पूँजीकरण की स्थिति (Situation of Over-Capitalisation )

(1) Actual Rate of Return < Current Rate

(2) Real Value of the Business < Book Value of the Business

(3) Real Value of the Share < Book Value of the Share

(B) अल्प-पूँजीकरण की स्थिति (Situation of Under-Capitalisation)

(1) Actual Rate of Return > Current Rate

(2) Real Value of the Business > Book Value of the Business

(3) Real Value of the Share> Book Value of the Share

(C) उचित पूँजीकरण की स्थिति (Situation of Fair Capitalisation)

(1) Actual Rate of Return = Current Rate

(2) Real Value of the Business = Book Value of the Business

(3) Real Value of the Share Book Value of the Share,

अल्प पूँजीकरण का प्रभाव (Consequences of Under Capitalisation) अल्प पूँजीकरण के प्रभावों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

1. बाजार मूल्य में वृद्धि-अंशों के बाजार मूल्य में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है; क्योंकि उसका वास्तविक मूल्य उनके सम-मूल्य से कहीं अधिक होता है।

2. अधिक लाभांश दर-अंशों पर लाभांश की दर बहुत अधिक दी जा सकती है।

3. ऋणदाताओं का प्रभाव-अंश पूंजी की मात्रा को कम रखकर दीर्घकालीन ऋण पर निर्भर रहने की नीति सदैव उत्तम नहीं कही जा सकती क्योंकि इसमें ऋणदाताओं का प्रभाव एवं हस्तक्षेप बढ़ जाता है।

4. प्रतिक्रिया भिन्न-भिन्न प्रकार से होता है। अल्प-पूँजीकरण की प्रतिक्रिया विभिन्न वर्गों पर भिन्न-भिन्न

5. आकस्मिक उतार-चढ़ाव अत्यधिक मूल्य के कारण ऐसी कम्पनी के अंशों की माँग का क्षेत्र सीमित हो जाता है। सटोरिये इस स्थिति से अनुचित लाभ उठाते हैं। अंशों के बाजार मूल्य में आकस्मिक उतार-चढ़ाव होते रहते हैं।

अति-पूँजीकरण का प्रभाव (Effdect of Over-Capitalisation)

अति पूँजीकरण के प्रभावों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है 1. कम्पनी पर प्रभाव

1. जलयुक्त पूंजी एवं बाजार में अंशों का मूल्य कम हो जाने के कारण कम्पनी की ऋण प्राप्त करने की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

2. आय कम होने के कारण अवक्षयण एवं सुरक्षित कोर्यों के निर्माण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा सकता और इससे कम्पनी के लाभोपार्जन की योग्यता और कम होती चली जाती है।

3. आवश्यकता से अधिक पूँजीकरण के फलस्वरूप कम्पनी को भारी संगठनात्मक कर एवं शुल्क चुकाने होते हैं।

4. कम्पनी सदैव वित्तीय संकट से ग्रसित रहती है और उसके समापित होने की सम्भावना बनी रहती है। अनिश्चित्ता की यह स्थिति प्रबन्धकों एवं संचालकों के लिए दुःखदायी होती है।

II. समाज पर प्रभाव

1. असफलता की सम्भावनाओं के कारण अति-पूँजीकृत कम्पनी के ऋणदाता अपने हितों की सुरक्षा के लिए सदैव चिन्ति रहते हैं।

2. अंशों का बाजार मूल्य गिर जाता है, वे बट्टे पर बिकने लगते हैं। इससे समस्त अर्थव्यवस्था पर निराशाजनक प्रभाव पड़ता है।

3. अति-पूँजीकृत कम्पनियों के अंशों में निरर्थक परिकल्पना बढ़ जाती है।

4. अति-पूँजीकरण पूँजी निर्माण एवं पूँजी की गतिशीलता को ठेस पहुँचाता है।

III. अंशधारियों पर प्रभाव

1. अंशों के मूल्य गिर जाने से उन्हें पूँजीगत हानि होती है।

2. लाभांश की दर कम हो जाने से उनकी आय में कमी हो जाती है।

3. समपार्श्विक प्रतिभूति के रूप में अंशों की उपयोगिता कम हो जाती है।

4. पुनर्संगठन या अवसायन की दशा में अंशधारियों को भारी हानि सहन करनी होती है।

“अल्प-पूँजीकरण, अति-पूँजीकरण की ओर ले जाता है।” (Under-capitalisation leads to Over-capitalisation)

यह एक रोचक तथ्य है जिस पर यकायक विश्वास नहीं होता किन्तु फिर भी यह सत्य है। अल्प-पूँजीकरण कुछ वर्षों के बाद किस प्रकार अति-पूंजीकरण को प्रोत्साहित करता है-इसे हम दो प्रकार से सिद्ध कर सकते हैं प्रथम, अल्प-पूँजीकरण कम्पनी अत्यधिक लाभ का उपार्जन भाग व्यवसाय में ही प्रतिधारित कर लिया जाता है। यह राशि पूँजीकरण का अंग मानी जाती है और व्यवसाय का लेख-मूल्य ज्ञान करने के लिए इसे पूँजी में जोड़ा जाता है। कुछ वर्षों में यह इतनी अधिक बढ़ जाती है कि कम्पनी के वास्तविक मूल्य से उसका लेख-मूल्य अधिक हो जाता है और इस प्रकार कम्पनी अति-पूँजीकृत हो जाती है। ऐसी कम्पनियों संचित कोषों में से बोनस अंशों का निर्गमन दो या तीन साल के अन्तराल के बाद करती रहती है। ऐसा करना वस्तुतः उचित पूँजीकरण की स्थिति प्राप्त करने का ही प्रयास माना जाना चाहिए। द्वितीय, अला-पूँजीकृत कम्पनी के अंश-पूँजी की मात्रा कम होती है और विस्तार व विकास कार्यों के लिए उसे दीर्घकालीन ऋणों का सहारा लेना पड़ता है। प्रत्येक अनुवर्ती ऋण पहले की अपेक्षा अधिक व्याज की दर पर प्राप्त होता है, क्योंकि जोखिम की मात्रा बढ़ जाती है। अतः लाभ में से चुकायी जाने वाली ब्याज की रकम बढ़ती चली जाती है। यह कुछ वर्षों में इतनी अधिक बढ़ जाती है कि कम्पनी की आय का महत्वपूर्ण भाग व्याज के भुगतान में व्यय हो जाता है और इसलिए कम्पनी सामान्यतः प्रचलित दर पर लाभांश घोषित करने की स्थिति में नहीं रह जाती। फलतः उसके धीरे-धीरे व्यवसाय का वास्तविक मूल्य उसके लेख – मूल्य के बराबर होकर कुछ वर्षों में जीचे गिर जाता है, अर्थात् कम्पनी अति-पूँजीकृत हो जाती है। उपर्युक्त कारणों को देखते हुए कहा जा सकता है कि “अल्प पूँजीकरण, अति-पूँजीकरण की ओर ले जाता है।”