व्यावसायिक वित्त क्या है ? वित्त कार्य की परम्परागत एवं आधुनिक विचारधारा को समझाइए।

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व्यावसायिक वित्त का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Business Finance)

व्यावसायिक वित्त का अर्थ व्यवसाय सम्बन्धी समस्त क्रियाओं की वित्त व्यवस्था से होता है। व्यवसाय का उद्देश्य लाभ कमाना होता है और व्यावसायिक क्रियाओं को चलाने हेतु एकल, व्यापारी साझेदारी या कम्पनी की आवश्यकता पड़ती है, अतः यह कह सकते हैं कि व्यावसायिक वित्त का सम्बन्ध नाभ कमाने के उद्देश्य से स्थापित व संचालित किए जाने वाले संगठनों की वित्तीय व्यवस्था से होता है। व्यावसायिक वित्त को समझने के लिए दोनों (व्यवसाय एवं वित्त) को अलग-अलग समझना होगा। व्यवसाय का अभिप्राय उन समस्त मानवीय क्रियाओं से होता है जो लाभ कमाने हेतु की जाती है। परन्तु यह व्यवसाय का व्यापक अर्थ है। वस्तुतः केवल आर्थिक क्रियाओं को ही व्यवसाय में शामिल किया जाना चाहिए। इस प्रकार किसी क्रिया को व्यावसायिक होने के लिए उसमें वस्तुओं एवं सेवाओं का लेन-देन अवश्य होना चाहिए। इस प्रकार व्यावसायिक वित्त मूलतः व्यावसायिक संस्था द्वारा फण्ड को प्राप्त करने, फण्ड का उपयोग करने तथा अर्जित लाभों के वितरण से सम्बन्धित है। आधुनिक दृष्टिकोण से इन्हें क्रमशः अर्थप्रबन्धन निर्णय, विनियोग निर्णय व लाभांश निर्णय के रूप में रखा जा सकता है और उस दशा में व्यावसायिक वित्त वित्तीय प्रबन्ध कहलाता है।

(1) गुसैन व गल] (Guthmann and Dugall) के अनुसार, “व्यावसायिक वित्त का तात्पर्य उन कार्यों से है जो व्यवसाय में उपयोग होने वाले फण्ड के नियोजन, संग्रह, नियन्त्रण व व्यवस्था करने से सम्बद्ध होते हैं।”

(2) हावर्ड एवं अपटन (Howard and Upton) के अनुसार, “व्यवसाय वित्त किसी संगठन में नकद और साख (Cash and Credit) के प्रबन्ध से सम्बन्धित प्रशासकीय क्षेत्र या क्रिया का समूह है जिससे कि संगठन के पास अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए यथासम्भव सन्तोषजनक ढंग से साधन उपलब्ध हो सके।”

वित्त कार्य का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Finance Function).

किसी भी व्यावसायिक उपक्रम में वित्तीय प्रबन्धक को जो भी कार्य करने होते हैं, उन्हें ही वित्त कार्य कहा जा सकता है। सरल शब्दों में, किसी भी व्यावसायिक संस्था की वित्तीय व्यवस्था करना ही वित्त कार्य है। आर. सी. ओसबोर्ग (R.C. Osborn) के अनुसार, “वित्त कार्य, व्यवसाय द्वारा कोषों की प्राप्ति तथा उनके उपयोग की प्रक्रिया है।”

इलटर के अनुसार, “वित्त कार्य एक व्यापक शब्द है जिसके अन्तर्गत उन सभी कार्यों का समावेश किया जाता है जिनका सम्बन्ध वित्त से है।” हैनरी के अनुसार, “वित्त कार्य के अन्तर्गत धन कोषों का पता लगाना, उनको जुटाना, उनका उपयोग करना, वित्त कोषों पर नियन्त्रण रखना, वित्त सम्बन्धी पूर्वानुमान लगाना, पूँजी की लागत प्राप्त करना आदि शामिल हैं।”

वित्त कार्य कौन करता है ? (Who Discharge the Finance Function)

आधुनिक युग में वित्त वह घुरी है जिसके चारों ओर आर्थिक संसार घूमता है। किसी भी व्यापार एवं उद्योग को चाहे वह बड़े पैमाने पर हो अथवा छोटे पैमाने पर, प्रारम्भ करने एवं उसके भावी विस्तार के लिए पर्याप्त वित्त की आवश्यकता होती है। आधुनिक समय में देश की औद्योगिक उन्नति वित्त प्रबन्ध पर ही निर्भर है। वित्त प्रबन्ध की उचित व्यवस्था के अभाव में औद्योगिक विकास की अनेक योजनाएँ फाइलों व कागजों तक ही सीमित रहकर असफल हो जाती है। अतः वित्तीय प्रबन्ध करने वाला व्यक्ति एक अनुभवी, दूरदर्शी एवं विवेकशील होना चाहिए। एकाकी व्यवसाय में जहाँ एक ही • व्यक्ति द्वारा वित्तीय कार्यों को सम्पादित किया जाता है, वहाँ साझेदारी व्यवसाय में प्रायः सभी साझेदारों द्वारा या उनमें से केवल कुछ साझेदारों द्वारा वित्तीय कार्यों का सम्पादन किया जाता है जबकि कम्पनी में वित्तीय कार्यों को सम्पन्न करने के लिए वित्तीय प्रबन्धक या नियन्त्रक एवं वित्तीय समितियों की नियुक्ति की जाती है।

वित्त कार्य की विचारधाराएँ (Approaches of Finance Function)

पिछले कुछ दशकों में वित्त कार्य के स्वरूप एवं विचार में पर्याप्त परिवर्तन हुआ है। वित्त कार्यों के सम्बन्ध में पुराने तथा नए विद्वानों के विचारों में बहुत ही अन्तर है। विचारयाय के इस अन्तर को दो भागों में स्पष्ट किया जा सकता है

(1) चित्त कार्य की परम्परागत विचारचारा (Traditional Concept of Finance Function)

(2) वित्त कार्य की आधुनिक विचारधारा (Modern Concept of Finance Function)

(1) वित्त कार्य की परम्परागत विचारधारा पिछले पाँच दशकों में वित्त कार्य के विवाद एवं स्वरूप तथा इसके कार्य क्षेत्र में जो क्रमिक परिवर्तन हुआ है, उसके फलस्वरूप वित्त कार्य एक यत्रतत्रिक कार्य न रहकर व्यवसाय संचालन की प्रक्रिया में निरन्तर प्रशासनिक कार्य बन गया है। परम्परागत विचारधारा के अन्तर्गत विषय का अध्ययन प्रमुख रूप से कोषों की व्यवस्था करने तथा समय-समय पर आवश्यकतानुसार कतिपय अन्य कार्यों को सम्पन्न करने तक ही सीमित था, जिससे पूँजी प्राप्ति के साधनों, संस्थागत स्रोतों तथा प्रचलित व्यवहारों के अध्ययन को अधिक प्रमुखता प्रदान की जाती थी। अतः इसके अन्तर्गत ऐसे प्रकरणों का अध्ययन किया जाता था जिनका सम्बन्ध दैनिक व्यवसाय संचालन से न होकर यदा-कदा उत्पन्न होने वाली कतिपय समस्याओं से होता था जैसे कम्पनी प्रवर्तक प्रतिभूतियाँ, पूँजी बाजार, पुनसँगठन, एकीकरण संविलयन आदि। यह समस्त अध्ययन निवेशक के दृष्टिकोण का परिचायक था, जिससे ऐसा प्रतीत होता था कि वित्तीय प्रबन्ध का प्रयोजन आन्तरिक प्रबन्ध से न होकर बाहरी व्यक्तियों (पूँजी लगाने वाले व्यक्तियों, बैंकरों, वित्तीय संस्थाओं) के मार्गदर्शन के लिए अधिक था। बीसवीं शताब्दी के मध्य तक इस विषय पर जो भी पुस्तकें प्रकाशित हुई उनके लेखक इसी परम्परागत विचारधारा के समर्थक थे। इन लेखकों में यॉमस एल. ग्रीन. ई. एस. मीड ए. एस. डेविंग सी. डब्ल्यू, गेस्टर्नवर्ग तथा हण्ट एण्ड विलयम्स प्रमुख रूप से उल्लेखनीय है जिसकी रचनाएँ सन् 1987 1950 तक विभिन्न वर्षों में पाठकों के सामने आयी। परम्परागत विचारधारा की कुछ सीमायें भी है जो निम्नलिखित है

1. यह केवल समामेलित उपक्रम की वित्त की प्राप्ति की समस्याओं पर ही ध्यान देती हैं और एकल व्यापारी साझेदारी संस्था आदि की वित्तीय समस्याओं की ओर अपेक्षाकृत कम ध्यान देती है।

2. यह विचारधारा विशेष घटनाओं जैसे प्रवर्तन, संविलयन, एकीकरण, विस्तार, पुनर्संगठन आदि के समय उत्पन्न वित्त समस्याओं पर अधिक ध्यान देती है किन्तु संस्था की दिन-प्रतिदिन की समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं देती। 3. यह विचारधारा संस्था के दीर्घकालीन वित्त प्रबन्ध पर अधिक केन्द्रित है।

(2) वित्त कार्य की आधुनिक विचारधारा आधुनिक विचारधारा के अन्तर्गत वित्तीय प्रबन्ध व्यावसायिक प्रबन्ध का एक अभिन्न अंग बन गया है जिसका सम्बन्ध व्यवसाय के आन्तरिक संचालन से अधिक है। विषय के वर्णनात्मक पथ पर अधिक ध्यान देने के स्थान पर अब इसके विश्लेषणात्मक पक्ष पर अधिक ध्यान दिया जाता है। विचारधारा में परिवर्तन एवं विषय-वस्तु के विस्तार के लिए अनेक कारण उत्तरदायी रहे हैं। वर्तमान शताब्दी के मध्य के पश्चात व्यावसायिक फर्मों के आकार में पर्याप्त वृद्धि हुई है। विशाल निगमों की स्थापना तथा उनमें होने वाली कड़ी प्रतिस्पर्धा ने साधनों के अनुकूलतम उपयोग की ओर प्रबन्धकों का के ध्यान आकर्षित किया। अतः वित्तीय नियोजन, नियन्त्रण तथा कार्य-निष्पादन की नवीन विधियों एवं तकनीकों का विकास हुआ जिन्होंने व्यावसायिक वित्त को नये आयाम प्रदान किये जिनका सम्बन्ध कोषों के प्रभावपूर्ण एवं कुशलतापूर्ण उपयोग से है। आधुनिक समय में वित्त का कार्य उच्च स्तर पर नीति-निर्धारण एवं प्रबन्धकीय निश्चयीकरण से अधिक जुड़ गया। इसके अन्तर्गत कोषों के अनुकूलतम उपयोग की दशा में विवेकपूर्ण निर्णय लिये जा सकते हैं। इस सन्दर्भ में दीर्घकालीन वित्तीय नियोजन कोषों के वैकल्पिक उपयोगों का मूल्यांकन, पूँजी बजटिंग व्यवसाय की वित्तीय सफलता के मापदण्डों का निर्धारण, पूँजी की लागत तथा कार्यशील पूँजी के प्रबन्ध आदि, इस विषय के प्रमुख अंग बन चुके हैं। व्यावसायिक इकाइयों के बढ़ते हुए आकार, व्यवसायियों में बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा, निरन्तर नवीन तकनीकी प्रगति, परिवर्तनशील बाह्य परिवेश के सन्दर्भ में व्यवसाय के सही मूल्यांकन एवं पूर्वानुमान के क्षेत्र में मशीनी कम्प्यूटरों की महत्वपूर्ण भूमिका आदि ने वित्त कार्य के दायरे को तो विस्तार दिया ही है साथ ही इसके दायित्वों को भी बढ़ा दिया है।