कार्यशील पूँजी का अनुमान लगाते समय किन कारकों को ध्यान में रखना चाहिए ?

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कार्यशील पूँजी का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Working Capital)

दीर्घकालीन एवं अल्पकालीन दोनों प्रकार की देनदारियों द्वारा प्रतिनिधित्व समस्त चल सम्पत्ति के योग को कार्यशील पूँजी माना जायेगा। चल सम्पत्तियों की व्यवस्था चाहे अंश-पूँजी और अन्य दीर्घकालीन ऋणों द्वारा दीर्घकालीन आधार पर की जाय अथवा चल देनदारियों के द्वारा इससे उनकी उपयोगिता में कोई कमी नहीं होती और चूँकि वे समस्त चल सम्पत्तियाँ व्यवसाय के कार्य में प्रयुक्त होती है; अतः उन सबको कार्यशील पूँजी माना जाना चाहिए। दूसरा तर्क यह है कि चूँकि स्थिर सम्पत्ति को स्थिर पूँजी का प्रतीक माना जाता है अतः चल सम्पत्ति को चल या कार्यशील पूँजी का प्रतीक माना जाना चाहिए। दूसरे मत के अनुसार, “चल सम्पत्ति में से यदि चालू देनदारियों को घटा दिया जाय, तो जो राशि शेष रहेगी, उसे कार्यशील पूँजी कहा जायेगा। इसमें कुल परिमाण या मात्रा की अपेक्षा, कार्यशील पूँजी के गुणात्मक पहलू पर अधिक जोर दिया गया है।”

  • मीड, मैलट एवं फील्ड (Mead, Melott and Field) के अनुसार, “कार्यशील पूँजी से आशय चल सम्पत्तियों के योग से है।”
  • बोनविले (Bonneville) के अनुसार, “कोषों की कोई प्राप्ति जो चालू सम्पत्तियों में वृद्धि करती है वह कार्यशील पूँजी में भी वृद्धि करती है, क्योंकि ये दोनों एक ही है।” जे. एस. मिल (J. S. Mill) के अनुसार, “चालू सम्पत्तियों का योग ही व्यवसाय की कार्यशील पूँजी है।”
  • सी. डब्ल्यू, गस्टनवर्ग (C. W. Gerstenberg) के अनुसार, “कार्यशील पूँजी को सामान्यतया चालू देनदारियों के ऊपर चल सम्पत्तियों के आधिक्य के रूप में परिभाषित किया जाता है।”
  • एल. जे. गिटमैन (L. J. Gitmen) के अनुसार, “कार्यशील पूँजी की सर्वमान्य परिभाषा फर्म की चल सम्पत्तियों एवं चालू दायित्वों का अन्तर है।” के. के. गुप्ता (K. K. Gupta) के अनुसार, “कार्यशील पूँजी से आशा पूँजी के ऐसे भाग से है, जो उपक्रम की अल्पकालिक सम्पत्तियों में विनियोजित है।”

कार्यशील पूँजी का वर्गीकरण (Classification of Working Capital)

कार्यशील पूँजी का वर्गीकरण निम्न दो आधारों पर किया जाता है (1) अवधारणा के आधार पर (Bases of Concept) अवधारणा के आधार पर कार्यशील पूँजी को निम्न दो भागों में बाँटा जा सकता है

(अ) सकल कार्यशील पूँजी (Gross Working Capital) सकल कार्यशील पूँजी से आशय सम्पूर्ण कार्यशील पूँजी से है, अर्थात् समस्त चालू सम्पत्तियों का योग ही सकल कार्यशील पूँजी है। दूसरे शब्दों में जब हम चालू सम्पत्तियों के योग में से चालू दायित्वों का योग नहीं घटाते तो यह सकल कार्यशील पूँजी कहलाती है। चालू सम्पत्तियों में Cash in hand, Cash at Bank, Debtors, B / R Stock, Short term investment, Prepaid Expenses आदि को शामिल करते हैं।

सूत्र के रूप में-सकल कार्यशील पूँजी = चालू सम्पत्तियाँ

(ब) शुद्ध कार्यशील पूँजी (Net Working Capital)—शुद्ध कार्यशील पूँजी से आशय ऐसी पूँजी से है, जिसमें चालू सम्पत्तियों में से चालू दायित्वों को घटा दिया जाता है। दूसरे शब्दों में चालू दायित्वों पर चालू सम्पत्तियों का आधिक्य ही शुद्ध कार्यशील पूँजी है। आधुनिक विद्वान् इस अवधारणा को उपयुक्त मानते हैं।

सूत्र के रूप में शुद्ध कार्यशील पूँजी = चालू सम्पत्तियाँ चालू दायित्व व्यापक दृष्टिकोण के आधार पर कार्यशील पूँजी चल सम्पत्तियों के योग के बराबर होती है। इस प्रकार यह परिभाषा कार्यशील पूँजी की मात्रा पर अधिक जोर देती है। इस परिभाषा के अनुसार, चल सम्पत्तियाँ, चाहे वे किसी साधन से क्यों न प्राप्त की गयी हों, दिन-प्रतिदिन संचालन सम्बन्धी क्रियाओं में प्रयुक्त होती हैं और उनका रूप परिवर्तित होता रहता है, अतः उन सबको कार्यशील पूँजी ही मानना चाहिए। संकीर्ण दृष्टिकोण के आधार पर चल सम्पत्तियों में से चल दायित्वों को घटाने के बाद जो शेष बचता है, उसे ही कार्यशील पूँजी माना जा सकता है। इस प्रकार यह दृष्टिकोण कार्यशील पूँजी की मात्रा पर जोर न देकर उसके गुणात्मक पहलू पर जोर देती है। किसी भी संस्था की ‘कार्यशील पूँजी’ सामान्यतः कच्चे माल के स्कन्ध में, अंशतः तैयार माल के स्कन्ध में, प्राप्त खातों में, विक्रय योग्य प्रतिभूतियों में और रोकड़ में विनियोजित होती है। इन सभी रूपों में लगायी गयी पूँजी सतत् रूप में नकद रोकड़ में परिवर्तित होती रहती है और यह रोकड़ पुनः कार्यशील पूँजी के अन्य प्रारूपों के बदले में बाहर चली जाती है। परन्तु यह ध्यान में रखना चाहिए कि रोकड़ या रोकड़ तुल्य सभी सम्पत्तियों के कुल मूल्य को कार्यशील पूँजी का माप नहीं माना जा सकता है। क्योंकि चिट्टे के दूसरी तरफ दायित्वों का एक समूह होता है जिसमें मुख्य रूप से अधिविकर्ष, लेनदार, देय बिल व अन्य अल्पकालीन दायित्व होते हैं, जो इन सम्पत्तियों के मूल्यों में से अवश्य घटाये जाने चाहिए ताकि शुद्ध कार्यशील पूँजी निर्धारित की जा सके। इसीलिए कार्यशील पूँजी की चालू सम्पत्ति का चालू दायित्व पर आधिक्य के रूप में परिभाषित करना यथोचित होगा।

(2) आवश्यकता के आधार पर (Bases of Need) आवश्यकता के आधार पर कार्यशील पूँजी को निम्न दो भागों में बाँटा जा सकता है

(अ) स्थिर कार्यशील पूँजी (Fixed Working Capital) चल सम्पत्तियों की आवश्यकता संचालन चक्र से सम्बन्धित है, जो अपने आप में एक सतत प्रक्रिया है। इस प्रकार चल सम्पत्तियों की • आवश्यकता नियमित रूप से महसूस की जाती है। परन्तु चल सम्पत्तियों में विनियोग की मात्रा हमेशा एकसमान नहीं होती है। उत्पादन के स्तर के अनुसार एक समयावधि में चल सम्पत्तियों में विनियोग की मात्रा बढ़ती या घटती रहती है। फिर भी चल सम्पत्तियों का एक न्यूनतम स्तर ऐसा होता है जो व्यवसाय के संचालन के लिए अपरिहार्य होता है, चाहे उत्पादन स्तर कुछ भी क्यों न रहे। यह न घटने योग्य न्यूनतम राशि होती है, जो चल सम्पत्तियों के चलन के लिए आवश्यक होती है। चल सम्पत्तियों में यह न्यूनतम विनियोग स्थायी रूप से व्यवसाय में बनी रहती है और इसलिए इसे स्थायी या स्थिर या नियमित कार्यशील पूँजी कहते हैं। यह उसी प्रकार स्थायी होती है, जैसे स्थायी सम्पत्तियों में विनियोग होता है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि इस प्रकार की कार्यशील पूँजी का अर्थ प्रबन्धन स्थायी वित्त स्रोत से किया जाना चाहिए।

(ब) परिवर्तनशील कार्यशील पूँजी (Variable Working Capital) स्थायी कार्यशील पूँजी के अलावा शेष कार्यशील पूँजी की मात्रा उत्पादन व विक्रय में परिवर्तन के अनुसार बदलती रहती है। कार्यशील पूँजी की आवश्यकता मौसमी परिवर्तनों या असाधारण दशाओं के कारण भी बदलती रहती है। बदलती व्यावसायिक क्रियाओं की सहायता हेतु अतिरिक्त कार्यशील पूँजी की आवश्यकता ही परिवर्तनशील कार्यशील पूँजी मानी जाती है। उदाहरण के लिए कीमत स्तर में वृद्धि से कच्चे माल के स्टॉक में विनियोग की मात्रा में वृद्धि होगी, गलाकाट प्रतियोगिता, तालाबन्दी, हड़ताल आदि से उत्पन्न समस्याओं का सामना करने हेतु अतिरिक्त कार्यशील पूँजी की जरूरत होगी, विक्रय-संवर्द्धन हेतु विशिष्ट विज्ञापन व अन्य प्रोत्साहनों हेतु अतिरिक्त कार्यशील पूँजी की जरूरत पड़ सकती है।

कार्यशील पूँजी के संघटक या अवयव (Components of Working Capital)

कार्यशील पूँजी के निम्नलिखित दो संघटक या अवयव है 1. चालू सम्पत्तियाँ (Current Assets)—चालू सम्पत्तियों का अभिप्राय ऐसी सम्पत्तियों से है जो अल्प अवधि के अन्तर्गत अधिकतम एक वर्ष के भीतर रोकड़ में परिवर्तित हो जाती है। चाल सम्पत्तियों में मुख्यतः निम्नलिखित सम्पत्तियों को शामिल किया जाता है हस्तस्थ रोकड़ (Cash in hand), बैंक में रोकड़ (Cash at Bank), देनदार (Debtors), पूर्वदत्त व्यय (Prepaid Expenses), अल्पकालीन निक्षेप (Short-term Deposits), प्राप्य बिल (Bills Receivable), पुस्तकीय ऋण (Book Debts), स्टॉक / स्कन्ध (Stock, Inventory or Merchandise), विक्रय योग्य प्रतिभूतियाँ (Marketable Securities )। 2. चालू दायित्व (Current Liabilities) चालू दायित्वों का आशय ऐसे दायित्वों से है। जिनका भुगतान सामान्यतया 1 वर्ष के भीतर कर दिया जाता है। चालू दायित्वों में निम्नलिखित को शामिल किया जाता है

व्यापारिक लेनदार (Trade Creditors), बैंक अधिविकर्ष (Bank Overdraft), देय बिल (Bills Payable), कर के लिए प्रावधान या देय आय कर (Provision for Taxation or Income Tax Due), अदत्त व्यय (Outstanding Expenses), अल्पकालीन ऋण ( Short-term Loans) आदि।

कार्यशील पूँजी की आवश्यकता (Need of Working Capital)

व्यवसाय के दिन-प्रतिदिन के कार्य-कलापों में कार्यशील पूँजी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कार्यशील पूँजी का व्यवसाय का जीवन रक्त होती है। इस सम्बन्ध में केनेडी एवं मैकमूलन ने ठीक ही कहा है कि “कार्यशील पूँजी का अध्ययन आन्तरिक एवं बाह्य विश्लेषकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका व्यवसाय के दिन-प्रतिदिन के संचालन से बहुत निकट का सम्बन्ध है। कार्यशील पूँजी की पर्याप्तता या खराब प्रबन्ध व्यवसाय की असफलताओं का एक प्रमुख कारण है।” केवल स्थायी सम्पत्ति के लिए पूँजी व्यवस्था कर देने मात्र से ही व्यवसाय का संचालन नहीं किया जा सकता व्यवसाय की सामान्य प्रगति के लिए स्थिर सम्पत्ति के लिए आवश्यक पूँजी के साथ-साथ चल सम्पत्तियों के लिए आवश्यक पूँजी की भी व्यवस्था करनी होती है। कच्चा माल खरीदने, निर्माण प्रक्रिया द्वारा उसे निर्मित माल में परिवर्तित करने, माल को बेचने के लिए उसकी विक्रय व्यवस्था करने, ग्राहकों को उधार माल देने के लिए भी पूँजी की आवश्यकता होती है। इस पूँजी की व्यवस्था दीर्घकालीन एवं अल्पकालीन दोनों प्रकार के ऋणों द्वारा की जाती है। कार्यशील पूँजी की आवश्यकता निम्नलिखित कार्यों के लिए होती है

  • (1) कच्चा माल (Raw Material) क्रय करने के लिए।
  • (2) अवयव (Compounds) एवं अन्य पुर्जों को क्रय करने के लिए।
  • (3) कच्चे माल को निर्मित माल में परिवर्तित करने तक की समस्त प्रक्रियाओं के लिए।
  • (4) प्रशासनिक एवं कार्यालय व्ययों का भुगतान करने के लिए।
  • (5) विक्रय व्ययों जैसे पैकिंग एवं विज्ञापन के लिए।
  • (6) कच्चे माल, अर्द्ध-निर्मित कार्य एवं निर्मित माल के स्टॉक को बनाये रखने के लिये।
  • (7) व्यवसाय की सुदृढ़ तरल स्थिति बनाये रखने के लिए।
  • (8) दैनिक व्ययों का भुगतान करने के लिए।
  • (9) नकद छूट का लाभ उठाने के लिए।
  • (10) अनुकूल बाजार अवसरों का लाभ उठाने के लिए।

कार्यशील पूँजी को प्रभावित करने वाले घटक (Factors affecting Working Capital)

कार्यशील पूँजी की मात्रा क्या हो और उसके कितने भाग की व्यवस्था स्थायी आधार पर की जाय इसके लिए कोई एक ऐसा सामान्य मापदण्ड नहीं है जिसे सब कम्पनियों पर लागू किया जा सके। यह प्रश्न विभिन्न व्यवसायों तथा एक ही व्यवसाय में संलग्न विभिन्न कम्पनियों की परिस्थितियों के अनुसार ही हल किया जाना चाहिए। मात्रा का निर्धारण करते समय यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि वह इतना अवश्य हो कि जिससे व्यवसाय के सभी सामान्य व्ययों की पूर्ति की जा सके, तथा कम्पनी के पास सदैव तरल सम्पत्तियों की एक न्यूनतम मात्रा, आकस्मिक देनदारियों के भुगतान के लिए अथवा ऋण प्राप्त करने की क्षमता को बनाये रखने के लिए रखी जा सके मात्रा इतनी अधिक भी नहीं होनी चाहिए कि उसका एक महत्वपूर्ण भाग सदैव निरर्थक पड़ा रहे। कार्यशील पूंजी का अनुमान लगाते समय निम्न घटकों को ध्यान में रखना चाहिए

1. व्यवसाय की प्रकृति- कार्यशील पूँजी की मात्रा पर व्यवसाय की प्रकृति का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। अधिक एवं नियिमत माँग वाले व्यवसायों-जैसे परिवहन संगठनों तथा अन्य जनोपयोगी उपक्रमों में अपेक्षाकृत कम कार्यशील पूँजी से काम चल जाता है। इनकी सेवाओं की निरन्तर मॉंग रहती है और उनका भुगतान तत्काल होता रहता है। परिवहन आदि सेवाओं में तो अग्रिम धनराशि लेकर ग्राहकों को सेवा बाद में प्रदान की जाती है। इसके विपरीत, व्यापारिक उपक्रमों में, जहाँ माल के वितरण या क्रय-विक्रय का कार्य होता है, स्थिर पूँजी अधिक नहीं होती किन्तु कार्यशील पूँजी अधिक रखनी होती है। इसका कारण यह है कि पूँजी का एक बड़ा भाग माल का भण्डार रखने और माल उधार देने में खप जाता है। आधारभूत उद्योगों में स्थिर पूँजी की तुलना में कार्यशील पूँजी की मात्रा कम होती है।

2. व्यवसाय का आकार कम्पनी के आकार के साथ-साथ स्थिर पूँजी एवं कार्यशील पूँजी दोनों की आवश्यकता बढ़ती जाती है। छोटे व्यवसायों में अधिक कार्यशील पूँजी की आवश्यकता नहीं होती जबकि विशाल कम्पनियों में, जिसका उद्देश्य बहुत बड़ी माँग की पूर्ति करना होता है, स्थिर-पूँजी के साथ-साथ कार्यशील पूँजी की मात्रा में भी वृद्धि हो जाती है।

3. उत्पादन प्रक्रिया की अवधि उत्पादन संस्थाओं में समय तत्व अत्यन्त महत्व रखता है। उत्पादन के काल में निर्माण कार्यों की वित्त पूर्ति कार्यशील पूँजी द्वारा की जाती है। यदि उत्पादन की प्रक्रिया लम्बी है, अर्थात् कच्चे माल को निर्मित स्वरूप प्रदान करने की प्रक्रिया में अधिक समय लगता है, तो कार्यशील पूंजी की आवश्यकता में वृद्धि हो जायेगी, क्योंकि निर्माणधीन प्रक्रिया में लम्बी अवधि तक पूँजी फँसी रहेगी जलयान निर्माण उद्योग इसके उत्तम उदाहरण हैं। उत्पादन-प्रक्रिया की अवधि जितनी ही कम लम्बी होगी, कार्यशील पूँजी उतनी ही कम मात्रा में अपेक्षित होगी।

4. इन्वेण्ट्री का आकार किसी कम्पनी में माल के तीन प्रकार हो सकते हैं कच्चा माल, अर्द्ध-निर्मित माल। तीनों ही प्रकार के माल में चल पूँजी का अधिक तरल स्वरूप नहीं होता और यह तत्व संस्था की कार्यशील पूँजी की आवश्यकताओं को अधिक प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए, सूती वस्त्र उद्योग में कच्चे, अर्द्ध-निर्मित एवं निर्मित, तीनों ही प्रकार के माल का मूल्य काफी होता है और इनकी आवृत्ति भी धीमी गति से होती है। अतः कार्यशील पूँजी का परिमाण स्थिर पूँजी से भी अधिक हो जाता है। ऐसी कम्पनियाँ उत्पादन प्रक्रिया को सुचारू रूप से चालू रखने के लिए भारी मात्रा में सब प्रकार के माल के स्टॉक जमा रखती है और इस कारण कार्यशील पूँजी की आवश्यक मात्रा में वृद्धि हो जाती है।

5. खरीद की शर्तें एवं रीति-कच्चा माल अधिकांशतः वर्ष के किन महीनों तथा किन शर्तों पर खरीदा जाता है-इसका भी कार्यशील पूँजी की मात्रा पर प्रभाव पड़ता है। यदि कच्चे माल की समस्त वार्षिक आवश्यकता को फसल के समय ही खरीदकर स्टॉक में रखना पड़ता है, तो कार्यशील पूँजी की अधिक आवश्यकता होगी। इसके विपरीत, यदि कम्पनी को वर्ष पर्यन्त कच्चे माल की पूर्ति स्थानीय बाजार से बराबर होती रहती है तो स्थिति दूसरी होगी। इसके अतिरिक्त, कच्चा माल उधार खरीदा जाता है अथवा नकद इसका भी कार्यशील पूँजी की मात्रा पर प्रभाव पड़ेगा। यदि कच्चा माल उधार मिल जाता है, तो उसे निर्मित करने के बाद बेचकर कच्चे माल का भुगतान किया जा सकता है।

6. विक्रय की शर्तें-प्रायः सब स्थानों एवं कम्पनियों में निर्मित माल का विक्रय उधार के आधार पर किया जाता है और ग्राहकों के खाते में उसका नाम लिख दिया जाता है तथा स्थानीय प्रथा एवं परम्परा के अनुसार सप्ताह में, महीनों में या तीन महीने में, हिसाब होता रहता है प्रचलित उधार की अवधि से जल्दी भुगतान प्राप्त होने पर प्रायः ग्राहक नकद बट्टा भी माँगते हैं जो उन्हें देना होता है। माल का भुगतान प्रायः बिल या हुण्डियों के द्वारा भी किया जाता है जिन्हें तत्काल बैंक से भुनाने पर कम्पनी को यट्टा देना होता है जो उतनी रकम पर बिल या हुण्डी के ब्याज के बराबर होता है माल को बेचने और उसका भुगतान प्राप्त करने के समयों में अधिक या कम अन्तर कार्यशील पूँजी पर प्रभाव डालता है।

7. क्रय एवं विक्रय की शर्तों में सम्बन्ध–व्यापारिक ऋण स्वयं कार्यशील पूँजी का एक महत्वपूर्ण साधन है। यदि किसी कम्पनी को खरीदे हुए कच्चे माल का मूल्य नकद चुकाना है, किन्तु निर्मित माल का विक्रय वह अपने ग्राहकों को उधार के आधार पर करती है; तो ऐसी दशा में उसे अधिक कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होगी। यदि क्रय एवं विक्रय की शर्तों में समानता है, तो कठिनाई उत्पन्न नहीं होगी। प्राप्य विपत्रों की नियमित वसूली परिपक्व देय विपत्रों के नियमित भुगतान में सहायक होती है। ऐसी अवस्था में उधार खरीद का वित्त पोषण स्वयं उधार विक्रय की नियमित वसूली के द्वारा होता रहेगा और कम्पनी अपेक्षाकृत कम कार्यशील पूंजी से ही अपना कार्य संचालन कर सकने में सफल हो सकेगी। इसके विपरीत, यदि कम्पनी को माल की खरीद के लिए उधार की सुविधा प्राप्त है, किन्तु अपने माल का विक्रय वह नकद करती है तो ऐसी दशा में कम कार्यशील पूँजी से काम चल सकता है।

8. व्यवसाय की मौसमी प्रकृति अनेक कम्पनियों का व्यापार वर्ष के किसी मौसम विशेष में अधिक होता है। उस मौसम में इन कम्पनियों को अधिक मात्रा में कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होगी। भारत की चीनी मिलें इनका उत्तम उदाहरण है। इनमें उत्पादन प्रायः नवम्बर से अप्रैल तक चलता है और इन महीनों में अधिक कार्यशील पूंजी की जरूरत होती है। ऊनी माल, बिजली के पंखे, वाटर कूलर, रेफ्रीजरेटर आदि से सम्बन्धित उद्योग में एक अन्य प्रकार की कठिनाई सामने आती है। इनमें अधिकांशतः उत्पादन कार्य वर्ष पर्यन्त हाता है जबकि विक्रय एक ऋतु विशेष में ही होता है। ऋतु आने तक इन्हें माल का स्टॉक रखना पड़ता है जिसके वित्त पोषण में अधिक कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है, जिसे बैंकों से अल्पकालीन ऋण लेकर पूरा किया जाता है।

9. व्यवसाय के विकास की सामान्य दर-व्यवसाय आरम्भ करने के बाद कुछ वर्षों में उनका धीरे-धीरे विकास होने लगता है। विकास के साथ-साथ कार्यशील पूंजी की आवश्यकता भी बढ़ती जाती है। व्यवसाय के विकास की दर एवं कार्यशील पूंजी में वृद्धि की मात्रा में पूर्ण सामंजस्य होना चाहिए अन्यथा पूँजी की कमी के कारण विकास रुक जायेगा। प्रायः सामान्य विकास का वित्त-पोषण लाभ के पुनर्विनियोग के द्वारा किया जाता है।

10. बैंकिंग सम्बन्ध-ऐसी कम्पनियाँ, जिन्होंने अपने जीवन काल में बैंकों के साथ अच्छे सम्बन्ध स्थापित कर लिये हैं और बैंकों की दृष्टि में जिनकी साख अच्छी है; तथा जिनमें उन्हें विश्वास है, समय पड़ने पर शीघ्र वित्त की व्यवस्था कर सकती है। ये अपना कार्य चालू देनदारियों के आधार पर भी सुचारू रूप से चला सकती है; यद्यपि इसके लिए पर्याप्त अनुभव एवं कुशलता अपेक्षित है। यह इस बात पर भी निर्भर होगा कि बाजार में कम्पनी की साख कैसी है।