कार्यशील पूंजी प्रबन्ध से आप क्या समझते है ? कार्यशील पूँजी में कमी और आधिक्य खतरों को बताइए।

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कार्यशील पूँजी का प्रबन्ध का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Management of Working Capital)

कार्यशील पूँजी के प्रबन्ध का आशय है, उसकी चालू सम्पत्तियों की व्यवस्था करना है। इन सम्पत्तियों के विनियोग-स्तर तथा इनके कुशल प्रबन्ध पर ही फर्म के धन-कोर्षो की तरलता निर्भर करती है। व्यापक रूप में कार्यशील पूँजी के प्रबन्ध में चालू सम्पत्तियों एवं चालू दायित्वों दोनों के प्रबन्ध से सम्बन्धित सभी पहलू शामिल होते हैं। डेमोग तथा कोल्ब के अनुसार, “कार्यशील पूँजी के प्रबन्ध में चालू सम्पत्तियों का नियन्त्रण, चालू दायित्वों के माध्यम से अल्पकालीन वित्त साधनों के प्रयोग तथा शुद्ध कार्यशील पूँजी की राशि को नियन्त्रित करना, सम्मिलित होता है।”

कार्यशील पूँजी के प्रबन्ध की नीतियाँ (Policies of Working Capital Management) : कार्यशील पूंजी के प्रबन्ध के लिए प्रबन्ध के द्वारा निम्न तीन प्रकार की नीतियों से किसी भी एक नीति को अपनाया जा सकता है

(1) रूढ़िवादी नीति (Conservative Policy)—इस नीति के अनुसार प्रबन्धकों द्वारा चल सम्पत्तियों में कोषों का विनियोग प्रचुरता से किया जाता है। इससे जोखिम (Risk) कम होकर शोधन क्षमता (Solvency) में सुधार होता है। किन्तु आवश्यकता से अधिक विनियोग के फलस्वरूप लाभदायकता में गिरावट आती है।

(2) उग्र नीति (Aggressive Policy)- इस नीति के अनुसार प्रबन्धकों द्वारा चल सम्पत्तियों में पूंजी विनियोग की मात्रा न्यूनतम रखकर उत्पादकता में वृद्धि करने के प्रयास किये जाते हैं। किन्तु इससे जोखिम की मात्रा बढ़ जायेगी और शोधन क्षमता में कमी हो जायेगी।

(3) सामान्य-नीति (Modern Policy)- इस नीति के अनुसार प्रबन्धकों द्वारा चल सम्पत्तियों में कोर्यों का विनियोग न आवश्यकता से अधिक होता है और न कम। इस नीति को अपनाने से जोखिम की मात्रा कम हो जाती है तथा शोधन क्षमता एवं लाभदायकता की स्थिति में सुधार होता है।

कार्यशील पूँजी प्रबन्ध का महत्व (Importance of Working Capital Management)

कार्यशील पूंजी का प्रबन्ध करना व्यवसाय के दैनिक कार्यों के संचालन में आवश्यक होता है। कार्यशील पूँजी एक व्यवसाय का जीवन रक्त होता है। जिस प्रकार जीवन को बनाये रखने के लिए मानवीय शरीर में रक्त संचारण आवश्यक है, ठीक उसी प्रकार एक व्यवसाय के सुचारू संचालन के लिए कार्यशील पूँजी अति आवश्यक है। साथ ही कार्यशील पूँजी की रकम न तो आवश्यकता से कम हो और न ही आवश्यकता से अधिक हो। ये दोनों ही स्थितियाँ व्यवसाय को उसी प्रकार पीड़ित करती है, जिस प्रकार मानव शरीर में उच्च रक्तचाप एवं निम्न रक्त चाप से परेशानी होती है। अतः वित्तीय प्रबन्धक को कार्यशील पूँजी का उचित प्रबन्ध करना चाहिए। कार्यशील पूँजी प्रबन्ध के महत्व को अग्र प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

1. विनियोग–कुल पूँजी साधनों के महत्वपूर्ण भाग का विनियोग चल सम्पत्तियों में होता है, अतः चल सम्पत्तियों के प्रबन्ध पर विशेष ध्यान देना आवश्यक होता है जिससे कि इनके न्यूतम आवश्यक स्तर को बनाये रखा जा सके।

2. परिवर्तन-चल सम्पत्ति में निरन्तर परिवर्तन होते रहते हैं जबकि स्थिर सम्पत्तियों की व्यवस्था एक बार ही की जाती है तथा उनमें परिवर्तन कम होते हैं। व्यवसाय का संचालन चल सम्पत्ति के आधार पर ही होता है। जितनी फेर-बदल अधिक होगी उतनी ही अधिक व्यवसाय की मात्रा में बढ़ोत्तरी होगी इस प्रकार वित्तीय प्रबन्धक का बहुत अधिक समय कार्यशील पूंजी के प्रबन्ध पर व्यय होता है। इसीलिए प्रायः कहा जाता है कि कार्यशील पूँजी का प्रबन्ध वित्तीय प्रबन्धक के लिए निरन्तर बना रहने वाला सिर दर्द है।

3. स्थिर पूँजी की मात्रा में कमी-इनके लिए कार्यशील पूँजी के प्रबन्ध का महत्व और अधिक है क्योंकि छोटे उपक्रमों में स्थिर पूँजी की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है और दीर्घकालीन वित्त की सुविधाओं के अभाव में उन्हें बैंक साख बाजार-साख आदि का सहारा लेकर सम्पत्तियों के आवश्यक स्तर को निरन्तर बनाये रखना होता है।

4. विक्रय की मात्रा से सम्बन्ध कार्यशील पूंजी की आवश्यकता एवं विक्रय की मात्रा के बीच में प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है। बिक्री की मात्रा में वृद्धि के साथ-साथ व्यवसाय में रोकड़ स्टॉक एवं उधार की बिक्री की मात्रा में वृद्धि हो जाती है। अतः वित्तीय प्रबन्धक को पूर्व-नियोजन विक्रय की मात्रा तथा चल सम्पत्तियों में प्रत्याशित वृद्धि के मध्य सामंजस्य बनाये रखना होता है; जो कि कार्यशील पूँजी के प्रबन्ध में उष्ण दक्षता की अपेक्षा चाहता है।

5. जोखिम – प्रत्याय भ्रमजाल चल सम्पत्तियों का अनुकूलतम स्तर से ऊँचा अथवा नीचा स्तर उपक्रम की शोधन क्षमता एवं लाभदायकता को प्रभावित करता है। चल सम्पत्तियों का न्यूनतम स्तर जोखिम में वृद्धि करके शोधन क्षमता की स्थिति में सुधार करता है; किन्तु साथ ही पूँजी पर प्रत्याय अथवा लाभदायकता में कमी कर देगा। अतः यह कार्यशील पूँजी के प्रबन्धक का दायित्व है कि वह इन दोनों स्थितियों में निरन्तर सन्तुलन बनाये रखने का प्रयास करें। प्रायः यह प्रश्न सामने आता है कि यह कैसे ज्ञात किया जाये कि कार्यशील पूँजी का प्रबन्ध कुशलतापूर्वक हो रहा है अथवा नहीं हो रहा है ? किन प्रमापों अथवा मापदण्डों के आधार पर कार्यशील पूँजी की प्रबन्ध कुशलता का मूल्यांकन किया जाय ? इसके लिए किसी एक ‘प्रमाप’ अथवा ‘मापदण्ड’ को आधार मानना उचित नहीं होगा; क्योंकि कार्यशील पूँजी की संरचना में अनेक चल सम्पत्तियों का योग होता है तथा प्रत्येक चल सम्पत्ति अत्यन्त चलायमान होती है। अतः चाहे किसी कम्पनी का आकार विशाल हो अथवा छोटा हो; अतिशीघ्र गति से निरन्तर चलायमान कार्यशील पूँजी के प्रबन्ध की कुशलता के मूल्यांकन के लिए हमें अनेक महत्वपूर्ण मापदण्डों को आधार मानना होगा। ऐसे मूल्यांकन के लिए ‘सतत् परिवर्तनशीलता’ एवं तीव्र गति से चलायमानता के महत्वपूर्ण कारकों को दृष्टिगत रखना अत्यन्त आवश्यक होगा।

कार्यशील पूँजी के आयाम (Dimensions of Working Capital) : कार्यशील पूंजी के आयामों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) चल सम्पत्तियों में विनियोग का प्रबन्ध-कार्यशील पूँजी प्रबन्धक का पहला व प्रमुख दायित्व चल सम्पत्तियों में विनियोग का उचित स्तर निर्धारित करता है। यद्यपि किसी भी चल सम्पत्ति में विनियोग की राशि दिन-प्रतिदिन बदलती रहती है, फिर भी एक समयावधि के दौरान औसत राशि को चल सम्पत्तियों में स्थायी व परिवर्तनशील विनियोग के निर्धारण में प्रयोग कर सकते हैं। स्थायी थ परिवर्तनशील विनियोग में अन्तर करना एक उचित अर्थप्रबन्धन व्यूह रचना तैयार करने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। विनियोग की राशि या स्तर के अलावा चल सम्पत्तियों के प्रकार को निर्धारित करना भी एक महत्वपूर्ण निर्णय कारक (चर) होता है। स्कन्ध में कौन-कौन सी मदें होंगी, प्राप्यों में किन ग्राहकों को शामिल करेंगे विपणन योग्य प्रतिभूतियों में किन्हें शामिल करेंगे आदि को ध्यान में रखकर ही चल सम्पत्तियों में विनियोग के स्तर को निर्धारित करना चाहिए।

(2) कार्यशील पूँजी का अर्थ प्रबन्धन कार्यशील पूँजी प्रबन्ध का एक अन्य महत्वपूर्ण आयाम कार्यशील पूंजी के लिए वित्त का मिश्रण निर्धारित करना है जो तात्कालिक, अल्पकालीन और दीर्घकालीन स्रोतों के संयोजन हो सकते हैं। अर्थप्रबन्धन के तात्कालिक स्रोतों में व्यापारिक ऋण एवं अन्य देय (Payables) को शामिल करते हैं, जो संस्था के दिन-प्रतिदिन के संचालन में स्वतः (तत्काल) उचित होते हैं। उदाहरण के लिए, जब हम आपूर्तिदाता से कच्चा माल दो माह के आधार पर खरीदते हैं, तो आपूर्तिदाता ने एक प्रकार से दो माह के लिए अर्थप्रबन्धन का कार्य किया है और उसे देय राशि (व्यापारिक ऋण) को तात्कालिक स्रोत मानेंगे। इसी प्रकार देय मजदूरी, देय कर, देय ब्याज आदि भी तात्कालिक स्रोत के ही उदाहरण हैं। देय बिल, अल्पकालीन बैंक ऋण, नकद, साख, अन्तर्कम्पनी ऋण, वाणिज्यिक पत्र आदि अल्पकालीन वित्त स्रोत हैं। ऋणपत्र, दीर्घकालीन ऋण, अंश और प्रतिधारित आय आदि दीर्घकालीन स्रोत है।

(3) अन्तर्सम्बद्धता–कार्यशील पूँजी निर्णयों की एक अनूठी विशेषता अन्तर्सम्बद्धता है। वित्तीय प्रबन्धक केवल इतना निर्णय लेकर कि स्कन्ध में विनियोग अमुक राशि के बराबर होगा, चुप नहीं बैठ जाएगा। स्कन्ध का इच्छित स्तर अपने आप में एक परिवर्तनीय मात्रा भी हो सकती है। उदाहरण के लिए, जब संस्था की बिक्री निरन्तर बढ़ रही हो तो उस अवधि में स्कन्ध की इच्छित मात्रा वही नहीं होगी, जो कम बिक्री की अवधि में स्कन्ध की मात्रा होगी। साथ ही स्कन्ध व बिक्री के सम्बन्ध में कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता जब तक कि उनका प्राप्यों पर पड़ने वाले प्रभावों पर विचार न कर लिया जाए। पुनः कोई भी व्यावसायिक निर्णय, जो विक्रय में वृद्धि और देनदारों के वसूली में तीवता लाता हो, रोकड़ शेष की कम राशि रखने की तरफ इशारा करता है और रोकड़ प्रबन्ध अन्तर्सम्बन्धित होते हैं। चल सम्पत्ति के एक अवयव के सम्बन्ध में लिया गया निर्णय दूसरे अवयव के निर्णय को अवश्य प्रभावित करता है। चल सम्पत्तियों और चल दायित्व भी आपस में एक कड़ी से जुड़े होते हैं। यदि विक्री बढ़ती है, तो क्रय भी अवश्य बढ़ना चाहिए। स्कन्ध का एकसमान स्तर बनाए रखने के लिए और बढ़ोत्तरी प्रवृत्ति के बिक्री को सम्पादित करने हेतु क्रय और स्कन्ध से अधिक विनियोग करना होगा। यदि क्रय नकद न किया जाए, तो क्रय में वृद्धि के साथ-साथ लेनदारों में भी वृद्धि होगी। इस प्रकार चल दायित्व भी आपस में अन्तर्सम्बन्धित होते हैं।

(4) चंचलता एवं विपरीतता कार्यशील पूँजी की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि चल सम्पत्तियों में विनियोजित द्रव (फण्ड) तीव्रता के साथ परिवर्तित हो सकता है और उसी प्रकार अर्थप्रबन्धन की आवश्यकता भी चल सम्पत्तियों में विनियोग का स्तर विभिन्न प्रकार के कारकों से प्रभावित होता है जिनमें से बहुत ही अधिक अनियमित भी हो सकते हैं, जैसे-श्रम अशान्ति, प्लाण्ट की बाहुल्यता। माँग में मौसमी व चक्रीय उच्चावचन चल सम्पत्तियों के विनियोग में एवं आवश्यक अर्थप्रवन्धन में तीव्र परिवर्तन का सामान्य कारक माना जाता है। चंचलता से सम्बन्धित चल सम्पत्तियों एवं चल दायित्वों की एक मुख्य विशेषता विपरीतता भी है। मान लें कि 20% प्रतिवर्ष ब्याज की दर पर ₹ 10,000 का ऋण लिया गया है। ब्याज तिमाही देय है। जब तक ₹ 10,000 का ऋण भुगतान न कर दिया जाए ₹ 500 प्रति तिमाही ब्याज का भुगतान होता ही रहेगा। यदि किसी समय 10,000 ₹ के भुगतान को स्वीकार कर लिया जाए तो ₹ 500 का तिमाही रोकड़ बाहा बहाव रुक जाएगा। इस तरह के लेन-देन को विपरीतता (Reversibility) कहते हैं।