समता पर व्यापार से आप क्या समझते है ? इसके प्रकार, उद्देश्य एवं सीमाओं की विवेचना कीजिए।

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समता पर व्यापार का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Trading on Equity)

एक संस्था (विशेषकर कम्पनी) अपने विनियोगों को विभिन्न स्रोतों जैसे ऋण (debt), पूर्वाधिकार अंश व सम अंश, आदि से अर्थ प्रबन्धित कर सकती है। संस्था के लाभ से पूर्णतः ऋण पर ब्याज की दर स्थिर होती है। ऋण पर ब्याज का भुगतान संस्था का एक वैधानिक व अनुबन्धित दायित्व होता है। पूर्वाधिकार अंशों पर लाभांश की दर भी स्थिर होती है, परन्तु जब संस्था को लाभ होता है तो पूर्वाधिकार अंशों पर लाभांश का भुगतान करना पड़ता है। सम अंशधारियों के हिस्से में ऋण पर ब्याज व अधिमान अंशों पर लाभांश देने के बाद बची हुई आय आती है। सम अंशों पर लाभांश की दर स्थिर नहीं होती है, वरन् संस्था की लाभांश नीति पर निर्भर करती है। पूँजी ढाँचे में स्वामी इक्विटी के साथ-साथ स्थिर लागत वाले पूँजी स्रोतों का प्रयोग ही ‘समता पर व्यापार’ कहलाता है।

समता पर व्यापार का प्रयोग इस तथ्य के कारण किया जाता है कि सम अंश पूँजी (संचित व आधिक्य सहित) के ठोस आधार पर ही ऋण पूँजी व पूर्वाधिकार अंश पूँजी की उगाही की जाती है। ऋण पूँजी देने वाला संस्था के लाभ में सीमित भाग रखता है और इसलिए वह सुरक्षा पर बल देता है-आय की सुरक्षा व मूल्य की सुरक्षा जो स्वामित्व इक्विटी द्वारा प्रतिनिधित्व होता है।

  • गटनबर्ग (Gestenberg) के अनुसार, “जब एक व्यक्ति या निगम स्वामित्व पूँजी के साथ-साथ ऋण-पूँजी लेकर अपने व्यापार का नियमित संचालन करता है, तो इसे समता पर व्यापार कहलाता है।”
  • गूयमैन एवं डूगल (Guthmann and Dougall) के अनुसार, “एक फर्म के अर्थ-प्रबन्धन हेतु स्थिर लागत पर ऋण फण्ड का प्रयोग समता पर व्यापार कहलाता है।” समता पर व्यापार के प्रकार (Types of Trading on Equity)—समता पर व्यापार दो प्रकार

1. अल्प समता का व्यापार (Trading on Thin Equity)- जब कम्पनी की समता अंश पूँजी, पूर्वाधिकार अंश पूँजी तथा ऋण की अपेक्षा कम होती है तो उसे अल्प समता पर व्यापार कहते हैं।

2. उच्च समता का व्यापार (Trading on Thick Equity) जब कम्पनी की समता अंश पूँजी पूर्वाधिकार अंश पूँजी तथा ऋण पूंजी की अपेक्षा अधिक होती है तो उसे उच्च समता पर व्यापार कहते हैं। समता पर व्यापार का उद्देश्य (Object of Trading on Equity) समता पर व्यापार नीति के निम्न प्रमुख उद्देश्य होते हैं

1. वित्तीय साधनों को नियन्त्रित करना।

2. लाभांश दर में वृद्धि करना।

3. कम लागत पर पूँजी प्राप्त करके अधिक लाभ कमाना।

4. व्यवसाय का नियन्त्रण स्वयं के या विशेष व्यक्तियों के हाथों में केन्द्रित करना।

‘समता पर व्यापार’ नीति का महत्व (Importance of Trading on Equity)

‘समता पर व्यापार’ की नीति अपनाने का आधार यही होता है कि संस्था ऋण पूँजी के प्रयोग से उनकी लागत से अधिक आय कमायें। इस प्रकार से जो आधिक्य (Surplus) होगा, उससे अंश पूंजी पर प्रत्याय में वृद्धि हो जाएगी। फलस्वरूप सम अंशधारियों को अधिक लाभांश प्राप्त होने लगेंगे। ऊँचे लाभांश वितरण के कारण संस्था की साख व ख्याति में वृद्धि होती है। पूँजी बाजार में उसके अंशों का मूल्य भी बढ़ने लगता है। साख में वृद्धि के कारण संस्था को नीची ब्याज की दर पर भी पर्याप्त ऋण सरलता से प्राप्त होने लगता है जिससे संस्था व्यवसाय का कुशल संचालन करके अधिक आय कमा सकती है।

लेकिन यह तो समता पर व्यापार नीति का एकतरफा पहलू है। जब संस्था की लाभ की मात्रा बहुत ही कम हो या लाभ न होकर हानि हो, तो ऐसी स्थिति में सम-अंशधारियों को बहुत ही हानि उठानी पड़ सकती है, क्योंकि लाभ की रकम ऋण पूँजी पर ब्याज देने में ही समाप्त हो जाएगी और सम अंशों पर कोई लाभांश घोषित नहीं किया जा सकेगा। फलस्वरूप संस्था की साख में गिरावट आएगी। उसके सम अंशों का मूल्य गिरने लगेगा। संस्था को ऋण प्राप्त करने में भी कठिनाइयाँ सामने आएँगी। इस प्रकार समता पर व्यापार दोधारी तलवार है। इस विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि समता पर व्यापार की नीति उस समय लाभदायक होती है जब संस्था को आय की निश्चितता व स्थिरता का विश्वास हो। मस्टनबर्ग ने भी लिखा है, “समता पर व्यापार मुख्यतः आय की स्थिरता एवं निश्चितता की सीमाओं से बँधा हुआ है।” समता पर व्यापार की नीति की सीमाएँ यह तो स्पष्ट हो गया है कि समता पर व्यापार से सम अंशधारियों का आय व उनके याती मूल्य में वृद्धि होती है और संस्था की साख भी बढ़ती है। किन्तु यह लाभदायकता स्थिति तभी सम्भव हो पाती है, जब संस्था की कुल सम्पत्ति पर अर्जित प्रत्याय की दर ऋण पर देय ब्याज की दर से अधिक हो। इस प्रकार इस नीति की अन्य मर्यादाएँ एवं सीमाएँ भी हैं, जिनको ध्यान में रखकर ही इसका प्रयोग करना चाहिए। कुछ सीमाएँ इस प्रकार हैं

(i) अर्जन की अनिश्चितता एवं अस्थिरता-जब व्यवसाय की आय (अर्जन) की अनिश्चितता व अस्थिरता होती है, तो समता पर व्यापार की नीति हानिप्रद हो सकती है, इसलिए इस नीति को लाभदायक होने के लिए यह शर्त है कि संस्था की आय में निरन्तरता, निश्चितता एवं स्थिरता हो। यदि संस्था की आय में निश्चितता न हो और किसी वर्ष लाभ की मात्रा इतनी भी न हो कि ऋणदाताओं को ब्याज न दिया जा सके, तो ऐसी दशा में संस्था को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है। वस्तुतः जब संस्था को विश्वास हो जाए कि वह ऋणों पर ब्याज भुगतान कर सकती है और समय आने पर ऋणों की वापसी भी दे सकती है, तभी इस नीति को अपनाया जाना चाहिए।

(ii) क्रमशः ऊँची व्याज दरों पर ऋण की प्राप्ति समता पर व्यापार करने की नीति के फलस्वरूप ऋणों पर देय ब्याज की दर प्रत्येक बाद वाले ऋण के साथ बढ़ती जाती है। ऐसा इसलिए होता है कि एक ऋण के बाद दूसरे ऋण के लिए ऋणदाताओं की जोखिम में वृद्धि हो जाती है, क्योंकि पहले ऋणदाताओं का संस्था की सम्पत्ति पर प्रथम ग्रहणाधिकार (First Lien) होता है। इस प्रकार बाद वाले ऋणदाताओं की सुरक्षा स्थिति पहले वालों से घटिया होती है, जिसके कारण उन्हें अधिक ब्याज देकर ऋण देने के लिए प्रेरित करना पड़ता है। क्रमशः ऊँची ब्याज दरों के कारण सम अंशधारियों के लाभांश में कमी आती जाती है।

(iii) प्रबन्धकीय अभिवृत्ति-समता पर व्यापार की नीति अपनाते समय प्रबन्ध की अभिवृत्ति को भी ध्यान में रखना चाहिए। कभी-कभी संस्था की वित्तीय स्थिति अच्छी होने या कम लागत पर भी ऋण प्राप्त होने के कारण ऋणपत्र निर्गमन की सामर्थ्य होते हुए भी प्रबन्धक वर्ग इस नीति का विरोध कई कारणों से कर सकता है। ऐसी स्थिति में सम अंश पूँजी प्राप्त करनी चाहिए न कि ऋणपत्र के निर्गमन से।

(iv) अति पूंजीकरण का भय यह भी निश्चित है कि ऋण लेकर व्यवसाय करने की एक सीमा होती है। उस सीमा के बाद ऋण लेकर व्यापार करना असम्भव सा हो जाता है, क्योंकि निश्चित ब्याज की दर होने के कारण संस्था पर व्ययों का भार इतना बढ़ जाता है कि कुछ काल के बाद व्यवसाय में अति पूँजीकरण की स्थिति पैदा हो जाती है। फलस्वरूप संस्था की ऋण लेने की क्षमता में कमी आ जाती है और लाभांश दर में कमी आने से अंशों के बाजार मूल्य में कमी आने लगती है।

(v) ऋणदाताओं का हस्तक्षेप सतत रूप और अधिक समय तक ऋण लेकर व्यापार करने से ऋणदाताओं का प्रभाव व हस्तक्षेप बढ़ने लगता है, विशेषकर जब ऋणदाता के रूप में वित्तीय संस्थाएँ होती हैं। संस्था की अतिरिक्त पूँजी उगाहने के लिए प्रत्येक योजना के लिए ऋणदाताओं का अनुमोदन आवश्यक सा हो जाता है और इस प्रकार अतिरिक्त पूँजी की प्राप्ति में कठिनाइयाँ आने लगती हैं।

(vi) वैधानिक तथा अनुबन्धित कठिनाइयाँ समता पर व्यापार करना लाभदायक होते हुए भी इस कारण से नहीं अपनाया जा सकता है कि कम्पनी के पार्षद सीमानियम वैसे तो इसकी अनुमति नहीं देते और अगर सभा बुलाकर पार्षद अन्तर्नियमों में संशोधन करके इसकी अनुमति ली जाय तो आवश्यक नहीं कि कम्पनी एवं उसके ऋणदाता हमेशा फायदे में रहें।