किसी निगम की पूँजी संरचना से आप क्या समझते है ? उन गुणों की चर्चा कीजिए जो एक सुदृढ़ (अच्छी) पूँजी संरचना में होने चाहिए।

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पूँजी संरचना का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Capital Structure)

पूँजी संरचना को पूँजी ढाँचा, पूँजी का स्वरूप या पूँजी कलेवर भी कहते हैं। पूँजी संरचना वित्तीय नियोजन का एक महत्वपूर्ण अंग है। प्रायः पूँजीकरण एवं पूँजी संरचना को ही समझ लिया जाता है किन्तु इन दोनों में मौलिक अन्तर है। पूँजीकरण का आशय व्यवसाय के कार्य संचालन के लिए पूँजी की आवश्यकताओं का निर्धारण करना है, जबकि आवश्यक पूँजी को किन प्रतिभूतियों के आधार पर किस अनुपात में जुटाया जायेगा, के निर्धारण को पूँजी संरचना कहते हैं। गस्टेनबर्ग ने इस सम्बन्ध में लिखा है कि पूँजीकरण का आशय पूँजी की मात्रा को निश्चित करने से है एवं पूँजी संरचना का आशय पूँजी के स्वरूप या प्रकार को निश्चित करने से है।

पूँजी संरचना का आशय यह निश्चित करना है कि आवश्यक पूँजी का कितना भाग अंशों के द्वारा प्राप्त किया जाये एवं कितना भाग ऋणपत्रों द्वारा किया जाय। साथ ही अंश पूँजी में भी कितना भाग पूर्वाधिकार अंशों का होगा और कितना भाग समता अंशों का होगा।

  • (1) वेस्टन एवं ब्राइघम (Weston and Brigham) के अनुसार, “पूँजी संरचना किसी फर्म की स्थायी वित्तीय व्यवस्था होती है, जो दीर्घकालीन ऋणों, पूर्वाधिकारी स्कन्ध तथा शुद्ध मूल्यों में प्रदर्शित होती है।”
  • (2) आर. एच. वैसिल (R. H. Wessel) के अनुसार, “पूँजी संरचना शब्द का प्रयोग प्रायः किसी व्यावसायिक संस्था के द्वारा विनियोजित दीर्घकालीन वित्तीय साधनों को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है।”

इस प्रकार स्पष्ट है कि पूँजी संरचना एक ऐसा कार्य है जिसमें यह निर्धारित किया जाता है कि दीर्घकालीन पूँजी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अंश पूँजी, ऋण-पत्र तथा ऋणों आदि में से कौन-कौन से वित्तीय स्रोतों का उपयोग किया जाये तथा इन विभिन्न स्रोतों का किस अनुपात में उपयोग किया जाये।

पूँजी संरचना को प्रभावित करने वाले घटक (Factors Effecting Capital Structure)

कम्पनी की भावी प्रगति उसकी उत्तम संरचना पर निर्भर करती है। अतः इनके निर्माण के समय उन सभी तत्वों पर भली-भाँति विचार करना आवश्यक है, जिनका इस पर प्रभाव पड़ता है। इन तत्वों को अग्र प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

I. आन्तरिक घटक या तत्व ( Internal Factors)—पूँजी संरचना को प्रभावित करने वाले कुछ प्रमुख आन्तरिक तत्व निम्नलिखित है

(1) व्यवसाय की प्रकृति-किसी नये उपक्रम की पूँजी संरचना पर उस उपक्रम के व्यवसाय की प्रकृति का काफी प्रभाव पड़ता है। कुछ व्यवसाय तो ऐसे होते हैं, जिनमें उत्पादन और विक्रय निरन्तर सम्पूर्ण वर्ष होता रहता है; जैसे—सूती वस्त्र उद्योग, लोहा एवं इस्पात उद्योग आदि। अतः ऐसे उद्योगों के लिए दीर्घकालीन वित्तीय साधनों से पूँजी की व्यवस्था करनी चाहिए। इसके विपरीत, कुछ व्यवसाय मौसमी प्रकृति के होते हैं; जैसे-चीनी उद्योग, ऊनी वस्त्र उद्योग, शीतगृह उद्योग आदि मौसमी प्रकृति के उद्योगों में व्यस्त मौसम में अधिक पूँजी की आवश्यकता होती है। अतः मौसमी उद्योगों की पूँजी संरचना इस प्रकार की होनी चाहिए जिसमें मौसम के अनुसार समायोजन किये जा सके। ऐसे उद्योगों में दीर्घकालीन वित्तीय साधनों की अपेक्षा अल्पकालीन वित्तीय साधनों का अधिक महत्व होता है।

(2) आय की निश्चितता एवं नियमिततापूँजी संरचना की सुदृढ़ता इस बात पर बहुत कुछ निर्भर होती है कि भविष्य में कम्पनी की आय नियमित एवं निश्चित रूप से होती रहेगी अथवा नहीं। आय की प्रकृति को देखते हुए श्री डेविंग ने इस विषय में तीन सिद्धान्तों का उल्लेख किया है

(i) ऋणपत्र या बाण्डों का निर्गमन उस स्थिति में करना चाहिए जबकि यह विश्वास हो जाय कि कम्पनी को पर्याप्त, निश्चित एवं नियमित आय भविष्य में भी प्राप्त होती रहेगी।

(ii) पूर्वाधिकार अंश उस स्थिति में निर्गमित किये जा सकते हैं जब यह सम्भावना हो कि यदि कम्पनी को नियमित आय नहीं हुई तो भी कई वर्षों की औसत आय इतनी अवश्य हो जायेगी कि जिसमें से पूर्वाधिकार अंशों पर लाभांशों के चुकाने के बाद भी पर्याप्त राशि बच सकेगी।

(iii) यदि कम्पनी की आय के सम्बन्ध में पहले से कोई निश्चित अनुमान लगाना सम्भव नहीं हो तो ऐसी दशा में समता अंशों का निर्गमन किया जाना चाहिए।

(3) व्यापार पर नियन्त्रण की इच्छा पूँजी संरचना व्यापार पर नियंत्रण की इच्छा से भी प्रभावित होती है। यदि कम्पनी के प्रवर्तक कम्पनी का नियंत्रण कुछ ही व्यक्तियों के हाथों में रखना चाहते हैं तो समता अंशों का निर्गमन किया जाता है जिसका एक बड़ा भाग कुछ लोगों के पास केन्द्रित रखा जाता है तथा शेष छोटे-छोटे अंशधारियों में बाँट दिया जाता है।

(4) परिचालन अनुपात-किसी व्यवसाय में कुल आय का जितने प्रतिशत भाग परिचालन व्ययों में प्रयुक्त होता है, उसे परिचालन अनुपात कहा जाता है। परिचालन अनुपात जितना ऊँचा होता है, पूँजी संरचना में ऋणगत प्रतिभूतियों का भाग उतना ही कम रखा जाता है, क्योंकि उच्च परिचालन अनुपात के कारण ब्याज आदि को पूरा करने के लिए अधिक आय नहीं बच पाती। इसके विपरीत परिचालन अनुपात जितना कम होगा पूँजी संरचना में ब्याज वाली प्रतिभूतियों का भाग अधिक होगा। उच्च परिचालन अनुपात वाली कम्पनियों के पूँजी संरचना में सामान्य समता अंश तथा ऋणपत्रों को भी सम्मिलित किया जा सकता है।

(5) सम्पत्तियों का ढाँचा जिन संस्थाओं के सम्पत्ति ढाँचे में स्थायी सम्पत्तियों की मात्रा अधिक होती है, उनकी पूँजी संरचना में दीर्घकालीन ऋणों या ऋणपत्रों का भाग अधिक होता है, जबकि अंशपूँजी का कम। इसके विपरीत, जिन संस्थाओं के सम्पत्ति ढाँचे में चालू सम्पत्तियाँ अधिक होती हैं, उनके पूँजी संरचना में दीर्घकालीन ऋण कम होते हैं।

(6) भावी योजनाएँ किसी भी कम्पनी की पूँजी संरचना केवल वर्तमान को ही ध्यान में रखकर नहीं बनायी जाती बल्कि संस्था की भावी विकास योजनाओं को ध्यान में रखकर बनायी जाती है। इस उद्देश्य के लिए अधिकृत पूँजी अधिक रखी जाती है। प्रारम्भ में समता अंश जारी किये जाते हैं।

(7) समता अंशों पर व्यापार-यदि कम्पनी के प्रवर्तक कम से कम पूँजी द्वारा अधिकतम सम्पत्तियों पर नियंत्रण प्राप्त करने की अभिलाषा रखते हैं तो वे समता पर व्यापार नीति अपनाते हैं। समता पर व्यापार करने वाली कम्पनियों की पूँजी संरचना में समता अंशों की मात्रा कम तथा दीर्घकालीन ऋणों की मात्रा अधिक रखी जाती है।

(8) पूँजी मिलान अनुपात-पूँजी मिलान अनुपात वह अनुपात है जो स्वामित्व पूँजी तथा निश्चित दायित्व वाली पूँजी के बीच होता है। निश्चित दायित्व वाली पूँजी का आशय उस पूँजी से होता है जिस पर निश्चित दर से लाभांश देना पड़ता है या निश्चित दर से ब्याज देना पड़ता है। यदि समता अंश कम निर्गमित किये जाते हैं तो कम पूँजी मिलान अनुपात होता है तथा अधिक निर्गमित करने पर उच्च पूँजी मिलान अनुपात होता है।

II. बाह्य तत्व (External Factors) पूँजी की संरचना को प्रभावित करने वाले बाह्य तत्व निम्नलिखित हैं-

(1) पूँजी निर्गमन की लागत पूँजी निर्गमन पर अनेक व्यय करने पड़ते हैं; जैसे-अभिगोपन कमीशन, दलाली, स्टॉम्प व्यय आदि। अलग-अलग प्रतिभूतियों के सम्बन्ध में यह लागत अलग-अलग होती है। अतः पूँजी संरचना बनाते समय इन लागतों को भी ध्यान में रखना पड़ता है।

(2) विनियोक्ताओं की रुचि विनियोक्ताओं की मनोवैज्ञानिक दशा तथा जोखिम के प्रति उनके विश्वास का भी संरचना पर प्रभाव पड़ता है। कुछ विनियोक्ता साहसी होते हैं तो कुछ विनियोक्ता बिल्कुल जोखिम नहीं लेना चाहते और निश्चित आय चाहते हैं। इन्हीं स्थितियों को देखते हुए प्रतिभूतियों का निर्गमन किया जाना चाहिए।

(3) पूँजी बाजार की दशाएँ मन्दी की अवस्था में जब लाभांश की दर कम होती है और लाभ की सम्भावनाएँ अनिश्चित होती हैं, तब समता अंशों की अपेक्षा ऋणपत्र अधिक लोकप्रिय होते हैं। इसके विपरीत, तेजी काल में जब लाभ की सम्भावना अधिक होती है, ऋणपत्रों के स्थान पर समता अंशों की माँग बढ़ जाती है। अतः बाजार का रुख देखकर ही पूँजी का स्वरूप निश्चित किया जाना चाहिए।

(4) प्रचलित विधान एवं नियम सरकारी नियंत्रणों, नियमन एवं कानूनों का भी पूँजी संरचना पर प्रभाव पड़ता है। विभिन्न प्रकार की प्रतिभूतियों के निर्गमन व उनसे प्राप्त आय के सम्बन्ध में अनेक कानून बनाये गये हैं जिनकी पूँजी संरचना के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका होती है।