कार्यशील पूँजी के विश्लेषण से आप क्या समझते हैं ? इस प्रकार के विश्लेषण में प्रयोग की जाने वाली विधियों की विवेचना कीजिए।

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कार्यशील पूँजी का विश्लेषण (Analysis of Working Capital)

किसी भी व्यवसाय की कुल विनियोजित पूँजी की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण होती है। इसके पर्याप्तता तथा कुशल प्रबन्ध पर ही संस्था का भविष्य निर्भर करता है, अतः वित्तीय प्रबन्धक समय-समय पर कार्यशील पूँजी का माप तथा विश्लेषण करते रहते हैं। कार्यशील पूँजी का विश्लेषण करके ज्ञात किया जाता है कि, संस्था में कार्यशील पूँजी का प्रयोग प्रभावी ढंग से किया गया है या नहीं। यदि प्रभावी ढंग से प्रयोग नहीं किया गया है, तो सुधार की कहाँ सम्भावना है तथा इस प्रकार कार्यशील पूँजी के अधिक कुशल प्रयोग से किस प्रकार संस्था लाभदायकता तथा वित्तीय सुदृढ़ता में वृद्धि कर सकती है।

कार्यशील पूँजी के विश्लेषण की विधियाँ या उपकरण (Methods of Analysis of Working Capital)

कार्यशील पूँजी का विश्लेषण करने के लिए निम्न विधियाँ प्रयोग में लायी जाती है

(1) कोष प्रवाह विश्लेषण (Analysis of Fund Flow) कोष प्रवाह विश्लेषण के अध्ययन से यह सरलतापूर्वक जाना जा सकता है कि वर्तमान वर्ष में संस्था को किन-किन स्रोतों से कौन-कौन सी आय प्राप्त हुई है तथा किन-किन मदों पर व्यय हुआ। इस प्रकार कुल कार्यशील पूँजी में कितनी वृद्धि हुई थी, कितनी कमी हुई, इसका सरलतापूर्वक ज्ञान कोष प्रवाह विवरण से ज्ञात हो जाता है। वर्ष में जिन सम्पत्तियों की बिक्री होती है उसे फण्ड का स्रोत माना जाता है और जिन सम्पत्तियों का क्रय किया जाता है वह फण्ड का प्रयोग समझा जा सकता है। संस्था को जो लाभ होता है, वह भी फण्ड का स्रोत माना जाता है। इसी प्रकार संस्था को जो हानि होती है वह फण्ड का प्रयोग समझा जा सकता है। कोष प्रवाह विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि कोषों में कितनी वृद्धि हुई तथा कोषों में कितनी कमी हुई।

(2) रोकड़ प्रवाह विश्लेषण (Analysis of Cash Flow) -रोकड़ प्रवाह विश्लेषण के लिए रोकड़ प्रवाह विवरण बनाया जाता है, जिसके योतपक्ष में उन मदों को प्रदर्शित किया जाता है, जिनसे रोकड़ में वृद्धि हुई है। इसके उपयोग पक्ष में व्यय को विभिन्न मदों में दिखाया जाता है। यदि रोकड़ का स्रोत अधिक और इनका प्रयोग कम है तो रोकड़ का प्रभाव उपक्रम के पक्ष में माना जाता है। इसके विपरीत, यदि रोकड़ का स्रोत कम तथा इसका उपयोग अधिक है, तो रोकड़ प्रवाह को उपक्रम के विपक्ष में माना जाता है।

(3) अनुपात विश्लेषण ( Ratio Analysis) – अनुपात विश्लेषण के द्वारा भी कार्यशील पूँजी का विश्लेषण किया जाता है। इसके लिए निम्नलिखित अनुपातों की गणना की जाती है

(A) चालू अनुपात (Current Ratio) यह अनुपात संस्था की चालू सम्पत्तियों और दायित्वों के बीच सम्बन्ध को प्रकट करता है। चालू अनुपात के द्वारा यह पता लगा लिया जाता है कि कार्यशील पूँजी उपक्रम के पक्ष में है अथवा विपक्ष में है। इस अनुपात की गणना निम्न सूत्र के द्वारा की जाती है

Current Assets Current Ratio Current Liabilities

(B) शीघ्र अनुपात (Quick Ratio) – यह अनुपात और अधिक खरे परीक्षण का द्योतक है।

इसकी गणना करते समय चल सम्पत्तियों के उन्ही मदों को सम्मिलित किया जाता है जिन्हें यदि वित्तीय संकट उपस्थित हो जाय तो तत्काल बेचकर उचित मूल्य प्राप्त करके चल देनदारियों का भुगतान किया जा सकता हो। अतः माल के स्टॉक को इसमें सम्मिलित नहीं किया जाता है क्योंकि संकट पड़ने पर इसे तत्काल उचित मूल्य पर बेचना सम्भव नहीं होगा और फिर इसके मूल्य में उतार-चढ़ाव प्रायः होते हैं जिससे इस पर भरोसा करना उचित नहीं होता। प्रायः यह स्वीकार किया जाता है कि शीघ्र अनुपात (Quick Ratio) सामान्यतः 11 या इससे अधिक होना चाहिए। इससे कम शीघ्र अनुपात संकटपूर्ण चल वित्तीय स्थिति का पूर्वाभास हो सकता है। इसकी गणना करते समय केवल तरल सम्पत्तियाँ (Liquid Assets) की तुलना चालू दायित्वों से की जाती है।

Liquid Assets Liquid Ratio = Current Liabilities

(C) नकद अनुपात (Cash Ratio) चालू सम्पत्ति एवं नकद राशि के अनुपात को नकद अनुपात कहते हैं, जिसमें बैंक में जमा राशि भी सम्मिलित की जाती है। पिछले वर्षों अथवा अन्य समानान्तर फर्मों में तुलनात्मक अध्ययन के बाद यदि यह प्रतीत होता है कि यह अनुपात अधिक है तो इसे कम करने का प्रयास किया जाना चाहिए ताकि रोकड़ में या बैंक के चालू खाते में फालतू नकद राशि न पड़ी रहे

(D) कार्यशील पूँजी आवृत्ति (Working Capital Turnover Ratio)—यह अनुपात कार्यशील पूँजी तथा विक्रय में सम्बन्ध स्थापित करता है। इस अनुपात को निम्न प्रकार से ज्ञात किया जा सकता है

Working Capital Turnover = Sales at Cost

Net Working Capital इसका अर्थ यह हुआ कि साढ़े सात लाख रुपये की विक्रय की लागत के लिए कार्यशील पूँजी का पाँच बार पलट फेर हुआ। यदि इस आवृत्ति में वृद्धि होती है तो यह कार्यशील पूँजी के प्रबन्ध में कुशलता का प्रतीक है और यदि इसमें कमी होती है तो यह प्रबन्ध के स्तर में गिरावट का सूचक है।

(4) अन्य विधियाँ (Other Techniques) – इसके अतिरिक्त इनवेण्ट्री (Inventory) तथा प्राप्य बिलों (Bill Receivable) से सम्बद्ध अनेक अन्य अनुपातों (Ratios) तथा आवृत्तियों (Turnovers) का उपयोग कार्यशील पूँजी के विश्लेषण में किया जाता है। इन्वेण्ट्री विश्लेषण के अन्तर्गत स्कन्ध आवर्त (Inventory Turnover), ई. ओ क्यू, विश्लेषण (E. O. Q. Analysis) तथा ए.बी.सी. विश्लेषण (A.B.C. Analysis) की विधियाँ प्रयुक्त की जाती हैं प्राप्य विपत्रों के विश्लेषण के लिए काल-क्रम सूची (Ageing Schedule) तथा औसत वसूली अवधि (Average Collection Period), आदि विधियाँ प्रयुक्त होती हैं जहाँ तक रोकड़ का प्रश्न है इसके विश्लेषण के लिए। रोकड़-प्रवाह विवरण तथा रोकड़ बजट का सहारा लिया जाता है। यदि किसी दी हुई निश्चित अवधि में कार्यशील पूँजी में हुए परिवर्तनों को ज्ञात करना हो तो इसके लिए वर्ष के आरम्भ की तथा अन्त की बैलेन्स शीटों के आधार पर एक विवरण तैयार करना होता है। जिसे ‘कार्यशील पूँजी में हुए परिवर्तनो का विवरण’ कहा जाता है।