उत्पाद से आप क्या समझते है? इसके वर्गीकरण तथा महत्व को समझाइए।

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वस्तु या उत्पाद शब्द का आशय एवं परिभाषा (Meaning and Definition of a Product) : एक उपभोक्ता द्वारा वस्तु का क्रय इसलिए किया जाता है कि उस वस्तु में कुछ लाभ होते हैं जो उपभोक्ता की आवश्यकताओं की सन्तुष्टि करते हैं। वस्तु में इन लाभों के अतिरिक्त कुछ भौतिक गुण भी होते हैं। वास्तव में एक निर्माता इन्हीं सबको बेचता है। उत्पाद या वस्तु का अर्थ दो अर्थों में लगाया जाता है

  1. संकीर्ण अर्थ में वस्तु की सदृश भौतिक व रासायनिक विशेषताएँ आती हैं, जैसे- साबुन, जूते, कलम, पुस्तक, लिपस्टिक, मोबाइल फोन आदि। इसमें प्रत्येक वस्तु को एक अलग वस्तु मानते हैं।
  2. विस्तृत अर्थ में प्रत्येक ब्राण्ड एक अलग वस्तु है। यही नहीं, यदि एक ही ब्राण्ड के अलग-अलग आकार के पैकिंग बना दिये जाएँ तो वे भी अलग-अलग वस्तुएँ होंगी। जैसे भारत में Forhans Toothpaste तीन आकारों में मिलता है-छोटा आकार, परिवार आकार व बड़ा आकार यह तीन अलग-अलग वस्तुएँ कहलायेंगी। यदि वस्तु के आकार, रंग, पैकिंग, डिजाइन आदि में परिवर्तन हो जाता है तो प्रत्येक एक अलग वस्तु बन जाती है। यद्यपि ब्राण्ड चिन्ह वही बना रहता है। उत्पाद को कुछ प्रमुख विद्वानों ने निम्न प्रकार परिभाषित किया है

(1) जार्ज फिस्क (George Fisk) के अनुसार, “उत्पाद मनोवैज्ञानिक सन्तुष्टियों का एक पुलिन्दा है।”

(2) फिलिप कोटलर (Philip Kotler) के अनुसार, “एक वस्तु क्रेता को सन्तुष्टियों अथवा सुविधाएँ प्रदान करने वाले भौतिक सेवा एवं चिन्हात्मक विवरणों का पुलन्दा है।”

(3) आर. एस. डावर (R. S. Davar) के अनुसार, विपणन की दृष्टि से वस्तु को उन सुविधाओं का बण्डल माना जा सकता है जो उपभोक्ता को प्रस्तुत की जा रही है।”

(4) डब्ल्यू एल्डरसन (W. Alderson) के अनुसार, “एक उत्पाद उपयोगिताओं का एक बण्डल है जिसमें उत्पाद के विभिन्न लक्षण और उसके साथ दी जाने वाली सेवाएँ सम्मिलित होती है।

(5) विलियम जे. स्टाण्टन (William J. Stanton) के अनुसार, ‘वस्तु दृश्य एवं अदृश्य विशेषताओं का एक सम्मिश्रण है जिसमें पैकेजिंग, रंग, मूल्य, निर्माता की ख्याति, फुटकर विक्रेता की ख्याति और निर्माता एवं फुटकर विक्रेता द्वारा दी जाने वाली वे सेवाएँ भी शामिल हैं, जिन्हें उपभोक्ता अपनी आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने के लिए स्वीकार कर सकता है।”

(6) के. के. गुप्ता (K. K. Gupta) के अनुसार, “उत्पाद से आशय उस प्रत्येक चीज से है जो क्रेता के लिए सन्तुष्टि, सुरक्षा, आर्थिक सफलता के लिए महत्वपूर्ण है।”

उत्पादों या वस्तुओं का वर्गीकरण (Classification of Product or Commodities)

विपणन कार्यक्रम की सफलता केवल इसी बात पर ही निर्भर नहीं करती कि हम वस्तु को बेचने के लिए कितने प्रयत्नशील है या हमारे द्वारा निर्मित वस्तु कितने अधिक गुणों से युक्त हैं, बल्कि इस सफलता प्राप्ति के लिए यह अभाव में विपणन कार्यक्रमों की सफलता की कामना, किसी लंगड़े व्यक्ति के द्वारा दौड़ प्रतियोगिता जीतने की इच्छा जैसी ही है। वस्तु वर्गीकरण एक ऐसी क्रिया है जिसके द्वारा वस्तु को उनके गुण और प्रयोग के आधार पर अलग-अलग भाग में बाँट दिया जाता है। अतः किसी भी वस्तु के सम्बन्ध में विपणन कार्यक्रम बनाने से पहले यह देखना आवश्यक है कि निर्मित वस्तु किस प्रकार की है जिससे कि उसकी विशेषताओं के अनुरूप विपणन कार्यक्रम बनाया जा सके। साधारणत वस्तुओं को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जाता है

(I) उपभोक्ता उत्पाद या वस्तुएँ (Consumer Product ) : ये वस्तुएँ जो आम जनता के उपयोग के लिए बनायी जाती हैं, उपभोक्ता वस्तुएँ कहलाती हैं। इन वस्तुओं को बिना किसी अन्य व्यावसायिक क्रिया के उपभोक्ता को बेचा जाता है। दूसरे शब्दों में, उपभोक्ता उत्पाद से आशय ऐसे उत्पादों से है जो अन्तिम उपभोक्ताओं द्वारा अपनी आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने हेतु क्रय किये जाते हैं। इनमें कपड़े, जूते, सिगरेट, बिस्कुट, पेन, घड़ी, टूथपेस्ट, साबुन, रेडियो, सिलाई मशीन व प्रतिदिन के उपभोग की वस्तुएँ शामिल हैं। इस प्रकार की वस्तुओं के क्रेता लाखों व करोड़ों की संख्या में पाये जाते हैं तथा इनके बाजार सारे देश में दूर-दूर तक फैले रहते हैं। उपभोक्ता के द्वारा इन वस्तुओं का क्रय थोड़ी-थोड़ी मात्रा में किया जाता है। साधारणतया उसको वस्तुओं को परखने की जानकारी कम होती है। उपभोक्ता वस्तुओं को उपभोक्ता की आदतों और मनोवृत्तियों के आधार पर निम्न तीन भागों में बाँटा जाता है

(1) सुविधाजनक उत्पाद या वस्तुएँ वे वस्तुएँ जिनकी आवश्यकता नित्य प्रति पड़ती है और जिनका मूल्य भी कम होता है, सुविधाजनक अथवा सहूलियत की वस्तुएँ कहलाती हैं। दूसरे शब्दों में, सुविधाजनक उत्पाद से आशय ऐसे उत्पादों से हैं, जिन्हें उपभोक्ता बार-बार एवं न्यूनतम प्रयासों से क्रय करता है। साबुन, सिगरेट, बीड़ी, दियासलाई, पेंसिल, कलम की स्याही, कागज, बिस्कुट, छोटी-मोटी दवाइयाँ आदि वस्तुएँ इस कोटि में आती हैं। इन वस्तुओं के दाम साधारणतया सभी उपभोक्ताओं को मालूम होते हैं। इनको खरीदने के लिए उपभोक्ता दूर नहीं जाना चाहता। उपभोक्ता इन वस्तुओं को एक समय में थोड़ी ही मात्रा में खरीदते हैं। यह कार्य फुटकर विक्रेताओं के सहयोग से पूरा किया जाता है।

(2) बिक्रीगत उत्पाद या वस्तुएँ बिक्रीगत वस्तुओं में हम उन वस्तुओं को रख सकते हैं जिन्हें खरीदने में उपभोक्ता उनके मूल्य और गुण पर विशेष ध्यान देते हैं। कई दुकानों पर मूल्य और गुण का मिलान करने की आवश्यकता का अनुभव करते हैं और भारत जैसे देश में जहाँ लगभग सभी दुकानदार एक निश्चित मूल्य न रखकर घटा-बढ़ी करने को तैयार हो जाते हैं और ग्राहक को सौदा करने की आवश्यकता प्रतीत होती हैं। उदाहरण के लिए, ऊनी सूट, रेशमी साड़ियाँ, बढ़िया, जूते, चीनी के बर्तनों के बढ़िया रोट, सौन्दर्य प्रसाधन, फर्नीचर, आभूषण आदि को हम ले सकते हैं। इन्हें हम सौदे की वस्तुएँ भी कह सकते हैं।

(3) विशिष्ट उत्पाद या वस्तुएँ विशिष्ट वस्तुएँ वे वस्तुएँ हैं जिनका मूल्य तो साधारणतया अधिक होता है, किन्तु इसके अतिरिक्त उनकी ओर खरीददार का कुछ और विशेष खिंचाव भी होता है जिसके कारण वह विशेष प्रयत्न करके उन भण्डारों तक जाता है जहाँ उस प्रकार की वस्तुएँ बिकती हैं, जैसे-ऊँचे मूल्य की घड़ियाँ, रेफ्रिजरेटर, टेलीविजन, बिजली के मूल्यवान उपकरण तथा कारें आदि वस्तुएँ इसी कोटि में सम्मिलित की जा सकती है।

(II) औद्योगिक वस्तुएँ (Industrial Product ) : औद्योगिक वस्तुओं में कारखानों में बनी हुई ये वस्तुएँ शामिल होती है जो उपभोक्ता के उपभोग के लिए नहीं होती वरन दूसरे कारखानों में उपभोक्ता माल बनाने के काम आती है। दूसरे शब्दों में, औद्योगिक उत्पाद से आशय ऐसे उत्पादों से है जो उपभोक्ता उत्पादों को निर्मित करने के लिए कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त किये जाते हैं। इसमें सब प्रकार की मशीनरी, बिजली की मोटर, भाप के इंजन, चमड़ा, लोहा आदि आते हैं। इस प्रकार की वस्तुओं का बाजार बड़े-बड़े औद्योगिक क्षेत्रों में होता है। क्रेताओं की संख्या सीमित या थोड़ी होती हैं एवं प्रत्येक क्रय-विक्रय सौदा बड़ी मात्रा में और अधिक मूल्य का होता है। औद्योगिक वस्तुएँ निम्नलिखित चार प्रकार की जानी जाती हैं

(1) गढ़ाई की वस्तुएँ इस समूह में उन औद्योगिक वस्तुओं को शामिल किया जाता है जो या तो पूरी तरह बनी हुई नहीं है या जो उसी अवस्था में उपभोक्ता के काम नहीं आ सकती हैं। इनको उपयोगी बनाने के लिए या तो कुछ और औद्योगिक क्रिया की आवश्यकता होती है अथवा इनको जैसा का तैसा ही अन्य उपयोगी वस्तुओं में लगा दिया जाता है या जड़ दिया जाता है। गढ़ाई की वस्तुओं के अन्तर्गत हम ऐसी वस्तुओं को ले सकते हैं, जैसे- धातु के ट्यूब, चद्दरें, आदि। ट्यूब के प्रयोग का एक बहुत सुन्दर उदाहरण इस्पात के ट्यूब हैं जिन्हें मोड़कर साइकिलों के ढाँचे बनाये जाते हैं।

(2) उपकरण वस्तुएँ—ये सस्ती पूँजीगत वस्तुएँ होती हैं। इस कोटि में कारखानों में लगायी जाने वाली और काम में आने वाली बहुत प्रकार की वस्तुएँ सम्मिलित होती है। इसमें कुछ वस्तुएँ तो ऐसी होती है जो कारखानों की विशेष आवश्यकताओं की पूर्ति की दृष्टि से विशेष तौर पर बनायी जाती हैं और कुछ ऐसी होती है जो बनी हुई मिलती हैं। बिजली अथवा मैकेनिकल शक्ति संचालन के उपकरण अधिकतर विशेष आवश्यकताओं की पूर्ति की दृष्टि से खासतौर पर बनाये जाते हैं। इन वस्तुओं में इनकी उपयोगिता और कार्यक्षमता का बड़ा महत्व होता है। ये प्रायः अस्थायी प्रकृति की होती है और इनका जीवन काल कम होता है।

(3) सामग्री वस्तुएँ-सामग्री के अन्तर्गत ऐसी वस्तुएँ आती है जिनकी आवश्यकता कारखाना चलाने के लिए होती है लेकिन वे बनी हुई वस्तु का भाग नहीं बनती हैं। उदाहरण के तौर पर औद्योगिक ईंधन (कोयला, तेल आदि) तथा मशीनों और कल-पुर्जों को चिपकाने वाले पदार्थ इसी प्रकार की वस्तुएँ है। दफ्तर में काम आने वाली स्टेशनरी भी इसी वर्ग में सम्मिलित की जानी है। ईंधन और चिकनाहट के पदार्थ अधिकतर काफी मात्रा में काम आते हैं और लगातार काफी समय तक के लिए इनका प्रबन्ध करना पड़ता है।

(4) कच्ची वस्तुएँ-वे वस्तुएँ जो खेतों, खानों तथा वनों से प्राप्त होती हैं कच्ची वस्तुएँ कहलाती है। इसमें विभिन्न प्रकार के खाद्य-पदार्थ, जैसे-गेहूँ, चना, मटर, दालें, गन्ना, तम्बाकू, वनों की लकड़ी, खनिज तेल, कोयला, सोना, चाँदी, लोहा आदि शामिल हैं। ये सभी वस्तुएँ निर्मित वस्तुओं के कच्चे माल के रूप में काम में लायी जाती हैं। इनका वास्तविक अस्तित्व समाप्त हो जाता है और ये अन्तिम उत्पाद का हिस्सा बन जाते हैं।

(III) टिकाऊ एवं अटिकाऊ उत्पाद (Durable and Non- Durable Products) : उत्पादों का वर्गीकरण उनके प्रयोग एवं जीवन काल के आधार पर भी किया जा सकता है। इस दृष्टि से वस्तुओं को दो श्रेणियों-टिकाऊ एवं अटिकाऊ वस्तुओं के रूप में विभाजित किया जा सकता है। टिकाऊ वस्तुएँ वे उत्पाद हैं जो अनेक बार प्रयोग में लायी जा सकती हैं और काफी लम्बे समय तक प्रयोग में आती रहती है। अतः टिकाऊ माल वह दृश्य उत्पादों में सम्मिलित किये जाते हैं। अटिकाऊ वस्तुएँ वे दृश्य वस्तुएँ हैं जो कि सामान्यतः एक या कुछ प्रयोगों के बाद समाप्त हो जाती हैं, जैसे-भोजन, चाय, दूध, खेल का सामान आदि। जिस प्रकार की वस्तु होगी विपणन कार्यक्रम भी उसी के अनुसार बनाने चाहिए। जैसे-यदि अटिकाऊ वस्तुएँ हैं तो उनको स्थान-स्थान पर बेचने की व्यवस्था करनी होगी, लाभ भी कम रखा जायेगा तथा ब्राण्ड के प्रति वफादारी का प्रयत्न किया जायेगा। इसी प्रकार यदि वस्तुएँ टिकाऊ हैं तो उनके लिए व्यक्तिगत मात्रा अधिक रखी जा सकती है और विक्रय के बाद सेवा के प्रबन्ध की भी आवश्यकता होती है।

उत्पाद या वस्तु का महत्व (Importance of Product or Commodity)

वास्तव में, उत्पाद या वस्तु समस्त विपणन क्रियाओं का केन्द्र बिन्दु है। बिना उत्पाद या वस्तु के कोई भी विपणन क्रिया सम्भव नहीं हो सकती है। विक्रय, विज्ञापन, विक्रय संवर्द्धन आदि सभी वस्तु पर ही निर्भर है। वस्तु का मूल्य, उसका वितरण एवं उससे सम्बन्धित नीतियाँ उसी पर आधारित है। यदि व्यावसायिक जगत् में किसी व्यावसायिक उपक्रम को शरीर, उसके प्रबन्ध को हृदय और बाजार को रक्त की संज्ञा प्रदान की जाये तो इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि उत्पाद पूरे व्यावसायिक उपक्रम का प्राण होता है। जिस प्रकार प्राण के अभाव में शरीर और उसके विभिन्न अंग सारहीन हो जाते हैं, ठीक उसी प्रकार व्यावसायिक उपक्रम में यदि उत्पाद न हों तो व्यावसायिक उपक्रम के अन्य सभी साधन निष्क्रिय हो जायेंगे। वस्तु-नियोजन एवं उसका विकास वस्तु के जीवन को प्रभावित करता है। वस्तु सम्बन्धी निर्णय एक व्यवसाय को प्रगति के पथ पर ले जा सकते हैं। इसके विपरीत गलत निर्णय व्यवसाय को अवनति की ओर ले जा सकते हैं; जैसे-एक व्यवसायी किसी वस्तु के निर्माण करने का निर्णय उचित समय पर नहीं लेता है तो उसको हानि उठानी पड़ सकती है और वस्तु बाजार में असफल हो सकती है। इस प्रकार वस्तु क्रेता एवं विक्रेता दोनों की दृष्टि से अपना महत्व रखती है जिसका वितरण निम्न प्रकार है

क्रेता की दृष्टि से महत्व-वस्तुओं या उत्पादों का क्रेता की दृष्टि से काफी महत्व है, क्योंकि उसके उपभोग का एक मात्र केन्द्र बिन्दु उत्पाद ही तो है। उत्पाद या वस्तु क्रेता की क्रयशक्ति, उसका जीवन स्तर, मानसिक सन्तुष्टि व आवश्यकताओं की पूर्ति को प्रभावित करती है। जहाँ एक ओर उत्तम वस्तुओं का चयन एक क्रेता के जीवन को सफल बनाता है तथा वहीं दूसरे ओर उत्तम वस्तुओं का अभाव उसमें अशान्ति, कुण्ठाओं एवं कठिनाइयों को उत्पन्न करता है।

विक्रेताओं की दृष्टि से महत्व-विक्रेताओं की दृष्टि से भी वस्तु या उत्पाद महत्वपूर्ण है। वास्तव में वस्तु विपणन कार्यक्रमों की जन्मदाता और आधारशिला है। बिना वस्तु के न तो विपणन कार्यक्रम बन सकता है और न उसकी बिक्री हो सकती है। इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि वस्तु सभी व्यावसायिक क्रियाओं का प्रारम्भिक बिन्दु है। वस्तु पर ही विक्रय ढाँचा, विक्रय संवर्द्धन क्रियाएँ, विपणन अनुसन्धान एवं विकास आदि क्रियाएँ आधारित है। उत्पाद की व्यावसायिक संस्था की प्रगति का आधार है तथा उत्पाद या वस्तु पर ही संस्था का लाभ निर्भर करते हैं जिसके लिए उत्तम वस्तु सही मूल्यों पर देना आवश्यक है। घटिया वस्तु को लम्बे काल तक बेचना सम्भव नहीं है। अच्छी वस्तु का विक्रय उसके ग्राहकों की संख्या में वृद्धि करता है, संस्था की ख्याति में चारचांद लगाता है तथा लाभों में भी उत्तरोत्तर वृद्धि करता है।

सामाजिक दृष्टि से महत्व-सामाजिक दृष्टि से भी उत्पाद का काफी महत्व है। एक ओर जहाँ उत्पाद से समाज में रहने वाले व्यक्तियों की आवश्यकताओं की सन्तुष्टि होती है वही दूसरी ओर उत्पादों के उत्पादन, विज्ञापन, विक्रय संवर्द्धन एवं वितरण क्रियाओं से करोड़ों लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त होते हैं।