विपणन प्रवर्तन से आप क्या समझते हैं ? विपणन में प्रवर्तन का महत्व समझाइए।

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सम्वर्द्धन या प्रवर्तन का आशय एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Promotion)

किसी वस्तु का नियोजन, विकास, कीमत, वितरण आदि निर्धारित करने के पत्त्चात् यह निश्वय किया जाता है कि अपनी वस्तु का बाजार में किस प्रकार संवर्द्धन किया जाये। दूसरे शब्दों में, ग्राहकों को वस्तु के प्रति आकर्षित करके के लिए संवर्द्धन क्रियाएँ आवश्यक होती है। संवर्द्धन के अन्तर्गत वे सभी क्रियाएँ सम्मिलित होती है, जिनसे ग्राहकों को वस्तु के सम्बन्ध में सूचनाएँ मिलती है तथा वे वस्तु से प्रभावित होकर वस्तु खरीदने के लिए प्रेरित होते हैं। अतः संवर्द्धन में वे सभी क्रियाएँ सम्मिलित की जाती है, जिनके द्वारा संस्था या फर्म ग्राहकों का ध्यान अपने उत्पादन की ओर आकर्षित करती है, जैसे- उत्पाद सम्बन्धी सूचनाओं, विशेषताओं एवं कीमत आदि के द्वारा ग्राहकों को संस्था की वस्तु की ओर आकर्षित किया जाता है।

  • (1) विलियम जे. स्टाण्टन (William J. Stanton) के अनुसार, “संवर्द्धन में विज्ञापन, वैयक्तिक विक्रय विक्रय प्रवर्तन और अन्य विक्रय उपकरण आते हैं।”
  • (2) मैक्कार्थी (McCarthy) के अनुसार, “संवर्द्धन उपभोक्ताओं, थोक विक्रेताओं, फुटकर विक्रेताओं, प्रयोगकर्ताओं या अन्तिम उपभोक्ताओं को वस्तु, स्थान व मूल्य के विपणन मिश्रण को जिसको कि विपणन प्रबन्ध ने एकत्रित किया है, कि सूचना देने, अनुनय करने या याद दिलाने का साधन है।” इस प्रकार, हम यह कह सकते हैं कि संवर्द्धन एक साधन है जिसके द्वारा वस्तुओं या सेवाओं के लिए क्रेताओं का ध्यान आकर्षित किया जाता है, उन्हें सूचना दी जाती है, उन्हें याद दिलायी जाती है व उनसे वस्तु या सेवा क्रय करने के लिए अनुनय किया जाता है। इसमें विज्ञापन, विक्रय संवर्द्धन वैयक्तिक विक्रय व अन्य सभी विपणन उपकरण सम्मिलित किये जाते हैं।

संवर्द्धन का उद्देश्य (Objectives of Promotion)

विपणन में वस्तु के संवर्द्धन या प्रवर्तन का बहुत महत्व है। वस्तु के निर्माण के पश्चात् उसको उपभोक्ता तक पहुँचाना तथा उपभोक्ता द्वारा उसकी माँग करना बहुत ही आवश्यक है। बिना उपभोक्ता द्वारा माँगे उस वस्तु का उत्पादन बनाए रखना सम्भव नहीं हो सकता है। अतः इसके लिए आवश्यक है कि उपभोक्ता को वस्तु के उत्पादन के बारे में जानकारी दी जाए। इस प्रकार प्रवर्तन के निम्न उद्देश्य होते हैं

(1) वस्तु सम्बन्धी सूचना देना-संवर्द्धन या प्रवर्तन क्रियाओं का पहला उद्देश्य सूचना देना है। इसके द्वारा वस्तु की विशेषता के बारे में पर्याप्त सूचना दी जाती है।

(2) याद दिलाना- आजकल प्रतियोगी युग में प्रतियोगी वस्तु के निर्माता बड़ी तैयारी से बाजार में आ रहे हैं और यह सम्भव है कि उपभोक्ता उनकी ओर झुक जाए। अतः बार-बार याद दिलाना संवर्द्धन या प्रवर्तन क्रियाओं का दूसरा उद्देश्य है।

(3) वस्तु क्रय हेतु राजी करना-संवर्द्धन या प्रवर्तन का उद्देश्य क्रेताओं को वस्तु क्रय करने के लिए तैयार करना है। क्रेता एक क्षण में तैयार नहीं हो सकते है। उनको तो बार-बार सूचना देते रहना व याद दिलाते रहना अनिवार्य है। जब ग्राहक को बार-बार वस्तु की याद आती है तो वह कुछ समय के बाद उस वस्तु को खरीदने के लिए राजी हो जाता है।

(4) विक्रय में वृद्धि करना-संवर्द्धन क्रियाओं का अन्तिम उद्देश्य वस्तु को बिक्री में वृद्धि करना होता है। संवर्द्धन क्रियायें वस्तु की माँग की लोच में वांछित परिवर्तन करके विक्रय में वृद्धि कर देती है।

संवर्द्धनात्मक क्रियायें (Promotional Activities)

संवर्द्धन में निम्नलिखित गतिविधियों या क्रियाएँ सम्मिलित की जाती हैं

(1) वैयक्तिक विक्रय (Personal Selling)-वैयक्तिक विक्रय के अन्तर्गत एक विक्रेता मौखिक रूप में वस्तु की विशेषताओं को उन व्यक्तियों को बताता है जो ग्राहक तो नहीं है, किन्तु यदि उनको प्रभावित कर लिया जाता है तो वे ग्राहक बन सकते हैं। ऐसे व्यक्तियों को सम्भावित ग्राहक कहा जाता है। इस प्रकार वैयक्तिक विक्रय में क्रेता को सन्तुष्ट करते हुए उत्पाद के विक्रय का प्रयास किया जाता है। वैयक्तिक विक्रय का उद्देश्य भावी ग्राहकों में उत्पाद के प्रति जानकारी उत्पन्न करना, रुचि पैदा करना, ब्राण्ड प्राथमिकता का विकास करना और कीमतों को तय करना है। इसमें विक्रेता एवं भावी क्रेता दोनों ही एक-दूसरे की आवश्यकताओं को समझने और आवश्यक समायोजन करने की कोशिश करते हैं जिससे उनकी मुलाकात सफल हो सके।

(2) विज्ञापन (Advertisement)-आधुनिक प्रतिस्पर्द्धा के युग में विज्ञापन का महत्वपूर्ण स्थान है। विज्ञापन के द्वारा नयी-नयी वस्तुओं का परिचय उपभोक्ताओं को कराया जाता है तथा उन्हें वस्तुएँ खरीदने के लिए प्रेरित किया जाता है। बुद्ध (Wood) के अनुसार, ” विज्ञापन जानने, स्मरण रखने एवं कार्य करने की एक विधि है।” व्हीलर (wheeler) के अनुसार, “विज्ञापन लोगों को करने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से विचारों, वस्तुओं तथा सेवाओं का अवैयक्तिक प्रस्तुतीकरण है जिसमें लिए भुगतान किया जाता है।” इस प्रकार विज्ञापन एक व्यापक प्रक्रिया है जिसमें विज्ञापन के विभिन्न माध्यमों, जैसे-दूरदर्शन, आकाशवाणी समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, सिनेमा, स्लाइड्स, बाह्य विज्ञापन आदि का प्रयोग किया जाता है। साथ ही विज्ञापन संदेश को बार-बार दोहराया जाता है। विज्ञापन ग्राहकों को विज्ञापित वस्तु को क्रय करने हेतु प्रेरित करता है। विज्ञापन का उद्देश्य उत्पादक तथा निर्माता को लाभ पहुँचाना, उपभोक्ता को शिक्षित करना, विक्रेता को सहायता देना, प्रतिस्पर्द्धा को समाप्त कर व्यापारियों को अपनी ओर आकर्षित करना और सबसे अधिक तो उत्पादक तथा उपभोक्ता में सम्बन्ध स्थापित करना है।

(3) विक्रय संवर्द्धन (Sales Promotion)-विक्रय सम्वर्द्धन से आशय इन समस्त क्रियाओं से है जो वैयक्तिक विक्रय, विज्ञापन एवं प्रचार के अतिरिक्त की जाती है। जैसे-कूपन बाँटना, प्रीमियम देना, नमूने बाँटना, प्रतियोगिताएँ आयोजित करना आदि। एल. के. जॉनसन के अनुसार, “विक्रय प्रवर्तन में वे सभी क्रियाएँ सम्मिलित होती हैं जिनका उद्देश्य विक्रेताओं, विज्ञापन विभाग एवं वितरकों के कार्यों को सम्पन्न करना तथा विक्रेताओं के कार्यों को अधिक प्रभावपूर्ण बनाना होता है जिससे विक्रय बढ़ सके और उपभोक्ताओं के क्रय में अधिक रुचि लेने को प्रेरित किया जा सके।” इसी प्रकार जे. आर. डॉवमेन (J. R. Daubman) के शब्दों में, “विक्रय प्रवर्तन से आशय फुटकर व्यापारियों के कार्य को अधिक सरल बनाना है, ग्राहकों के मस्तिष्क में इच्छा उत्पन्न करना है एवं व्यापारियों को अधिक श्रेष्ठ व्यापारी बनाना है।”

(4) प्रचार (Publicity)- इसे जन सम्बन्ध (Public Relations) नाम से भी जाना जाता है। प्रचार अवैयक्तिक होता है और इसके लिए किसी प्रकार का भुगतान नहीं करना पड़ता है। इसके अन्तर्गत निर्माता द्वारा बाजार एवं आम जनता में अनुकूल वातावरण बनाया जाता है। इस हेतु समाचार-पत्र, पत्रिकाओं, दूरदर्शन, रेडियो आदि पर उत्पादों या सेवाओं के बारे में अनुकूल समाचार प्रसारित कराये जाते हैं। यह यही कि प्रचार हेतु निर्माता को कोई भुगतान नहीं करना पड़ता परन्तु विपणन अधिकारियों को इसे ‘फ्री पब्लिसिटी’ समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।

सम्वर्द्धन को प्रभावित करने वाले घटक (Factors Influencing Promotion) सम्बर्द्धन की तकनीकों तथा उपकरणों पर अनेक घटकों का प्रभाव पड़ता है, जिनमें से मुख्य निम्न है –

(1) वस्तु की प्रकृति (Nature of Product)-वस्तु की प्रकृति सम्वर्द्धन को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण घटक है। इस दृष्टि से उपभोक्ता वस्तुओं तथा औद्योगिक वस्तुओं के लिए सम्वर्द्धन की अलग-अलग तकनीक अपनायी जाती है।

(2) कोषों की उपलब्धता (Availability of Funds)- फर्म के वित्तीय साधन भी सम्बर्द्धन को प्रभावित करते हैं। बड़ी फर्म टेलीविजन विज्ञापन, बड़ी-बड़ी इनामी प्रतियोगिताओं को अपना सकती है, जबकि छोटी फर्म दीवालों एवं स्थानीय समाचार-पत्रों में विज्ञापन तथा व्यक्तिगत विक्रय तक ही सीमित रह जाती है।

(3) बाजार का क्षेत्र (Scope of the Marker)-उत्पादित या विक्रय की जाने वाली वस्तु का बाजार क्षेत्र भी सम्वर्द्धन को प्रभावित करता है। बाजार का क्षेत्र स्थानीय, प्रान्तीय, राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय हो सकता है।

(4) ग्राहकों के प्रकार (Types of Coustomer ) –ग्राहकों का प्रकार ग्रामीण ग्राहक या शहरी ग्राहक, पुरुष ग्राहक या महिला ग्राहक, उपभोक्ता ग्राहक, औद्योगिक ग्राहक या मध्यस्थ ग्राहक हो सकता है। यह भी सम्बर्द्धन के विभिन्न रूपों को प्रभावित करते हैं।

(5) वस्तु का जीवन चक्र (Life Cycle of the Product)- एक वस्तु का जीवन चक्र (Product Life Cycle) भी वस्तु के सम्वर्द्धन के सम्बन्ध में निर्णय लेने को प्रभावित करता है। इसमें यह देखना होता है कि वस्तु नई है अर्थात् बाजार में पहली बार उतारी जा रही है अथवा वस्तु पहले से ही बाजार में पर्याप्त रूप से प्रचलित है।

(6) प्रतियोगिताओं की विक्रय सम्वर्द्धन रीतियाँ (Methods of Sales Promotion of the Competitions) सम्वर्द्धन रीतियों के निर्धारण में भी यह ध्यान रखना पड़ता है कि प्रतियोगिताओं द्वारा किन रीतियों को अपनाया जा रहा है।

(7) सरकारी नीतियाँ (Government Policies) सम्बर्द्धन तकनीकों के अपनाने में सरकारी नियमों और रीतियों का भी पालन करना आवश्यक है। इस सम्बन्ध में सरकार ने विज्ञापनों पर अनेक प्रकार के प्रतिबन्ध लगा रखे हैं और यदि वह ऐसा नहीं करेगा तो उनका कानून के अनुसार दण्ड के लिए बाध्य होना।

(8) वस्तु का मूल्य (Price of Product)-वस्तु का प्रति इकाई मूल्य तथा विक्रय की कुल राशि भी सम्बर्द्धन को प्रभावित करती है। यदि वस्तु के मूल्य में लाभ पर्याप्त मात्रा में जुड़ा है तो सम्बर्द्धन करने की सम्भावनाएँ अधिक है, क्योंकि उसकी बिक्री बढ़ने पर सम्बर्द्धन व्यय निकल आने की आशा है।

(9) व्यावसायिक प्रथाएँ (Business Traditions)- भारत के सन्दर्भ में सम्वर्द्धन पर व्यावसायिक प्रथाओं और परम्पराओं का भी प्रभाव पड़ता है। इसमें विभिन्न त्यौहारों एवं मेलों के अवसर पर उपहार इत्यादि मुख्य हैं।

(10) निर्माता के उद्देश्य (Objectives of Manufactures)- निर्माता के उद्देश्य भी सम्बर्द्धन को प्रभावित करते हैं, जैसे-यदि निर्माता का उद्देश्य जन-जन तक वस्तुओं को पहुँचाना है तो वह सम्बर्द्धन क्रियाओं को अपनायेगा, किन्तु इसके विपरीत यदि उसका उद्देश्य केवल कुछ व्यक्तियों तक ही वस्तु पहुँचाना है तो वह सम्बर्द्धन क्रियाएँ या तो अपनायेगा ही नहीं या फिर वह सीमित भाग में अपनायेगा।

संवर्द्धन का महत्व (Importance of Promotion)

वर्तमान युग में जहाँ अपूर्ण प्रतियोगिता है या वस्तु विभिन्नीकरण के कारण एकाधिकार है, क्रेता के पास सूचना का अभाव है तथा उसका स्वयं का व्यवहार अविवेकपूर्ण है, तो ऐसी स्थिति को सूचना देने का काफी महत्व है। इस महत्व की निम्न घटकों ने और अधिक बढ़ा दिया है और यह आवश्यक कर दिया है कि संवर्द्धन साधन या संचार सम्मिश्रण अवश्य ही अपनाया जाये चाहे उनकी : मात्रा थोड़ी ही क्यों न हो। ये घटक निम्नलिखित हैं

 

(1) प्रतियोगिता का सामना आजकल के युग को प्रतियोगिता का युग कहा जाता है क्योंकि प्रत्येक क्षेत्र में प्रतियोगिता पायी जाती है। एक उद्योग दूसरे उद्योग से प्रतियोगिता करता है। एक ही उद्योग में बहुत-सी संस्थाएँ होने के कारण भी उनमें आपस में प्रतियोगिता होती है। इस प्रतियोगिता का संवर्द्धन पर काफी प्रभाव पड़ता है। आजकल निर्माता आवश्यकता की पूर्ति ही नहीं करता बल्कि ग्राहक के मनोविज्ञान की भी पूर्ति करता है। इस प्रकार प्रतियोगिता से प्रभावकारी ढंग से निपटने के लिए संवर्द्धन की सहायता ही नहीं लेनी पड़ती है बल्कि एक उपयुक्त संवर्द्धन कार्यक्रम बनाना पड़ता है। ग्राहकों की माँग तो सदा ही सुस्त रहती है। प्रतियोगी निर्माता का काम उस माँग को उभारना व जागना है। इस प्रकार प्रतियोगिता ने संवर्द्धन कार्यक्रम या संचार सम्मिश्रण को अपनाने के लिए बाध्य कर दिया है जो वस्तुओं के विपणन में काफी सहयोग प्रदान करता है।

(2) उत्पादकों और उपभोक्ताओं के बीच अधिक दूरी-उपभोक्ता और उत्पादकों के बीच दूरी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। संवर्द्धन या संचार क्रियाएँ इन दोनों को मिलाने में सहायक होती है।

(3) वितरण माध्यमों का विकास-वितरण माध्यमों का विकास भी बहुत अधिक हुआ है और निर्माता तथा उपभोक्ता के बीच कई कड़ियाँ आ गयी है। अतः निर्माता के लिए यह आवश्यक है कि वह ऐसी नीति अपनाये जिससे उसकी सूचनाएँ समय-समय पर उपभोक्ताओं को ही नहीं मिले बल्कि मध्यस्थों को भी मिल सकें। एक निर्माता थोक विक्रेता को सूचित करता है, चोक विक्रेता फुटकर विक्रेता को और फुटकर विक्रेता उपभोक्ता को इस प्रकार वितरण माध्यमों के विकास ने संवर्द्धन व संचार क्रियाओं का महत्व बढ़ा दिया है।

(4) आर्थिक मन्दी का सामना आर्थिक जगत् में जब मन्दी आती है तो वस्तु के विक्रय को बहुत कम कर देती है। ऐसी हालत में संवर्द्धन व संचार सुविधाएँ ही विक्रय को बनाए रखने में सहायक होती हैं जिससे विपणन क्रियाएँ चलती रहती हैं।

(5) उच्च जीवन स्तर बनाना अधिक वस्तुओं को काम में लाना ही उच्च रहन-सहन के स्तर का प्रतीक है। प्रवर्तन या संवर्द्धन उन वस्तुओं के बारे में सूचनाएँ देता है जिनकी जानकारी उपभोक्ता को नहीं है। जब उपभोक्ता को जानकारी हो जाती है तो वह उनको क्रय करके अपने जीवन स्तर को उच्च बना लेता है।

(6) रोजगार-यदि वस्तुओं की माँग कम होती है तो व्यवसाय की प्रगति रुक जाती है और निर्माता कर्मचारियों की छंटनी करने के लिए बाध्य हो जाता है। संवर्द्धन विक्रय को बनाए रखने में सहायक होता है जिससे रोजगार सुविधाएँ ज्यों की त्यों बनी रहती है और छंटनी करने की आवश्यकता नहीं होती।

(7) संवर्द्धन व्यय- एक वस्तु के विपणन व्यय उस वस्तु के उत्पादक व्यय से कहीं अधिक होते हैं। इन विपणन व्ययों में संवर्द्धन भी शामिल है।