विपणन वातावरण से आप क्या समझते है? विपणन वातावरण को प्रभावित करने वाले प्रमुख घटक कौन-कौन से है ? समझाइये।

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विपणन वातावरण का आशय एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Marketing Environment) : विपणन वातावरण से आशय बाजार की उन सभी परिस्थितियों से है जिनके अन्तर्गत वस्तुओं का क्रय-विक्रय किया जाता है। विपणन के अन्तर्गत क्योंकि वस्तुओं के क्रय एवं विक्रय के पूर्व व पश्चात् की सभी क्रियाओं को शामिल किया जाता है इसलिए विपणन वातावरण का निर्धारण उसके आन्तरिक एवं बाह्य दोनों प्रकार के तत्व निर्धारित करते हैं। आन्तरिक तत्वों में उत्पादन का आकार, पूँजी की उपलब्धता, संस्था की स्थिति आदि को शामिल किया जाता है जबकि बाह्य तत्वों में प्रतियोगिता की स्थिति, बाजार का स्वभाव, वैधानिक वातावरण आदि को शामिल करते हैं। एक विपणन प्रबन्धक को इन सभी तत्वों का अध्ययन कर विपणन वातावरण के अनुसार ही अपनी वस्तुओं के विक्रय की रीति-नीति का निर्धारण करना चाहिए ताकि बाजार में अधिक विक्रय कर उपभोक्ताओं को सन्तुष्ट करते हुए, उचित लाभ कमाया जा सके प्राइड तथा फैरेल (Pride and Ferrel) के अनुसार, “विपणन में वे सभी बाह्य घटक शामिल है जो किसी संस्था के संसाधनों (मानवीय, वित्तीय, प्राकृतिक, कच्चा माल एवं सूचनाएँ) की प्राप्ति तथा उत्पादों (माल, सेवाएँ या विचार) के सृजन को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित करती हैं।”

  • फिलिप कोटलर (Philip Kotler) के अनुसार, “विपणन पर्यावरण में फार्म के विपणन प्रबन्धक कार्य के बाहरी घटक एवं शक्तियाँ शामिल हैं जो लक्षित ग्राहकों के साथ सफल व्यवहारों का विकास करने और उन्हें बनाये रखने की विपणन प्रबन्ध की योग्यता को आगे बढ़ाती है।” इस प्रकार स्पष्ट है कि विपणन वातावरण से आशय विपणन प्रबन्ध के बाहरी वातावरण की उन गतिशील परिस्थितियों से है जो विपणन क्रियाओं की कार्यकुशलता एवं प्रभावशीलता को प्रभावित करती है एवं जिन पर विपणन प्रबन्ध का कोई नियन्त्रण नहीं होता है।

विपणन पर्यावरण के आन्तरिक तथा बाह्य घटक (Internal and External Factors of Marketing Decisions) : विपणन सम्बन्धी निर्णयों पर बहुत से घटक प्रभाव डालते हैं जिन्हें दो भागों- आन्तरिक व बाह्य घटक के रूप में बाँटा जाता है। इनका विस्तृत विवरण निम्न प्रकार है

(A) विपणन पर्यावरण के आन्तरिक घटक या शक्तियाँ-सूक्ष्म पर्यावरणीय घटक विपणन पर्यावरण की आन्तरिक शक्तियों अथवा सूक्ष्म पर्यावरणीय घटकों से आशय उन शक्तियों से है जिन पर विपणन प्रबन्धक का नियन्त्रण रहता है। वह इन शक्तियों में आवश्यक परिवर्तन करने की स्थिति में रहता है। आन्तरिक शक्तियों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) संस्था की स्थिति एक संस्था की स्थिति विपणन निर्णयों को प्रभावित करती है। इसलिए विपणन निर्णय लेते समय एक संस्था को अपनी आर्थिक स्थिति, कर्मचारी शक्ति, उत्पादन साधनों आदि के बारे में भी विचार करना आवश्यक होता है। यदि कोई संस्था किसी नयी वस्तु को बनाने के बारे में सोचती है लेकिन यदि उसके पास आर्थिक साधनों की कमी है तो वह नयी वस्तु को बनाने का निर्णय नहीं ले सकती है। इसी प्रकार यदि कर्मचारी शक्ति सीमित है और इस प्रकार के प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं मिलते जैसे कि संस्था को चाहिए तो इसका प्रभाव यह होगा कि संस्था अपने विकास का निर्णय नहीं ले सकती है। ऐसे ही यदि कोई संस्था औद्योगिक वस्तुओं का उत्पादन एवं वितरण कर रही है और वह नयी उपभोक्ता वस्तु बनाना चाहती तो इसके लिए उसको नया वितरण विज्ञापन व कर्मचारी संगठन बनाना होगा क्योंकि पुराने संगठन से जो कि औद्योगिक वस्तु के लिए है काम नहीं चलेगा।

(2) वस्तु का स्वभाव-विपणन निर्णय वस्तु के स्वभाव से भी प्रभावित होता है। जैसे उपभोक्ता वस्तु के वितरण व विक्रय संवर्द्धन का तरीका औद्योगिक वस्तु के तरीके से भिन्न होगा। उपभोक्ता वस्तुओं को प्रत्येक उपभोक्ता तक पहुँचाने के लिए गहन वितरण प्रणाली का निर्णय लेना होता है जबकि औद्योगिक वस्तु के लिए गहन वितरण प्रणाली के निर्णय लेने की आवश्यकता नहीं होती है। इसी प्रकार दोनों के विक्रय संवर्द्धन सम्बन्धी निर्णय भी भिन्न होंगे। इसी प्रकार कम प्रतियोगिता वाली वस्तु विपणन निर्णय अधिक प्रतियोगिता वाली वस्तुओं के निर्णय से भिन्न होते हैं।

(3) ग्राहक-एक कम्पनी को अपने ग्राहकों को अच्छी प्रकार से समझ लेना चाहिए। यह ग्राहक सामान्य उपभोक्ता, सरकार, व्यापारी व अन्तर्राष्ट्रीय ग्राहक हो सकते हैं। इन ग्राहकों का विपणन निर्णयों पर प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, यदि ग्राहक व्यापारी है जो हमारे माल को क्रय करके आगे पुनः बेच देते हैं तो यह आवश्यक है कि हमें माल की पूर्ति बराबर रखनी होगी जिससे ग्राहक टूटने का भय नहीं रहे।

(4) विपणन मध्यस्य– विपणन मध्यस्थ संस्था के माल को अन्तिम उपभोक्ता तक पहुँचाने में सहायक होते हैं, इसमें थोक व्यापारी व फुटकर व्यापारी शामिल होते हैं। साथ ही माल की भौतिक अदला-बदला के लिए भण्डारगृह व परिवहन साधन भी इसी में शामिल किये जाते हैं। यदि समय पर माल नहीं पहुँचेगा तो इससे उपभोक्ता सन्तुष्टि में कमी एवं ग्राहक विपणनकर्ता सम्बन्धों में दरार पड़ जाएगी। इसीलिए यह व्यापार के महत्वपूर्ण साझेदार माने जाते हैं।

(5) पूर्तिकर्ता – पूर्तिकर्ता एकाकी अथवा व्यावसायिक गृह होते हैं जोकि किसी कम्पनी को आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराते हैं। कम्पनी को ऐसे पूर्तिकर्ताओं का चयन करना चाहिए जोकि उसको पर्याप्त मात्रा में माल, यथासमय, उत्तम किस्म उचित शर्तों एवं उचित मूल्य पर प्रदान कर सके।

(6) वित्तीय संसाधन-भूमि व भवन, मशीनरी, कच्चा माल आदि का क्रय करने व व्यवसाय की दैनिक क्रियाओं के संचालन के लिए पूँजी की आवश्यकता होती है। इन वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था का कार्य विपणन अधिकारियों द्वारा न किया जाकर प्रायः वित्तीय अधिकारियों द्वारा किया जाता है।

(7) सामग्री-विभिन्न प्रकार के कल-पुर्जे, कच्चे माल की पूर्ति व ऊर्जा संसाधन सामग्री में सम्मिलित किये जाते हैं। अधिकांश सामग्री का उपयोग उत्पाद कर्मचारियों द्वारा किया जाता है परन्तु इन सामग्रियों के क्रय का कार्य विपणन विभाग के कार्यक्षेत्र में ही आता है।

(8) मानवीय संसाधन-इसमें सभी प्रकार के कर्मचारियों व अधिकारियों को सम्मिलित किया जाता है। विपणन कर्मचारियों की नियुक्ति, प्रशिक्षण और पर्यवेक्षण हेतु सेविवर्गीय विभाग व विपणन विभाग में निकट सहयोग आवश्यक है।

(B) विपणन पर्यावरण की बाहरी शक्तियाँ-वृहत पर्यावरणीय घटक विपणन पर्यावरण की बाहरी शक्तियाँ बृहत् पर्यावरणीय घटक कहलाती है। ये आस-पास के वातावरण में पायी जाती हैं। ये वृहत् पर्यावरणीय घटक अनियन्त्रित होते हैं और विपणन निर्णयों को प्रभावित करते हैं। विपणन प्रबन्ध के लिए यह अनिवार्य है कि वह इन वृहत् पर्यावरणीय शक्तियों अथवा घटकों के साथ निरन्तर सम्पर्क बनाये रखे। सफल विपणन हेतु विपणन योजनाओं में इन शक्तियों के साथ समुचित समायोजन रखा जाना चाहिए। ये शक्तियाँ अनियन्त्रणीय होने के कारण विपणन संगठन की क्रियाओं में सीमाओं के रूप में होती हैं। ये बाहरी शक्तियाँ अथवा वृहत पर्यावरणीय घटक निम्नलिखित हैं

(1) जनांकिकी वातावरण-जनांकिकी वातावरण विपणन निर्णयों पर प्रभाव डालता है। जैसे जनसंख्या बढ़ रही है। इसमें जलाने वाले पदार्थ, खाद्य पदार्थ एवं खनिजों की कमी होना स्वाभाविक है। इसी प्रकार अविकसित देशों में मृत्युदर गिर रही है, लेकिन जन्मदर में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं हो रहा है। इससे इन देशों में खाने, कपड़े व शिक्षा आदि की समस्याएँ हैं। अतः एक विपणनकर्ता को अपने देश व विदेश व्यापार करने के लिए जनांकिकी वातावरण को ध्यान में रखना होगा।

(2) आर्थिक वातावरण-विपणन के लिए दो बातें आवश्यक है-एक तो क्रेता की क्रय शक्ति व दूसरे जन समुदाय क्रय शक्ति, आय, मूल्य, बचत, ऋण व साख निर्भर करती है। एक विपणनकर्ता को अपने देश की जनता की खर्च करने की शक्ति का पूरा-पूरा ध्यान रखना चाहिए जो क्रय शक्ति पर निर्भर करता है।

यह क्रय शक्ति समय-समय पर बदलती रहती है। अतः एक विपणनकर्ता को बदलती हुई क्रय शक्ति का अनुमान होना चाहिए जिससे कि वह अपने विपणन कार्यक्रम में उसी अनुरूप परिवर्तन कर सके।

(3) प्राकृतिक वातावरण-प्राकृतिक वातावरण भी विपणन निर्णयों पर प्रभाव डालता है। आजकल सभी देशों में प्राकृतिक वातावरण को बनाए रखने पर काफी जोर दिया जा रहा है, क्योंकि प्रकृति से मिलने वाली वस्तुओं की कमी हो रही है और जिनके आगे चलकर और कम होने की सम्भावनाएँ है। अतः एक विपणनकर्ता को विपणन कार्यक्रम बनाते समय इस बात को भी ध्यान में रखना चाहिए।

(4) तकनीकी वातावरण- वर्तमान समय में तकनीक प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को प्रभावित कर रही है। यह तकनीक चाहे खुला हृदय, शल्य चिकित्सा की हो या विडियो खेलों की जब फोटोकॉपी तकनीक आ गई तो कार्बन प्रतिलिपि उसके आगे नहीं टिक सकी। जब टेलीविजन तकनीक आ गई तो रेडियो तकनीक पुरानी पड़ गई। यदि कोई व्यवसायी इन पुराने व्यवसायों में लगा था और उसने इन नई तकनीकों की ओर ध्यान नहीं दिया तो वह व्यवसाय अवनति की ओर चला गया। अतः यह आवश्यक है कि तकनीक में परिवर्तन को अवश्य ही ध्यान में रखा जाए और उसी अनुरूप अपने विपणन सम्बन्धी निर्णय लिए जाएँ।

(5) राजनीतिक एवं कानूनी वातावरण-विपणन निर्णय राजनीतिक एवं कानूनी वातावरण से होने वाले परिवर्तनों से भारी मात्रा में प्रभावित होते हैं जिससे व्यापारिक गतिविधियाँ या तो विकसित होने लगती है या फिर उनमें संकुचन प्रारम्भ हो जाता है। जैसे आजकल ऐसे कानून बना दिये गये हैं जिनके अनुसार औद्योगिक अपशिष्ट पुनः उपयोग करना आवश्यक है। इससे पुनः उपयोग करने वाली मशीनों की माँग बढ़ रही है और यह उद्योग तेजी से पनपने लगा है।

(6) सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण-समाज लोगों के विश्वास, मूल्य व मानक का निर्धारण करता है। सामान्यतः लोग इन मूल्यों व मानकों पर विश्वास करते हैं। अतः एक विपणनकर्ता को वस्तु इस प्रकार की बनानी चाहिए जो सामाजिक मूल्यों एवं मानकों के अनुरूप हो। तभी वह अपने इरादे में सफल हो सकता है अन्यथा उसको अपने व्यापार में सफलता नहीं मिलेगी। भारतीय संस्कृति कुछ इस प्रकार की है कि इसमें सभी के लिए उचित स्थान हैं। यहाँ भगवान व भाग्य पर भरोसा है। जीओ और जीने दो का सिद्धान्त अपनाया जाता है। यह बातें माता-पिता से बच्चों तक पहुँचती है और जो सामाजिक संस्थाओं द्वारा सुदृढ़ की जाती है। एक विपणनकर्ता इन बातों में कोई संशोधन नहीं कर सकता है। अतः उसको ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जो इन बातों पर चोट करता हो। यदि उसने ऐसा किया तो उसका व्यवसाय नहीं चल पायेगा।

विपणन निर्णयों के प्रकार (Type of Marketing Decisions) एक विपणन प्रबन्धक द्वारा विपणन सम्बन्धी निम्न प्रकार के निर्णय लिये जाते हैं

(1) नीति सम्बन्धी एवं चालू निर्णय-वे निर्णय जो शीर्ष-प्रबन्धकों के द्वारा व्यवसाय की आधारभूत नीतियों के सम्बन्ध में लिये जाते हैं, नीति सम्बन्धी निर्णय कहलाते हैं। ऐसे निर्णयों में अंशधारियों को दिया जाने वाला लाभांश, कर्मचारियों को दिये जाने वाले बोनस, उत्पाद की उधार-बिक्री सम्बन्धी निर्णय आदि आते हैं। संस्था के दिन-प्रतिदिन के कार्यों-सम्बन्धी जो निर्णय लिये जाते हैं उन्हें चालू निर्णय कहा जाता है। जैसे-विक्रय निरीक्षक द्वारा अपने अधीनस्थ विक्रेताओं से सम्पर्क करने का निर्णय लिया जाना।

(2) नैत्यिक निर्णय तथा महत्वपूर्ण निर्णय-ऐसे निर्णय जो व्यवहार के सामान्य प्रकृति के कार्यों के लिए बार-बार लिये जाते हैं और जिनका निर्णय लेते समय अधिक सोचने की आवश्यकता नहीं होती है, नैत्यिक निर्णय कहलाते हैं जैसे क्रय विभाग द्वारा दैनिक आवश्यकता के लिए वस्तुओं को क्रय करने का निर्णय लेना, बिजली के बिलों का भुगतान करने का निर्णय लेना आदि। ऐसे निर्णय प्रायः अधीनस्थ कर्मचारियों के द्वारा लिये जाते हैं। इसके विपरीत, महत्वपूर्ण कार्यों के सम्बन्ध में लिये जाने वाले निर्णय महत्वपूर्ण निर्णय कहलाते हैं। ऐसे निर्णय लेने के लिए विवेक, विश्लेषण एवं अधिकार की आवश्यकता होती है।

(3) संगठन सम्बन्धी एवं व्यक्तिगत निर्णय-संस्था के अधिकारियों द्वारा संस्था के कार्यों के लिए किए गये निर्णयों को संगठन सम्बन्धी निर्णय कहते हैं। जैसे किस प्रकार का माल, कितनी मात्रा में बनाया जाये या किस प्रकार की नयी मशीन क्रय की जाये आदि के सम्बन्ध में किसी कम्पनी के प्रबन्धक निदेशक द्वारा लिये गये निर्णय संगठन सम्बन्धी निर्णय कहलायेंगे। इसके विपरीत जब कोई अधिकारी अपने व्यक्तिगत कार्यों के लिए निर्णय लेता है तो उन्हें व्यक्तिगत निर्णय कहते हैं। जैसे घर की सब्जी व दूध आदि के क्रय सम्बन्धी निर्णय

(4) जोखिमपूर्ण निर्णय तथा कम जोखिमपूर्ण निर्णय-जोखिमपूर्ण निर्णय वे निर्णय हैं जिन्हें अनिश्चितता के वातावरण में, पर्याप्त सूचनाओं के अभाव में लिया जाता है और जिनके गलत होने पर नुकसान होने की सम्भावना होती है, जैसे विपणन प्रबन्धकों द्वारा नये उत्पाद हेतु विपणन प्रयास सम्बन्धी निर्णय जोखिमपूर्ण निर्णय का ही उदाहरण है। कम जोखिम वाले निर्णय वे निर्णय हैं जिनके गलत निकल जाने पर भी फर्म को अधिक हानि होने की सम्भावना नहीं होती। जैसे नये क्लर्क की भर्ती का निर्णय।

(5) विभागीय एवं अन्तर विभागीय निर्णय-किसी विभागीय प्रबन्धक द्वारा अपने विभाग के कार्यों से सम्बन्धित लिये गये निर्णय विभागीय निर्णय कहलाते हैं, लेकिन जब कोई निर्णय कई विभागों के अधिकारियों द्वारा सामूहिक रूप से मिलकर लिया जाता है तो उसे अन्तर विभागीय निर्णय कहते हैं।

(6) सामरिक निर्णय एवं प्रशासकीय निर्णय-वे निर्णय जो फर्म द्वारा बाह्य वातावरण को ध्यान में रखकर लिये जाते हैं सामरिक निर्णय कहलाते हैं। जैसे प्रतियोगी संस्था की वस्तु पंक्ति को देखकर अपनी वस्तु पंक्ति के विषय में निर्णय लेना सामरिक निर्णय का उदाहरण है। इस प्रकार के निर्णय काफी सोच-विचारकर लिये जाते हैं। इसके विपरीत वे निर्णय जो प्रशासकीय कार्यों को सुचारू रूप से चलाने तथा फर्म के साधनों का अधिकतम उपयोग हेतु लिये जाते हैं प्रशासकीय निर्णय कहलाते हैं जैसे प्रशिक्षण निर्णय, विभागों में समन्वय सम्बन्धित निर्णय, प्रशासकीय निर्णयों के उदाहरण हैं।

वृहत् पर्यावरणीय घटकों का विपणन निर्णयों पर प्रभाव (Impact of Macro Environmental Factors on Marketing Decisions)

वृहत् पर्यावरणीय घटक वे घटक होते हैं जोकि बाहरी होते हैं और तत्काल पर्यावरण से सम्बन्धित नहीं होते हैं। वृहत् पर्यावरणीय घटक अनियन्त्रणीय होते हैं जो अप्रत्यक्ष रूप से विपणन की क्रियाशील शक्ति को प्रभावित करते हैं। कम्पनी इनका उपयोग निजी लाभ के लिए करती है। कम्पनी के विपणन सम्बन्धी निर्णयों को पर्यावरणीय घटक निम्न प्रकार से प्रभावित करते हैं

(1) आर्थिक पर्यावरण-आर्थिक पर्यावरण के अधीन विपणन प्रबन्धक सामान्यतः निम्न घटकों एवं प्रवृत्तियों का अध्ययन करता है (i) भौगोलिक आय वितरण, (ii) व्यय करने का ढंग एवं प्रवृत्तियाँ ।। (iii) उपभोक्ताओं की बचत करने की प्रवृत्तियाँ। (v) ब्याज दरें । (iv) रहन-सहन का स्तर। (vii) भुगतान की शर्तें। (viii) रहने का व्यय (vi) वास्तविक आय वृद्धि

उपर्युक्त घटकों से लोगों की क्रय-शक्ति, बचत करने की क्षमता, खर्च करने की प्रवृत्ति तथा साखा की उपलब्धता आदि के बारे में आवश्यक जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इन आर्थिक घटकों/शक्तियों का अध्ययन प्रभावी विपणन योजनाओं को तैयार करने के लिए परम आवश्यक है।

(2) जनांकिकी घटक-वृहत् पर्यावरणीय घटक जो विपणनकर्ताओं को प्रभावित करते हैं, वह है जनसंख्या विपणनकर्ताओं की गहरी दिलचस्पी जनसंख्या के आकार, उसके भौगोलिक वितरण, घनत्व, चलायमान प्रवृत्तियाँ, आयु वितरण, जन्म दर, मृत्यु दर, विवाह, जाति, वंश तथा धार्मिक ढाँचा में होती है। जनांकिकी घटकों का विपणन निर्णयों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जनांकिकी आँकड़े भौगोलिक विपणन योजनायें, घरेलू विपणन योजनाओं, आयु एवं लिंग के अनुसार योजनाओं को तैयार करने में सहायता करते हैं। अच्छे परिणामों को प्राप्त करने के लिए व्यावसायिक इकाई प्रमुख जनांकिकी प्रवृत्तियों की भविष्यवाणी कर सकती है। चूँकि जनसंख्या की प्रवृत्ति पर विपणनकर्ता का कोई नियन्त्रण नहीं होता। अतः उस पर उसे पैनी निगाह रखनी पड़ती है क्योंकि इसमें होने वाला परिवर्तन उसके विपणन निर्णयों को प्रभावित कर सकता है।

(3) सामाजिक एवं सांस्कृतिक पर्यावरण घटक-व्यवसाय समाज में रहकर समाज के लोगों के साथ किया जाता है। अतएव समाज को व्यवसाय से पृथक् नहीं किया जा सकता। अतः कुछ वर्षों से विपणन साहित्य के क्षेत्र में विपणन अवधारणा के विकल्प के रूप में सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना बड़ी तेजी से प्रवेश कर रही है। इस भावना के अन्तर्गत विपणन निर्णयों में निम्नलिखित बातों का समावेश होना चाहिए

  • (i) सही माप एवं सही तौल करना।
  • (ii) मिलावट रहित शुद्ध उत्पादों का विपणन करना।
  • (iii) मुनाफाखोरी न करके उपभोक्ताओं को उत्पाद उचित मूल्य पर बेचना।
  • (iv) उत्पादों की पूर्ति बराबर बनाये रखना।
  • (v) ग्राहकों की रुचि, आदतों एवं फैशन के अनुसार उत्पादों का विपणन करना।
  • (vi) बाजार में नये उत्पादों को प्रस्तुत करने का प्रयास करना ।

(4) वैज्ञानिक एवं तकनीकी पर्यावरण घटक-उत्पत्ति के क्षेत्र में बड़ी तेजी से वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास हो रहा है। यह अनियन्त्रणीय घटक है। वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास जहाँ एक ओर विभिन्न क्षेत्रों में नये-नये अवसर निर्मित करता है, वहीं दूसरी ओर, परम्परागत उत्पादों के लिए तरह-तरह के खतरे उत्पन्न करता है। अवसरों के रूप में वैज्ञानिक एवं तकनीकी पर्यावरण नये उत्पाद प्रस्तुत करता है जिनके विपणन से प्रतियोगियों पर विजय प्राप्त करना सरल हो जाता है। एक समय था जब लोग रेडियो का उपयोग करते थे। तत्पश्चात् ब्लैक एण्ड व्हाइट टी. वी. सेटों ने रेडियो का बाजार छीन लिया और अब कलर टी. वी. ने बाजार पर नियन्त्रण स्थापित कर लिया है। इस प्रकार वैज्ञानिक एवं तकनीकी पर्यावरण व्यवसाय एवं उद्योग के क्षेत्र में एक बड़ी शक्ति के रूप में विकसित हो रहा है। इसने हमें बाध्य किया है कि हम भावी विपणन निर्णय वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास को ध्यान में रखकर ही लें अन्यथा हम शीघ्र बाजार से बाहर कर दिये जायेंगे।

(5) प्रतियोगी पर्यावरण घटक-आज का युग प्रतियोगिता का युग है। एक फर्म के विपणन निर्णय उसके बाजार को प्रभावित करते हैं और इसके बदले में प्रतियोगियों के निर्णयों से स्वयं प्रभावित होते हैं। बाजार में किसी भी उत्पाद की सफलता अथवा असफलता प्रतियोगी पर्यावरण पर निर्भर करती है। अतएव ऐसी स्थिति में विपणन व्यूहरचना करते समय प्रतियोगी पर्यावरण एक महत्त्वपूर्ण घटक है। प्रतियोगिता आज के युग की एक वास्तविकता है जिससे बचना सम्भव नहीं है। साथ ही प्रतियोगियों की क्रियाओं पर नियन्त्रण स्थापित करना भी सम्भव नहीं है। इस प्रतियोगिता के कई आधार हो सकते हैं, जैसे-मूल्य प्रतियोगिता, किस्म प्रतियोगिता, उत्पाद लक्षण प्रतियोगिता, विज्ञापन प्रतियोगिता, उत्पाद की उपलब्धता एवं सेवा प्रतियोगिता आदि प्रतियोगिता कैसी हो सकती है, इसका केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है।