संयुक्त लीवरेज से आप क्या समझते हैं ? संयुक्त लीवरेज की मात्रा को आप किस प्रकार मापेगे ? उदाहरण देते हुए समझाइये।

32

लीवरेज का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Leverage)

वित्तीय प्रबन्ध साहित्य में कुछ सम्पत्तियों के अर्थ-प्रबन्धन में ‘ऋण-पूँजी’ को लीवर के रूप में माना गया है। इसी प्रकार सम्पत्तियों के अधिग्रहण क्रिया से सम्बन्धित करने पर स्थिर लागत को भी लीवर के रूप में माना जा सकता है। ऊँची स्थिर लागतों या अधिक ऋण-पूँजी के प्रयोग के कारण जो जोखिम उत्पन्न होती है, उसकी सीमा या आकलन करने के अभिप्राय से ही लीवरेज की अवधारणा का उपयोग किया जाता है। कुल लागतों में स्थिर लागत का अनुपात ऊँचा होने पर अथवा कुल पूँजी में ऋण-पूँजी का अनुपात अधिक होने पर व्यावसायिक जोखिम (Business risk) और वित्तीय जोखिम (Financial risk) बढ़ जाती है, क्योंकि इसके कारण स्थिर लागतों का भार अथवा स्थिर ब्याज के भुगतान का दायित्व बढ़ जाता है, जिसका विपरीत प्रभाव लाभदायकता पर पड़ता है। इस प्रकार लीवरेज से आशय एक सम्पत्ति या कोष के स्रोतों के प्रयोग से है जिसके लिए संस्था को स्थिर लागत या स्थिर प्रत्याय (ब्याज) का भुगतान करना पड़ता है।

(i) एस. सी. कुच्छल (S. C. Kuchal) के अनुसार, “लीवरेज का अभिप्राय वित्त प्रबन्धन में स्थायी लागत के सहन करने या स्थायी प्रत्याय का भुगतान करने से है।”

(ii) सोलोमन ईजरा (Solomon Ezra ) के अनुसार, “अंशधारियों को इक्विटी पर मिलने वाली प्रत्याय दर का कुल पूँजीकरण की प्रत्याय दर के साथ अनुपात को लीवरेज कहते हैं।”

(iii) जे. ई. वाल्टर (J. E. Walter) के अनुसार, “लीवरेज को समता पर प्रतिशत प्रत्याय तथा पूँजीकरण पर प्रतिशत प्रत्याय के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”

लीवरेज एक ऐसी स्थिति का द्योतक है जिसमें संस्था द्वारा स्थिर लागत में कमी या वृद्धि अथवा -पूँजी में कमी या वृद्धि के फलस्वरूप समता अंशधारियों की आय पर पड़ने वाले प्रभाव का माप किया जाता है। सरल शब्दों में उत्तोलक विक्रय की मात्रा में की गयी थोड़ी-सी वृद्धि या कमी से लाभों में आनुपातिक रूप से अधिक वृद्धि या कमी उत्पन्न करता है।

लीवरेज या उत्तोलक के प्रकार (Types of Leverage).

लीवरेज निम्न तीन प्रकार के होते हैं

1. परिचालन लीवरेज (Operating Leverage) परिचालन लीवरेज लागत मात्रा लाभ विश्लेषण के सिद्धान्त पर आधारित है। कुल लागत में स्थिर लागत की विद्यमानता ही परिचालन लीवरेज को जन्म देती है। परिचालन लीवरेज की परिभाषा संस्था की उस योग्यता के रूप में दी जा सकती है जिसके माध्यम से संस्था स्थिर लागतों का प्रयोग बिक्री में परिवर्तन का लाभ पर (कर व ब्याज से पूर्व) होने वाले प्रभावों को बढ़ाने में करती है।” दूसरे शब्दों में, एक संस्था में परिचालन लीवरेज उस समय उत्पन्न होता है, जबकि विक्रय के स्तर में होने वाले परिवर्तन संस्था के परिचालन लाभों में भी परिवर्तन उत्पन्न करते हैं।

  • एफ. डब्ल्यू, वाल्कर (F. W. Walker) के अनुसार, “परिचालन उत्तोलक को स्थायी परिचालन लागतों के उपयोग के परिणामस्वरूप दी हुई विक्रय मात्रा में हुए परिवर्तनों की तुलना में लाभों में हुए परिवर्तनों के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”
  • जॉन जे. हैम्पटन (John J. Hampton) के अनुसार, “परिचालन लीवरेज तब विद्यमान होता है, जब आगम में परिवर्तन के फलस्वरूप परिचालन लाभ (कर व ब्याज से पूर्व) में व्यापक परिवर्तन होता है।” परिचालन लीवरेज हर उस क्षण उत्पन्न होता है, जब संस्था में स्थिर लागत हो और उस स्थिर

लागत को हर हालत में पूरा करना हो चाहे बिक्री की मात्रा कुछ भी क्यों न हो। व्यवसाय में स्थिर लागत वाली सम्पत्तियों का प्रयोग इस आशा के साथ किया जाता है कि बिक्री से इतना आगम मिल सकेगा कि स्थिर व परिवर्तनशील दोनों लागतों को पूरा किया जा सकेगा। फलस्वरूप, स्थिर लागत यथावत् रहने पर बिक्री की मात्रा में परिवर्तन के लाभ में परिवर्तन का प्रतिशत बिक्री की मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन से अधिक होता है और इसी घटना स्थिति को परिचालन लीवरेज कहते हैं। यदि किसी फर्म की कुल लागतों में उसकी स्थिर लागतों का अनुपात ऊँचा है, तो यह कहा जाएगा कि वह ऊँचे परिचालन लीवरेज के आधार पर व्यवसाय का संचालन कर रहा है। कुल लागतों की तुलना में अपेक्षाकृत ऊँची स्थिर लागतों का उपयोग फर्म के विक्रय की मात्रा में होने वाली वृद्धि अथवा कमी के कारण उसके लाभों में अनुपात से अधिक वृद्धि अथवा कमी उत्पन्न कर देता है। परिचालन उत्तोलक उच्च या निम्न स्तर का हो सकता है। उच्च परिचालन उत्तोलक प्रबन्ध के लिए जोखिमपूर्ण होता है क्योंकि इसमें सुरक्षा की सीमा बहुत कम होती है। निम्न परिचालन उत्तोलक प्रबन्धकों के लिए सुविधाजनक होता है क्योंकि इसमें सुरक्षा की सीमा अधिक होती है।

परिचालन उत्तोलक की मात्रा (Degree of Operating Leverage) परिचालन लाभ में आनुपातिक परिवर्तन एवं बिक्री में आनुपातिक परिवर्तन के आधार पर परिचालन उत्तोलक की मात्रा का अध्ययन किया जा सकता है। जब प्रश्न में परिचालन लाभ की मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन ज्ञात करने को कहा जाये या बिक्री की मात्रा का प्रतिशत परिवर्तन ज्ञात करने के लिए कहा जाये तो वहाँ भी परिचालन उत्तोलक की मात्रा का अध्ययन करेंगे। सामान्यतः परिचालन उत्तोलक एवं परिचालन उत्तोलक की मात्रा एक ही है। परिचालन उत्तोलक की मात्रा निम्न सूत्र से ज्ञात करेंगे

Percentage Change in EBIT Degree of Operating Leverage = Percentage Change in Sales

2. वित्तीय लीवरेज (Financial Leverage)-वित्तीय लीवरेज समता पर व्यापार का ही समानार्थी है। इन दोनों विचारधाराओं में कोई अन्तर नहीं है। हाँ, यह कहा जा सकता है कि वित्तीय लीवरेज का सिद्धान्त समता पर व्यापार के सिद्धान्त की ही एक परिष्कृत व्याख्या है। एक व्यावसायिक संस्था दो प्रकार के स्रोतों से पूँजी उगाह सकती है-ऐसे स्रोत जिन पर व्याज व लाभांश भुगतान के रूप में आने वाली लागत स्थिर होती है। चाहे कर व ब्याज से पूर्व लाभ की मात्रा कुछ भी क्यों न हो, इस स्थिर लागत का भुगतान करना ही होगा। दूसरे, ऐसे स्रोत जिन पर लाभांश के रूप में देय लागत परिवर्तनशील रहती है अर्थात् कर व ब्याज से पूर्व लाभ में से स्थिर ब्याज व लाभांश घटाने के बाद जो कुछ भी बचता है, वह इसी स्रोत का होता है। प्रथम वर्ग में ऋणपत्र व पूर्वाधिकार अंश को शामिल करते हैं और दूसरे वर्ग में समता अंशों को। जब व्यावसायिक संस्था के ऊपर स्थित वित्तीय चार्ज (ब्याज व लाभांश के रूप में) होता है, तभी वित्तीय लीवरेज की उत्पत्ति होती है, अन्यथा नहीं। परिचालन लाभ में परिवर्तन के साथ-साथ इन स्थिर वित्तीय चार्ज में कोई परिवर्तन नहीं होता है। चाहे परिचालन लाभ की मात्रा कुछ भी क्यों न हो, इन स्थिर वित्तीय चार्ज का भुगतान तो करना ही पड़ता है। इनके भुगतान के बाद बचा परिचालन लाभ समता अंशधारियों का होता है। कर व ब्याज से पूर्व लाभ में परिवर्तन का अंशधारियों के लिए उपलब्ध लाभ पर पड़ने वाले प्रभाव से ही वित्तीय लीवरेज का सम्बन्ध होता है। एक संस्था स्थिर वित्तीय चार्ज सम्बन्धी स्रोत से पूँजी उगाहकर कर व ब्याज से पूर्व लाभ में परिवर्तन लाकर, समता अंशधारियों की आय में वृद्धि ला सकती है। दूसरे शब्दों में, जब ऋण-पूँजी व पूर्वाधिकार अंश पूँजी का प्रयोग करके सम-अंशधारियों के लिए उपलब्ध आय के प्रत्याय दर में वृद्धि की जाती है, तो उसे वित्तीय लीवरेज की संज्ञा दी जाती है। कुछ परिभाषाएँ स्मरणीय हैं

  • जॉन जे हैम्पटन (John J. Hampton) के अनुसार, “वित्तीय लीवरेज तब विद्यमान होता है, जब एक फर्म के पास ऋण या कोष के अन्य स्रोत हैं जो स्थायी प्रभार वाले हैं।”
  • जेम्स सी. वान होर्न (James C, Van Horne) के अनुसार, “वित्तीय उत्तोलक में स्वायी लागत कोषों का प्रयोग सामान्य अंशधारियों के प्रत्याय को बढ़ाने की आशा से किया जाता

अनुकूल या धनात्मक वित्तीय लीवरेज उस समय माना जाता है, जब संस्था कोषों से खरीदी गई सम्पत्ति पर इतना अर्जन करती है, जो कोषों की स्थिर लागत से अधिक हो। जब संस्था कोषों से क्रय की गई सम्पत्ति से इतना अर्जन करती है, जो कोर्षों की स्थिर लागत से कम हो, तो वित्तीय लीवरेज प्रतिकूल माना जाता है। वित्तीय लीवरेज की विद्यमानता की जांच कर से पूर्व लाभ व प्रति अंश आय दोनों के सन्दर्भ में की जाती है। स्थिर लागत वाली पूँजी के प्रयोग से जब प्रति अंश आय में वृद्धि हो जाए या कर से पूर्व लाभ में वृद्धि हो जाए, तो उस स्थिति को अनुकूल वित्तीय लीवरेज की स्थिति मानेंगे।

वित्तीय उत्तोलक के लिए निम्न सूत्रों का प्रयोग किया जाता है (i) जब कम्पनी की पूँजी संरचना में समता अंश व पूँजी एवं ऋण पूँजी हो

परिचालन उत्तोलक एवं वित्तीय उत्तोलक में सम्बन्ध (Relationship Between Operating and Financial Leverage)

परिचालन उत्तोलक एवं वित्तीय उत्तोलक में घनिष्ठ सम्बन्ध है। परिचालन उत्तोलक विनियोग निर्णयों से सम्बन्धित है जबकि वित्तीय उत्तोलक पूँजी संरचना निर्णयों से सम्बन्धित है। वित्तीय उत्तोलक परिचालन लाभ और समता पर प्रत्याय के मध्य सम्बन्ध दर्शाता है जबकि परिचालन उत्तोलक परिचालन लाभों और बिक्री में सम्बन्ध बतलाता है। इसी प्रकार वित्तीय उत्तोलक ब्याज व कर से पूर्व लाभों (EBIT) को प्रभावित करता है जबकि वित्तीय उत्तोलक ब्याज एवं कर के पश्चात् (EAIT) के लाभों को प्रभावित करता है। जब एक फर्म दोनों उत्तोलकों का उपयोग करती है तब दोनों का मिश्रित प्रभाव अंशधारियों के प्रत्याय एवं जोखिम को प्रभावित करता है जिसे ‘कुल उत्तोलन’ कहते हैं। इस प्रकार की स्थिति में विक्रय की मात्रा में मामूली सा परिवर्तन प्रति अंश अर्जनों या समता पर प्रत्याय दर में व्यापक उच्चावचनों को जन्म देता है। किन्तु उत्तोलकों का अत्यधिक उपयोग परिचालन एवं वित्तीय जोखिम अथवा प्रत्याय की अनिश्चितता को बढ़ावा देते हैं। वित्तीय उत्तोलक वहाँ प्रारम्भ होता है जहाँ परिचालन उत्तोलक समाप्त होता ह।

संयुक्त अथवा मिश्रित उत्तोलक (Composite or Combined Leverage)

स्थायी परिचालन व्यय तथा स्थायी वित्तीय व्ययों के आधार पर जो उत्तोलक ज्ञात किया जाता है, उसे संयुक्त उत्तोलक कहते हैं। परिचालन लीवरेज का व्यावसायिक जोखिम पर प्रभाव पड़ता है और इसका मापन बिक्री में प्रतिशत परिवर्तन के कारण EBIT में हुए प्रतिशत परिवर्तन के रूप में किया जाता है। वित्तीय लीवरेज का प्रभाव वित्तीय जोखिम पर पड़ता है और इसका मापन EBIT में प्रतिशत परिवर्तन के कारण EBT या EPS में हुए प्रतिशत परिवर्तन के रूप में किया जाता है। चूँकि ये दोनों लीवरेज स्थिर प्रभार (स्थिर संचालन लागत परिचालन लीवरेज में और स्थिर वित्तीय लागत वित्तीय लीवरेज में) को पूरा करने में संस्था की योग्यता का निर्धारण करते समय आपस में घनिष्ठ सम्बन्ध रखते हैं, अतः जब हम दोनों को मिश्रित कर दें तो उसका परिणाम कुल लीवरेज या संयुक्त लीवरेज होगा। संयुक्त लीवरेज की गणना से परिचालन व वित्तीय लीवरेज के संयुक्त प्रभाव को स्पष्ट किया जा सकता है। संयुक्त लीवरेज का सूत्र निम्न है-

CL = Combined Leverage

CL = OL x FL

OL = Operating Leverage

FL = Financial Leverage

संयुक्त उत्तोलक का प्रभाव (Affects of Combined Leverage) अनिश्चितता तथा जोखिम की सीमा का विश्लेषण प्रायः परिचालन अनुपात तथा वित्तीय लीवरेज के सम्मिलित प्रभाव के आधार पर आकलित किया जाता है। मान लीजिए कि यदि किसी कम्पनी का परिचालन लीवरेज चार है और उसका वित्तीय लीवरेज भी चार है तो उसका संयुक्त लीवरेज 16 होगा तथा उसकी ‘अनुकूलता’ तथा प्रतिकूलता की सीमा 16 गुना अर्थात् 1600 प्रतिशत होगी। इसका आशय यह हुआ कि ऐसी कम्पनी की स्थिति अत्यन्त ही जोखिमपूर्ण होगी। ऐसी कम्पनी में विक्रय और परिचालन लाभ में एक निश्चित मात्रा में वृद्धि उसके कर-सहित लाभों में सोलह गुना वृद्धि कर देगी, किन्तु दूसरी ओर उनमें एक निश्चित मात्रा में कमी उसके कर-सहित लाभों में सोलह गुना कमी कर देगी। दूसरे शब्दों में यदि यह कहा जाय कि उत्तम वर्षों में ऐसी कम्पनी बाजार की नजरों में चढ़ जायेगी। क्योंकि उसके लाभ एवं लाभांशों की अधिकता के कारण उसके अंशों के बाजार मूल्यों में अप्रत्याशित वृद्धि हो जायेगी। दूसरी ओर यदि बुरे दिन आते हैं तो लाभ की मात्रा इतनी कम होगी कि ऋण-पूँजी का भार वहन करना उसके बूते के बाहर होगा। ऐसी स्थिति जारी रहने पर घाटे के कारण ऐसी कम्पनी अपनी स्वामी-पूँजी को ही खाने लगेगी तथा उसके अंश बाजार में बट्टे पर बिकने लगेंगे फिर उनका कोई खरीददार नहीं मिलेगा। यदि किसी कम्पनी की परिचालन व वित्तीय दोनों लीवरेज बहुत ही कम है, तो कुल जोखिम की मात्रा भी बहुत कम होगी, जो इस तथ्य का सूचक होगा कि कम्पनी फूंक-फूंक कर कदम बढ़ा रही है। ऐसी कम्पनी प्रायः विनियोग के अच्छे अवसरों से वंचित रह जाती है, क्योंकि विकास, विस्तार तथा विविधीकरण के लिए समय पर आवश्यक कोषों की व्यवस्था करना उसके लिए कठिन होता है। यदि परिचालन लीवरेज ऊँचा है, परन्तु वित्तीय लीवरेज नीचा है तो एक की प्रतिकूलता को दूसरे की अनुकूलता कुछ सीमा तक करने में सहायक होगी। सबसे अच्छी स्थिति वह होगी जब किसी कम्पनी का परिचालन लीवरेज नीचा हो, किन्तु वित्तीय लीवरेज ऊँचा हो, क्योंकि इसमें पहले की सुरक्षा उपान्त के कारण कम्पनी ऊँचे ऋण-समता अनुपात पर व्यवसाय का संचालन करते हुए अधिकतम लाभों का अर्जन करने में सफल होगी।

लीवरेज का महत्व (Importance of Leverage) वित्तीय प्रबन्ध के लिए लीवरेज एक बहुत ही महत्वपूर्ण एवं उपयोग तकनीक है, जिसका सावधानी से प्रयोग करके समता अंशधारियों की प्रति आय, प्रति अंश लाभांश और उनके विनियोगों के बाजार मूल्य को बढ़ाया जा सकता है। जैसा कि पहले ही बताया गया है, लीवरेज एक दो धार वाली तलवार है, जो बिक्री और परिचालन लाभ में परिवर्तन का बढ़ा-चढ़ा प्रभाव (वृद्धि या कमी के रूप में) कर से पूर्व आय (EBT) या प्रति अंश आय (EPS) पर डालते हैं। जब ऋण-पूँजी की लागत अर्जन दर से कम हो, तो ऋण पूँजी का प्रयोग कर से पूर्व आय व प्रति अंश आय में अधिक वृद्धि करके अंशधारियों के लिए यह वरदान साबित होता है, परन्तु दूसरी ओर यह व्यवसाय के लिए अभिशाप भी सिद्ध हो सकता है, जब ऋण पूँजी की लागत अर्जन दर से अधिक हो जाए। लीवरेज एक कम्पनी की पूँजी संरचना निर्धारित करने, समता पूँजी अंशधारियों को अधिकतम आय देने तथा कम्पनी की औसत पूँजी लागत में कमी करने के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण है। लीवरेज के महत्व का विवेचन निम्न रूप में किया जा सकता है

(1) पूँजी संरचना के निर्धारण में उपयोगी (Useful in Determination of Capital (Structure ) — वित्तीय प्रबन्धन निर्णयों में इस तकनीक का बहुत अधिक प्रयोग किया जाता है। पूँजी संरचना के सर्वश्रेष्ठ स्वरूप निर्धारण में इस तकनीक की सहायता ली जा सकती है। इस तकनीक से पूँजी संरचना में विभिन्न प्रतिभूतियों का वह अनुपात निर्धारित किया जा सकता है जिस पर औसत पूँजी लागत न्यूनतम हो। पूँजी संरचना में लीवरेज के समावेश से समता अंशधारियों को उपलब्ध लाभ में होने वाले परिवर्तनों का विस्तार किया जा सकता है।

(2) विनियोग निर्णय में उपयोगी (Useful in Investment Decision) विनियोगों निर्णयों में भी लीवरेज की तकनीक अधिक उपयोगी सिद्ध होती है। लीवरेज की नीति व्यापार का विस्तार सीमा पर प्रकाश डालती है और परामर्श देती है कि यदि व्यापार के भावी विस्तार कार्यक्रम में लगाई गई पूँजी पर आशंसित प्रदाय की दर उन पर होने वाले स्थिर लागत की दर से कम है, तो विस्तार योजना को लागू नहीं करना चाहिए। इसके विपरीत दशा में विस्तार योजना को अपनाना चाहिए। इस प्रकार लीवरेज विनियोग निर्णय लेने में सहायक होता है।

(3) समता अंशधारियों की आय बढ़ाने में उपयोगी (Useful in Increasing Equity Shareholders Earning) लीवरेज की सहायता से वित्तीय प्रबन्धक ऐसी वित्तीय योजना व पूँजी संरचना की रचना कर सकता है ताकि समता अंशधारियों के लिए उपलब्ध आय (प्रति अंश आय के रूप में या याती के मूल्य के रूप में) अधिकतम हो सके। लीवरेज के प्रयोग से ऐसा इसलिए सम्भव हो पाता है कि पूँजी संरचना में स्थिर लागत की मात्रा बढ़ने से औसत पूँजी लागत में कमी आती है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि ‘लीवरेज’ एक ऐसे उपकरण के समान है जो दुतरफा काट करता है। दूसरे शब्दों में, यह एक ओर जोखिम में वृद्धि करता है तो दूसरी ओर विनियोजित पूँजी पर प्रत्याय की दर में भी वृद्धि करने का अवसर प्रदान करता है। जब तक विक्रय से प्राप्त होने वाली आय का स्तर ऊँचा रहता है ऊँचा लीवरेज स्वामी-पूँजी पर अनुपात से अधिक लाभ प्रदान करने में सफल होता है; किन्तु विक्रय आय में गिरावट होने पर यह स्वामी- पूँजी पर लाभ में प्रतिशत में अनुपात से अधिक कभी भी कर देता है। इसी प्रकार थोड़ी-सी ‘प्रतिकूलता’ लाभों में अनुपात से अधिक ‘कमी’ उत्पन्न कर सकती है। अतः यह कहना उचित होगा कि ऊँचे लीवरेज के आधार पर व्यवसाय संचालन के लिए ऊँचे स्तर की सतर्कता की अपेक्षा होती है।

उत्तोलन की सीमाएँ (Limitations of Leverage )

(1) अस्पष्ट लागत की उपेक्षा (Implict Cost is Ignored )-इस तकनीक में ऋण पूँजी की अस्पष्ट लागत (Implicit Cost) की उपेक्षा की जाती है और केवल स्पष्ट लागत (Explicit Cost ) को ध्यान में रखा जाता है। उत्तोलन के अनुसार अतिरिक्त पूँजी को ऋण पूँजी से तब तक पूरा करना चाहिए जब तक सम्भावित आय दर ऋण पूँजी की लागत से अधिक है। परन्तु इस प्रक्रिया में अंशधारियों के हितों की रक्षा नहीं हो पाती। ऋणों की निरन्तर वृद्धि से फर्म में जोखिम की मात्रा बढ़ती है जिससे अन्ततः अंशों के मूल्य में भी कमी आने लगती है। अंशों के मूल्य में यह ह्रास ऋण पूँजी की अस्पष्ट लागत कही जाती है और इस अस्पष्ट लागत की इस तकनीक में उपेक्षा की जाती है। अतः उत्तेलन तकनीक की इस महत्वपूर्ण सीमा को प्रबन्धकों को ध्यान में रखना चाहिए।

(2) ऋण पूँजी की लागत में परिवर्तन (Change in Cost of Debt Capital) उत्तोलन-विश्लेषण इस मान्यता पर आधारित है कि ऋण पूँजी की लागत सदैव समान रहती है। परन्तु यह मान्यता अव्यावहारिक है। ऋण पूँजी की एक निश्चित सीमा के बाद अतिरिक्त ऋण को प्राप्त करने में कठिनाई होती है और प्रत्येक अगला ऋण ऊँचे ब्याज दर पर प्राप्त होता है। इससे प्रत्येक अगले ऋण से व्यवसाय की जोखिम बढ़ती है। अतः केवल उत्तोलन के आधार पर ही वित्तीय प्रबन्धक को कोई अन्तिम निर्णय नहीं लेना चाहिए बल्कि इस तकनीक का प्रयोग अन्य विश्लेषण तकनीकों के एक पूरक के रूप में करते हुए वित्तीय विश्लेषण करना चाहिए।