पूँजी दन्तीकरण से आप क्या समझते हैं ? ‘उच्च पूँजी दन्तीकरण’ एवं निम्न पूँजी दन्तीकरण शब्दों की व्याख्या कीजिए और पूँजी ढाँचा डिजाइन में इनके महत्व को समझाइए ।

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पूँजी दन्तीकरण का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Capital Gearing)

पूँजी मिलान या दन्तीकरण का तात्पर्य कुल पूँजीकरण में विभिन्न स्रोतों से प्राप्त की जाने वाली पूँजी के अनुपात के विषय में निर्णय लेना होता है। यदि कुल पूँजीकरण में स्थिर ब्याज वाली प्रतिभूतियों एवं स्थिर लाभांश वाली प्रतिभूतियों का हिस्सा कम है, तो उसे निम्न पूँजी मिलान कहेंगे। इस दशा में स्वामी पूँजी अधिक और पूर्वाधिकार व ऋण व पूँजी कम होती है। इसके विपरीत, जब कुल पूँजीकरण में स्थिर ब्याज व स्थिर लाभांश वाली प्रतिभूतियों का हिस्सा अधिक होता है, तो उसे उच्च पूँजी मिलान कहा जाता है। कुछ विद्वानों ने पूँजी मिलान को पूँजी लीवरेज के नाम से सम्बोधित किया है।

पूँजी मिलान निम्न या उच्च हो इस सम्बन्ध में लिया जाने वाला निर्णय बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। प्रायः संस्था की आय में उच्चावचन होते रहते हैं और इसका प्रभाव समता अंशधारियों को प्राप्त होने वाली आय पर भी पड़ता है। यह भी ध्यान में रखना होगा कि उच्च पूँजी मिलान उच्च पूँजी लीवरेज का पर्यायवाची बन गया है। ऐसी मान्यता है कि व्यवसाय की प्रगति व आय में वृद्धि के साथ-साथ उच्च पूँजी मिलान का सहारा लेकर स्वामित्व पूँजी पर लाभ की दर में वृद्धि की जा सकती है। उच्च पूँजी मिलान उच्च पूँजी लीवरेज ही होता है, अतः इसके आधार पर वित्तीय लीवरेज का लाभ उठाया जा सकता है अर्थात् स्वामी पूँजी की तुलना में स्थिर ब्याज वाली ऋण पूँजी व स्थिर लाभांश वाली पूर्वाधिकार पूँजी का अधिक प्रयोग करके लाभ को बढ़ाया जा सकता है।

ब्राउन एवं हावर्ड के अनुसार, ‘पूँजी दन्तीकरण शब्द का प्रयोग किसी कम्पनी की साधारण अंश पूँजी एवं स्थिर ब्याज वाली प्रतिभूतियों के मध्य अनुपात को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है।” जे. बैटी के अनुसार, “समता अंशों के पूर्वाधिकार अंश पूँजी एवं ऋण पूँजी के सम्बन्ध को पूँजी दन्तीकरण कहते हैं।”

पूँजी मिलान की जाँच करने के लिए एक अनुपात का प्रयोग किया जाता है जिसे पूँजी मिलान अनुपात कहते हैं। यह अनुपात स्वामी पूँजी और स्थिर ब्याज वाली ऋण व पूर्वाधिकार पूँजी के बीच स्थिर सम्बन्ध को दर्शाता है। सूत्र के रूप में

Capital Gearing Ratio = Equity Capital +Reserves Pref. Capital + Int. bearing finance

पूँजी दन्तीकरण के प्रकार (Kinds of Capital Gearing) पूँजी दन्तीकरण निम्न प्रकार का होता है— (i) उच्च दन्तीकरण (High Gearing)-जब किसी कम्पनी की पूँजी में साधारण अंश पूँजी अन्य स्थिर ब्याज वाली प्रतिभूतियों की तुलना में कम होती है तो इसे उच्च दन्तीकरण कहते हैं। उच्च दन्तीकरण की स्थिति में दन्ती अनुपात कम होता है। माना कि एक संस्था की कुल पूँजी 1,00,000 रुपये है जिसमें साधारण अंश 25,000 रुपये, पूर्वाधिकार अंश 25,000 रुपये व ऋण-पत्र 50,000 रुपये के हैं। यहाँ दन्ती अनुपात 25,000 75,000 अर्थात् 1:3 का होगा यह उच्च दन्तीकरण की स्थिति है।

(ii) निम्न दन्तीकरण (Low Gearing)- निम्न दन्तीकरण उच्च दक्तीकरण के विपरीत स्थिति को व्यक्त करता है। निम्न दन्तीकरण में साधारण अंश पूँजी का अनुपात स्थायी लागत प्रतिभूतियों की तुलना में अधिक होता है। निम्न दन्तीकरण की स्थिति में दन्ती अनुपात अधिक होता है। माना कि किसी संस्था में साधारण अंश पूँजी 50,000 रुपये तथा पूर्वाधिकार अंश पूँजी 1,25,000 रुपये तथा ऋण-पत्र 12,500 रुपये के हैं तो यह निम्न दन्तीकरण की स्थिति है तथा यहाँ दन्त अनुपात 50,000 : 25,000 अर्थात् 2:1 का होगा।

पूँजी दन्तीकरण के प्रयोग की विधि (Procedure or Using Capital Gearing)

पूँजी दब्तीकरण की तुलना एक मोटर के गियर बॉक्स से की जाती है। जिस तरह मोटर को चालू करने व गति देने के लिए शुरू में नीचे गियर का प्रयोग करते हैं और जैसे-जैसे गति बढ़ानी हो, वैसे-वैसे उच्च गियर में लाते हैं ठीक उसी तरह व्यवसाय को स्थापित करने व कार्य प्रारम्भ करने की प्राथमिक अवस्था में नीचा दब्तीकरण अर्थात् समता अंशों का प्रयोग, ऋण व पूर्वाधिकार अंशों की तुलना में अधिक किया जाता है। जैसे-जैसे व्यवसाय की गति व प्रगति बढ़ती जाती है अर्थात् व्यवसाय की आय नियमित होने लगती है या बढ़ने लगती है, वैसे-वैसे स्थिर ब्याज वाली प्रतिभूतियों का अनुपात कुल पूँजीकरण में बढ़ाने लगते हैं अर्थात् उच्च दन्तीकरण का प्रयोग करने लगते हैं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि व्यवसाय की प्रारम्भिक अवस्था में नीचा दन्तीकरण का प्रयोग करना चाहिए और जब व्यवसाय की प्रगति के साथ आय निगमित व निश्चित हो जाय, तो उच्च दब्तीकरण का प्रयोग करना चाहिए।

व्यवसाय में प्रयोग की जाने वाली पूँजी को दन्तीकरण के प्रयोगार्थ निम्न भागों में बाँटा जा सकता है

(i) स्थायी लागत पूँजी (Fixed Cost Capital) यह वह पूँजी होती है जिस पर ब्याज अथवा लाभांश स्थिर दर से किया जाता है। इसमें पूर्वाधिकार अंश व ऋण-पत्र सम्मिलित किए जाते हैं। (ii) परिवर्तनशील लागत पूँजी (Variable Cost Capital)- इसमें साधारण अंश पूंजी सम्मिलित होती है जिसकी लागत अनिश्चित अवदा परिवर्तनशील होती है। साधारण अंशों पर लाभांश की मात्रा संचालकों की नीति तथा कुल आय में से स्थायी लागत पूँजी के प्रतिफल को घटा देने पर शेष बदी राशि पर निर्भर करती है।

(iii) बिना लागत पूँजी (No Cost Capital) इसमें वह समस्त धनराशि सम्मिलित की जाती है जिसका प्रयोग व्यवसाय में संस्था द्वारा किया जाता है लेकिन जिस पर कोई प्रतिफल नहीं देना पड़ता है। उदाहरणार्थ, व्यापार साख अदत्त व्यय, संचित कोष आदि। पूँजी दन्तीकरण का महत्व (Importance of Capital Gearing)-एक सन्तुलित एवं समुचित पूँजी दब्तीकरण उपक्रम के कुशल संचालन में अत्यधिक सहायक होता है। पूँजी दन्तीकरण का उपक्रम की पूँजी संरचना से सम्बद्ध होने के कारण इसे पूंजी का गुणात्मक पहलू कहा जाता है। दन्तीकरण के प्रयोग से विभिन्न स्रोतों द्वारा प्राप्त पूंजी में उचित अनुपात निर्धारित किया जा सकता है तथा प्राप्त धन का अधिकतम उपयोग किया जा सकता है। पूँजी दन्तीकरण के प्रयोग द्वारा विभिन्न प्रतिभूतियों का सन्तुलित मिश्रण निर्धारित किया जा सकता है। यह सन्तुलित मिश्रण विनियोक्ताओं, ऋणदाताओं तथा उपक्रम के लिए लाभदायक होता है। उचित दन्तीकरण के द्वारा उपक्रम व्यापार चक्रों के कुप्रभाव से बच सकता है। संक्षेप में, इसके महत्व को निम्न शीर्षकों के रूप में व्यक्त किया जा सकता है

1. विभिन्न स्रोतों द्वारा प्राप्त की जाने वाली पूंजी में सन्तुलित मिश्रण निर्धारित करना;

2. प्राप्त धन का अधिकतम सम्भव उपयोग किया जाना;

3. स्वामियों को अधिकतम आय प्रदान करना;

4. व्यापार चक्रों के कुप्रभावों से सुरक्षा।