कार्यशील पूँजी पूर्वानुमान से आपका क्या आशय है ? इस प्रकार के अनुमान में प्रयुक्त विधियों की संक्षेप में व्याख्या कीजिए।

61

कार्यशील पूँजी पूर्वानुमान का आशय (Meaning of Working Capital Forecast)

किसी व्यावसायिक संस्था में व्यावसायिक क्रियाओं के सफल संचालन के लिए वित्तीय प्रबन्धकों द्वारा कार्यशील पूँजी का निर्धारण करना अत्यन्त आवश्यक है। इसके लिए कार्यशील पूँजी की आवश्यकताओं का पूर्वानुमान लगाया जाता है। कार्यशील पूँजी का अनुमान लगाना कोई सरल कार्य नहीं है और न इसके लिए कोई सर्वमान्य सूत्र एवं सिद्धान्त ही है। क्योंकि इसके लिए क्रियाशीलता के प्रत्येक पहलू का गहन अध्ययन एवं जटिल गणनाओं की आवश्यकता होती है। इन सभी गणनाओं का मुख्य आधार रोकड़ की प्राप्ति है।

कार्यशील पूँजी पूर्वानुमान का आशय किसी निश्चित समय एवं उत्पादन स्तर पर कार्य संचालन हेतु भावी रोकड़ आवश्यकताओं का निर्धारण करने से है, ताकि संस्था के वित्तीय स्रोतों में उचित तरलता बनी रहे। दूसरे शब्दों में, कार्यशील पूँजी पूर्वानुमान का तात्पर्य किसी निश्चित उत्पादन स्तर पर कार्य करने हेतु रोकड़ प्रवाहों की सहायता से कार्यशील पूँजी के लिए रोकड़ की भावी आवश्यकता एवं उपलब्धता का अनुमान लगाने से है, ताकि सामान्य व्ययों की पूर्ति आसानी से होती रहे।

कार्यशील पूँजी का पूर्वानुमान लगाने की विधियाँ (Method of Forecasting Working Capital): कार्यशील पूँजी का पूर्वानुमान लगाने की प्रमुख विधियों या तकनीकों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) रोकड पूर्वानुमान विधि (Cash Forecasting Method)—इस विधि के अन्तर्गत अवधि के आरम्भ के रोकड़ शेष को आधार मानते हैं, तत्पश्चात् उस अवधि में होने वाली सम्भावित आय एवं व्ययों का पूर्वानुमान लगाकर अवधि के अन्त में रोकड़ शेष का निश्चय करते हैं। अतः इस विधि के आधार पर यदि रोकड़ शेष में कमी आती है तो वित्त प्रबन्धन के उपाय प्रबन्धक पहले से सोच लेते हैं एवं रोकड़ शेष का आधिक्य है तो अल्पकालीन विनियोगों की व्यवस्था कर सकते हैं।

(2) प्रक्षेपी लाभ-हानि खाता (Project Profit and Loss Method)- इस विधि में सर्वप्रथम आगामी अवधि के लिये आवश्यक कार्यशील पूँजी का अनुमान लगाने के लिये विभिन्न लेन-देनों का पूर्वानुमान लगाया जाता है। तत्पश्चात् पूर्वानुमानित लाभ-हानि खाता बनाकर शुद्ध लाभ ज्ञात कर लिया जाता है। इस प्रकार ज्ञात किये गये शुद्ध लाभ में गैर-रोकड़ मदें जैसे-हास, सम्पत्ति कर, विक्रय पर हानि आदि शामिल होते हैं अतः शुद्ध कार्यशील पूँजी की गणना करते समय इनका समायोजन कर लिया जाता है। इसे निम्न प्रारूप में प्रदर्शित किया गया है

  • Computation of Working Capital
  • Net Profit or Income
  • Add: Non-Cash Items
  • Less: Cash outflows Netchange in Working Capital

(3) प्रक्षेपी चिट्ठा विधि (Projected Balance sheet Method)—इस विधि के अन्तर्गत भावी आवश्यकताओं का अनुमान लगाने के बाद विभिन्न सम्पत्तियों तथा दायित्वों का पूर्वानुमान लगाया जाता है। तत्पश्चात् पूर्वानुमानित तथ्यों की सहायता से संस्था का आर्थिक चिट्ठा तैयार किया जाता है। इस आर्थिक चिट्ठे को ही प्रक्षेपी चिट्ठा कहते हैं। इस चिट्ठे में प्रदर्शित की गई अनुमानित चालू सम्पत्तियों एवं अनुमानित चालू दायित्वों का अन्तर ही अनुमानित कार्यशील पूँजी कहलाती है।

(4) चालू सम्पत्तियों एवं चालू दायित्वों की पूर्वानुमान विधि (Forecasting of Current As sets and Current Liabilities Method) कार्यशील पूँजी के अनुमान की यह सबसे लोकप्रिय विधि है। इस विधि के अनुसार सर्वप्रथम संस्था की भावी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए चालू सम्पत्तियों एवं चालू दायित्वों का अनुमान लगाया जाता है। तत्पश्चात् चालू सम्पत्तियों में से चालू दायित्वों को घटाकर कार्यशील पूँजी की गणना कर ली जाती है। प्रायः चालू सम्पत्तियों की प्राप्ति के लिए आवश्यक वित्त का मासिक या साप्ताहिक आधार पर निर्धारण किया जाता है तथा बाद में मासिक आवश्यकताओं को कुल अवधि से गुणा करके प्रत्येक चालू सम्पत्ति हेतु आवश्यक कार्यशील पूँजी की गणना कर ली जाती है। चालू सम्पत्तियों का अनुमान गत अनुभव, साख नीति, स्कन्ध नीति व भुगतान नीति आदि के आधार पर किया जाता है। इस प्रकार प्राप्त कुल सम्पत्तियों की राशि के योग में से सम्भावित साख की राशि को घटाकर कार्यशील पूँजी की आवश्यक राशि का निर्धारण कर लिया जाता है। इस आवश्यक राशि में आकस्मिकताओं के लिए दिए गए प्रावधान को भी जोड़ा जाता है। तत्पश्चात् कुल योग में से यदि कुल राशि बैंक या अन्य वित्तीय संस्थाओं से मिली है उसे घटा दिया जाता है। शेष कार्यशील पूँजी की राशि का प्रबन्ध संस्था को करना पड़ता है। टण्डन समिति ने कार्यशील के अनुमान के लिए इसी विधि को काम में लेने का सुझाव दिया है। कार्यशील पूँजी के लिए ऋण मांगने पर बैंक व अन्य वित्तीय संस्थाएँ निर्धारण प्रारूप में कार्यशील पूँजी अनुमान की माँग करती हैं।

(5) परिचालन चक्र विधि (Operating Cycle Method) परिचालन विधि के द्वारा संस्था की रोकड़ कार्यशील पूँजी का पूर्वानुमान लगाया जाता है। रोकड़ कार्यशील पूँजी की गणना कुल परिचालन व्ययों (Total Operating Expenses) में सम्बन्धित अवधि के परिचालन चक्रों की संख्या (Num ber of Operating Cycle) का भाग देकर की जाती है। अतः कार्यशील पूँजी का अनुमान लगाने के लिए परिचालन व्ययों, परिचालन चक्र अवधि में परिचालन चक्रों की संख्या की गणना करना आवश्यक है,

इन्हें निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है:-

(i) परिचालन व्यय (Operating Expenses) किसी संस्था के परिचालन व्ययों में उस अवधि के समस्त प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष व्ययों को सम्मिलित किया जाता है। इन व्ययों का अनुमान लागत लेखों की सहायता से आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। ऐसे व्ययों में गैर-रोकड़ खर्चे को सम्मिलित नहीं किया जाता है। साथ ही किसी भी प्रकार के आयोजनों को भी शामिल नहीं किया जाता है। इन व्ययों की गणना करते समय मूल्य स्तर में परिवर्तन, उत्पादन मिश्रण में परिवर्तन आदि का समायोजन भी किया जाता है।

(ii) परिचालन चक्र की अवधि (Period of Operating Cycle) परिचालन चक्र की अवधि का आशय परिचालन की विभिन्न अवस्थाओं में लगने वाले कुल समय के योग से है। कुल समय के योग का तात्पर्य सामग्री प्राप्त करने से लेकर देनदारों की वसूली तक की अवधि से लगाया जाता है, परन्तु इसमें से लेनदारों द्वारा स्वीकृत अवधि को घटा दिया जाता है। इस अवधि की गणना निम्न प्रकार की जाती है

(अ) सामग्री संग्रहण अवधि (Material Storage Period) सामग्री संग्रहण अवधि वह अवधि है जिसमें सामग्री उत्पादन के निर्गमन में पहले गोदाम (Store) में रहती है। इसकी गणना सदैव सामग्री स्टॉक में दैनिक औसत उपभोग का भाग देकर की जा सकती है,