विक्रयकर्ता से आपका क्या आशय है ? विक्रयकर्त्ता के विभिन्न कार्यों की विवेचना कीजिए।

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आधुनिक युग में विक्रय-कला अनेक रूप में व्यापारिक जगत् में दृश्यमान है। चूँकि विक्रय में भिन्न-भिन्न प्रकार के ढंग प्रयुक्त होते हैं, इसी कारण विक्रेता भी अनेक प्रकार के हैं। विक्रता के प्रयासों का मुख्य उद्देश्य नये ग्राहकों की खोज कर व्यवसाय का सृजन करना है। यदि कुशल विक्रेता पर्याप्त मात्रा में न हो तो भारी मात्रा में विक्रय नहीं किया जा सकता है।

विक्रेता का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Salesman) सरल शब्दों में विक्रेता का आशय एक प्रतिनिधि से होता है, जो वस्तुओं या सेवाओं का विक्रय करता है। विक्रेता दुकान में या ऑफिस में बैठकर ग्राहकों से सम्पर्क करके विक्रय कार्य सम्पन्न करता है।

  • प्रो. ए. एल. मिलर (A. L. Millor) के अनुसार, “विक्रेता किसी व्यवसाय या सामाजिक साहस के. का प्रतिनिधि होता है जिसका मुख्य कार्य व्यवसाय की वस्तुओं या सेवाओं के बारे में जानकारी देना है, ताकि व्यक्ति उसके विचारों को स्वीकार करें जिससे दोनों को लाभ प्राप्त हो, परिणामस्वरूप वस्तुओं या सेवाओं का विनियोग हो सके ।”

मुख्य कार्य वस्तुओं या सेवाओं के विक्रय का सौदा करना है। विक्रेताओं के प्रकार या भेद उपर्युक्त परिभाषा के आधार पर यह कहा जा सकता है कि विक्रेता एक प्रतिनिधि है जिसका (Types of Salesman ) विक्रेता अनेक प्रकार के होते हैं। इस सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों के विभिन्न मत हैं। कुछ प्रमुख विद्वानों ने विक्रेताओं का वर्गीकरण निम्न प्रकार किया है

  • बी. आर. केनफील्ड (B. R. Canfield) के अनुसार विक्रेता निम्न छ प्रकार के होते हैं (i) विशिष्ट विक्रेता, (ii) कनिष्ठ विक्रेता, (iii) वरिष्ठ विक्रेता, (iv) विक्रय अभियन्ता, (v) मिशनरी विक्रेता, (vi) निर्यात विक्रेता
  • बिलियन ए. नीलेण्डर के अनुसार विक्रेता निम्न दो प्रकार के होते हैं-(i) सृजनशील विक्रेता, (ii) वृद्धिशील विक्रेता ।
  • मैकार्थी (Mc-Carthy) के अनुसार विक्रेता तीन प्रकार के होते हैं (i) आदेश प्राप्त करने वाला विक्रेता, (ii) आदेश लेने वाला विक्रेता, (iii) सहारा देने वाला विक्रेता अध्ययन की सुविधा के आधार पर हम विक्रेताओं को निम्न भागों में बाँट सकते हैं

(अ) नियोक्ताओं के आधार पर (On the Basic of Employers)

(1) निर्माता द्वारा नियुक्त विक्रेता (Manufacturer’s Salesman ) – यह विक्रेता निर्माता या उत्पादक द्वारा नियुक्त किया जाता है। इस प्रकार के विक्रेता का काम निर्माता या उत्पादक द्वारा उत्पादित वस्तु को बेचना है।

(2) थोक व्यापारी द्वारा नियुक्त विक्रेता (Wholesaler’s Salesman)-इस प्रकार के विक्रेता थोक व्यापारी द्वारा नियुक्त किये जाते हैं। इन विक्रेताओं का कार्य फुटकर व्यापारियों एवं बिचौलियों से सम्पर्क स्थापित करना तथा उनसे आदेश प्राप्त करना होता है। इस प्रकार के विक्रेता सामान को साथ में लेकर चलते हैं और फुटकर व्यापारियों द्वारा माँगे जाने पर उन्हें माल नगद या उधार देते रहते हैं। उधार विक्रय ये अपनी जोखिम पर ही करते हैं।

(3) फुटकर विक्रेता (Retail Salesman) वह विक्रेता जो या तो फुटकर व्यापारी द्वारा नियुक्त किया जाता है या स्वयं योक व्यापारी से थोड़ी-थोड़ी मात्रा में माल खरीदकर उपभोक्ता को बेचता है। इस प्रकार के विक्रेता का ग्राहकों से सीधा सम्बन्ध रहता है। यह विक्रयकर्ता भी दो प्रकार के होते है-(i) एक तो वे जो दुकान में ही कार्य करते हैं जिन्हें आन्तरिक विक्रयकर्ता कहते हैं, और (ii) दूसरे वे जो व्यवसाय से बाहर घूम-घूमकर माल बेचते हैं जिन्हें यात्री या बाहरी विक्रयकर्ता कहते हैं।

(4) विशिष्ट विक्रेता (Special Salesman) -जब कोई संस्था किसी विशिष्ट वस्तु का विक्रय करने के लिए विशिष्ट योग्यता वाले विक्रेताओं को नियुक्त करता है, तो इन विक्रेताओं को विशिष्ट विक्रेता कहा जाता है। विशिष्ट प्रकार की वस्तुओं में रेडियो, टेलीविजन, रेफ्रीजरेटर, पंखे, घड़ियाँ आदि आते हैं। इस प्रकार विक्रयकर्ता भी दो प्रकार के होते हैं-(i) औद्योगिक वस्तु के विक्रयकर्ता व (ii) उपभोक्ता वस्तु के विक्रयकर्ता। औद्योगिक वस्तु विक्रयकर्ता औद्योगिक वस्तुएँ, जैसे, गणना मशीन, टाइपराइटर, डुप्लीकेटर, आदि का विक्रय करते हैं जबकि उपभोक्ता वस्तु विक्रयकर्ता उपभोक्ता वस्तुएँ, जैसे, रेफ्रीजेरेटर, रेडियो, कपड़ा आदि बेचते हैं।

(5) निर्यात विक्रेता (Exporter’s Salesman)-जब कोई माल का निर्यात करने वाला अपने माल के निर्यात हेतु विक्रेताओं को नियुक्त करता है तो उसे निर्यात करने वाला विक्रेता कहा जाता है। यह विक्रेता विदेशी ग्राहकों से सम्पर्क स्थापित कर आदेश प्राप्त करता है, माल भेजने की उचित व्यवस्था करता है तथा माल भेजन के सम्बन्ध में उचित प्रबन्ध जैसे समुद्री बीमा आदि की व्यवस्था भी करता है।

(ब) स्थिति के आधार पर (On the Basis of Situation) (1) आन्तरिक विक्रेता (Internal Salesman)- आन्तरिक विक्रेता यह विक्रेता है जो दुकान पर ही विक्रय कार्य करते हैं और दुकान के बाहर विक्रय का कार्य नहीं करते हैं। डाक द्वारा व्यापार एवं काउण्टर के विक्रेता इसी श्रेणी में आते हैं। ऐसे विक्रयकर्ता भी दो प्रकार के होते हैं- (i) डाक द्वारा व्यापार के विक्रयकर्ता यह विक्रयकर्ता वे व्यक्ति होते हैं जो डाक द्वारा विक्रय करते हैं। इसके लिए वे ग्राहकों को विक्रय साहित्य भेजते रहते हैं जिनमें वस्तु के बारे में पूर्ण विवरण होता है। इसमें ग्राहक से आदेश डाक से आते हैं और उनकी पूर्ति भी डाक से ही होती है। (ii) काउण्टर विक्रयकर्ता वह विक्रयकर्ता जो वस्तुओं को दुकान पर बेचता है, ग्राहकों से बातचीत करता है, काउण्टर विक्रयकर्ता कहलाता है।

(2) बाह्य विक्रेता (External Salesman) – बाह्य विक्रेता वह विक्रेता है जो व्यापारगृह से बाहर जाकर व्यापार कार्य करते हैं तथा विक्रय सम्बन्धी क्रियाएँ सम्पादित करते हैं। इस प्रकार के विक्रेता प्रायः प्रवासी यात्री या भ्रमणशील होते हैं। यह निम्न दो प्रकार के होते हैं (i) यात्री विक्रयकर्ता यह विक्रयकर्ता स्थान-स्थान पर घूमता है और नियोक्ता के लिए आदेश प्राप्त करता है। इसका काम थोक एवं फुटकर विक्रेताओं से स्थान-स्थान पर सम्पर्क स्थापित करना है। इसके पास वस्तु के केवल नमूने ही होते हैं, जिनके आधार पर वह आदेश प्राप्त करता है। (ii) घर-घर विक्रेता-इस प्रकार के विक्रयकर्ता वस्तुओं को अपने थैलों, ठेलों, साइकिलों, रिक्शों आदि में रखकर विक्रय करता हुआ दिखायी देता है। यह विक्रयकर्ता सामान्य उपभोग की कम मूल्य वाली वस्तुओं को ही बेचते हैं।

(स) क्रियाओं के आधार पर (On the Basis of Activities) (1) सृजनशील विक्रेता-सृजनशील विक्रेता से तात्पर्य ऐसे विक्रेता से है जो नई वस्तुओं के बारे में प्रचार कर उसकी माँग बनाने का कार्य करता है। इस प्रकार के विक्रेताओं का उद्देश्य वस्तुओं का विक्रय करना नहीं, बल्कि वस्तुओं के प्रति जनसाधारण का विश्वास जगाना होता है ताकि वस्तुओं की माँग निर्मित हो सके तथा लोकप्रियता प्राप्त कर सके।

(2) वृद्धिशील विक्रेता-वह विक्रेता जो वस्तुओं की माँग में निरन्तर वृद्धि करने के प्रयास में रहता है तथा विक्रय वृद्धि एवं सम्बर्द्धन के लिए सतत् प्रयत्नशील रहता है। (द) मनोवृत्ति के आधार पर (On the Basis of Psychology)

(1) आदर्श विक्रेता-वह विक्रेता जो अपने व्यवहार तथा आदर्शों के आधार पर ग्राहकों पर प्रभाव जमा लेता है, आदर्श विक्रेता कहलाता है। ऐसे विक्रेता की बाजार में साख अच्छी रहती है तथा ऐसा विक्रेता पूर्णतः विश्वसनीयता समझा जाता है।

( 2 ) आडम्बरी विक्रेता-ऐसा विक्रेता चालाक होता है। वह अपने वाक्जाल में फैंसाकर ग्राहक को असत्य बात को ही बताता है। इस प्रकार का विक्रेता आडम्बरी, भ्रामक एवं असत्यभाषी होने के कारण अपनी ख्याति खो देता है।

(3) निराश विक्रेता-निराश या थका हुआ विक्रेता वह होता है जो निरुत्साही मन से ग्राहकों से व्यापार करता है। व्यापार के प्रति वह उदासीन रहता है और ग्राहकों को क्रय की प्रेरणा नहीं देता है। ग्राहकों द्वारा वस्तु के विषय में पूछे गये प्रश्नों सन्तोषजनक उत्तर भी नहीं देता है। ऐसा निराश थका हुआ तथा निरुत्साही विक्रेता व्यापारी के लिए भारस्वरूप होता है। सरल शब्दों में निराश विक्रयकर्ता वह विक्रयकर्ता है जो विक्रयकार्य को ठीक प्रकार से नहीं करता है और सदैव निराशावादी दृष्टिकोण को अपनाता है।

एक विक्रयकर्ता के कार्य (Functions of a Salesman)

विक्रयकर्ताओं को वस्तुओं के विक्रय की प्रक्रिया में बहुत से कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व निभाने पड़ते हैं जिन्हें विक्रयकर्ताओं के कार्य भी कहते हैं। यह निम्नलिखित हैं

(1) ग्राहकों से सम्पर्क करना- एक विक्रेता का सबसे प्रथम एवं सबसे महत्वपूर्ण कार्य अपनी वस्तु को बेचने के लिए सम्भावित ग्राहक अथवा ग्राहकों से भेंट करना है। प्रथम प्रभाव अन्तिम प्रभाव होता है, इस बात को ध्यान में रखकर भेंट को सर्वाधिक सफल बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए और भेंट के दौरान सम्भावित ग्राहक के साथ अपनत्व का भाव दर्शाना चाहिए।

(2) ग्राहकों का आदर-सत्कार जैसे ही कोई ग्राहक दुकान, कारखाने अथवा कार्यालय में प्रवेश करता है तो विक्रेता का यह पुनीत कार्य हो जाता है कि वह आये हुए ग्राहक का विनम्रतापूर्वक एवं आदर-सूचक शब्दों में स्वागत करे। यदि बातचीत के दौरान किसी बात पर ग्राहक नाराज भी हो जाय तो उसे आदर-सूचक शब्दों का प्रयोग करके नाराजगी को दूर करने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए।

(3) वस्तु के बारे में पूछताछ का उत्तर देना-वस्तु के बारे में पूछताछ ग्राहक द्वारा की जाती है। ग्राहक स्वयं विक्रेता से वस्तु के बारे में पूछताछ करे तो विक्रेता का कर्तव्य है कि वह उसका बड़े ही सन्तोषजनक ढंग से नपे-तुले शब्दों में उत्तर दे एवं वस्तु प्रस्तुत करे।

(4) ग्राहक की आपत्तियों का उचित उत्तर देना-विक्रयकर्ता का तीसरा उत्तरदायित्व ग्राहक द्वारा प्रस्तुत आपत्तियों का उचित निवारण करना है। इसके लिए विक्रयकर्ता को ‘ग्राहक सदा सही है।’ का अनुसरण करना चाहिए, लेकिन इसके साथ-साथ उसको अपने विवेक से भी काम लेना चाहिए। एक सन्तुष्ट ग्राहक सदा के लिए स्थायी ग्राहक बन जाता है।

(5) ग्राहक की वस्तुओं के चुनाव में सहायता करना-विक्रयकर्ता का चौथा कर्तव्य ग्राहक की वस्तुओं के चुनाव में सहायता करना है। बहुधा यह देखा जाता है कि ग्राहक को कई वस्तुएँ एक-सी दिखायी देती है। अतः वह निर्णय करने में कठिनाई अनुभव करता है कि किस वस्तु का क्रय करें। ऐसी स्थिति में ग्राहक को उचित राय देकर उसको निर्णय लेने में सहायता की जानी चाहिए।

(6) वस्तुओं के विभिन्न प्रयोगों की जानकारी देना एक विक्रयकर्ता का यह पाँचवाँ उत्तरदायित्व है कि वह वस्तु के विभिन्न प्रयोगों की जानकारी उस वस्तु के ग्राहकों को अवश्य दे जिससे कि वे भी इस जानकारी से लाभ उठा सकें।

(7) वस्तुओं के बारे में पूर्ण जानकारी रखना- एक विक्रयकर्ता को अपनी वस्तु एवं प्रतियोगी वस्तुओं के बारे में पूर्ण जानकारी होनी चाहिए जिससे कि वह ग्राहकों को जानकारी दे सके तथा उनके साथ उचित व्यवहार कर सके। इसके साथ-साथ उसको यह जानकारी भी होनी चाहिए कि उसकी दुकान या गोदाम में उन वस्तुओं का कितना स्टॉक है। इसके लिए इसको ‘स्टॉक बुक’ रखनी चाहिए तथा प्रतिदिन की बिक्री एवं आवक माल को चढ़ाकर प्रतिदिन बाकी निकालनी चाहिए।

(8) विक्रय खिड़की को सजाना-विक्रयकर्ता का यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण कार्य है। उसको विक्रय काउण्टर बहुत ही सुन्दर ढंग से सजाकर रखना चाहिए जिससे कि राहगीर भी आकर्षित होकर पूछताछ करने के लिए दुकान के अन्दर प्रवेश कर सके। यदि विक्रयकर्ता भ्रमण करने वाला है तो उसके पास आवश्यक साहित्य आकर्षक कागजों पर छपा होना चाहिए।

(9) इच्छाओं को आवश्यकताओं में परिणित करने में सहायता करना-ग्राहक की विभिन्न प्रकार की इच्छाएँ होती हैं। विक्रेता अपने अनुभव के आधार पर ग्राहक की इच्छाओं का पता लगाता है और अपनी कुशल विक्रयकला के आधार पर उन इच्छाओं को आवश्यकताओं बनाने में सहायता प्रदान करता है।

(10) ग्राहकों को सन्तुष्टि प्रदान करना-विक्रेता का एक महत्वपूर्ण कार्य ग्राहकों को क्रय में पूर्ण सन्तुष्टि प्रदान करना है। जैसे-यदि ग्राहक ने कोई वस्तु खरीदी है और वह बाद में उसे बदलना चाहता है तो उसे बिना किसी संकोच के बदल देना चाहिए।

(11) प्रभावी सन्देशवाहन स्थापित करना-विक्रेता को अपने ग्राहकों के साथ निरन्तर सम्पर्क बनाकर प्रभावी सन्देशवाहन की स्थापना करनी चाहिए। ऐसा करने से ग्राहक अपनी समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति आपके यहाँ से ही वस्तुएँ खरीदकर करेगा, अपने इष्ट मित्रों को भी अपने साथ दुकान पर लायेगा।

(12) ख्याति का निर्माण करना-विक्रेता का कर्तव्य है कि वह अपने स्वामी की संख्या की ख्याति का निर्माण करे एवं उसमें वृद्धि करे तथा उसके प्रति स्वामिभक्त बना रहे।