विपणन की रीति-नीति या विपणनीय व्यूहरचना से आपका क्या अभिप्राय है ? समग्र विपणन रीति-नीति बनाते समय विचार किये जाने तथ्यों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

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विपणन रीति-नीति का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Marketing Strategy) : बाजार में समय-समय पर कुछ नये प्रतियोगी प्रवेश करते हैं या कुछ प्रतियोगी बाजार छोड़कर चले जाते हैं। कुछ प्रतिस्पर्द्धा अपनी विपणन नीति में परिवर्तन करते रहते हैं। ऐसी स्थिति में संस्था के सम्मुख दो विकल्प होते हैं-प्रथम, संस्था बाजार सम्बन्धी परिवर्तनों के सम्बन्ध में तटस्थता की नीति अपनाये या दूसरा विकल्प यह है कि वह इन परिवर्तनों के अनुरूप अपनी नीति में समायोजन करे। कुशल विपणन प्रबन्धक दूसरे विकल्प को अधिक श्रेष्ठ मानते हैं अर्थात् ये बाजार सम्बन्धी परिवर्तनों के अनुरूप अपनी संस्था की विपणन नीति में आवश्यक परिवर्तन करते रहते हैं। विपणन सम्बन्धी वातावरण में परिवर्तनों का सामना करने के लिए संस्था जो नीति बनाती है उसे ही विपणन रीति-नीति या विपणनीय व्यूह-रचना के नाम से जाना जाता है।

  • फिलिप कोटलर (Philip Kotler) के अनुसार, “विपणन रीति-नीति या विपणनीय व्यूह-रचना से आशय उद्देश्यों, नीतियों और नियमों के समूह से है, जो एक फर्म में विपणन प्रयत्नों को प्रदर्शित करता है।”

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि विपणन व्यूह-रचना से आशय ऐसी नीति से है जो संस्था बाजार सम्बन्धी परिवर्तनों के प्रत्युत्तर में अपनाती है। विपणनी रीति-नीति अल्पकाल के लिए तैयार की जाती है और इनमें बाजार सम्बन्धी वातावरण में हुए परिवर्तनों के अनुसार परिवर्तन किए जाते रहते हैं।

विपणन व्यूह-रचना करते समय विचारणीय तत्व (Elements to be Considered in Formulating Marketing Strategy)

विपणन व्यूह-रचना करते समय निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए-

(1) प्रतिस्पर्द्धियों की सम्भावित प्रतिक्रियायें (Expected Countermoves of Com विपणन अधिकारियों को विपणन व्यूह रचना करते समय सर्वप्रथम अपने प्रतिस्पर्द्धियों की petitors) सम्भावित प्रतिक्रियाओं की कल्पना करनी चाहिए और यह भी देखना चाहिए कि क्या-क्या सम्भावित प्रभाव होंगे। उदाहरण के लिए संस्था वस्तु का मूल्य वर्तमान मूल्य स्तर से कम निर्धारित करना चाहती है तो यह देखना चाहिए कि क्या प्रतिस्पर्द्धा भी अपनी वस्तु के मूल्य कम करेंगे या वे कोई अतिरिक्त सेवा प्रारम्भ करेंगे, जैसे-गृह सुपुर्दगी, साख सुविधाएँ विक्रयोपरान्त सेवा आदि या वे कोई अन्य नीति अपनायेंगे और इनका हमारी संस्था की बिक्री की मात्रा पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इन सभी बातों का अध्ययन करने के पश्चात् ही- विपणन अधिकारियों को विपणन व्यूह-रचना में निर्णय लेने चाहिए।

(2) साहचर्य सम्भावनायें (Synergistic Potential)-कुछ विपणन आदायें (Marketing Inputs) साहचर्य सम्भावना रखते हैं। दूसरे शब्दों में कुछ विपणन आदाओं में परस्पर समर्थन की प्रवृत्ति पाई जाती है जैसे एक आदाय पर काम करने से दूसरे आदाय पर व्यय करने की सम्भावना उत्पन्न हो जाती है। उदाहरण के लिए, उत्पाद नीति और वितरण माध्यम नीति ऐसे दो विपणन आदाय है कि यदि एक अतिरिक्त उत्पाद के उत्पादन पर व्यय करना है तो उसके विपरीत माध्यम पर भी व्यय करना पड़ेगा। अतः विपणन व्यूह की रचना करते समय विपणन आदाओं के सम्बन्धों को भी ध्यान में रखना चाहिए।

(3) प्रतिस्थानापन्नता ( Substitutability)- कुछ विपणन तत्वों में परस्पर प्रतिस्थापन्नता की सम्भावना पाई जाती है। विपणन व्यूह-रचना तैयार करते समय ऐसे तत्वों का अध्ययन करके यह देखना चाहिए कि ऐसे तत्वों में किस तत्व का प्रयोग श्रेयस्कर होगा और किस सीमा तक एक तत्व दूसरे तत्व से प्रतिस्थापित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, बिक्री मात्रा वृद्धि करने के लिए विज्ञापन पर अधिक व्यय किया जाये या विक्रय संवर्द्धन क्रियाओं पर इस सम्बन्ध में यह स्मरणीय तथ्य है कि तभी विपणन तथ्यों का अपना-अपना अलग-अलग महत्व है। इनमें से एक तत्व के स्थान पर दूसरे तत्व को एक सीमा के अन्दर ही प्रतिस्थापित करना चाहिए।

(4) विभिन्न विपणन आदाओं के उत्पादकता स्तर में भिन्नता (Diversity in Productivity Levels of Various Marketing Inputs)-विभिन्न विपणन आदाओं के उत्पादकता स्तर में विभिन्नता पाई जाती है, जैसे-रेडियो द्वारा विज्ञापन और साइन बोर्ड द्वारा विज्ञापन एक-दो बार रेडियों द्वारा विज्ञापन कराने से हो सकता है कि उपभोक्ताओं को वह सुनाई ही न पड़े या उसका उपभोक्ताओं पर कोई विशेष प्रभाव न पड़े। अतः रेडियो द्वारा विज्ञापन को अधिक प्रभावी बनाने के लिए उसकी आवृत्ति बढ़ानी चाहिए। साइन बोर्ड द्वारा एक ही बार विज्ञापन करना अधिक टिकाऊ होता है। अतः विपणनीय व्यूह रचना करते समय विभिन्न आदाओं के उत्पादकता के स्तर को भी ध्यान में रखना चाहिए।

(5) विपणन आदाओं की लोच (Elasticity of Marketing Inputs) – विभिन्न विपणन आदाओं में लोच पाई जाती है और उनका उत्पाद की माँग पर प्रभाव पड़ता है। इस तथ्य को विपणन प्रबन्धक को ध्यान में रखना चाहिए। उदाहरण के लिए एक ही उत्पाद के विपणनकर्त्ता को विभिन्न उपभोक्ताओं की माँग के आधार पर एक ही वस्तु के भिन्न-भिन्न मूल्य निश्चित करने पड़ सकते हैं।

प्रायः वस्तुओं के निर्माता वस्तुओं के थोक विक्रेता, फुटकर और अन्तिम उपभोक्ताओं के लिए अलग-अलग मूल्य निर्धारित करते हैं। विपणन प्रबन्धक को विपणीय व्यूह रचना करते समय उपरोक्त तथ्यों का भली-भाँति अध्ययन करना चाहिए।