कार्यशील पूँजी के अर्थ प्रबन्धन के विभिन्न साधन कौन से है ? दीर्घकालीन स्रोतों के अन्तर्गत स्वामीगत स्रोतों का वर्णन कीजिए।

62

कार्यशील पूँजी के स्रोत (Sources of Working Capital)

कम्पनियों द्वारा कार्यशील पूंजी को अब साधनों से प्राप्त किया जाता है

(A) दीर्घकालीन साधन (Long-term Sources) दीर्घकालीन स्रोत से कार्यशील पूँजी के केवल उस भाग का वित्त पोषण करते हैं, जो स्वायी प्रकृति का होता है अर्थात् जिसके लिए यह विश्वास होता है कि उस कार्यशील पूँजी की व्यवसाय में लम्बे टाइम तक आवश्यकता होगी। कार्यशील पूँजी के दीर्घकालीन स्रोतों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

1. स्वामीगत स्रोत स्वामीगत स्रोतों में निम्न को शामिल किया जाता है

  • (i) अंश निर्गमन-स्थायी कार्यशील पूँजी के लिए वित्त / फण्ड प्राप्ति का एक महत्वपूर्ण स्रोत अंश निर्गमन है। ये अंश पूर्वाधिकार एवं सम दोनों ही प्रकार के हो सकते हैं। चूँकि सम अंश निर्गमन से व्यवसाय की आय पर कोई स्थायी प्रभार उत्पन्न नहीं होता है, अतः साधारणतः स्थायी कार्यशील पूँजी के लिए सम अंशों के निर्गमन द्वारा ही फण्ड प्राप्त करना चाहिए।
  • (ii) प्रतिधारित आय व्यवसाय द्वारा अर्जित लाभ, जो लाभांश के रूप में नहीं बाँटा जाता है, प्रतिधारित आय कहलाता है और कार्यशील पूँजी के अर्थप्रबन्धन में इसे एक नियमित और लागत रहित स्रोत के रूप में मानते हैं। व्यावसायिक संस्था के विकास के साथ-साथ कार्यशील पूँजी की आवश्यकता बढ़ती ही जाती है और जिसकी पूर्ति संस्था में लाभों का पुनर्विनियोजन करके भी की जा सकती है।
  • (iii) संचित कोष-प्रतिधारित आय की तरह ही संचित कोषों का प्रयोग भी व्यवसाय आय पर स्थायी भार उत्पन्न नहीं करता है और इसलिए स्थायी कार्यशील पूँजी के अर्थप्रबन्धन में इसका लाभदायक एवं उचित माना जाता है।
  • (iv) स्थायी सम्पत्तियों की बिक्री-व्यावसायिक संस्थाओं में कुछ सम्पत्तियाँ अप्रचलित हो सकती है तथा कुछ सम्पत्तियों अवशेष के रूप में उपलब्ध होती हैं और कुछ गलत अनुमान के कारण फालतू खरीद ली जाती हैं। इन सभी प्रकार की सम्पत्तियों को बेचकर कार्यशील पूँजी की व्यवस्था की जा सकती है। परन्तु कार्यशील पूँजी का यह स्रोत नितान्त अनियमित व अविश्वसनीय होता है।

2. ऋणगत स्रोत ऋणगत स्रोतों में निम्नांकित को शामिल किया जा सकता है

  • (i) ऋणपत्र- अंश पूँजी की भाँति एक कम्पनी ऋणपत्र निर्गमित करके कार्यशील पूँजी प्राप्त कर सकती है। यहाँ यह बता देना आवश्यक है कि ऋणपत्र निर्गमन से कम्पनी की आय पर ब्याज का स्थायी भार उत्पन्न हो जाता है, अतः इसका प्रयोग व्यवसाय की प्रगति, व्यवसाय में आय की स्थिरता, जोखिम की मात्रा, इत्यादि तत्वों को ध्यान में रखते हुए ही करना चाहिए।
  • (ii) दीर्घकालीन ऋण ऋणपत्र निर्गमन के अतिरिक्त एक संस्था कार्यशील पूँजी के लिए कोष औद्योगिक निगमों, प्रन्यासों तथा विनियोग कम्पनियों आदि से भी प्राप्त कर सकती है। (B) अल्पकालीन स्रोत (Short term Sources) परिवर्तनशील कार्यशील पूँजी की व्यवस्था अल्पकालीन योतों से की जा सकती है जिसके अन्तर्गत जि को शामिल करते हैं

1. व्यापारिक साख (Prade Credit)– विभिन्न वस्तुओं एवं कच्चे माल के विक्रेता/आपूर्तिदाता अपने ग्राहकों को व्यावहारिक परम्पराओं के अनुसार स्वतः ही साख प्रदान करते हैं। सफल व्यापारिक संस्थाएँ जो अपने भुगतानों का अच्छा रिकार्ड रखती है, इस व्यापारिक साख को सफलता लगातार प्राप्त करती रहती है। यदि किसी संस्था को व्यापारिक साख किसी पूर्व निर्धारित अवधि जैसे 15 दिन, 30 दिन या अन्य किसी अवधि के लिए दी जाये तो इसकी कोई लागत नहीं होती है किन्तु यदि शीघ्र भुगतान के लिए कोई प्रोत्साहक बट्टे की सुविधा भी दी जाती है तो बड़े की अवधि समाप्त होने पर विलम्ब से भुगतान करने की भारी लागत हो सकती है। उदाहरण के लिए कोई आपूर्तिदाता अपने ग्राहकों को 2/10 निवल 30 शर्तों पर माल उधार देता है तो इसका यह अर्थ है कि यदि ग्राहक 10 दिन में उधार राशि का भुगतान कर देता है तो उसे 2% बट्टा प्राप्त होता है तथा 10 दिन के बाद भुगतान करता है तो उसे यह बहा या छूट प्राप्त नहीं होती है तथा उसे 30 दिन के भीतर हर हालत में भुगतान करना होता है। व्यापारिक साख को वित्त प्राप्ति का तात्कालिक साधन समझा जाता है क्योंकि यह प्रचलित व्यापारिक परम्पराओं के अनुसार स्वतः मिल जाती है।

2. अल्पकालीन बैंक वित्त (Short Term Bank Finance) बैंकों द्वारा अल्पकालीन वित्त निम्न रूपों में प्रदान किया जाता है—

  • (अ) अधिविकर्ष (Overdraft) –जिन ग्राहकों का बैंक में चालू खाता होता है, बैंक उनको एक निश्चित सीमा तक अधिविकर्ष की सुविधा दे सकता है। ग्राहक उस सीमा तक कभी भी अधिविकर्ष ले सकता है तथा कभी भी राशियों का भुगतान कर सकता है। ब्याज उसी राशि पर वसूल किया जाता है जो राशि वास्तव में अधिविकर्ष के रूप में प्रयोग की गई है।
  • (ब) नकद साख (Cash Credit)–व्यापारिक बैंक नकद साख की सुविधा अपने ग्राहकों की अल्पकालीन वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करते हैं। यह एक ऐसी शाश्वत व्यवस्था है जिसके द्वारा बैंक निर्धारित सीमा के अन्दर समय-समय पर ग्राहकों को अग्रिम पैसा निकालने की सुविधा देता है। ऐसी सुविधा वस्तुओं के स्कन्ध की जमानत पर दी जाती है। (स) व्यापारिक बिलों की कटौती (Discounting of Trade Bills)—विक्रेतागण अपने ग्राहकों पर विनिमय-बिल लिखते हैं तथा उन बिलों का बैंकों से बट्टा करा लेता है। इससे भी अल्पकालीन वित्त की प्राप्ति होती है।

(द) साख पत्रों का खोलना (Opening of Letters of Credit)–अपने ग्राहकों के पक्ष में बैंक साख पत्र खोलकर वस्तु कच्चे माल के प्रदाताओं को जोखिम के प्रति सुरक्षा प्रदान करते हैं। इस व्यवस्था में बैंक वित्त प्रदान नहीं करता है बल्कि अपने ग्राहकों की देनदारी का समादरण करने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लेता है।

3. जन-निक्षेप (Public Deposits) बैंक वित्त की उपलब्धता पर लगाए गए नियमन से बहुत-सी संस्थाएँ कार्यशील पूँजी के अर्थप्रबन्धन के वैकल्पिक स्रोतों को तलाशने लगीं और सामान्य जनता से उनकी बचत को एकत्रित करना एक महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में ओंका गया। जनता से एकत्र किया गया धन जननिक्षेप माना गया। गैर-बैंकिंग तथा गैर-वित्तीय कम्पनियों द्वारा जनता से निक्षेप प्राप्त करने की परम्परा भारत में बहुत ही पुरानी है। अहमदाबाद, सूरत तथा मुम्बई की कपड़ा मिलों ने इस वित्तीय स्रोत का श्रीगणेश किया था जो आगे चलकर बहुत ही लोकप्रिय हो गया।

4. अन्तर्प्रमण्डल निक्षेप (Inter-Corporate Deposit)- एक कम्पनी द्वारा दूसरी कम्पनी को दिये गये निक्षेप अन्तर्प्रमण्डल निक्षेप कहलाते हैं। ये अल्पकालीन अथवा सावधि हो सकते हैं। • अल्पकालीन निक्षेप (i) माँग निक्षेप (Call Deposits) जो एक दिन की सूचना पर वापस प्राप्त किये जा सकते हैं, (ii) त्रैमासिक निक्षेप, तथा (iii) अर्द्धवार्षिक निक्षेप के रूप में हो सकती है।

5. ग्राहकों से अग्रिम (Advances from Customers) अनेक बार कुछ उत्पादक अपने • ग्राहकों से माल की सम्पूर्ण राशि अथवा आंशिक राशि अग्रिम प्राप्त कर लेते हैं तथा यह राशि माल की आपूर्ति तक उनके पास रहती है। सामान्यतया इस पर कोई ब्याज नहीं दिया जाता है। अतः यह • अल्पकालीन दित्त का सस्ता साधन है, परन्तु यह केवल प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा ही उपयोग में लाया जा सकता है। जिन उद्योगों में अधिक प्रतिस्पर्धा की स्थिति होती है वहाँ ग्राहकों से अग्रिम प्राप्त नहीं होता है बल्कि ग्राहकों को उधार की शर्तों पर माल बेचना पड़ता है।

6. आन्तरिक स्रोत (Internal Sources) जब एक संस्था ह्रास कोष बनाती है तथा इस कोष का उपयोग जब तक सम्पत्तियों के प्रतिस्थापन के लिए नहीं करती तब तक इनका प्रयोग कार्यशील पूँजी की वित्त व्यवस्था के लिए किया जाता है। इसी तरह लाभों का पुनः विनियोजन अथवा प्रतिधारित अर्जनें कार्यशील पूंजी की वित्त व्यवस्था के लिए उपयोगी होती है। कर आयोजन से जब तक कर राशि सरकारी कोष में जमा नहीं कराई जाती, कार्यशील पूँजी प्रयोग की जाती है।