एक प्रभावशाली विज्ञापन में कौन-कौन सी आवश्यक बातें पायी जाती है ? इसके मापने के विभिन्न उपायों को बताइए।

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मनोविज्ञान का विज्ञापन में महत्व (Importance of Psychology in Advertisement) : विज्ञापन तथा मनोविज्ञान एक-दूसरे से घनिष्ठतापूर्वक सह-सम्बन्धित है। विज्ञापन द्वारा पाठक के मन में वस्तु के गुण एवं उपयोगिता की बात बैठा दी जाती है, ताकि वह उस वस्तु को क्रय करने के लिए प्रेरित हो जाये। वस्तुतः विज्ञापन मुद्रित विक्रय-कला (Printed Salesmanship) है। प्रत्येक विज्ञापन का इस प्रकार का होना आवश्यक है, ताकि वह पाठक के मन पर प्रभाव छोड़ सके। विज्ञापन को सदैव पाठक के दृष्टिकोण से ही देखना उचित होता है। विज्ञापन के लेखक को सदैव यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि उसके विज्ञापन का पाठक के मनोविज्ञान पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ेगा। कई विज्ञापन, विज्ञापन-लेखक की दृष्टि से अच्छे तो हो सकते हैं, परन्तु वे पाठक के मन को प्रभावित नहीं कर पाते जिससे वे अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाते। एक कलाकार विज्ञापन के लिए एक अच्छी ड्राइंग या पेण्टिंग बनाता है। वह ड्राइंग या पेण्टिंग कला के दृष्टिकोण से एक बहुमूल्य कृति हो सकती है, किन्तु विज्ञापन की दृष्टि से वह कृति तब ही अपने उद्देश्य में पूर्ण समझी जा सकती है, जबकि वह पाठकों के मन पर उचित प्रभाव डाल सके। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि विज्ञापन अपने उद्देश्य में तब ही सफल हो सकता है जबकि वह पाठक के मनोविज्ञान के अनुकूल हो। एक सफल विज्ञापन में पाठक के मनोविज्ञान को प्रभावित करने के लिए निम्न तीन तत्व प्रयुक्त होने चाहिए

(I) ध्यान आकर्षित करना (Attracting Attention)-विज्ञापन में निहित मनोविज्ञान इस प्रकार का होना चाहिए ताकि वह पाठकों का ध्यान आकर्षित कर सके। यदि कोई विज्ञापन पाठकों का ध्यान आकर्षित न कर सके तो वह अपने उद्देश्य में असफल हो जाता है। यदि विज्ञापन में पाठकों के ध्यान को आकर्षित करने का गुण तब हो पाठक विज्ञापन में दी गई बातों को पढ़ेंगे, अन्यथा नहीं।

(II) रूचि उत्पन्न करना तथा उसे बनाये रखना (Creating and Holding Interest)- ऊपर दिये गये वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है कि किस प्रकार विज्ञापन से ध्यान आकर्षित किया जा सकता है, किन्तु केवल ध्यान आकर्षित करना ही पर्याप्त नहीं बल्कि विज्ञापन में आगे यह भी गुण होना आवश्यक है कि जिससे पाठक के मन में उस विज्ञापित वस्तु के प्रति रुचि उत्पन्न हो जाये तथा यह रुचि कुछ समय तक बनी रहे। वस्तुतः विज्ञापन का यही प्रमुख लक्षण है कि इससे कितने अधिक समय तक उत्पन्न रुचि को बनाये रखा जा सकता है।

(III) वांछित उद्देश्य प्राप्त करना (Getting Action)-किसी भी विज्ञापन का कार्य तब तक अधूरा रहता है जब तक कि उससे वांछित उद्देश्य की प्राप्ति न हो जाये। बाजार में उसी प्रकार की वस्तु का उत्पादन करने वाली अनेक संस्थाएँ भी विज्ञापन करती रहती है, जिसके कारण पाठकों का ध्यान उन विज्ञापनों के प्रति भी आकर्षित होना स्वाभाविक ही है, परन्तु विज्ञापन का उद्देश्य केवल पाठकों को आकर्षित करना एवं उस वस्तु के प्रति इच्छा उत्पन्न करना तक ही नहीं है, वरन विज्ञापन दूसरे विज्ञापकों की अपेक्षा इतना अधिक प्रभावशाली हो, ताकि पाठक दूसरी विज्ञापित वस्तुओं से आपकी वस्तु को खरीदना उत्तम समझे तथा उस वस्तु खरीदने के लिए लालायित होकर खरीदने की कार्यवाही करने लगे। अतः विज्ञापन की प्रमुख बात वांछित उद्देश्य को प्राप्त करना होनी चाहिए।

प्रभावशाली विज्ञापन के सिद्धान्त या आवश्यक बातें या लक्षण (Principles or Characteristics of an Effective Advertising)

वर्तमान व्यावसायिक प्रतिस्पर्द्धात्मक युग को विज्ञापन का युग कहा जाता है। प्रतिस्पर्द्धा के इस युग में वही उत्पादक सफल हो सकता है जो वैज्ञानिक विधि के माध्यम से अपनी जानकारी सम्भावित ग्राहकों तक पहुँचा सके। यदि विज्ञापन वैज्ञानिक विधि से किया जाता है तो उसमें चुम्बकीय शक्ति पायी जाती है तथा वह अपनी ओर नवीन ग्राहकों को आकर्षित कर सकता है। वैज्ञानिक विज्ञापन से आशय ऐसे विज्ञापन से होता है जो किन्ही निश्चित सिद्धान्तों पर आधारित हो। इसीलिए कहा जाता है कि एक विज्ञापन तभी प्रभावशाली कहा जा सकता है जबकि इसमें निम्नलिखित सिद्धान्तों या लक्षणों का समावेश हो

(1) सम्भावित ग्राहकों का ध्यान रखना एक प्रभावी विज्ञापन के लिए सर्वप्रथम यह आवश्यक है कि इसमें सम्भावित ग्राहकों की दशाओं का ध्यान रखा जाना चाहिए, ये सम्भावित ग्राहक पुरुष, स्त्री तथा बालक हो सकते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि सम्भावित ग्राहकों के आय के साधन, शिक्षा, निवास स्थान, रीति-रिवाज तथा जीवन स्तर आदि बातों को ध्यान में रखकर ही विज्ञापन किया जाना चाहिए तभी सफलता प्राप्त हो सकती है।

(2) विज्ञापन आकर्षक शीर्षक–विज्ञापन का शीर्षक आकर्षक होना चाहिए। ऐसा पाये जाने पर ही सम्भावित ग्राहक इसकी ओर आकर्षित हो सकेंगे। अन्य शब्दों में, इसका शीर्षक इस प्रकार का होना चाहिए जिसकी ओर ग्राहक आसानी से आकर्षित हो सकें। उदाहरणार्थ- ‘लाइफबॉय है जहाँ तन्दुरुस्ती है वहाँ’, इस प्रकार आकर्षक शीर्षक उपभोक्ताओं को अपनी ओर आकर्षित करता है तथा विक्रय को बढ़ाता है।

(3) रूचि उत्पन्न करने का प्रयास-विज्ञापन को प्रभावशाली बनाने के लिए यह आवश्यक है. कि विज्ञापन इस प्रकार का होना चाहिए जो ग्राहकों के हृदय में रुचि उत्पन्न कर सके। अन्य शब्दों में, इसे ऐसा होना चाहिए ताकि ग्राहकों को आसानी से खरीदने के लिए तैयार किया जा सके। इसीलिए कहा जाता है कि एक अच्छा विज्ञापन वस्तु के प्रति रुचि उत्पन्न करता हो तथा साथ-ही-साथ यह रुचि लम्बे समय तक कायम रह सके। यही इसका मनोवैज्ञानिक कार्य है।

(4) भाषा की सरलता-प्रायः यह कहा जाता है कि विज्ञापन की भाषा सरल तथा अत्यन्त रोचक होनी चाहिए। अन्य शब्दों में, विज्ञापन की भाषा आम जनता की भाषा होनी चाहिए। जहाँ तक सम्भव हो इसमें कठिन शब्दों तथा मुहावरों का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। साथ-ही-साथ विज्ञापन के लिए वही भाषा उपयोग की जानी चाहिए जिसे क्षेत्र की अधिकांश जनता बोलती तथा समझती हो। यदि ऐसा नहीं पाया गया तो हमारा विज्ञापन सफल नहीं माना जा सकता है।

(5) वस्तु की उपयोगिता को सिद्ध करना-विज्ञापन करते समय इस बात की ओर विशेष रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए कि विज्ञापित वस्तु की उपयोगिता स्वयं सिद्ध हो जाये। इसका प्रभाव यह होगा कि पाठक या ग्राहक अपने आप वस्तु की ओर आकर्षित हो जायेगा। उदाहरणार्थ- जब यह विज्ञापन सुनाई देता है कि ‘तन्दुरुस्ती की रक्षा करता है लाइफबॉय’ तो यह इस साबुन की उपयोगिता को प्रकट करता है। इसी प्रकार की बातें अन्य प्रकार के विज्ञापनों के सम्बन्ध में भी कही जाती है। जैसे-‘पचनोल से सब कुछ हजम। इनसे वस्तु की उपयोगिता स्पष्ट होती है।

(6) चित्रों का उपयोग करना-विज्ञापन में चित्रों का उपयोग ग्राहकों तथा पाठकों को पूर्ण रूप से आकर्षित करने में सफल पाया जाता है। यह ध्यान आकर्षित करने के साथ इसकी उपयोगिता की व्याख्या करने में भी सहायता करता है। इसीलिए कहा जाता है कि “सौ बार सुनना एक बार देखने के बराबर पाया जाता है।” चित्र यदि विभिन्न रंगों के होते हैं तो इससे आकर्षण और बढ़ जाते हैं। पाठकों को आकर्षित करने में यह विशेष रूप से महत्व रखता है। इसीलिए विज्ञापन में चित्रों की उपयोगिता पायी जाती है।

(7) वस्तु की नवीनता को प्रदर्शित करना-विज्ञापन इस प्रकार से किया जाना चाहिए कि विज्ञापन की वस्तु नवीनता को प्रदर्शित करती हो। अन्य शब्दों में, विज्ञापन का स्वरूप इस प्रकार का बनाया जाना चाहिए कि वस्तु के विज्ञापन से नवीनता की झलक आती हो। कहने का अभिप्राय यह है कि यह पुरानी शराब को नवीन बोतल में रखने के समान होनी चाहिए। जब विज्ञापन में वह कहा जाता है कि ‘नया सुपर सर्फ’ तो यह इस बात को बताता है कि यह एक नवीन वस्तु है। इस प्रकार विज्ञापन में नवीनता को स्पष्ट करके विज्ञापन की प्रभावशीलता में वृद्धि की जा सकती है।

(8) वस्तु को रखने में गर्व का अनुभव होना-विज्ञापन देते समय इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि ऐसे तरीकों से विज्ञापन दर्शाया जाये कि उपभोक्ताओं को इसके प्रयोग से गर्व का अनुभव हो। प्रायः यह देखा गया है कि गाड़ियों से चलने वाले पैदल तथा साइकिल से चलने वालों की तुलना में गर्व अनुभव करते हैं। अवसर कहते हुए सुना गया है मैं फ्रीडम गाड़ी से ही चलता हूँ। इसीलिए यह कहना सत्य प्रतीत होता है कि आज विज्ञापन मानव जीवन का अंग बन गया है। यह प्रत्येक को प्रभावित करता है।

(9) वस्तु की कल्पना करने का अवसर प्रदान करना-विज्ञापन में एक अन्य गुण यह भी पाया जाना चाहिए कि इसे देखने या पढ़ने के बाद पाठक अथवा ग्राहक के मन में इसकी कल्पना उत्पन्न हो। अन्य शब्दों में, ग्राहकों में वस्तु के आकार, रंग, रूप तथा प्रकार की कल्पना करने की शक्ति उत्पन्न करे। इस सम्बन्ध में चित्र का निर्माण विशेष रूप से लाभप्रद सहायक सिद्ध हो सकता है। आजकल इस प्रकार के विज्ञापन का अधिक प्रचलन पाया जाता है। संक्षेप में, विज्ञापन में सेवा तत्व का अंग पाया जाना चाहिए।

(10) वस्तु की क्वालिटी पर जोर देना-विज्ञापन में इसकी क्वालिटी पर विशेष रूप से जोर दिया जाना चाहिए। वस्तु की किस्म को शब्दों द्वारा या चित्र द्वारा स्पष्ट करना चाहिए। विज्ञापन में वस्तु की प्रशंसा इस प्रकार करनी चाहिए ताकि उपभोक्ता स्वयं इसकी ओर आकर्षित हो। इस विज्ञापन में सत्यता का भी गुण पाया जाना चाहिए। इसका कारण है कि आजकल लोग वस्तु का चुनाव इसकी क्वालिटी के आधार पर करते हैं। यही कारण है कि जब सर्फ एक्सल का विज्ञापन किया जाता है तो इसकी क्वालिटी का पता चलता है। यही वजह है कि आजकल गुण नियन्त्रण की ओर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है।

(11) सृजनात्मक विज्ञापन होना-विज्ञापन की प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए विज्ञापन में सृजनात्मकता का गुण पाया जाना भी आवश्यक है। विज्ञापन ऐसा होना चाहिए ताकि नये-नये ग्राहक इसकी ओर आकर्षित हों तथा विक्रेता अपनी वस्तु को विक्रय करने में सफलता प्राप्त कर सके। यही नहीं विज्ञापन को सृजनात्मक बनाने के लिए उसे सम्भावित ग्राहकों की समस्या एवं आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए तैयार करना चाहिए। यही इसकी उपयोगिता पायी जाती है।

(12) अन्य सिद्धान्त-विज्ञापन को प्रभावित बनाने के लिए कुछ अन्य सिद्धान्त इस प्रकार पाये जाते हैं- (1) विज्ञापन यथासम्भव संक्षिप्त होना चाहिए। (2) विज्ञापन समय या स्थान के अनुसार होना चाहिए। (3) विज्ञापन में सेवा के तत्व का समावेश होना चाहिए। (4) वस्तु का विज्ञापन बार-बार किया जाना चाहिए। (5) विज्ञापन द्वारा जीवन-स्तर में वृद्धि होनी चाहिए।

विज्ञापन की प्रभावोत्पादकता को मापने की विधियाँ (Method of Evaluation of Advertising Effectiveness) विज्ञापन की प्रभावोत्पादकता का मूल्यांकन करने के लिए प्रायः निम्न विधियों का उपयोग किया जाता है

(1) सम्मति अनुसन्धान (Opinion Research)- इस विधि के अन्तर्गत सम्भावित उपभोक्ता की कुछ पैनल तैयार की जाती हैं। प्रत्येक पैनल में सभी प्रकार के उपभोक्ताओं के आठ से इस तक सदस्य हो सकते हैं। इस विधि में विज्ञापनों के पैनलों को दिखाया जाता है और इसके बाद उन पैनलों की प्रतिक्रियाओं की टिप्पणियाँ आमन्त्रित की जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य यह होता है कि यदि पैनलों की प्रतिक्रियायें विज्ञापन के पक्ष में नहीं होती है तो उस विज्ञापन पर खर्च होने वाली धनराशि को बचा लिया जाता है। इसके विपरीत, यदि प्रतिक्रियायें विज्ञापन के पक्ष में होती है तो विज्ञापन उपभोक्ताओं तक पहुँचाया जा सकता है।

( 2 ) चेतना सर्वेक्षण (Awareness Survey)-चेतना अनुसन्धान का उपयोग नवीन वस्तुओं के सम्बन्धी लोगों की जानकारी प्राप्त करने में किया जाता है। इसका उपयोग वस्तुओं की लोकप्रियता, ट्रेडमार्क तथा ब्राण्ड की ख्याति के मापने के लिए किया जाता है। इस विधि में उत्तर देने वाले से पूछा जाता है क्या उसने फरिश्ता का नाम सुना है, यदि हाँ तो क्या उसका ब्राण्ड इत्यादि आपको याद है। इस सम्बन्ध में यह कहना गलत न होगा कि इससे मितव्ययिता लाने तथा सम्प्रेषण में सुविधा आती है।

(3) स्मृति परीक्षण (Memory Tests ) – स्मृति परीक्षण का प्रयोग विज्ञापन के ध्यानाकर्षण सम्बन्धी महत्व को जानने के लिए किया जाता है। उदाहरणार्थ, उपभोक्ता से विज्ञापन के बारे में उसे जो कुछ याद रहा उसकी जानकारी ली जाती है। इस परीक्षण से यह पता चलता है कि विज्ञापन ने उपभोक्ता का ध्यान किस सीमा तक आकर्षित किया है। स्मृति परीक्षण निम्न भागों में विभक्त किया जा सकता है

(i) पहचान परीक्षण (Recognition Test)-यह विधि विज्ञापन के बाद परीक्षण के अन्तर्गत आती है इसके अन्तर्गत ग्राहकों की याद्दाश्त को अधिक महत्व दिया जाता है। इसमें ग्राहकों को विज्ञापन की एक प्रति दिखाकर उनसे पूछा जाता है कि क्या कभी उन्होंने ऐसी प्रति देखी है ? यदि ग्राहक का उत्तर धनात्मक होता है तो विज्ञापन को प्रभावशाली माना जाता है।

(ii) पुनः स्मरण परीक्षण (Recall Test)- परीक्षण विज्ञापन के बाद में किया जाता है। इस परीक्षण में उपभोक्ता को विज्ञापन की प्रति नहीं दिखायी जाती है बल्कि उनसे पूछा जाता है कि उन्होंने हाल में अमुक वस्तु के बारे में कौन-कौन से विज्ञापन देखे हैं। यदि धनात्मक उत्तर मिलता है तो विज्ञापन को प्रभावशाली माना जाता है।

(4) साहचर्य परीक्षण (Association Test)-इस पद्धति में वस्तुओं में विज्ञापन के सम्बन्द में उपभोक्ताओं से जाँच की जाती है। यही नहीं वस्तुओं के गुणों के सम्बन्ध में प्रश्न किये जाते हैं तथा नारों के आधार पर भी वस्तुओं के ब्राण्ड के बारे में पता लगाया जाता है। उदाहरणार्थ-जैसे यह पूछा जाये, कौन-सा बिस्कुट है जिसके विज्ञापन पर मजेदार नया स्वादिष्ट लिखा है। यदि अधिकांश उपभोक्ताओं के उत्तर सही है तो विज्ञापन प्रभावशाली माना जाता है।

(5) विद्युतचालित युक्तियाँ (Electronic Devices) कुछ व्यापारिक कम्पनियाँ तथा संस्थाएँ विज्ञापन तथा विज्ञापन के विभिन्न भागों के प्रति होने वाली प्रतिक्रियाओं को जानने के लिए अब विद्युतचालित युक्तियों का भी उपयोग करने लगे हैं। इसमें विशेषकर साइकोगैल्वनो मोटर, टेकिस्टोस्कोप तथा इलेक्ट्रॉनिक स्केल आदि मुख्य रूप से प्रचलित पाये जाते हैं।

(6) विक्रय अनुसन्धान (Sales Research)-विज्ञापन का मुख्य उद्देश्य बिक्री में वृद्धि करने से होता है। अतः विज्ञापन के प्रभाव का मूल्यांकन विक्री वृद्धि की माप से किया जाता है। यदि विक्री में वृद्धि हुई है तो विज्ञापन प्रभावशाली रहा है। लेकिन यह तभी सम्भव होगा जब बिक्री में वृद्धि को प्रभावित करने के अन्य सभी तत्व स्थिर रहे होंगे। इस विधि के अन्तर्गत उन दो शहरों का चयन कर लिया जाता है जिनकी बिक्री मात्रा बराबर होती है। एक शहर में विज्ञापन कार्यक्रम सम्पन्न किये जाते है दूसरे में नहीं। यदि जिस शहर में विज्ञापन किया जाता है उसकी बिक्री मात्रा में तेजी से वृद्धि होती है, तो इस प्रकार दोनों शहरों की बिक्री की मात्रा की तुलना करके विज्ञापन की प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया जा सकता है।

इस प्रकार यह कहना गलत न होगा कि विज्ञापन कार्यक्रम के दौरान प्रबन्धकों तथा उत्पादकों को चाहिए कि जो कुछ विज्ञापित किया गया है उसके सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करके उसका मूल्यांकन किया जाये। इसी बात पर व्यवसाय की ख्याति तथा सफलता निर्भर करती है। यही विज्ञापन की प्रभावोत्पादकता है।