पूँजी ढाँचे के विभिन्न सिद्धान्त क्या है ? संक्षेप में व्याख्या कीजिए। पूँजी ढाँचे के निर्धारक तत्वों की भी व्याख्या कीजिए।

31

पूँजी-ढाँचा सिद्धान्त की मान्यताएँ (Assumptions of Capital Structure Theories)

पूँजी ढाँचा सिद्धान्त की प्रमुख मान्यताओं को अग्र प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

1. सतत् जोखिम-विहीन ऋण तथा सम अंश केवल यही दो वित्त के स्रोत हैं।

2. कोई निगमित कर नहीं है।

3. लाभांश भुगतान अनुपात शत-प्रतिशत है अर्थात् सम्पूर्ण आय का लाभांश के रूप में वितरण कर दिया जाता है।

4. कोई प्रतिधारित आय नहीं है।

5. कम्पनी का संचालन लाभ प्रदत्त मान लिया जाता है और उसमें बढ़ोत्तरी की कोई आशा नहीं होती है।

6. एक विशेष फर्म के लिए भावी आशंसित ई. बी. आई. टी. के प्रति सभी विनियोक्ताओं का व्यक्तिगत प्रायिकता वितरण एक समान है।

7. फर्म की कुल सम्पत्तियाँ प्रदत्त मान ली जाती हैं और उसमें एक समय के बाद किसी भी प्रकार के परिवर्तन की आशा नहीं की जाती है 8. फर्म का जीवनकाल सतत् है।

शुद्ध आय उपागम (Net Income Approach)

शुद्ध आय उपागम का प्रतिपादन डेविट डूरन्ड द्वारा किया गया है। इसके अनुसार पूँजी की लागत और कम्पनी के मूल्य में सम्बन्ध होता है अर्थात् कम्पनी का मूल्य कम्पनी के पूँजी ढाँचा पर आश्रित होता है। फलस्वरूप पूँजी ढाँचा में परिवर्तन कम्पनी के मूल्य में परिवर्तन ला देता है। यह सिद्धान्त बतलाता है कि एक फर्म अधिकतम ऋण वित्तीयन का प्रयोग करके पूँजी की कुल लागत को न्यूनतम कर सकती है और फर्म के कुल मूल्य व समता अंशों के बाजार मूल्य को बढ़ा सकती है। क्योंकि ऋण वित्तीयन का कम खर्चीला साधन होता है।

यह उपागम निम्न मान्यताओं पर आधारित है—

(1) कोई कर व्यवस्था नहीं है।

(2) ऋण पूँजी की लागत इक्विटी की लागत से कम होती है।

(3) पूँजी ढाँचा में ऋण के अनुपात में वृद्धि अंशधारियों के जोखिम धारण में कोई परिवर्तन नहीं लाता है।

इन तीनों मान्यताओं के आधार पर उपागम का कथन है कि हम जैसे ही पूँजी ढाँचे में ऋण के अनुपात को बढ़ाते हैं, पूँजी की कुल लागत घटती है, क्योंकि ऋण वित्त का सबसे सस्ता स्रोत माना जाता है। परिणामतः कम्पनी का मूल्य बढ़ता है। इस प्रकार शुद्ध आय उपागम पूँजी की लागत और कम्पनी के मूल्य के बीच सम्बन्ध को स्वीकार करता है। इसका यह अर्थ भी है कि पूँजी की लागत अधिकतम होती है, जब ऋण का अनुपात शून्य होता है और पूँजी की लागत न्यूनतम होती है, जब ऋण का अनुपात 100% होता है।

शुद्ध आय सिद्धान्त के अनुसार संस्था की पूँजी की समस्त लागत का निर्धारण निम्न सूत्र द्वारा किया जाता है Overall Cost of Capital – Earnings before Interest and Tax Value of the Firm

तत्त्व पूँजी ढाँचे के तत्त्व इस प्रकार हैं

(1) आन्तरिक तत्त्व

(i) व्यवसाय का आकार पूँजी ढाँचे का निर्धारण करते समय व्यवसाय के आकार का भी ध्यान रखना पड़ता है। छोटे आकार की व्यावसायिक संस्थाओं की धन एकत्रित करने की क्षमता कम होती है। साख कम होने से इन्हें ऋण नहीं मिलता। इनकी कुल पूँजी में अंश पूंजी का भाग अधिक होता है। बड़े आकार को संस्थाओं के ऋणपत्र भी बिक जाते हैं और उन्हें ऋण भी मिल जाता है।

(ii) व्यवसाय का स्वभाव – कुछ व्यवसाय का स्वाभाव इस प्रकार का होता है कि उनमें चल सम्पत्तियों की तुलना में स्थायी सम्पत्तियों की आवश्यकता अधिक होती है।

(iii) आय की नियमितता एवं निश्चितता आय की निश्चितता एवं नियमितता भी पूँजी ढाँचे को प्रभावित करती है। जिस संस्था की आय में उक्त गुण होते हैं, उनके पूँजी ढाँचे में पूर्वाधिकार अंशों एवं ऋणपत्रों को प्रधानता रहती है।

(iv) व्यवसायिक सम्पत्तियों का ढाँचा-जिन संस्थाओं के सम्पत्ति ढाँचे में स्थायी सम्पत्तियों के ढाँचे में स्थायी सम्पत्तियों की मात्रा अधिक होती है। उनकी पूँजी संरचना में दीर्घकालीन ऋणों अथवा ऋणपत्रों का भाग अधिक होता है, जबकि अंशपूँजी का कम। इसके विपरीत जिन संस्थाओं के सम्पत्ति ढाँचे में चालू सम्पत्तियाँ अधिक होती है उनके पूँजी ढाँचे में दीर्घकालीन ऋण कम होते हैं।

(v) व्यापार पर नियन्त्रण की इच्छा-संरचना व्यापार पर नियन्त्रण की इच्छा से भी प्रभावित होती है। अगर कम्पनी के प्रवर्तक कम्पनी का नियन्त्रण कुछ ही व्यक्तियों के हाथों में रखना चाहते हैं तो समता अंशों का निर्गमन किया जाता है। जिसका एक बड़ा भाग कुछ लोगों के पास केन्द्रित रखा जाता है तथा शेष भाग छोटे-छोटे अंशधारियों को बाँट दिया जाता है।

(2) बाह्य तत्त्व

(i) पूँजी बाजार पूँजी बाजार के वातावरण का भी प्रभाव पूँजी संरचना पर पड़ता है।

(ii) विनियोक्ताओं की मनोवैज्ञानिक दशा विनियोक्ताओं की मनोवैज्ञानिक दशा के प्रति विश्वास का भी पूँजी ढाँचे पर प्रभाव पड़ता है। कुछ नियोक्ता साहसी होते हैं।

(iii) सरकारी नियन्त्रण-सरकारी नियन्त्रण को भी पूँजी ढाँचे पर प्रभाव पड़ता है। विभिन्न प्रकार की प्रतिभूतियों के निर्गमन व उन पर प्राप्त आय के सम्बन्ध में अनेक कानून देश के अन्दर बनाये गये हैं। जिन की पूँजी ढाँचे के निर्धारण के महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

(iv) विनियोजकों की रुचि पूँजी विनियोजक की रूचि का भी प्रभाव पूँजी संरचना पर पड़ता है।

(v) न्यूनतम जोखिम एक अनुकुलतम पूँजी ढाँचा इस प्रकार होना चाहिए कि उस पर अनेक प्रकार के जोखिमों का कम से कम प्रभाव पड़ सके।

(vi) सरलता-पूँजी संरचना अधिक जटिल नहीं होना चाहिए। सरलता के लिए शुरू में केवल में समता अंश एवं पूर्वाधिकार अंश ही जारी किये जाना चाहिए तथा ऋणपत्र बाद में निर्गमित करना चाहिए। पूँजी संरचना को सरल रखने के साथ-साथ यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि उसमें आवश्यकता से अधिक संस्तापन नहीं आना चाहिए।