मूल्यांकन शैली कितने प्रकार की होती है? उसे उदाहरण सहित समझाइए ।

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मूल्यांकन परक शैली के प्रकार मूल्यांकनपरक शैली के सात प्रकार हैं

1. आलोचनात्मक मूल्यांकनपरक कथन शैली जहाँ किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान या घटना का गुण-दोष के आधार पर मूल्यांकन किया जाये, वहाँ आलोचनात्मक मूल्यांकनपरक कवन शैली होती है, जैसे- प्राकृतिक सुषमा और इतिहास की अनुपम धरोहर के लिये देशभर के प्रख्यात पर्यटन स्थलों में मांडव है, जहाँ आजकल मौज-मस्ती के नाम पर मनचलों की अवांछित गतिविधियों बढ़ रही हैं और सांस्कृतिक प्रदूषण फैल रहा है। इससे पर्यटन विभाग की परेशानी पर चिन्ता की लकीरें भले ही नहीं खींचें, पर स्थानीय नागरिक अपने गाँव की छवि के प्रति चिंतित हो उठे हैं।

इस पर्यटन स्थल के नैसर्गिक सौन्दर्य और प्राचीन विरासत को देखने के लिये हर साल लाखों की संख्या में सैलानी मांडव आते हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों से मांडव के स्मारक ऐशगाह बन रहे है। शराबखोरी पर्यटन की जरूरी रस्म हो रही है और छेड़छाड़ व उच्छृंखलता की घटनाएं आम हो रही हैं।

2. विचारात्मक मूल्यांकनपरक कथन शैली – जहाँ गंभीरतापूर्ण विचारों के माध्यम से मूल्यांकन किया जाए, वहाँ विचारात्मक मूल्यांकनपरक कथन शैली होती है, जैसे- “प्रो. आर. जी. सक्सेना दहशत भरी उस दुर्घटना से उबरे नहीं है। हाल ही में नैनीताल से नई दिल्ली आते हुए उनकी बस दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। पाँच लोगों की जान लेने वाली इस दुर्घटना ने प्रो. सक्सेना, उनकी पत्नी, बेटी और उनके परिवार की एक बच्ची को गहरी शारीरिक चोटें दी शारीरिक चोटों से प्रो. सक्सेना देर-सबेर उबर जायेंगे, पर उस मानसिक चोट से उबरना उनके लिए सम्भव नहीं है, जो उस रात उन्हें लगी। दुर्घटना के तत्काल बाद ड्राइवर और कंडक्टर गायब हो गये। जिस कम्पनी की वह गाड़ी थी, उसने दुर्घटनाग्रस्त यात्रियों की कोई सुध नहीं ली।”

3. व्याख्यापरक मूल्यांकनपरक कथन शैली जहाँ किसी व्यक्ति, स्थान, वस्तु अथवा घटना के सम्बन्ध में तथ्यात्मक चित्रण किया जाये या उससे सम्बन्धित तथ्यों को प्रस्तुत किया जाये, वहाँ तथ्यात्मक मूल्यांकनपरक कथन शैली होती है, जैसे “जिन लोगों को ग्रहण का वास्तविक कारण नही मालूम है, उनके हृदय में ग्रहण को देखकर भय का संचार होना स्वाभाविक है। सन् 1504 ई. की घटना है, जब अमेरिका को ढूंढ निकालने वाला कोलम्बस भटकता-भटकता पश्चिम द्वीप समूह में जा पहुँचा था वहाँ के निवासियों ने उसको पकड़ लिया था और उसकी हत्या करना चाहते थे। उस समय कोलम्बस को एक अनोखी युक्ति सूझी। उसे यह ज्ञात था कि इस वर्ष एक मार्च को चंद्र ग्रहण होगा। उसने इसी ज्ञान के बल पर वहाँ के निवासियों को धमकी दी कि चंद्रमा के प्रकाश से वंचित कर देगा। इस कथन पर उन्होंने कुछ ध्यान नहीं दिया, किन्तु रात्रि को जब चन्द्रमा के उदित होने के कुछ देर बाद ग्रहण लगना आरंभ हो गया तब तो वहाँ के निवासी अत्यधिक भयभीत होकर दौड़े दौड़े आये और कोलम्बस के पैरों पर गिरकर प्रार्थना करने लगे कि वे उसकी सब इच्छा पूर्ण करने को तत्पर है। इस प्रकार कोलम्बस अपनी तथा अपने साथियों की प्राण रक्षा कर सका।

4. भावनात्मक मूल्यांकनपरक कथन शैली जहाँ कचनकर्ता भावावेश में भर जाता है, वहाँ भावनात्मक मूल्यांकनपरक कथन शैली होती है, जैसे “गुरु को गोविन्द से भी श्रेष्ठ और ऊँचा मानकर उसके आगे नतमस्तक होने की भावना और परम्परा, गुरु को गुरु दक्षिणा में अंगूठा काटकर दे देने के उदाहरण और आदर्श जहाँ की संस्कृति ने बड़े गर्व और आदर के साथ संजोकर रखे हों, वहाँ छात्रों द्वारा कॉलेज- कैम्पस से प्राध्यापक पर किये गये पथराव या स्कूल के मैदान पर शिक्षिका के लिए सिनेमा के सस्ते चलताऊ किस्म के गीत गाये जाने के वाकिये जब कहने-सुनने में आयें, तब शिक्षक ही नहीं कोई भी संवेदनशील व्यक्ति चिन्ता और सोच में पड़ जाता है और ऐसे में ‘शिक्षक दिवस’ सम्मान जैसे शब्द निरर्थक और खोखले लगने लगते हैं। आये दिन विद्यार्थियों की उदंडता और अनुशासनहीनता झेलने वाले शिक्षक का जब एक दिन मंच पर बैठाकर सम्मान किया जाता है, तब शिष्य का गुरु के प्रति आदर और श्रद्धा का प्रतीक मानकर उसे दिये जाने वाले श्रीफल और दुशाला महज एक औपचारिकता और दिखावा लगने लगे हैं। मन और व्यवहार में जब गुरु के प्रति सम्मान की भावना न हो, तब सिर्फ एक परिपाटी को निभाने भर के लिए प्रदर्शित किया गया सम्मान सार्थक लगेगा भी कैसे ?”

5. तार्किक मूल्यांकनपरक कथन शैली जहाँ तर्क के आधार पर व्यक्ति, स्थान, वस्तु या घटना के गुण-दोष चित्रित किये जायें, वहाँ तार्किक मूल्यांकनपरक कवन शैली होती है, जैसे- “लताजी की नजरों में सलिल दा (सलिल चौधरी) लोकसंगीत के जीते-जागते सागर थे। आशाजी को जब कभी वे गाने के लिए बुलाते, तो वे इस निमन्त्रण को चुनौती मानकर चली जाती थीं। मुकेश को उनकी धुनों पर गाने का सदैव गर्व रहा है। अनिल विश्वास, सी. रामचन्द्र तथा सचिन देव के वे प्रशंसक रहे. लेकिन लोकप्रिय संगीतकार ओ. पी. नैय्यर और शंकर जयकिशन उनकी नजर में महान नहीं थे। नौशाद और जयदेव जैसे शास्त्रीय धुन आधारित संगीतकारों के बारे में उनकी राय एक सीमा तक ठीक थी। माटी की महक को अपनी धुनों में ढालने वाला यह संगीतकार जीवन के अन्तिम दिनों में गुमनामी का जीवन जी रहा था।”

6. तुलनात्मक मूल्यांकनपरक कथन शैली जहाँ दो या दो से अधिक व्यक्ति, वस्तु, स्थान या घटना की गुण-दोष के आधार पर तुलना की जाये, वहाँ तुलनात्मक मूल्यांकन कथन-शैली होती है, जैसे- “जापान ने विश्वविद्यालयीन खेलों में फुटबॉल का खिताब जीतकर स्वर्ण पदकों की होड़ में अमेरिका को पीछे छोड़ दिया। जापान के अब कुल 22 स्वर्ण पदक हैं, जबकि अमेरिका ने 21 स्वर्ण पदक हासिल किये हैं। कुल पदकों में अमेरिका अब भी 63 पदकों के साथ पहले स्थान पर बना हुआ है। जापान के कुल 61 पदक है।” इसमें जापान और अमेरिका की तुलना है।

7. वैयक्तिक मूल्यांकनपरक कथन शैली जहाँ किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान या घटना का प्रशंसात्मक मूल्यांकन किया जाये, वहाँ वैयक्तिक मूल्यांकनपरक कथन शैली होती है, जैसे “जर्मनी की स्टेफी ग्राफ ने स्पेन की आरांचा सांचेज विकारियचों को हराकर फ्रेंच ओपन टेनिस प्रतियोगिता का महिला एकल खिताब चौथी बार जीत लिया है। इस जीत से ग्राफ ने अपने टेनिस कैरियर में अब तक 16 ग्रैंड स्लैम एकल खिताबों पर कब्जा कर लिया है। पहली बार उन्होंने ग्रैंड स्लैम खिताब 1987 में जीता था।”