“वित्त उद्योग की धमनियों में प्रवाहित होने वाला रक्त है।” इस कवन की उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।

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वित्त का महत्व  (Significance of Finance)

वास्तव में यह कथन कि वित्त आधुनिक उद्योग का जीवन-रक्त है पूर्णतः सत्य है क्योंकि वित्त के बिना वर्तमान समय में कोई भी व्यवसाय या उद्योग या निगम अपने कार्यों को संचालित नहीं कर सकता। अतः वित्त व्यावसायिक कार्यों की सफलता की कुन्जी है। एक उपक्रम में वित्त का वही कार्य होता है जो कि इंजन में तेल का बिना पर्याप्त वित्त के कोई भी उपक्रम या उद्योग जीवित नहीं रह सकता है क्योंकि उसके प्रत्येक स्तर पर वित्त की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वर्तमान युग में वित्त व्यावसायिक अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए जीवन-रक्त है, वित्त व्यावसायिक क्रियाओं का मूल आधार है, वित्त के बिना व्यावसायिक क्रियाएँ सुचारू रूप से नहीं चल सकती हैं, इसीलिए डॉ. सी. पी. श्रीवास्तव ने कहा है कि, “वित्त उद्योग एवं वाणिज्य के पहियों के लिए तेल, हड्डियों का सार, नाड़ियों का रक्त और सभी व्यवसायों की आत्मा है।” इसीलिए यह कहा जा सकता है कि वित्त के अभाव में अच्छी से अच्छी योजनाएँ केवल कागजों पर ही रखी रह जाती है और यदि पर्याप्त वित्त के अभाव में किसी प्रकार योजना को कार्य रूप दे भी दिया जाये तो बाद में उसके संचालन व नियन्त्रण में अनेक कठिनाइयों उत्पन्न होती है। अतः उचित सिद्धान्तों एवं रीतियों के आधार पर पर्याप्त वित्त की व्यवस्था करके, उस पर अनुकूल नियंत्रण रखकर उसे उत्पादन कार्यों में लगाया जाना चाहिए। निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि निगम के लिए सुदृढ़ वित्तीय प्रबन्ध सफलता की कुंजी है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि वित्तीय प्रबन्ध निश्चित सिद्धान्तों के आधार पर करना चाहिए। व्यावसायिक क्षेत्र में तीव्र औद्योगिक विकास की नीति ने वित्तीय प्रबन्ध को अधिक महत्त्वपूर्ण बना दिया है। आज किसी भी व्यावसायिक उपक्रम में उत्पादन, वित्त, विपणन एवं सेवीवर्गीय क्रियाओं को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है, किन्तु वित्तीय प्रबन्ध को सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है, क्योंकि उपक्रम की अन्य सभी क्रियाओं की सफलता वित्त पर निर्भर करती है। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि वित्त समस्त व्यापार, वाणिज्य एवं उद्योग की आत्मा है। वित्तीय प्रबन्ध के महत्व को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

(1) व्यावसायिक सफलता का निर्णायक किसी भी व्यवसाय की सफलता वित्त पर ही निर्भर करती है। यदि व्यवसाय को समय पर वित्त उपलब्ध हो जाता है तो व्यवसाय सफल हो सकता है, अन्यथा नहीं। यदि व्यवसाय में कार्यशील पूंजी के लिए पर्याप्त मात्रा में वित्त उपलब्ध है, और पर्याप्त मात्रा में लाभ हो रहे हैं तो इसे एक सफल व्यावसायिक संगठन कहा जा सकता है।

(2) साधनों का अनुकूलतम उपयोग-वित्तीय प्रबन्ध उपक्रम में साधनों के अनुकूलतम उपयोग पर बल देता है। वास्तव में कभी-कभी वित्त की अपर्याप्तता व्यवसाय की असफलता का कारण नहीं होती, बल्कि यह कोष का कुप्रबन्ध ही है जो इसके लिए उत्तरदायी है। वित्तीय प्रबन्ध उपक्रम के साधनों के अधिकतम विदोहन एवं सदुपयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ पूँजी सीमित है, वित्तीय साधनों का सदुपयोग विशेष महत्व रखता है। यह पूँजी कोषों की उत्पादकता में वृद्धि करके अधिकतम परिणाम प्राप्त करता है।

(3) निर्णय का केन्द्र बिन्दु- वर्तमान समय में व्यवसाय का आकार बढ़ गया है व नियमों का विकास हो रहा है। ऐसे समय में निर्णय अनुमान के आधार पर ही नहीं वरन वैज्ञानिक आधार पर लिए जाते हैं। अनेक निर्णय वित्त से सम्बन्धित होते हैं, अतः व्यवसाय में ये निर्णय वित्त की उपलब्धि के आधार पर लिये जाते हैं। वित्त व्यवसाय में उचित निर्णय लेने के लिए ठोस आधार प्रदान करता है। ऐसे वित्तीय निर्णय व्यवसाय में नहीं लिए जाने चाहिए जो जोखिम में वृद्धि करते हो वरन् ऐसे निर्णय लिये जाने चाहिए जो लाभदायकता में वृद्धि करे।

(4) कार्य निष्पत्ति का मापक वित्त कार्य निष्पत्ति के मापक रूप में कार्य करता है, वित्त व्यवसाय का साधन ही नहीं साध्य भी है। वित्तीय निर्णय आय की मात्रा तथा व्यावसायिक जोखिम इन दोनों को प्रभावित करते हैं। अतः आज भी उपक्रम के विभिन्न कार्यों की निष्पत्ति एवं व्यवसाय की सफलता का मूल्यांकन वित्तीय परिणामों द्वारा मापा जाता है। वित्त, लाभदायकता व जोखिम में संतुलन स्थापित करता है। जोखिम उठाये बिना लाभ नहीं होता है तथा लाभ की सम्भावना के बिना जोखिम उठाना निर्थक है।

(5) नियोजन, समन्वय एवं नियंत्रण का आधार-वित्तीय प्रबन्ध उपक्रम में नियोजन, समन्वय एवं नियन्त्रण हेतु आधार प्रस्तुत करता है। नियोजन का उद्देश्य कोषों का प्रभावपूर्ण उपयोग होता है। वित्तीय पूर्वानुमानों द्वारा योजनाओं और विभिन्न बजटों का निर्माण किया जाता है जो कि नियोजन के आधार होते हैं। व्यवसाय के विभिन्न क्रिया-कलापों में समन्वय का कार्य बजटरी नियंत्रण द्वारा सम्पन्न किया जाता है जिसमें विभिन्न कार्यों के लिए अपेक्षित समय एवं लागतों के प्रमाप निर्धारित किये जाते हैं तथा विचलन पाये जाने पर सुधारात्मक कार्यवाही की जाती है।

(6) औद्योगीकरण का आधार-वित्त औद्योगीकरण का आधार है। वित्त के बिना औद्योगिक विकास सम्भव नहीं है। भारत में प्राकृतिक व मानव साधन बहुतायत से उपलब्ध हैं, किन्तु इनका उचित प्रयोग न होने के कारण देश अभी भी अविकसित है। इन साधनों का उचित प्रयोग न होने का प्रमुख कारण देश में वित्त का अभाव है। इसी कारण सरकार ने अनेक वित्तीय संस्थाओं की स्थापना की है, जिससे देश औद्योगीकरण के मार्ग पर अग्रसर हो सके।

(7) आर्थिक नीतियाँ- देश की आर्थिक नीतियाँ भी वित्त से प्रभावित होती हैं। विदेशी सहायता सम्बन्धी नीति, राष्ट्रीय आय नीति, कर नीति, व्यय नीति, औद्योगिक नीति आदि सभी देश में वित्त की उपलब्धि से प्रभावित होती है। भारत में वित्त की कमी के कारण ही विदेशी पूँजी का स्वागत किया गया विभिन्न प्रकार की विदेशी सहायता ली गई। देश में अपार पूँजी का विनियोग हो रहा है। वित्त की आवश्यकता पूरी करने के लिए ही देश में घाटे की अर्थव्यवस्था अपनाई गई है।

(8) अन्य पक्षों के लिए महत्व-वित्त का न केवल व्यवसाय में महत्व होता है, वरन् अनेक पक्ष ऐसे हैं जिनकी दृष्टि में भी वित्त का महत्व होता है। व्यवसाय के अतिरिक्त अंशधारी विनियोक्ता, वित्तीय संस्थाएँ, समाजशास्त्री, सरकार आदि सभी पक्षों की दृष्टि से वित्त का महत्व होता है जैसे कि निम्न विवेचन से स्पष्ट है

(a) अशधारियों के लिए महत्व कम्पनी के स्वामी अंशधारी होते हैं जो संख्या में अधिक होने के कारण कम्पनी के प्रबन्ध में प्रत्यक्ष भाग नहीं ले सकते। प्रबन्ध का कार्य अंशधारियों द्वारा चुने हुए संचालकों द्वारा किया जाता है। संचालक अंशधारियों के हित में किस प्रकार कार्य करते हैं, यह देखना अंशचारियों का कार्य है। यदि अंशधारियों को वित्तीय प्रथव्य के सिद्धान्तों की जानकारी है तो ये कम्पनी की आर्थिक स्थिति का मूल्यांकन कर सकते हैं तथा वार्षिक सभा में सुझाव दे सकते हैं। यदि संचालक उनके हितों के विरुद्ध कोई कार्य करते हैं तो वे उन्हें हिंसा करने से रोक भी सकते हैं।

(b) विनियोजकों के लिए महत्व देश के अधिकांश विनियोजक अपनी संचित पूँजी का विनियोग कम्पनियों के अंशों एवं ऋणपत्रों में करते हैं। उनका मार्गदर्शन करने के लिए देश में यदि विनियोजको को वित्तीय प्रबन्ध के सिद्धान्त और व्यवहार का ज्ञान हो तो वे विभिन्न प्रतिभूतियों एवं उनकी संस्थाओं की तुलना करके सर्वश्रेष्ठ प्रतिभूतियों का चयन कर सकते हैं।

(c) वित्तीय संस्थाओं के लिए महत्व-विभिन्न वित्तीय संस्थाओं, जैसे व्यापारिक बैंकों, विनियोग बैंकों, प्रन्यास कम्पनियों, अभिगोपको स्वीकृत गृहों, षट्टा गृहों आदि के प्रबन्धकों को वित्तीय प्रबन्ध के विस्तृत ज्ञान की आवश्यकता होती है। यदि इन्हें वित्तीय प्रबन्ध का पर्याप्त ज्ञान नहीं है तो वे लगत प्रतिभूतियों में विनियोग कर सकते हैं अथवा ऐसी संस्थाओं को उधार दे सकते हैं जिसकी वित्तीय स्थिति सुदृढ़ न हो।

(d) राजनीतिज्ञों एवं अर्थशास्त्रियों के लिए महत्व- वित्तीय प्रबन्ध के ज्ञान से राजनीतिज्ञ व अर्थशास्त्री यह निर्णय ले सकते हैं कि कौन-सा कार्य सार्वजनिक क्षेत्र में किया जाना चाहिए व कौन-सा कार्य निजी क्षेत्र के लिए छोड़ देना चाहिए। वे वित्तीय प्रबन्ध के ज्ञान से सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की दशा सुधारने के लिए उचित नीति का निर्धारण भी कर सकते हैं।

(e) सरकार के लिए महत्व – प्रत्येक देश में आर्थिक विकास हेतु करोड़ों रुपयों का प्रतिवर्ष विनियोग किया जाता है। इस विनियोग की सफलता वित्तीय प्रबन्ध की प्रभावशीलता पर निर्भर करती है। भारत जैसे नियोजित अर्थव्यवस्था वाले देश में पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के औद्योगिक उपक्रमों में करोड़ों रुपयों का पूँजी विनियोग किया गया है।