वित्त कार्य की परिभाषा दीजिए। वित्त कार्य की प्रकृति तथा क्षेत्र की विवेचना कीजिए।

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वित्त कार्य से आशय एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Finance Function)

वित्तीय कार्य से आशय किसी व्यावसायिक संस्था की वित्त सम्बन्धी समस्याओं के अध्ययन एवं विश्लेषण से है। इसके अन्तर्गत वित्त की आवश्यकता का अनुमान लगाना, श्रेष्ठतम स्रोतों से वित्त प्राप्त करना, पूँजी के कलेवर का निर्माण करना, वित्त का उचित नियोजन करना आदि कार्यों को सम्मिलित किया जाता है।

(1) जे. एल. मैसी (J.L.. Massie) के अनुसार, “विश्व कार्य किसी व्यवसाय की यह संचालनात्मक क्रिया है जो प्रचलनों के लिए आवश्यक वित्त को प्राप्त करने और उसका प्रभावशाली रूप से उपयोग करने के लिए उत्तरदायी होती है।”

(2) आर. सी. ओसबोर्न (R. C. Osborn) के अनुसार, “वित्त कार्य से आशय व्यवसाय द्वारा कोषों की प्राप्ति एवं उनके उपयोग से सम्बन्धित प्रक्रिया से है।”

इस प्रकार स्पष्ट है कि वित्त कार्य में वित्त से सम्बन्धित समस्त पहलुओं, प्रथाओं एवं सिद्धान्तों का निरूपण किया जाता है; जैसे-अंशों व ऋण-पत्रों का निर्गमन, आन्तरिक वित्तीय नियन्त्रण, अतिरिक्त पूँजी की व्यवस्था, वित्तीय संकटों का निराकरण, संचित कोष, हास तथा लाभांश नीतियों आदि को शामिल किया जाता है।

वित्त कार्य की प्रकृति (Nature of Finance Function)

विभिन्न स्रोतों से पूँजीगत कोर्यों को जुटाने तथा उन्हें प्रत्याय प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रयोग कर कोष पूर्ति करने वालों को उस प्रत्याय का भुगतान करने की क्रिया को वित्त कार्य कहा जाता है। पूँजीगत कोषों को स्वामित्व कोष तथा ऋण कोष के माध्यम से जुवया जाता है। ये विनियोजक जो स्वामित्व कोष का अंशदान करते हैं, उन्हें अंशधारी कहा जाता है। ये ही कम्पनी के वास्तविक स्वामी होते हैं और ये अपने विनियोग पर लाभांश प्राप्त करते हैं। व्यवहार में ये स्वामी दो प्रकार के होते हैं समता अंशधारी तथा पूर्वाधिकारी अंशधारी जो विनियोजक कम जोखिम उठाना चाहते हैं और पूँजी की अपेक्षाकृत अधिक सुरका चाहते हैं वे पूर्वाधिकार अंश लेते हैं। इन अंशों पर लाभांश पूर्व निश्चित दर से दिया जाता है और यह भी समता अंशधारियों को लाभांश देने के पहले। यदि पूर्वाधिकारी अंशधारियों को लाभांश का भुगतान करने के बाद कुछ लाभ अचता है तो उसका भुगतान समता अंशधारियों को दिया जाता है। यदि नहीं तो कोई भुगतान नहीं दिया जाता।

अनेक विनियोजक इस प्रकार के होते हैं जो जोखिम नहीं उठाना चाहते और विनियोग की सुरक्षा चाहते हैं तो वे उधार कोष के रूप में धन कम्पनी को उपलब्ध करते हैं ऐसे उधार कोष पर दिया जाने वाला प्रत्याय, ब्याज कहलाता है। ब्याज का भुगतान करना कम्पनी का वैधानिक दायित्व होता है। उधार कोष शोधनीय भी हो सकते हैं। इन उधार कोषों को बैकों, वित्तीय संस्थाओं, ऋणपत्रधारियों तथा अन्य लोगों से जुटाया जाता है। कज्वनी एकत्रित किये गये कोषों का प्रयोग कर लाभार्जन करती है और इन्ही लाभों से विनियोजकों को प्रत्याय का भुगतान करती है। लेकिन प्रायः वह आर्थिक सुदृढ़ता बनाये रखने तथा अतिरिक्त साधन जुटने के उद्देश्य से समस्त उपलब्ध लाभों को प्रत्याय के रूप में नहीं बाँटती और कुछ लाभ को आधि के रूप में संस्था में ही रोक लेती है। वास्तव में यह रोका गया लाभ समता अंशधारियों का होता है

विभिन्न स्रोतों से जुटाये गये कोरों की सहायता से कम्पनी अपनी विभिन्न परियोजनाओं की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करती है। परियोजना में कोष का उपयोग भावी लाभ की प्रत्याशा में किया जाता है। कोष का उपयोग जितना अधिक प्रभावकारी ढंग से किया जाता है, कम्पनी की आय उतनी ही अधिक होती है। व्यवहार में वित्तीय कार्य के अन्तर्गत कोषों को चुना तथा उनका प्रभावी उपयोग सम्मिलित किया जाता है। इसलिए वित्त कार्य का अन्तर्सम्बन्ध उत्पादन तथा विपणन से भी स्थापित किया जाता है। उत्पादन तथा विपणन ही वह क्रियाकलाप है जिनमें कोषों का उपयोग अधिक प्रभावकारी ढंग से किया जाता है। कर्मचारियों की नियुक्ति, उनके वेतन आदि का भुगतान, प्रशिक्षण तथा पदोन्नति, सामग्री का क्रय, उनका भण्डारण तथा उपयोग, मशीन की क्रय तथा उनकी स्थापना आदि कार्य उत्पादन क्रियाकलाप में सम्मिलित किये जाते हैं और इन समस्त कार्यों में कोष का प्रयोग निहित होता है। उत्पादित वस्तु सेवाओं के विक्रय का उत्तरदायित्व विपणन के अन्तर्गत आता है। विक्रय प्रवर्तन कार्यों में कोष का उपयोग किया जाता है। परिणामस्वरूप जो विक्रय होता है उसमें भी कोष की प्राप्ति होती है।

वित्त कार्य की प्रकृति का अध्ययन करने के लिए हमें इस तथ्य का परीक्षण करना होगा कि यह विज्ञान है या कला अथवा दोनों विज्ञान एवं कला के रूप में प्रबन्ध की प्रकृति को समझने के लिए पहले यह जानना आवश्यक है कि ‘विज्ञान’ एवं ‘कला’ का क्या अर्थ है, इसके बाद ही हम यह निर्णय कर सकते हैं कि व्यावसायकि वित्त विज्ञान’ है या ‘कला’ अथवा दोनों।

व्यावसायिक वित्त एक विज्ञान है-किसी भी प्रकार का व्यवस्थित ज्ञान जो किन्हीं सिद्धान्तों पर आधारित हो, विज्ञान कहलाता है। यह ग्राम का वह स्वरूप है जिसमें अवलोकन व प्रयोग द्वारा सिद्धान्त प्रतिपादित किये जाते हैं तथा कारण एवं परिणाम में सम्बन्ध स्थापित किया जाता है।

यदि विज्ञान के अर्थ की कसौटी पर व्यावसायिक वित्त को परखा जाये तो निश्चित रूप से इसे विज्ञान की श्रेणी में रख सकते हैं। आधुनिक समय में व्यावसायिक वित्त के भी अनेक सिद्धान्त है जिनका प्रतिपादन वित्तीय समस्याओं के कारण और परिणाम के रूप में किया गया है। वित्तीय विश्लेषण हेतु अनेक सांख्यिकीय तथा गणितीय विधियाँ उपलब्ध है जिनका वित्तीय समस्याओं के निराकरण हेतु प्रयोग किया जाता है। वित्तीय निष्पादन के विश्लेषण हेतु अनुपात विश्लेषण, प्रवृत्ति विश्लेषण, कोष-प्रवाह विश्लेषण, विचरण विश्लेषण, लागत मात्रा-लाभ विश्लेषण अनेक महत्वपूर्ण तकनीकों का प्रयोग किया जाता है। वस्तुतः वित्तीय प्रबन्ध के आधुनिक सिद्धान्तों की समुचित जानकारी के बिना वित्तीय प्रबन्धक अपनी भूमिका का निर्वाह भली प्रकार नहीं सकते। वित्तीय प्रबन्ध के सिद्धान्तों के पूर्ण ज्ञान के आधार पर ही वे ठीक-ठीक वित्तीय नीतियों का निर्धारण और परिपालन कर पाते हैं।

व्यावसायिक वित्त एक कला है-किसी भी कार्य को श्रेष्ठ ढंग से कैसे किया जाए, यह उस कार्य के कला-पक्ष को दर्शाता है। दूसरे शब्दों में, उपलब्ध ज्ञान एवं कौशल को व्यावहारिक रूप देना ही कला है।

व्यावसायिक वित्त को कला के अर्थ की कसौटी पर परखने से स्पष्ट होता है कि कला के लक्षण व्यावसायिक वित्त में भी पाए जाते हैं, क्योंकि वित्तीय अधिकारी व्यावसायिक वित्त की अनेक समस्याओं (जैसे, वित्तीय नियोजन, वित्तीय नियन्त्रण, विनियोग तथा स्थिर और चल सम्पत्तियों का प्रवन्ध लाभ-नियोजन, मूल्य निर्धारण नीति, पूँजी बजटिंग एवं पूँजी की लागत, आदि) का व्यावसायिक वित्त के सिद्धान्तों को ध्यान में रखते हुए ही बुद्धिमत्ता व सूझबूझ से समाधान करता है। अतः कहा जा सकता है कि व्यावसायिक वित्त एक कला भी है।

वित्त कार्य का क्षेत्र (Scope of Finance Function)

वित्त क्रिया के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के निर्णय लिये जाते हैं जो कोषों को जुटाने तथा उनके प्रभावी प्रयोग से सम्बन्धित होते हैं। इसलिए वित्त क्रिया के क्षेत्र को स्पष्ट करने के लिए निर्णयों का विश्लेषण करना आवश्यक होता है। वित्त क्रिया से सम्बन्धित निर्णय निम्नलिखित है

(1) विनियोग निर्णय (Investment Decision) इसके अन्तर्गत कोषों के प्रयोग के सम्बन्ध में निर्णय लिया जाता है कि किस परियोजना का वित्तीयकरण किया जाये और किसका नहीं। वास्तव में यह पूंजी के आवंटन तथा दीर्घकालीन सम्पत्तियों के कोर्यों के लगाने के लिए निर्णय से सम्बन्धित होता है। क्या वास्तव में एक निश्चित उद्देश्यों के लिये पूँजीगत कोर्यों को लगायें ? क्या अतिरिक्त पूँजी में निहित लागत तथा जोखिम की क्षतिपूर्ति के लिए सम्भावित प्रत्याय पर्याप्त है ? किस विशिष्ट के सम्पत्ति को व्यवसाय द्वारा क्रय किया जाना चाहिये ? आदि निर्णय से सम्बन्धित होते हैं।

(2) वित्तीय निर्णय (Financing Decision) वित्तीय निर्णय के अन्तर्गत व्यवसाय विनियोग के लिए आवश्यक कोष की माँग को पूरा करने के लिए किन स्रोतों से, किस प्रकार और कितनी मात्रा कोष उपलब्ध कराया जाये, का अध्ययन करता है। एक कम्पनी कोष की कितनी मात्रा विनियोजित करे ? आवश्यक कोष को किस प्रकार जुटाया जाये ? एक कम्पनी किस प्रकार और कितनी तेजी से विकास करे ? एक कम्पनी सम्पत्तियों को किन स्वरूपों में रखे ? उसके दायित्वों का क्या मिश्रण हो ? आदि के बारे में निर्णय वित्तीय निर्णय से सम्बन्धित होता है। दूसरे शब्दों में, व्यावसायिक संस्था का पूँजी ढाँचा निश्चित करने, अंश पूँजी तथा ऋण पूँजी आदि एकत्र करने से सम्बन्धित कार्य वित्तीय निर्णय के अन्तर्गत सम्मिलित किये जाते हैं। इस क्रिया के अन्तर्गत पूँजी की लागत तथा जोखिम एवं सम्भावित प्रत्याय में सन्तुलन स्थापित करने का प्रयास किया जाता है।

(3) लाभांश सम्बन्धी निर्णय (Dividend Decision) यह लाभांश नीति से सम्बन्धित होता है। इसके अन्तर्गत यह निर्णय लिया जाता है कि व्यवसाय द्वारा अर्जित आय में से कितना भाग अंशधारियों को लाभांश के रूप में बाँटा जाये और कितने भाग को प्रतिधारित आय के रूप में व्यवसाय में ही रोके रखा जाये। सुदृढ वित्तीय नीति के लिए आन्तरिक पूँजी निर्माण आवश्यक है और आन्तरिक पूँजी निर्माण प्रतिधारित आय का परिणाम होता है, फिर भी एक अनुकूलतम लाभांश नीति का निरूपण किया जाना चाहिये जिससे कि प्रति अंश अधिकतम बाजार मूल्य इंगित हो सके। लाभांश स्थिरता, अंश लाभांश तथा नकद लाभांश में पारस्परिक समन्वय स्थापित किया जाना चाहिये। जिससे विनियोजकों में निराशा न विकसित हो।