विक्रय सम्बर्द्धन की उन तकनीकों का विवेचन कीजिए जिनका प्रयोग एक निर्माता द्वारा फुटकर व्यापारियों के प्रोत्साहन हेतु किया जाता है।

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फुटकर व्यापारियों के लिए विक्रय सम्वर्द्धन की तकनीके (Techniques of Sales Promotion for Retailers)

विक्रय सम्बर्द्धन की ये तकनीकें अग्रलिखित हैं जिनका प्रयोग एक निर्माता या उत्पादक द्वारा फुटकर व्यापारियों एवं थोक व्यापारियों को अधिक विक्रय करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है

(1) प्रदर्शन तथा विज्ञापन भत्ता (Display and Advertising Allowance)- थोक व्यापारी तथा फुटकर व्यापारी दोनों की हार्दिक इच्छा माल का अधिकाधिक विक्रय करने की होती है क्योंकि जितनी अधिक बिक्री होगी, उन्हें उतना ही अधिक लाभ होगा। इसके लिए वे विभिन्न प्रकार के प्रदर्शन अथवा विज्ञापन आदि की योजनाएँ क्रियान्वित करने के लिए तत्पर रहते हैं, किन्तु उन पर होने वाले अत्यधिक व्यय के भय से वे ऐसा नहीं कर पाते किन्तु यदि उन्हें प्रदर्शन तथा विज्ञापन करने के लिए कुछ भत्ता दिया जाये तो वे प्रदर्शन तथा विज्ञान के कार्य में निश्चित रूप में रुचि लेंगे। इससे विक्रय वृद्धि होती है। विक्रय वृद्धि होने से मध्यस्थों को भी लाभ होता है। इसी प्रकार से विक्रय-संवर्द्धन की किसी भी योजना का निर्माण करते समय थोक व्यापारियों एवं फुटकर व्यापारियों को प्रदर्शन तथा विज्ञापन भत्ता देने का पहले ही प्रावधान कर लिया जाता है। इस भत्ते के साथ-साथ कभी-कभी इस कार्य के लिए उन्हें कुछ निःशुल्क सामग्री भी प्रदान की जाती है, जैसे-डायरियाँ, कैलेण्डर्स, विक्रय-पुस्तिकाएँ, सिनेमा स्लाइड्स, हैण्ड बिल्स, साइनबोर्ड, सूची-पत्र, पैकिंग करने के लिए मुद्रित लिफाफे, पोस्टर्स, आदि।

(2) सामान्य एवं विशेष प्रशिक्षण प्रदान करना- प्रशिक्षण का व्यापार-सम्वर्द्धन विधियों में महत्त्वपूर्ण स्थान है। मध्यस्थों एवं विक्रेताओं को वस्तु विशेष के विक्रय के सम्बन्ध में सामान्य तथा विशिष्ट प्रशिक्षण निर्माता द्वारा दिया जाता है। सामान्य प्रशिक्षण के अन्तर्गत उसे उस वस्तु विशेष के विषय में विशिष्ट एवं तकनीकी जानकारी दी जानी चाहिए। अप्रशिक्षित विक्रेता चाहे वह विक्रय-कला या विक्रेता हो अथवा प्रवासी अपने ग्राहकों की जिज्ञासा कभी शान्त नहीं कर सकता। वह अपने अज्ञान के कारण व्यवसाय की ख्याति को भी ठेस पहुँचाता है। इसके विपरीत, प्रशिक्षित विक्रेता अपने ग्राहकों को सब तरह से सन्तुष्ट कर विक्रय-संवर्द्धन में सहायक होता है। ये कार्यक्रम प्रायः 3-4 सप्ताह के अथवा इससे भी कम अवधि के होते हैं। इन कार्यक्रमों में विक्रेताओं को वस्तु के विक्रय में तथा विक्रय कला के विषय में पूर्ण अवगत करा दिया जाता है। सामान्य व्यापार नीति एवं विक्रय कला प्रशिक्षण तो प्रत्येक व्यापारी को अपने विक्रेताओं को देना होता है किन्तु विशिष्ट ज्ञान ऐसे विक्रेताओं के लिए आवश्यक होता है जो तकनीकी वस्तुएँ बेचते हैं।

(3) मध्यस्थों एवं विक्रेताओं के मध्य प्रतिस्पर्द्धा का आयोजन-निर्माता मध्यस्थों तथा विक्रेताओं के मध्य प्रायः विक्रय वृद्धि के लिए स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा को विकास करते हैं। उनके लिए विक्रय अभ्यंश आबण्टित कर दिया जाता है। इससे अधिक राशि का विक्रय करने पर सर्वाधिक विक्रय करने वाले विक्रेता को पुरस्कृत किया जाता है। इस प्रतियोगिता के फलस्वरूप विक्रय में वृद्धि होती है अतः इसके उपलक्ष में विक्रेता के पारिश्रमिक में स्थायी वृद्धि नहीं की जा सकती है। उसे बोनस अथवा अन्य किसी प्रकार पुरस्कृत किया जाता है। प्रतियोगिता आयोजित करने के प्रमुख उद्देश्य निम्न है

(i) नये ग्राहक बनाना। (ii) मध्यस्थों में प्रतियोगी भावना से उनकी कार्यक्षमता में वृद्धि तथा आत्मविश्वास को सबल बनाना। (iii) नवीन बाजारों की खोज करना तथा कालान्तर में उन पर आधिपत्य जमाना (iv) नवीन वस्तुओं को बाजार में प्रचार व प्रचलन करना।

(4) सम्मेलन आयोजित करना-निर्माता कभी-कभी अपने व्यापारियों के क्षेत्रीय सम्मेलन भी आयोजित करते हैं जिनमें विक्रय व वितरण सम्बन्धी समस्याओं पर विचार-विमर्श किया जाता है। चितरक अपनी समस्याएँ निर्माता के समक्ष प्रस्तुत करते हैं और आपसी विचार-विमर्श द्वारा इनका समाधान खोजा जाता है। इन सम्मेलनों में विक्रय-नीति का स्पष्टीकरण भी कर दिया जाता है। यदि किसी प्रकार का कोई परिवर्तन किया जाता है तो सभी व्यापारियों को इससे अवगत करा दिया जाता है। ऐसे सम्मेलनों के आयोजन से आपसी सहयोग की भावना को बल मिलता है जो विक्रय-सम्वर्द्धन के लिए सहायक सिद्ध होता है।

(5) उपयुक्त साख-सुविधा प्रदान करना- उपयुक्त साख भीति का निर्माण व अनुसरण व्यापार की सफलता के लिए अपरिहार्य है। कोई भी व्यापार बिना साख के नहीं चल सकता किन्तु विवेकहीन साख सुविधा का प्रसार व्यापार के लिए घातक भी सिद्ध हो सकता है। साख कब, कितनी और किसको, कितनी अवधि के लिए दी जाय, यह परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। केवल विक्रय वृद्धि ही पर्याप्त नहीं, विक्रय राशि की वसूली इससे भी अधिक आवश्यक है।

(6) विपणि अन्वेषण कार्य (Market Research Work)-विपणि अन्वेषण के अन्तर्गत विपणि विश्लेषण, विक्रय अन्वेषण, उपभोक्ता तथा विज्ञापन अन्वेषण आदि समस्त क्रियाएँ आती है। विक्रय-सम्वर्द्धन विपणि अन्वेषण का कार्य भी हाथ में ले लेते हैं किन्तु बड़े-बड़े व्यापारी निष्पक्ष विशेषों के द्वारा स्वतन्त्र रूप से विपणि अन्वेषण कार्य करवाते हैं। अन्वेषण की आवश्यकता नवीन वस्तु के विपणन के लिए पुरानी वस्तु विक्रय स्तर से जुड़े हो जाने के कारण, गिर जाने के कारण अथवा पुरानी वस्तु के परिवर्तित नवीन माल को बाजार में लाने के लिए हो सकती है। यह कार्य प्रश्नावलियाँ प्रसारित कर, विज्ञापनों की कुंजी पद्धति अपनाकर, वितरकों की राय जानकर अथवा विशेषज्ञों से विचार-विमर्श द्वारा किया जा सकता है।