व्याख्यात्मक शैली की सोदाहरण विवेचना कीजिए।

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व्याख्यापरक शैली का आशय ‘व्याख्या’ शब्द का अर्थ है, विशेष आख्या अर्थात किसी अस्पष्ट अथवा जटिल विषय-वस्तु को समझाकर प्रस्तुत करने की विधि इस विधि या शैली में वक्ता या लेखक स्वयं सूत्र रूप में अपनी बात की व्याख्या करता है, जिसे श्रोता आसानी से समझ सके। इस शैली में प्रायः वक्ता या लेखक सूत्र बात को समझाने के लिए कहानी, उदाहरण इत्यादि का सहारा लेता है। इस प्रकार एक ही कथन को विस्तारपूर्वक समझाता है। अतः ऐसी कथन शैली व्याख्यापरक कथन शैली कहलाती है।

उदाहरण-कर्म में आनन्द अनुभव करने वालों का ही नाम कर्मण्य है।” इन पंक्तियों में बताया गया है कि कर्मण्य व्यक्ति किसे कहा जाता है। कर्म करने में आनन्द प्राप्त होता है। कर्म करने से आनन्द मिलना ही कर्म की ओर आकृष्ट होने का कारण है। कर्म और आनन्द का सम्बन्ध बताया गया है। कर्मण्य व्यक्ति की परिभाषा बताई गई है।

इन पंक्तियों में कर्म, आनन्द का सम्बन्ध, कर्म करने वाले व्यक्ति की परिभाषा इत्यादि के विषय में सूत्रात्मक रूप में कहा गया है, जिसे व्याख्या करके ही अधिक स्पष्टता के साथ समझाया जा सकता है। यह आवश्यक नहीं है कि हम जो कुछ भी कथन कह रहे हो उसे श्रोता पूरी तरह से समझ ही ले। अतः कई बार हमें हमारी बात के आशय को समझाना होता है। यही स्पष्टता के साथ समझाना

व्याख्यापरक शैली है। व्याख्यापरक शैली की विशेषताएँ व्याख्यापरक या व्याख्यात्मक कथन शैली में निम्नलिखित विशेषताएँ होती है—

1. इस शैली में सरल एवं सुबोध वाक्यों का प्रयोग किया जाता है।

2. इसमें दोहरे अर्थ वाले वाक्यों का प्रयोग नहीं किया जाता है।

3. व्याख्यापरक शैली में किसी बात को स्पष्ट करने के लिए उदाहरणों आदि की सहायता ली जाती है।

4. इसमें व्याख्या के सूत्र एक-दूसरे से सम्बद्ध रहते हैं।

5. अतः अतएव, वरन, किन्तु परन्तु, अर्थात् आदि अव्ययों का प्रयोग होता है।

6. पारिभाषिक शब्दों के अर्थ स्पष्ट किये जाते हैं।

7. व्याख्या को स्पष्ट करने के लिये यदि मान लिया जाए आदि वाक्यांशों का प्रयोग किया जाता है।

8. अध्यापन, व्याख्यान आदि में इस शैली का विशेष प्रयोग किया जाता है।

9. इस शैली में आवश्यकतानुसार किसी भी काल को व्यक्त करने वाली क्रियाओं का प्रयोग हो सकता है। यदि उदाहरण भूतकाल का है, तो क्रिया भी भूतकाल की होगी।

10. इस शैली में जिस बात या कथन की व्याख्या की जाती है, उसे सूत्र रूप में सर्वप्रथम प्रस्तुत किया जाता है, फिर उसकी व्याख्या की जाती है।