विपणन की वृहत् परिभाषा दीजिए तथा व्यवसाय कार्य के रूप में इसके महत्व की विवेचना कीजिए।

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विपणन का आशय एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Marketing)

सामान्यतया विपणन का अर्थ वस्तुओं के क्रय-विक्रय से लगाया जाता है, परन्तु विपणन विशेषज्ञ इसका अर्थ वस्तुओं के क्रय-विक्रय तक सीमित नहीं करते बल्कि क्रय एवं विक्रय से पूर्व एवं पश्चात् की क्रियाओं को भी इसका एक अंग मानते हैं। वर्तमान समय में विपणन शब्द का अर्थ अधिक विस्तृत हो गया है, जिसमें विक्रय के साथ-साथ ग्राहकों की सन्तुष्टि को विशेष मान्यता प्रदान की गयी है।

  • (1) पाइल (Pyle) के अनुसार, “विपणन में क्रय एवं विक्रय दोनों प्रकार की क्रियाओं को सम्मिलित किया जाता है।”
  • (2) व्हीलर (Wheeler) के शब्दों में, “विपणन उन समस्त संसाधनों एवं क्रियाओं से सम्बन्धित है, जिसमें वस्तुयें एवं सेवाएँ उत्पादक से उपभोक्ता तक पहुँचती है।”
  • (3) फिलिप कोटलर (Philip Kotler) के अनुसार, “विपणन मानवीय क्रियाओं का समूह है, जो विनिमय प्रक्रियाओं की सहायता से उपभोक्ता की इच्छाओं की सन्तुष्टि की ओर निर्देशित की जाती है। “
  • (4) पॉल मजूर (Paul Mazur) के अनुसार, “विपणन का अर्थ जीवन स्तर प्रदान करना होता है। “

भारतीय अर्थव्यवस्था में विपणन का महत्व (Importance of Marketing in Indian Economy) : विकासशील अर्थव्यवस्था में विपणन का विशेष महत्व है। ऐसी अर्थव्यवस्था का तीव्रगति से आर्थिक विकास करने के लिए विपणन के आधुनिक तरीकों को अपनाना आवश्यक है। ऐसी अर्थव्यवस्था के अन्तर्गत औद्योगिक एवं उपभोक्ता वस्तुओं का अधिकाधिक उत्पादन करने और उसका सफलतापूर्वक विक्रय करने के लिए विपणन सहायता प्रदान करता है। भारत जैसे विकासशील राष्ट्र के तीव्र आर्थिक विकास के लिए विपणन अत्यन्त उपयोगी है।

भारत ग्रामों का देश है तथा यह एक कृषि प्रधान देश भी है। यहाँ की अधिकांश जनता अभी भी अशिक्षित है। तब यह प्रश्न उठता है कि इस देश के लिए भी विपणन का कोई महत्व है, क्या भारतीय बाजारों में भी विपणन की कोई आवश्यकता है ?

यदि हम गम्भीरतापूर्वक विचार करें तो हमें यह मालूम होगा कि भारत में भी विपणन की बहुत अधिक आवश्यकता है, क्योंकि आज के तीव्र प्रतिस्पर्द्धा के युग में प्रत्येक व्यावसायिक प्रबन्ध में विपणन का महत्वपूर्ण योगदान है। यद्यपि भारत में स्वतन्त्रता से पूर्व विपणन को कोई विशेष महत्व नहीं दिया जाता था; परन्तु स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत में निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र में कई उद्योग खोले गये। कृषि के लिए व्यापक कार्यक्रम अपनाये गये। पूँजीगत एवं उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन में विभिन्नता आने लगी, हमारे देश के आयात एवं निर्यातों में भारी परिवर्तन हुए। इसके परिणामस्वरूप ग्राहकों की क्रय-शक्ति तथा आवश्यकताओं में भारी परिवर्तन हुआ, जिसका प्रभाव वस्तु एवं सेवाओं की माँग पर पड़ा। अतः भारत में विपणन के महत्व को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) देश के साधनों का सदुपयोग-विपणन कार्य उत्पादन से पूर्व प्रारम्भ होता है। विपणन की सफलता के लिए उत्पादन से पूर्व यह ज्ञात किया जाता है कि ग्राहक किस प्रकार की वस्तुएँ किन उद्देश्यों के लिए चाहते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि व्यवसायी उन्हीं वस्तुओं का उत्पादन करते हैं जिनकी ग्राहकों को आवश्यकता होती है। इससे वस्तुएँ व्यर्थ नहीं जाती है और देश के साधनों का सदुपयोग होता है।

(2) व्यापार-चक्रों से सुरक्षा-प्रभावकारी विपणन व्यवस्था माल की माँग एवं पूर्ति में सन्तुलन स्थापित करती है; इसके परिणामस्वरूप तेजी-मंदी का चक्र सन्तुलित रूप से चलता है।

(3) कृषि एवं सहायक उद्योगों का विकास-प्रभावकारी विपणन व्यवस्था से कृषि एवं सहायक उद्योगों के विकास को भी प्रोत्साहन मिलता है। कृषि उत्पादनों से अनेक वस्तुओं का निर्माण करके जीवनोपयोगी वस्तुएँ उपलब्ध की जा सकती है। दूसरी ओर कृषि तथा अन्य उद्योगों के लिए आवश्यक साज-सामान उपलब्ध करने के लिए सहायक उद्योगों का विकास होता है। इससे समन्वित विकास सम्भव होता है।

(4) जीवन-स्तर में वृद्धि “विपणन समाज को जीवन-स्तर प्रदान करता है।” विपणन से विद्यमान एवं नवीन उत्पादों के लिए माँग सृजित की जा सकती है। फलतः अधिक अच्छे उत्पादों की यथास्थान, यथासमय, उचित मूल्य पर उपलब्धि से ही लोगों के जीवन-स्तर में वृद्धि होती है। लोग अपेक्षाकृत अधिक आराम, सुख-सुविधा से जीवन गुजारते हैं; बीमारियों एवं अज्ञानता से मुक्ति प्राप्त करते हैं। इससे अधिक अच्छा जीवन-स्तर व्यतीत करने लगे हैं।

(5) रूढ़ियों एवं कुरीतियों से मुक्ति-प्रभावकारी विपणन व्यवस्था ने लोगों में ज्ञान का विकास एवं विस्तार किया है। लोगों के जीवन-स्तर में परिवर्तन हो रहा है, इससे सामाजिक रूढ़ियों एवं कुरीतियों से आसानी से मुक्ति मिलने लगती है। इससे सामाजिक परिवर्तन (Social change) होने लगता है। विपणन की नवीन विचारधारा ग्राहकों की सन्तुष्टि पर आधारित है। व्यवसायी ग्राहकों को अपनी सभी क्रियाओं का केन्द्र बिन्दु समझने लगता है और उसकी सन्तुष्टि में ही वह लाभ कमाने की सोचने लगता है।

(6) रोजगार में वृद्धि – विपणन कार्य से ही रोजगार में वृद्धि हुई है। आज प्रत्येक देश में बहुत बड़ी संख्या में लोग थोक व्यापार, फुटकर व्यापार, विज्ञापन, विक्रय-कला, विक्रय-संवर्द्धन, बाजार अनुसंधान आदि-आदि कार्यों में लगे हुए हैं। इन सबसे समाज में रोजगार के साधन उपलब्ध हो रहे हैं।

(7) आवश्यकताओं की पूर्ति-प्रभावकारी विपणन व्यवस्था में ग्राहकों की आवश्यकताओं, रुचियाँ, इच्छाओं आदि का महत्वपूर्ण स्थान होता है। “प्रभावकारी विपणन व्यवस्था ग्राहकों की आवश्यकताओं का पता लगाती है तथा उन्हें लाभकारी तरीके से सन्तुष्ट करने का प्रयास करती है।”

(8) बाजार सूचनाओं की जानकारी प्रभावकारी विपणन व्यवस्था सुदृद संचार व्यवस्था पर आधारित होती है। अतः ग्राहकों को बाजार सम्बन्धी सूचनाएँ प्राप्त होती रहती हैं। बाजार में उपलब्ध वस्तुओं, नवीन उत्पादित वस्तुओं के तथा वैकल्पिक वस्तुओं के सम्बन्ध में यथासमय जानकारी विज्ञापन, विक्रयकर्ता तथा विक्रय संवर्द्धन साधनों से प्राप्त होती ही रहती है।

(9) उचित मूल्य पर यथा समय वस्तुओं की प्राप्ति प्रभावी विपणन व्यवस्था पारस्परिक हितों की वृद्धि करने में सहायता करती है। फलस्वरूप, ग्राहकों को वस्तुएँ उचित मूल्य पर यथा समय उपलब्ध हो रही है। प्रतिस्पर्द्धात्मक परिस्थितियाँ व्यवसायियों को प्रतिस्पर्धी मूल्यों पर माल उपलब्ध कराने के लिए मजबूर कर रही हैं।

(10) ज्ञान में वृद्धि-विपणन की विविध क्रियाओं ने ग्राहकों के ज्ञान में वृद्धि की है। आज विज्ञापन एवं विक्रयकर्ताओं के माध्यम से सामान्य ग्राहक भी वस्तुओं के सम्बन्ध में विभिन्न प्रकार की जानकारी प्राप्त कर पा रहा है। वह तकनीकी वस्तुओं के उपयोग को भी उनकी सहायता से भली प्रकार समझ पा रहा है।

व्यवसाय कार्य के रूप में महत्व (Importance As a Business Function)

आधुनिक अर्थव्यवस्था में ग्राहक व्यावसायिक जगत् का केन्द्र बिन्दु बन गया है। सभी व्यावसायिक क्रियाएँ ग्राहक के चारों ओर चक्कर लगाती हैं। उपभोक्ता अवधारणा फलस्वरूप को अधिकाधिक मान्यता दिये जाने के कारण आर्थिक अवधारणा में क्रान्तिकारी परिवर्तन आ रहे हैं। फलस्वरूप विपणन का महत्व भी दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। यदि हम कुछ वर्ष पूर्व की स्थिति पर दृष्टिपात करें तो हमें ज्ञात होगा कि व्यवसाय के कार्यों में वित्त को प्रथम स्थान, उत्पादन को द्वितीय और विक्रय को तृतीय स्थान दिया जाता था परन्तु अब स्थिति में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं और व्यवसाय के कार्यों में विपणन को प्रथम स्थान दिया जाने लगा है। विकासशील अर्थव्यवस्था का तो यह मूलाधार है। भारत जैसे विकासशील देश में विपणन का विशेष महत्व है। विपणन के महत्व को निम्नलिखित शीर्षकों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है

(1) रोजगार प्रदान करना- विपणन ने रोजगार अवसरों की वृद्धि में पर्याप्त सहयोग दिया है। वास्तव में, उत्पादन की तुलना में रोजगार अवसरों में थोड़ी ही अवधि में चार गुनी वृद्धि हुई है। भारत में रोजगार में लगे हुए व्यक्तियों का लगभग एक-तिहाई भाग विपणन क्षेत्र में लगा हुआ है। अतएव भारत जैसे देश में, जहाँ कि बेरोजगारी व्यापक पैमाने पर व्याप्त है, विपणन क्रियाओं का विकास होना विशेष रूप में आवश्यक है।

(2) जीवन स्तर में वृद्धि करना- विपणन लोगों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए सामाजिक मूल्यों के अनुसार आर्थिक क्रियाओं को समायोजित करता है। इससे जनसाधारण के जीवन स्तर का विकास होता है। इस प्रकार देश में विभिन्न प्रकार की उत्तम कोटि की वस्तुएँ उपलब्ध कराके लोगों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाता है।

(3) वितरण लागतों को कम करने में सहायक इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि वितरण लागत अनिवार्य है, अतः पूर्ण रूप से इसकी समाप्ति सम्भव नहीं है परन्तु कुशल प्रक्रिया द्वारा वितरण लागत को कम अवश्य किया जा सकता है। वितरण लागत में कमी के फलस्वरूप वस्तुओं की कीमत में कमी हो जाती है जिससे उपभोक्ता लाभान्वित होते हैं।

(4) मन्दी से रक्षा प्रदान करना मन्दी से समाज में बेरोजगारी फैलने लगती है, व्यावसायिक उपक्रम बन्द होने लगते हैं और देश की अर्थव्यवस्था ठप्प पड़ जाती है। विपणन समाज को इस समस्या से बचाता है। समाज को मन्दी से बचाने के लिए विपणन उत्पादित माल के लिए नवीन बाजारों एवं प्रयोगों की खोज करता है जिससे उत्पादकों के पास माल के अधिक स्टॉक इकट्ठे न होने पायें ।

(5) व्यवसाय संचालन में सुविधा-प्रो. पीटर एफ. ड्रकर ने विपणन को एक व्यवसाय का नाम दिया है। उनके अनुसार संगठन में एक अलग से विपणन अधिकारों का होना अनिवार्य है। इसका कारण यह है कि व्यवसाय में विपणन की समुचित व्यवस्था के बिना उसे उचित ढंग से नहीं चलाया जा सकता है।

(6) निर्णयन एवं नियोजन में सहायक-उत्पादन सम्बन्धी निर्णय बाजार की स्थिति के अनुसार किया जाता है। जिन वस्तुओं का क्रय-विक्रय अधिक किया जाता है उन वस्तुओं की माँग के अनुसार अधिक उत्पादन किया जाता है। इसके अभाव में मॉंग व पूर्ति में सन्तुलन का अभाव बना रहता है। यही कारण है कि विपणन नियोजन व निर्णयन में सहायक होता है तथा मूल्य स्तर में समानता व स्थिरता बनी रहती है।

(7) उत्पादन तथा उपभोग में समन्वय-विपणन के माध्यम से उत्पादन से लेकर उपभोग तक का मार्ग आसानी से निपटाया जा सकता है जिससे उत्पादन तथा उपभोग में समन्वय स्थापित रहता हैं।

(8) बाजार का विभाजन करने में सुविधा वर्तमान युग में उपभोक्ता की माँग के अनुसार उत्पादन किया जाता है, जिनमें उनकी रुचि, फैशन व आदत का ध्यान रखा जाता है। इसीलिए अलग-अलग वस्तुओं के बाजार का वर्गीकरण हो जाता है।

(9) साधनों का सही वितरण-विपणन प्रणाली साधनों के उचित वितरण में भी सहायक होती है। इससे वस्तुओं के उत्पादन व क्रय-विक्रय में सहायता मिलती है।

(10) सूचनाओं के आदान-प्रदान में सहायक- विपणन के माध्यम से विभिन्न प्रकार की विपणन सम्बन्धी सूचनाएँ भी प्राप्त होती हैं। यही कारण है कि आज बाजार समाचार का एक विशेष महत्वपूर्ण स्थान है।