उत्पाद संशोधन की विभिन्न रीति-नीतियों को समझाइये।

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उत्पाद संशोधन का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of the Product Modification) : प्रत्येक उत्पाद का अपना जीवन-चक्र होता है अर्थात् प्रत्येक उत्पाद कभी न कभी अवश्य ही पतनावस्था में पहुँचकर अप्रचलित हो जाता है, लेकिन प्रत्येक उत्पादक यह चाहता है कि उसके उत्पाद का जीवन-चक्र अनन्त काल तक चलता रहे। इसके लिए वह अपने उत्पाद की परिपक्वता (Matu rity) और संतृप्ति (Saturation) अवस्था के जीवन काल को बढ़ाने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहता है ताकि उसकी उत्पाद पतन (Decline) की अवस्था में देर से पहुॅचे, ऐसा करने के लिए वह उत्पाद संशोधन रीति-नीति का सहारा लेता है। उत्पाद संशोधन से आशय उत्पाद के आकार, किस्म, रंग, शैली आदि में परिवर्तन करने से है।

  • फिलिप कोटलर (Philip Kotler) के अनुसार, “किसी उत्पाद के भौतिक गुणों या उसके पैकेजिंग में जान बूझकर किया गया कोई परिवर्तन उत्पाद संशोधन कहलाता है।”

निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है कि उत्पाद संशोधन जानबूझकर किया जाता है और इसके अन्तर्गत उत्पाद के भौतिक लक्षणों, जैसे-आकार, किस्म, रंग आदि में परिवर्तन या उत्पाद के पैकेजिंग में परिवर्तन किया जाता है जिससे कि नये-नये ग्राहकों को आकर्षित किया जा सके, पुराने ग्राहकों को बनाये रखा जा सके और प्रतिस्पर्द्धा का सामना किया जा सके। उत्पाद संशोधन से उपक्रम की विक्रय मात्रा में वृद्धि होती है जिसके परिणामस्वरूप उपक्रम की लाभार्जन क्षमता बढ़ जाती है।

उत्पाद संशोधन की विभिन्न रीति-नीतियाँ कुल (Various Strategies of Product Modification) उत्पाद संशोधन की कुछ मुख्य रीति-नीतियाँ निम्न प्रकार हैं

(I) किस्म सुधार रीति-नीति-इस रीति-नीति के अन्तर्गत कच्चे माल की अच्छी किस्म या इन्जीनियरिंग तकनीक के द्वारा उत्पाद की किस्म का सुधार किया जाता है जिससे कि उत्पाद की विश्वसनीयता और टिकाऊपन में वृद्धि हो जाये। इस रीति-नीति की सफलता के लिए दो बातें आवश्यक है

(i) उत्पाद में सुधार इस प्रकार के होने चाहिए कि जो स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो। (ii) उपभोक्ता उत्पाद की किस्म सम्बन्धी परिवर्तनों से भली-भाँति परिचित हो।

(2) शैली सुधार रीति-नीति-इस रीति-नीति के अन्तर्गत उत्पाद में सौन्दर्य सम्बन्धी आकर्षणों को बढ़ाया जाता है। प्रायः फैशनेविल और ऑटोमोबाइल उत्पादों के निर्माताओं के द्वारा इस रीति-नीति का प्रयोग किया जाता है, जैसे- वस्त्र, ट्रक, मोटरकार, स्कूटर आदि के निर्माता यह रीति-नीति अत्यन्त जोखिमपूर्ण है क्योंकि यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है कि उत्पाद की नई शैली को उपभोक्ताओं की स्वीकृति प्राप्त हो ही जायेगी।

(3) कार्य-सम्बन्धी सुधार रीति-नीति-इस रीति-नीति के अन्तर्गत उत्पाद का इस प्रकार पुनः डिजाइन (Redesign) किया जाता है। जिससे कि वह उत्पाद पहले से अधिक सुविधाजनक, सुरक्षित और कुशल बन जाये। किसी नई तकनीक के विकास के अनुसार उत्पाद में किया गया सुधार भी इस रीति-नीति के अन्तर्गत सम्मिलित किया जाता है। इस रीति-नीति में उपक्रम की नेतृत्व सम्बन्धी छवि बनती है। यह अत्यन्त लचीला प्रतिस्पर्द्धा उपकरण है क्योंकि इसे शीघ्रता से अपनाया या छोड़ा जा सकता है। इस रीति-नीति से विक्रेताओं और वितरकों के उत्साह में वृद्धि होती है।

(4) पैकेजिंग सुधार रीति-नीति-इस रीति-नीति के अन्तर्गत उत्पाद के पैकिंग में सुधार किया जाता है जिससे उपभोक्ताओं तक उत्पाद सुरक्षित पहुँच सके और सम्भव हो तो उपभोक्ता उस पैकिंग सामग्री का कोई उपयोग कर सके।

उत्पाद संशोधन की उपर्युक्त वर्णित रीति-नीतियाँ एक-दूसरे से पूर्ण रूप से स्वतन्त्र है, लेकिन व्यवहार में इनका एक साथ भी प्रयोग किया जा सकता है। उत्पाद संशोधन रीति-नीतियों में जोखिम अधिक होती है। जोखिम कम करने के लिए व्यावसायिक उपक्रम निम्न निर्णयों में से कोई भी एक या अधिक निर्णय ले सकता है-(i) उत्पाद में सभी संशोधन एक साथ न करके धीरे-धीरे संशोधन किये जायें (ii) संशोधित उत्पादों के साथ पुराने उत्पादों का भी उत्पादन किया जाये। (iii) उत्पाद के संशोधन का सम्भावित विक्रय प्रभावों का पता लगाने के लिए विपणन अनुसन्धान पर पर्याप्त ध्यान दिया जाये।