उपभोक्ता क्रय व्यवहार को प्रभावित करने वाले विभिन्न घटकों की व्याख्या कीजिए।

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उपभोक्ता व्यवहार का आशय एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Consumers Behaviour) : उपभोक्ता व्यवहार से आशय उपभोक्ताओं या ग्राहकों की क्रय आदतों क्रय प्रवृत्तियों, क्रय ढंगों व क्रय प्रेरणाओं के अध्ययन से लगाया जाता है। अतः उपभोक्ता व्यवहार के अन्तर्गत निम्नलिखित चार बातों का पता लगाया जाता है कि (1) उपभोक्ता कब क्रय करते हैं ? (2) क्रय कौन करता है ? (3) उपभोक्ता कैसे क्रय करते तथा (4) उपभोक्ता कहाँ क्रय करते हैं ?

विपणन की समस्त प्रक्रिया उपभोक्ता के आस-पास घूमती रहती है तथा उपभोक्ता उस विपणन का बादशाह कहलाता है। उपभोक्ता व्यवहार में उन प्रेरणाओं, उद्देश्यों, क्रय प्रारूप, निर्णय आदि का अध्ययन किया जाता है जिनसे प्रभावित होकर कोई क्रेता किसी विशिष्ट वस्तु को क्रय करता है। दूसरे शब्दों में, किसी वस्तु विशेष के क्रय करने के लिए निर्णय करना ही उपभोक्ता या क्रेता का व्यवहार कहलाता है। विपणन प्रबन्ध के लिए उपभोक्ता के व्यवहार का अध्ययन करना आवश्यक होता है क्योंकि समस्त विपणन सम्बन्धी क्रियाएँ उपभोक्ता के निर्णय से ही प्रभावित होती हैं। उपभोक्ता अपने समस्त कार्य या क्रियाएँ किसी विशिष्ट लक्ष्य या आवश्यकता की सन्तुष्टि के लिए करता है। विपणनकर्ता के द्वारा यह अध्ययन करना चाहिए कि उपभोक्ता कब, कहाँ, किस प्रकार से उसकी संस्था की वस्तुओं को क्रय करता है। अतः संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि उपभोक्ता किसी वस्तु को कब, कहाँ, कैसे और क्यों क्रय करता है यह जानकारी प्राप्त करना ही उपभोक्ता व्यवहार का अध्ययन है।

  • (1) वाल्टर एवं पॉल (Waiter and Paul) के अनुसार, “उपभोक्ता व्यवहार एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति यह निर्णय लेता है कि वस्तुओं और सेवाओं को खरीदना है तो क्या, कब, कहाँ और किससे खरीदना है।”
  • (2) शॉएल एवं गुल्टीनन (Schoell and Guiltinan) के अनुसार, ‘उपभोक्ता व्यवहार मानव व्यवहार का वह भाग है जिसका सम्बन्ध व्यक्तियों द्वारा उत्पादों के क्रय व उपयोग के सम्बन्ध में लिये गये निर्णय एवं कार्यों से होता है।
  • (3) शिफमैन एवं कनुक (Shiffman and Kanuk) के अनुसार, “उपभोक्ता व्यवहार वह अनुभाग है जो प्रबन्धकों को यह बताता है कि उपभोग्य वस्तुओं पर व्यय करने के निर्णय के पीछे क्या है। यह केवल यह सिद्ध नहीं करता कि क्या विनिमय किया गया है वरन यह भी दर्शाता है कि कहाँ, कब क्यों और कितनी बार विनिमय किया गया है।

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट है कि “उपभोक्ता व्यवहार से आशय उपभोक्ता की क्रय करने की निर्णय की प्रक्रिया से है जिसके अन्तर्गत उपभोक्ता की क्रय आदतों क्रय प्रवृत्तियों, क्रय ढंग एवं क्रय प्रेरणाओं का अध्ययन किया जाता है जो उसके क्रय करने के निर्णय को प्रभावित करती है।”

उपभोक्ता व्यवहार को प्रभावित करने वाले तत्व या घटक (Factors Influencing the Consumers Behaviour)

उपभोक्ता क्रय व्यवहार को प्रभावित करने वाले तत्वों को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा गया है-

(क) आर्थिक तत्व (Economic Factors) आर्थिक तत्वों के अन्तर्गत ऐसे तत्थों का अध्ययन किया जाता है जो कि उपभोक्ता की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करते हैं। इसके अन्तर्गत निम्नलिखित तत्व शामिल किये जाते हैं

(1) उपभोक्ता की साख उपभोक्ता द्वारा वस्तु उधार या साख पर खरीदने की क्षमता भी उपभोक्ता के व्यवहार को प्रभावित करती है। साख सुविधा प्राप्त होने से उपभोक्ता अधिक वस्तुएँ खरीदने के लिए प्रेरित होते हैं।

(2) सरकारी नीति-सरकारी नीति के द्वारा भी उपभोक्ता व्यवहार प्रभावित होता है। यदि मुद्रा प्रसार किया जाता है तो मूल्य बढ़ेंगे, बचत कम होगी और उपभोक्ता को अपने व्यय करने के तरीकों में पूर्ण रूप से परिवर्तन करना होगा।

(3) व्यक्तिगत आय-व्यक्तिगत आय उपभोक्ता के व्यवहार को बहुत प्रभावित करती है। उपभोक्ता की व्यक्तिगत आय में वृद्धि उपभोग में वृद्धि करती है तथा उपभोक्ता की व्यक्तिगत आय में कमी उपभोग में कमी करती है।

(4) स्वाधीन आय-स्वाधीन आय से आशय ऐसी आय से है जो कि आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति के पश्चात् बच जाती है। इस प्रकार की आय को उपभोक्ता अपनी इच्छानुसार खर्च कर सकता है। ऐसी आय उपभोक्ता के पास जितनी अधिक होगी वह उतनी ही अधिक वस्तुओं का उपभोग करने को उत्सुक होगा।

(5) उपभोक्ता की सम्पत्ति-प्रायः उपभोक्ता अपनी वर्तमान आय के अनुसार ही उपभोग करता है तथा भविष्य के लिए उसके पास स्त्री सुरक्षात्मक नकदी भी वर्तमान उपभोग को प्रभावित करती है।

इस प्रकार की नकदी आकस्मिक घटनाओं के लिए रखी जाती है।

(6) उपभोक्ता की आय सम्भावनाएँ-उपभोक्ता की आय सम्भावनाएँ भी उपभोग व्यवहार पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालती है। यदि उपभोक्ता की आय सम्भावनाओं, जैसे-विनियोग पर प्रत्याशित आय जो कि उपभोक्ता को भविष्य में प्राप्त होने की आशा है का उसके वर्तमान उपभोग पर प्रभाव पड़ेगा।

(7) पारिवारिक दशा व आय-यदि परिवार का आकार बड़ा व आय के साधन कम है तो उपभोग भी कम होगा। आय तथा परिवार का आकार भी क्रेता के खर्च करने के व्यवहार को काफी सीमा तक प्रभावित करता है।

(ख) मनोवैज्ञानिक तत्व (Psychological Factor) उपभोक्ता व्यवहार को प्रभावित करने वाले मनोवैज्ञानिक तत्व निम्नलिखित हैं

(1) आधारभूत आवश्यकताएँ उपभोक्ता सर्वप्रथम अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं को ही पूर्ण करता है। ये आवश्यकताएँ शारीरिक सम्बन्धी, सुरक्षा सम्बन्धी, सम्मान एवं प्रतिष्ठ तथा आत्मपूर्ति की होती है। जब भी उपभोक्ता वस्तुओं को क्रय करता है तो वह उन्हीं वस्तुओं का उपभोग करता है जो इन आवश्यकताओं की पूर्ति अधिकता से कर सकते हैं। वही वस्तु सफलता प्राप्त करती है।

(2) छवि-किसी वस्तु या विषय के सम्बन्ध में ज्ञान या अज्ञानतावश किसी उपभोक्ता के मस्तिष्क में जो छाप होती है उसे छवि कहा जाता है। उपभोक्ता पर उसका बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। छवि कई प्रकार की हो सकती है, जैसे-आत्म छवि, वस्तु छवि, ब्राण्ड छवि आदि।

(3) ज्ञान सिद्धान्त-ज्ञान सिद्धान्त के अनुसार उपभोक्ता को निम्नलिखित तत्व प्रभावित करते हैं

  • (i) अभिप्रेरणा- उपभोक्ता व्यवहार अभिप्रेरणा से बहुत अधिक प्रभावित होता है। इन प्रेरणाओं के अन्तर्गत भावात्मक, विवेकपूर्ण, स्वाभाविक एवं सीखे हुए प्रयोजन आदि शामिल होते हैं।
  • (ii) निरन्तरता- किसी वस्तु को उपभोक्ता के बिस्तर सम्पर्क में लाने से उसके वस्तु ज्ञान में वृद्धि हो जाती है। किसी वस्तु के लगातार विज्ञापन से उपभोक्ता को उस वस्तु का अधिक ज्ञान प्राप्त हो जाता है और वह उस वस्तु का उपभोग करने के लिए प्रोत्साहित होता है।
  • (iii) वस्तुस्थिति-वस्तुस्थिति के ज्ञान से भी उपभोक्ता व्यवहार बहुत अधिक प्रभावित होता है, जैसे किसी वस्तु की पैकिंग को सुन्दर और आकर्षण बना दिया जाये तो बहुत-से क्रेता उसकी पैकिंग से प्रभावित होकर वस्तु का क्रय कर लेते हैं।
  • (iv) समूह प्रभाव-समूह प्रभाव भी उपभोक्ता व्यवहार पर प्रभाव डालता है। यदि समाज में कोई धनी या प्रतिष्ठित व्यक्ति किसी वस्तु का उपभोग आरम्भ कर देता है तो समाज के अन्य व्यक्ति भी उसका उपभोग प्रारम्भ कर देते हैं।

(4) लाक्षणिक मनोविज्ञान- लाक्षणिक मनोविज्ञान के अन्तर्गत निम्नलिखित दो तत्वों को सम्मिलित किया जाता है

(1) विवेकीकरण-यह मानव के मस्तिष्क से सम्बन्धित निर्णय है। इसके अन्तर्गत मनुष्य की बौद्धिक क्षमता व विवेक का अध्ययन किया जाता है अर्थात् मनुष्य किसी वस्तु का क्रय क्यों करता है इसका पता लगाया जाता है।

(ii) अचेत अवस्था-अचेत अवस्था से आशय उस अवस्था से है, जिसमें उपभोक्ता वस्तु विशेष को खरीदने या न खरीदने का कारण नहीं बता सकता है।

उपर्युक्त तथ्यों का अध्ययन करने के बाद यह कहा जा सकता है कि उपभोक्ता व्यवहार को केवल एक ही तत्व प्रभावित नहीं करता है अर्थात् आर्थिक व मनोवैज्ञानिक दोनों तत्वों के द्वारा यह प्रभावित होता है। अतः विपणनकर्ता को आर्थिक तत्वों व मनोवैज्ञानिक तत्वों दोनों का ही अध्ययन करना चाहिए।