मोदग्लियानी व मिलर उपागम की व्याख्या कीजिए। इस उपागम की सीमाएँ क्या है ?

36

मोदग्लियानी व मिलर उपागम (Modgillani-Millar Approach).

शुद्ध संचालन आय उपागम द्वारा प्रदत्त दृष्टिकोण का मोदीग्लियानी व मिलर उपागम भी समर्थन करता है। परन्तु एम. एम. उपागम द्वारा समर्थन में प्रयुक्त कार्य प्रणाली शुद्ध संचालन आय उपागम से भिन्न है। शुद्ध संचालन आय उपागम कम्पनी के मूल्य पर पूँजी ढाँचा की अप्रासंगिकता के पक्ष में कोई संचालनात्मक औचित्य नहीं प्रस्तुत करता है। परन्तु एम. एम. उपागम ने अपने तर्क के पीछे व्यावहारिक औचित्य प्रस्तुत किया है और अपने तर्क के मर्म को सही सिद्ध करने के लिए आर्बिट्रेज रीति का प्रयोग किया है। आर्बिट्रेज का अर्थ लाभ कमाने की दृष्टि से समान वस्तु का एक ही समय में दो अलग-अलग बाजारों में खरीदना व बेचना है। यह प्रक्रिया उस समय तक चलती रहती है जब तक कि सन्तुलन प्राप्त न हो जाय। एम. एम. उपागम निम्न मान्यताओं पर आधारित है

  • (1) कोई भी निगमित कर नहीं है।
  • (2) लाभांश भुगतान अनुपात 10% है अर्थात् कोई प्रतिधारित आय नहीं है।
  • (3) पूँजी बाजार पूर्ण है अर्थात् सभी प्रकार की सूचना विवेकशील विनियोजकों को समान रूप से उपलब्ध है।
  • (4) लेन-देन की कोई लागत नहीं है और विनियोक्ता समान शर्तों पर ही उधार ले सकता है या ऋण दे सकता है।
  • (5) सभी विनियोक्ता फर्म के संचालन लाभ के सम्बन्ध में एक ही प्रकार की आशंसा रखते हैं और उसी के अनुसार फर्म का मूल्यांकन करते हैं।

एम. एम. उपागम की तीन प्रतिज्ञाप्तियाँ निम्नलिखित है-

  • 1. पूँजी की कुल लागत और फर्म का मूल्य पूँजी ढाँचा से स्वतन्त्र होते हैं। अर्थात् ऋण व इक्विटी मिश्रण के सभी स्तर के लिए पूँजी की कुल लागत (Ko) और फर्म का मूल्य (V) स्थिर रहेंगे।
  • 2. इक्विटी पूँजी की लागत Ke शुद्ध इक्विटी धन के लिए पूँजीकरण की दर एवं वित्तीय जोखिम के लिए प्रीमियम के बराबर होती है। फर्म के पूँजी ढाँचा में ऋण के अनुपात में वृद्धि के साथ-साथ वित्तीय जोखिम बढ़ती जाती है।
  • 3. विनियोग उद्देश्य के लिए कट-ऑफ दर पूर्णतः इस तथ्य से स्वतन्त्र होती है कि विनियोग का अर्थ प्रबन्धन किस ढंग से किया गया है। (Limitations of M.M. Approach)

एम. एम. उपागम की सीमाएँ

(1) जोखिम-बोध- एम. एम. उपागम मानता है कि निगम लीवरेज का स्थानापन्न व्यक्तिगत लीवरेज होता है अर्थात् व्यक्तिगत विनियोक्ता फण्ड की उतनी ही राशि को उसी दर पर बाह्य स्रोतों से उगाह सकता है जितनी राशि जितने दर पर कम्पनी उगाह सकती है।

परन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं हो सकता है व्यक्तिगत लीवरेज और निगम लीवरेज के जोखिम बोध में बहुत ही भिन्नता होती है। विनियोक्ता की जोखिम अवस्थिति व्यक्तिगत लीवरेज में अपेक्षाकृत अधिक होती है। एक विनियोक्ता का दायित्व धारित अंशों के अनुपात तक सीमित होता है परन्तु व्यक्तिगत ऋण की दशा में उसका दायित्व असीमित होता है। यही नहीं, ब्याज की दर भी निगम की तुलना में व्यक्तिगत ऋण में अधिक होती है। इन सभी कारणों से निगम लीवरेज का स्थानापन्न व्यक्तिगत लीवरेज में कभी भी नहीं हो सकता है अर्थात् एम. एम. उपागम की मान्यता दोषपूर्ण है।

(2) कारोबार लागत की अनुपस्थिति इस उपागम की व्याख्या में यह मान लिया गया है कि लेन-देन में किसी प्रकार की लागत निहित नहीं है परन्तु व्यवहार में जब कभी कोई विनियोक्ता प्रतिभूतियों / अंशों का क्रय तथा विक्रय करता है, तो उसे कमीशन दलाली, आदि पर खर्च करना पड़ता है। इन खर्चों की वजह से अंशों की बिक्री से प्राप्त शुद्ध राशि वास्तविक राशि से कम हो जाती है और विनियोग योग्य राशि कम होने से आर्बिट्रेज प्रक्रिया भी दूषित हो सकती है। अतः एम. एम. उपागम लेन-देन की लागत की मौजूदगी में खरा नहीं उतरता है।

(3) संस्थागत प्रतिबन्ध एम. एम. परिकल्पना के साथ एक अन्य समस्या यह है कि आर्बिट्रेज प्रक्रिया के सफल संचालन में संस्थागत प्रतिबन्ध रास्ते में खड़े हो जाते हैं। अनेक संस्थागत विनियोक्ता जैसे जीवन बीमा निगम यूनिट ट्रस्ट ऑफ इण्डिया वाणिज्यिक बैंक आदि व्यक्तिगत लीवरेज अपनाने के लिए स्वतन्त्र नहीं होते हैं। इस प्रकार अनलीवरड कम्पनी से लीवरड कम्पनी में परिवर्तन सभी विनियोक्ताओं के लिए सम्भव नहीं हो सकता है और उस स्थिति में व्यक्तिगत लीवरेज निगम लीवरेज का पूर्ण स्थानापन्न नहीं हो सकता जो आर्बिट्रेज प्रक्रिया के लिए आवश्यक है।