लाभांश नीति का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा एक समुचित लाभांश नीति के आवश्यक तत्वों का विस्तार से परीक्षण कीजिए

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लाभांश नीति का आशय एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Dividend Policy)

‘लाभांश नीति’ का आशय प्रबन्धकों की उस प्रवृत्ति (Attitude) से है जिनका सम्बन्ध इस बात से होता है कि लाभ में कितने भागों को लाभांश रूप में वितरित किया जाये तथा किस रूप में बाँटा जाये। अन्य शब्दों में, प्रबन्धकों द्वारा लाभांश सम्बन्धी निर्णय लेने को ‘लाभांश नीति’ कहते हैं। लाभांश नीति एक बहुत ही लोचपूर्ण शब्द है, क्योंकि लाभांश वितरण के सम्बन्ध में प्रतिवर्ष एक समान नीति अपनाना कठिन होता है। प्रायः प्रबन्धक वार्षिक दर का निर्णय करने का प्रयत्न तो अवश्य करते हैं, किन्तु यह नीति भी कई घटकों से प्रभावित होती है।

  • वेस्टन एवं ब्राइघम (Weston and Brigham) के अनुसार, “लाभांश नीति अर्जनों का अंशधारियों को भुगतान एवं प्रतिधारित अर्जनों में विभाजन निश्चित करती है।”
  • के. के. गुप्ता (K. K. Gupta) के अनुसार, “संचालकों द्वारा लाभांश वितरण के सम्बन्ध में सुस्पष्ट कार्यकरण योजना बनाने को ही लाभांश नीति कहा जाता है।”

लाभांश नीति इस प्रकार बनानी चाहिए, जिससे रोकड़ बहिर्गमन कम से कम हो तथा अंशधारियों को पर्याप्त सन्तोष की प्राप्ति हो सके। यदि ऊँची दर से लाभांश वितरित किया जाता है तो लाभों का पुनर्विनियोजन कम होगा और विकास की गति धीमी हो जायेगी। यदि कम दर से लाभांश वितरित किया जाता है तो इससे अंशधारियों में असन्तोष उत्पन्न हो जायेगा। अतः स्पष्ट है कि संचालकों द्वारा सन्तुलित लाभांश नीति अपनानी चाहिए।

सुदृढ़ लाभांश नीति के आवश्यक तत्व (Essential Factors of a Sound Dividend Policy) लाभांश नीति कम्पनी की साख एवं भावी प्रगति को प्रभावित करती है। अतः वित्त प्रबन्धक द्वारा एक सुदृढ़ लाभांश नीति का निर्माण किया जाना अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है, एक अनुकूलतम या सुदृद लाभांश नीति का निर्माण करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए

(1) लाभांश की स्थिरता-एक अनुकूलतम लाभांश नीति की मुख्य विशेषता लाभांश की राशि का लम्बी अवधि तक नियमित रूप से स्थिर बना रहना है भले ही कम्पनी की आय के स्तर में उच्चावचन आते रहें।

(2) लाभांश में धीरे-धीरे वृद्धि सम्भावित विनियोक्ताओं को आकर्षित करने तथा विद्यमान अंशधारियों के सन्तोष की दृष्टि से कम्पनी को अपनी आय में वृद्धि के साथ-साथ धीरे-धीरे लाभांश दर में वृद्धि करनी चाहिए। किन्तु इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए कि केवल अर्जित लाभ या अधिशेष में से ही लाभांश का भुगतान किया जाए।

(3) प्रारम्भ में कम लाभांश प्रारंम्भिक वर्षों में कम्पनी द्वारा अंशचारियों को कम दर से लाभांश दिया जाना चाहिए ताकि कम्पनी की तरल स्थिति को सुदृढ़ बनाया जा सके। बाद में कम्पनी की प्रगति तथा आय में वृद्धि के साथ-साथ इसमें धीरे-धीरे वृद्धि की जा सकती है।

(4) नकद लाभांश का वितरण प्रायः अंशचारी भविष्य में प्रत्याय दरों की अनिश्चितता से बचने तथा अपनी वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पूँजीगत लाभ के विपरीत ‘नकद लाभांश’ के भुगतान को प्राथमिकता देते हैं। अतः लाभांश नकदी के रूप में ही दिया जाना चाहिए। किन्तु जब कम्पनी में संचित कोषों की राशि अधिक हो जाय तो स्कन्द लाभांश भी घोषित किया जा सकता है।

(5) अन्य बाते-कम्पनी की नकद स्थिति को ध्यान में रखकर ही लाभांश घोषित किया जाना चाहिये। यदि लाभ-हानि खाते में पहले से कुछ हानि चली आ रही है तो जब तक वह अपलिखित न हो जाये, लाभांश की दर को सीमित कर देना चाहिये। लाभांश में स्थायित्व बनाये रखने के लिए कम्पनी द्वारा लाभांश समीकरण कोष की स्थापना की जानी चाहिये ताकि कम आय वाले वर्षों में इस कोष का प्रयोग किया जा सके।

लाभांश नीति को प्रभावित करने वाले तत्व (Factors affecting the Dividend Policy)

प्रत्येक कम्पनी के प्रबन्धकों का यही प्रयत्न होता है कि वह अपने अंशधारियों को उचित लाभांश देते रहें लेकिन वे ऐसा करने में असमर्थ रहते हैं, क्योंकि अनेक तत्व उन्हें ऐसा करने से रोक सकते हैं। लाभांश नीति को प्रभावित करने वाले तत्वों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

(1) व्यवसाय की प्रकृति-लाभांश नीति को प्रभावित करने में व्यवसाय की प्रकृति का भी प्रभाव पड़ता है। इस कारण से लाभांश नीति व्यवसाय की प्रकृति को ध्यान में रखकर बनायी जानी चाहिए। कुछ कम्पनियाँ ऐसी वस्तुओं का निर्माण करती हैं कि वे नियमित लाभांश दे सकें; जैसे उपभोक्ता वस्तुओं के निर्माण। जबकि कुछ कम्पनियाँ विलासिता की वस्तुओं का निर्माण करने के कारण नियमित लाभांश देने में असमर्थ रहती हैं।

(2) कम्पनी की तरल स्थिति कम्पनी की तरल स्थिति भी लाभांश नीति को प्रभावित करती है। यदि कम्पनी की तरल स्थिति अच्छी है तो वह पर्याप्त लाभ अर्जित किये जाने पर अंशधारियों को नकद लाभांश का भुगतान करती है। इसके विपरीत यदि कम्पनी की स्थिति खराब है तो ऐसी दशा में नकद लाभांश न देकर ‘स्टॉक’ लाभांश बाँटा जाता है।

(3) पुरानी लाभांश दरे- लाभांश की घोषणा करने से पूर्व प्रबन्धकों को पिछले सालों की लाभांश दरों को भी देखना होता है। अधिकांश लाभांश अचानक घोषित हो जाने पर बाजार में अंशों के मूल्य में बहुत अधिक उतार-चढ़ाव आने लगते हैं।

(4) स्वामित्व ढाँचा – यदि कम्पनी का स्वामित्व कम लोगों के हाथों में है तो वे कुछ वर्षों के लिए कठोर लाभांश नीति अपनाये जाने पर बल दे सकते हैं, क्योंकि वर्तमान आय के अधिकांश भाग का पुनर्विनियोजन करने से भविष्य में उन्हीं को लाभ पहुँचेगा।

(5) भावी पूँजी की आवश्यकता– यदि कम्पनी भविष्य में विकास करने की इच्छुक है तो कम्पनी अपनी आन्तरिक वित्तीय स्थिति को सुदृद करने हेतु लाभों में से संचय कोष का निर्माण करेगी। भले ही कम्पनी को लाभांश की दर को कम क्यों न करना पड़े।

(6) ऋणों का शोधन विगत ऋणों की अदायगी या तो नये ऋणों को लेकर की जा सकती है या फिर कम्पनी की प्रतिधारित आय के द्वारा सम्भव होती है। यदि संचालक दूसरे विकल्प को अपनाते है तो कम्पनी की आय के अधिकांश भाग को इस उद्देश्य के लिए रोकना होगा। ऐसा करने के लिए कम्पनी को कठोर नीति अपनानी होगी।

(7) सामान्य आर्थिक परिस्थितियाँ किसी उपक्रम के व्यावसायिक कार्यों का पैमाना तथा लाभोपार्जन क्षमता एक बड़ी सीमा तक देश की सामान्य आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है। भावी आर्थिक एवं व्यावसायिक परिस्थितियों के अनिश्चित होने पर कम्पनी अपने समस्त लाभों या लाभ के एक भाग को प्रतिधारित कर सकती है ताकि भविष्य में वित्तीय संकटों का सामना किया जा सके। इसी प्रकार, मन्दी काल में कम्पनी अपनी तरल स्थिति बनाये रखने के उद्देश्य से लाभांश का भुगतान करना बन्द कर सकती है। समृद्धिकाल में भी कम्पनी सदैव उदार लाभांश नीति नहीं अपना सकती है।

(8) वैधानिक प्रतिबन्ध लाभांश नीति का निर्धारण वैधानिक प्रतिबन्धों के अधीन किया जाता है। वैधानिक रूप से संचालक लाभांश घोषित करने के लिए बाध्य नहीं होते हैं। कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत ह्रास की व्यवस्था करने के पश्चात् वर्तमान या विगत लाभों में से ही लाभांश की घोषणा का भुगतान किया जा सकता है।

(9) राजकीय नीतियाँ-सरकारी नीतियों का प्रभाव भी लाभांश नीति पर पड़ता है। सरकार की औद्योगिक एवं श्रम सम्बन्धी नीति, बोनस नीति आदि के कारण कम्पनी के लाभों की मात्रा घट सकती है जिसके कारण लाभांश की दर भी कम हो जायेगी। बैंक दर के बढ़ने पर भी कम्पनियों को मिलने वाली सुविधाएँ महँगी हो जाने के कारण लाभ घट जाते हैं जिससे लाभांशों की दर में कमी आ सकती है।

(10) कर नीति-लाभांश नीति पर करों का भी विशेष प्रभाव पड़ता है। यदि निगम की कर की दर अधिक है, तब लाभांश की मात्रा लाभों की मात्रा घटाने के कारण कम हो जायेगी। कभी-कभी सरकार भी संचयों पर कर लगा देती है, तब कम्पनी यह सोचती है कि अधिकांश लाभ को संचय करे अथवा लाभांश के रूप में बाँटे।