ब्राण्ड का अर्थ समझाइये। ब्राण्ड के विभिन्न प्रकारों को लिखिए। ब्राण्ड एवं ट्रेडमार्क में अन्तर लिखिए।

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ब्राण्ड से आशय एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Brand) : ब्राण्ड से आशय ऐसे नाम चिन्ह या चित्र से है, जिसका उपयोग करके एक उत्पादक अपनी उत्पादित वस्तुओं को अन्य उत्पादकों की वस्तुओं से अलग रखता है। दूसरे शब्दों में, ब्राण्ड से आशय एक विशेष शब्द, चिन्ह, वर्ण या इनके सम्मिश्रण से है, जिसके द्वारा उत्पाद की विशेष पहचान उत्पन्न की जाती है। जब हम बाजार में जाकर लक्स साबुन, कोलिन ग्लास क्लीनर, ब्रिटानिया-गुड हे बिस्कुट, बजाज स्कूटर, सैमसंग – टी. वी., लिवर्टी-जूता खरीदते हैं तो उत्पाद के ये नाम कुछ और नहीं ब्राण्ड ही होते हैं।

  • अमेरिकन मार्केटिंग ऐसोसिएशन (American Marketing Association) के अनुसार, “ब्राण्ड एक ऐसा नाम, शब्द चिन्ह या डिजाइन या इनका एक सम्मिश्रण है जिसका उद्देश्य एक विक्रेता या एक समूह के विक्रेताओं के माल या सेवाओं को पहचानना है और प्रतियोगिताओं के माल या सेवाओं से भेद करना है।”
  • विलियम जे. स्टाण्टन (William J. Stanton) के अनुसार, “सभी ट्रेडमार्क ब्राण्ड हैं और इस प्रकार इनमें वे शब्द, लेख या अंक शामिल है जिनका उच्चारण हो सकता है। इनमें तस्वीर की डिजाइन भी शामिल हैं।” इस प्रकार ब्राण्ड में नाम हो सकता है, कुछ शब्द हो सकते हैं, एक डिजाइन हो सकती है या इन सबको मिलाकर एक ब्राण्ड बनाया जा सकता है।

ट्रेडमार्क से आशय एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Trade Mark)

ट्रेडमार्क या व्यापार चिन्ह वस्तु मार्का का वह भाग होता है, जिसे पंजीकृत करा लिया जाता है. अर्थात् ट्रेडमार्क वस्तु मार्का का वह भाग होता है जिसे वैधानिक संरक्षण प्राप्त होता है। व्यापार चिन्ह या ट्रेडमार्क का क्षेत्र वस्तु मार्का से बहुत संकुचित होता है। ट्रेडमार्क के एक बार निर्धारित कर लेने के बाद बार-बार इसमें परिवर्तन नहीं किया जा सकता है। ट्रेडमार्क संस्था की वस्तुओं का प्रतिनिधित्व करता है।

अमेरिकन मार्केटिंग ऐसोसिएशन (American Marketing Association) के अनुसार, के अन्तर्गत “ट्रेडमार्क एक ब्राण्ड है जिसको वैधानिक संरक्षण दे दिया गया है क्योंकि इसको कानून केवल एक मात्र विक्रेता द्वारा अपनाया जा सकता है।

आर. एस. डायर (R. S. Davar) के अनुसार, “ट्रेडमार्क शब्द को सामान्यतः ग्राण्ड के स्थान पर उस समय प्रयुक्त किया जाता है जबकि ब्राण्ड का पंजीयन कराना होता है और वैधानिक कार्यवाही की होती है।”

ब्राण्ड और ट्रेडमार्क में अन्तर (Difference between Brand and Trade Mark)

(1) ब्राण्ड एक शब्द, नाम, चिन्ह, डिजाइन का इनके सहयोग से बना हुआ एक सम्मिश्रण है, लेकिन जब इसी शब्द, नाम, चिन्ह, डिजाइन या सम्मिश्रण का कानून के अन्तर्गत पंजीकरण करा लिया जाता है तो वह ट्रेडमार्क बन जाता है।

(2) ब्राण्ड की नकल अन्य प्रतियोगी संस्थाओं के द्वारा की जा सकती है जिसके परिणामस्वरूप उनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती लेकिन ट्रेडमार्क की नकल करने वालों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जा सकती है तथा उसे हर्जाना वसूल किया जा सकता है।

(3) ब्राण्ड शब्द का क्षेत्र सीमित है जबकि ट्रेडमार्क विस्तृत है। ट्रेडमार्क में ब्राण्ड शामिल है। पहले ब्राण्ड तय करते हैं तब फिर उसका पंजीकरण कराकर उसी को ट्रेडमार्क कहने लगते हैं।

(4) सभी ट्रेडमार्क का उपयोग ब्राण्ड है लेकिन सभी ब्राण्ड ट्रेडमार्क नहीं है।

(5) एक ट्रेडमार्क का उपयोग केवल एक ही निर्माता या विक्रेता कर सकता है। उसी को उपयोग करने का कानूनी अधिकार प्राप्त होता है लेकिन ब्राण्ड का उपयोग कई निर्माता या विक्रेता कर सकते हैं।

ब्राण्ड के प्रकार (Types of Brand) ब्राण्ड के विभिन्न प्रकारों को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है

(I) स्वामित्व के आधार पर ब्राण्ड का वर्गीकरण-स्वामित्व के आधार पर ब्राण्ड को निम्न प्रकार से विभाजित किया जाता है (1) निर्माता का ब्राण्ड (Manufacturer’s Brand)–निर्माता द्वारा प्रयुक्त ब्राण्ड को निर्मित ब्राण्ड कहते हैं। जैसे-ए. सी. सी. कम्पनी द्वारा निर्मित सीमेण्ट पर ACC की छाप लगी रहती है। इसी प्रकार फिलिप्स कम्पनी द्वारा निर्मित रेडियो, बल्ब, ट्रांजिस्टर आदि पर Philips की छाप लगी रहती है।

(2) मध्यस्थों का ब्राण्ड-कुछ निर्माता अपने द्वारा निर्मित उत्पाद के लिए ब्राण्ड निश्चित नहीं करते हैं बल्कि एक साथ बड़ी मात्रा में उत्पादन बड़े-बड़े थोक एवं फुटकर विक्रेताओं को बेच देते हैं। ये थोक एवं फुटकर विक्रेता स्वयं अपना निजी ब्राण्ड या मार्का लगाकर उत्पादन को बाजार में बेचते हैं, ऐसे ब्राण्ड को मध्यस्थों का ब्राण्ड कहते हैं।

(II) उपयोग के आधार पर ग्राण्ड का वर्गीकरण उपयोग के आधार पर ब्राण्ड निम्न प्रकार के होते हैं

(1) लड़ाकू ब्राण्ड (Fighting Brand) यह वह ब्राण्ड होता है जिसे प्रतिस्पर्द्धा की दशा में निर्माता अथवा मूल बाण्ड की प्रतिष्ठा को बचाये रखने के लिए अपनाते हैं। ऐसे ब्राण्ड वाले उत्पादकों का मूल्य कम रखा जाता है ताकि अधिक ग्राहक-स्वीकरण प्राप्त कर सकें।

(2) प्रतियोगी ग्राण्ड (Competitive Brand) जब विभिन्न प्रकार के निर्माताओं या उत्पादकों द्वारा बनायी गयी वस्तुओं में गुण, मूल्य, आकार, प्रकार आदि की दृष्टि से भेद करना कठिन होता है तो ऐसी वस्तुओं के ब्राण्ड प्रतियोगी कहलाते हैं। ‘सर्फ ब्राण्ड’ एवं ‘मैजिक ब्राण्ड’ ऐसे ब्राण्ड के उदाहरण है।

(III) वस्तुओं की संख्या के आधार पर ब्राण्ड का वर्गीकरण-वस्तुओं की संख्या के आधार पर ब्राण्ड को निम्न प्रकार से वर्गीकृत कर सकते हैं

(1) व्यक्तिगत ब्राण्ड (Individual Brand)- जब निर्माता अथवा उत्पादक अपनी वस्तुओं को पृथक्-पृथक् ब्राण्ड नाम प्रदान करते हैं अर्थात् प्रत्येक वस्तु को अलग-अलग ब्राण्ड का नाम देते हैं तो इसे ‘व्यक्तिगत ब्राण्ड’ कहा जाता है। उदाहरण के लिए बुक ब्राण्ड टी कम्पनी ‘रेड लेबिल’, ‘यौन’ तथा ‘रिच ब्रू’ के नाम से अपने चाय एवं कॉफी उत्पाद बाजार में प्रस्तुत करती है।

(2) पारिवारिक ब्राण्ड (Family Brand)—जब निर्माता अथवा उत्पादक एक वर्ग की समस्त वस्तुओं को एक ही ब्राण्ड नाम देते हैं तो इसे ‘पारिवारिक अथवा वर्तमान ब्राण्ड’ कहा जाता है। मोहन (नाश्ते की वस्तुओं के लिए)’, ‘डिप्पी (विभिन्न सिरप्स एवं फलों के रस के लिए), ‘इरेस्मिक’ (सौन्दर्य प्रसाधन की वस्तुओं का लाभ) अन्य वस्तुओं की अधिक विक्री के रूप में फर्मों को प्राप्त हो सकता है और उनको विज्ञापन एवं संवर्द्धनात्मक व्यय भी अपेक्षाकृत कम करने पड़ते हैं।

(3) अम्ब्रेला ब्राण्ड (Umbrella Brand) सामान्यतया पारिवारिक ब्राण्ड एवं अम्ब्रेला ब्राण्ड में कोई विशेष अन्तर दिखाई नहीं देता है क्योंकि दोनों ही प्रकार के ब्राण्ड किसी संस्था के अनेक उत्पादों पर लगाने हेतु प्रयुक्त किये जाते हैं, ताकि एक ब्राण्ड नाम के अन्तर्गत अनेक उत्पादों को प्रचलित किया जा सके किन्तु पारिवारिक ब्राण्ड एवं अम्ब्रेला ब्राण्ड में मूल अन्तर यह है कि पारिवारिक ब्राण्ड किसी निर्माता की एक वर्ग की वस्तुओं के लिए प्रयुक्त किया जाता है, जबकि अम्ब्रेला ब्राण्ड उसकी समस्त निर्मित वस्तुओं के लिए प्रयुक्त किया जाता है। उदाहरण के लिए, टाटा की मुहर सभी प्रकार के उत्पादों, जैसे- साबुन, केमिकल्स, वस्त्र, स्टील, पेपर आदि के लिए प्रयुक्त की जाती है।

(IV) बाजार के क्षेत्र के आधार पर ब्राण्ड का वर्गीकरण-बाजार के क्षेत्र के आधार पर ब्राण्ड का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जा सकता है

(1) स्थानीय ब्राण्ड (Local Brand) वह ब्राण्ड जो एक स्थान विशेष पर ही लोकप्रिय है, उस ग्राण्ड को स्थानीय ब्राण्ड कहते हैं। बहुत-से निर्माता विभिन्न बाजारों का लाभ प्राप्त करने के लिए इस प्रकार की नीति को अपनाते हैं।

(2) प्रान्तीय ब्राण्ड (Provincial Brand) वह ब्राण्ड जो एक राज्य विशेष में ही प्रचलित है, उसको प्रान्तीय या राज्य ब्राण्ड (State Brand) कहते हैं।

(3) क्षेत्रीय ब्राण्ड (Regional Brand) जब एक निर्माता समूचे राष्ट्र को अपने विक्रय के लिए कई क्षेत्रों में बाँट लेता है और प्रत्येक क्षेत्र में नयी-नयी ब्राण्डों का प्रयोग करता है तो उसकी इन ग्राण्डों को क्षेत्रीय ब्राण्ड कहते हैं।

(4) राष्ट्रीय ब्राण्ड (National Brand) यह ब्राण्ड निर्माता ब्राण्ड भी कहलाती है। जब एक निर्माता सम्पूर्ण देश के लिए केवल एक ही ब्राण्ड का प्रयोग करता है तो उसकी यह ब्राण्ड राष्ट्रीय ब्राण्ड कहलाती है।

एक अच्छे ब्राण्ड की विशेषताएँ (Essential of Good Brand Name) अथवा ब्राण्ड नाम का चयन करते समय ध्यान देने योग्य बातें (Points be kept in Mind While Selecting Brand-Name)

किसी भी कम्पनी द्वारा ब्राण्ड नाम का चयन बड़ी ही सावधानी से किया जाता है, क्योंकि भविष्य में यही ब्राण्ड नाम संस्था के लिए वरदान या अभिशाप हो सकता है। ब्राण्ड नाम के चयन के सम्बन्ध में किसी भी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है। ब्राण्ड नाम के रूप में कम्पनी अपनी इच्छानुसार किसी नाम, चित्र नाम या चिन्ह आदि का चयन कर सकती है, किन्तु यह ब्राण्ड नाम अन्य किसी विद्यमान कम्पनी के ब्राण्ड के समान या उससे मिलता-जुलता नहीं होना चाहिए। ब्राण्ड नाम का चयन करते समय संस्था को एक अच्छे ब्राण्ड की अग्रलिखित विशेषताओं को ध्यान में रखना चाहिए

(1) साधारण व सूक्ष्म-ब्राण्ड साधारण होना चाहिए तथा साथ ही सूक्ष्म भी। सूक्ष्म का अर्थ है कि ड्राण्ड या चिन्ह का नाम छोटा होना चाहिए जिससे उसे याद रखा जा सके। जैसे- ‘डालडा’, ‘पनघट’, ‘पार्कर’, ‘हिमा’, ‘पोस्टमैन’, ‘ऊषा’, ‘मरफी’, ‘फिलिप्स’, ‘बुश’, ‘नेल्को’, ‘अमूल’, ‘बिनाका’,’बाय’, ‘डिप्लोमेट’ आदि।

(2) समयानुसार ग्राण्ड समयानुसार होना चाहिए अर्थात् समय के अनुकूल होना चाहिए। कुछ समय के बाद पुराने ब्राण्ड समय-समय पर बदलते रहते हैं। एक अच्छा ब्राण्ड वही है जो समय के अनुरूप हो।

(3) आसानी से पहचाना जाने योग्य ब्राण्ड चिन्ह ऐसा होना चाहिए जिसको आसानी से पहचाना जा सके अर्थात् ब्राण्ड चिन्ह की बनावट, आँखों में समा जाने योग्य होनी चाहिए।

(4) अन्य ब्राण्डों से भिन्न ब्राण्ड का नाम अन्य ब्राण्डों के आधार पर नहीं रखा जाना चाहिए ताकि किसी प्रकार के भ्रम की सम्भावना रहे। इसमें अपनी विशिष्टता होनी चाहिए।

(5) आकर्षित करने योग्य ग्राण्ड में यह विशेषता भी होनी चाहिए कि वह बोलने व सुनने में तो मधुर लगे ही साथ ही उसमें आकर्षित करने का गुण भी होना चाहिए।

(6) मितव्ययिता ब्राण्ड को पैकेट पर छपवाने या विज्ञापन में मितव्ययिता का गुण भी होना चाहिए। मितव्ययिता का अर्थ है कि उसमें व्यय कम होना चाहिए।

(7) विज्ञापन में सहायक ब्राण्ड का नाम व चिन्ह ऐसा होना चाहिए जो कि विज्ञापन को प्रभावशाली बनाने में सहायक हो। (8) ब्राण्ड का पंजीकरण ब्राण्ड का पंजीकरण अवश्य ही करवाना चाहिए ताकि उसकी नकल कोई अन्य उत्पाद न कर सके।

क्या ब्राण्ड सामाजिक दृष्टि से उचित है? (Is Brand Reasonable from the Social Point of View?) ब्राण्ड के प्रयोग से समाज को अनेक प्रकार की सुविधाएँ मिलती है, इसलिए ब्राण्ड का प्रयोग उचित कहा जाता है। ब्राण्ड के प्रयोग को समाज के लिए उचित माने जाने के पक्ष में निम्नलिखित तत्व है

(1) ब्राण्ड वाली वस्तुओं से उपभोक्ताओं को वस्तुओं के सम्बन्ध में गारण्टी मिल जाती है। यदि वस्तु में किसी प्रकार का दोष निकलता है तो उसके लिए ग्राण्ड का स्वामी उत्तरदायी होता है।

(2) ब्राण्ड के उपयोग करने से वस्तुओं के मूल्यों में स्थिरता रहती है।

(3) नकली वस्तुओं से समाज को बचाया जा सकता है।

(4) ग्राहकों को वस्तुओं के चुनाव में सुविधा रहती है क्योंकि वे वस्तुओं को ब्राण्ड के नाम से  पुकारकर क्रय कर सकते हैं, जैसे–ताजमहल चाय आदि। ब्राण्ड का उपयोग सामाजिक दृष्टिकोण से कुछ लोग अवांछनीय मानते हैं। इस सम्बन्ध में उन लोगों के निम्न विचार है

(1) ब्राण्ड का उपयोग उपभोक्ता को विवेकहीन बना देता है। इससे एक हानि यह होती है कि समाज उस वस्तु के दायरे में इतना फँस जाता है कि अन्य किसी वस्तु के बारे में नहीं सोच पाता।

(2) जब वस्तु ब्राण्ड के कारण बहुत अधिक लोकप्रिय हो जाती है तो वस्तु के निर्माता वस्तु के मूल्यों को बढ़ाकर उपभोक्ताओं का शोषण करने लगते हैं।

(3) ब्राण्ड की वजह से नये उत्पादों का निर्माण करने से निर्माता लोग कतराते हैं जिससे नयी-नयी वस्तुओं का विकास नहीं हो पाता।

(4) वास्तव में देखा जाये तो ब्राण्ड के उपयोग का समाज द्वारा विरोध केवल सैद्धान्तिक है क्योंकि अधिकतर लोग ब्राण्ड के प्रयोग को पसन्द करते हैं। अतः ब्राण्ड का प्रयोग तो किया जाना चाहिए कि निर्माता लोग ब्राण्ड का दुरुपयोग न करें।

ब्राण्ड के लाभ (Merits of Brand)

ब्राण्ड या ट्रेडमार्क प्रयोग में लाने से विभिन्न समुदायों को लाभ होता है। इन्ही लाभों का ब्राण्ड या ट्रेडमार्क के महत्व के रूप में भी प्रदर्शित किया जा सकता है। इन लाभों को निम्नलिखित तीन मदों के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है

(I) उत्पादकों को लाभ (Benefits to Producer)

ब्राण्ड नीति अपनाने से उत्पादक को बहुत-से लाभ मिलते हैं, जैसे-मूल्य नियन्त्रण, बाजार नियन्त्रण, पुनः विक्रय को प्रोत्साहन, प्रतियोगिता से बचाना, आसानी से मध्यस्य उपलब्ध होना, संवर्द्धन के व्ययों में मितव्ययिता आदि।

(1) मूल्य नियंत्रण- एक निर्माता ब्राण्ड निश्चित करने के साथ-साथ उस ब्राण्ड का मूल्य भी निश्चित कर देता है। जिस पर उस वस्तु को उपभोक्ताओं को मध्यस्थों एवं विक्रयकर्ताओं द्वारा) बेचा जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि मध्यस्य या विक्रयकर्ता मूल्यों में मनमानी नहीं कर सकते हैं और इस प्रकार यह निर्माता अपनी वस्तु के विक्रय मूल्य पर नियन्त्रण कर सकता है।

(2) बाजार नियन्त्रण ब्राण्ड निश्चित होने से बाजार पर नियन्त्रण किया जा सकता है अर्थात् निर्माता जिन बाजारों में वस्तु को बेचना चाहता है उन बाजारों में उसको बेच सकता है, शेष में नहीं। यदि उसकी वस्तु पर कोई ब्राण्ड नहीं है तो वस्तु को मध्यस्यों द्वारा नहीं भी बेचा जा सकता है जिसका पता उसको नहीं लग सकता है।

(3) पुनः विक्रय को प्रोत्साहन यदि ग्राहक ब्राण्ड वाली वस्तु से सन्तुष्ट है तो उसी वस्तु को पुनः खरीदेगा। ऐसा होने से पुनः विक्रय को प्रोत्साहन मिलता है।

(4) प्रतियोगिता से बचाना ब्राण्ड वाली वस्तुओं के क्रेताओं में ब्राण्ड के प्रति वफादारी पैदा हो जाती है जिससे वे उसी ब्राण्ड की वस्तु को क्रय करते हैं। उनकी यह आदत निर्माता को प्रतियोगिता से बचाती है।

(5) मध्यस्थों की आसानी से उपलब्धता-ग्राण्ड वाली वस्तु को बेचने के लिए मध्यस्थ आसानी से मिल जाते हैं। साथ ही अच्छी ब्राण्ड वाली वस्तु को बेचने के लिए इन मध्यस्थों को पारिश्रमिक भी कम देना पड़ता है।

(6) संवर्द्धन व्ययों में मितव्ययिता ब्राण्ड वाली वस्तुओं के सम्बन्ध में विज्ञापन आदि करने में व्यय कम ही होते हैं क्योंकि ब्राण्ड के नाम से ही काम चल जाता है। साथ ही ऐसे विज्ञापन कम स्थान घेरते हैं।

(7) अन्य लाभ–ब्राण्ड से एक निर्माता को उपर्युक्त लाभों के अतिरिक्त (अ) वस्तु पहचान का लाभ, (ब) ब्राण्ड का पंजीकरण होने से नकल न होने के लाभ भी मिल जाते हैं।

(II) मध्यस्थों को लाभ (Benefits to Middlemen)

ग्राण्ड चिष्ठ अपनाने में मध्यस्थों को समझाने में आसानी, कम जोखिम, संवर्द्धन की आवश्यकता न होना एवं साख वृद्धि के लाभ मिलते हैं।

(1) ग्राहकों को समझाने में आसानी ब्राण्ड निश्चित होने से मध्यस्थों को अपने ग्राहकों को समझाने में आसानी रहती है। साधारणतया यह देखा जाता है कि ग्राहक स्वयं ही उस वस्तु को माँगते हुए आते हैं। यदि ये वस्तु को माँगते हुए नहीं भी आते हैं तो अच्छे ख्याति प्राप्त निर्माता की वस्तु के लिए उसको थोड़े समय में ही समझाकर सन्तुष्ट किया जा सकता है। अतः

(2) कम जोखिम-ब्राण्ड वाली वस्तुओं के मूल्य में घटा-बढ़ी बहुत ही कम होती है मध्यस्थों को मूल्य की घटा-बढ़ी सम्बन्धी जोखिम भी कम रहती है।

(3) संवर्द्धन की आवश्यकता न होना-ब्राण्ड वाली वस्तुओं के लिए मध्यस्थों द्वारा संवर्द्धन व्यय करने की आवश्यकता नहीं रहती है क्योंकि ब्राण्ड वाली वस्तुओं का विज्ञापन एवं संवर्द्धन कार्य तो स्वयं निर्माता द्वारा ही किया जाता है जिसकी क्षतिपूर्ति उस वस्तु के निर्माता द्वारा कर दी जाती है।

(4) साख में वृद्धि – जो मध्यस्य अच्छे ख्याति प्राप्त निर्माताओं की ब्राण्ड वाली वस्तुओं को बेचते है उनकी साख बाजार में बढ़ जाती है।

(III) उपभोक्ताओं को लाभ (Benefits to Consumers)

वस्तुओं पर ब्राण्ड चिन्ह होने के कारण उपभोक्ताओं को क्वालिटी स्थिरता, मूल्य स्थिरता, गारण्टी, सुगम पहचान एवं अच्छे पैकेजिंग के लाभ मिलते हैं।

(1) क्वालिटी में स्थिरता ब्राण्ड वाली वस्तुओं की क्वालिटी स्थिर रहती है इसमें सामान्यतया गिरावट नहीं आती है। यदि सम्भव होता है तो उसमें सुधार ही किया जाता है। ऐसा होने से उपभोक्ता को अच्छी क्वालिटी की वस्तु मिल जाती है।

(2) मूल्य स्थिरता-ब्राण्ड वाली वस्तुओं के मूल्य निर्माता द्वारा निश्चित किये जाते हैं और उन मूल्यों में निर्माता द्वारा परिवर्तन बहुत ही कम किया जाता है। परिणामतः मूल्यों में स्थायित्व बना रहता है।

(3) गारण्टी-सामान्यतः ब्राण्ड वाली वस्तुओं की उनकी उपयोगिता के बारे में गारण्टी भी दी जाती है। ऐसा होने से उपभोक्ताओं को वस्तु अच्छी क्वालिटी की मिलती है। यह गारण्टी बीमा का काम करती है।

(4) सुगम पहचान-ब्राण्ड वाली वस्तु को आसानी से पहचाना जा सकता है और दुबारा क्रय करने में सुविधा रहती है।

(5) अच्छा पैकेजिंग ब्राण्ड की वस्तुओं का पैकेजिंग भी अच्छा होता है जिससे वस्तु को काफी लम्बे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

ब्राण्ड के दोष (Demerits of Brand)

ग्राण्ड के प्रयोग के प्रमुख दोष निम्नलिखित है (1) ब्राण्ड उपभोक्ता को विवेकहीन बना देता है और अच्छी वस्तु उपलब्ध होने पर भी वस्तु का उपयोग नहीं कर पाता है।

(2) इससे उसको अपने धन का उचित प्रतिफल नहीं मिल पाता है। वह अच्छी

(3) उसको वस्तु की क्वालिटी की तुलना में अधिक मूल्य देना पड़ता है।

(4) जब निर्माता विक्रेता द्वारा एक ब्राण्ड के विषय में प्रसिद्धि प्राप्त कर ली जाती है तो वह उसकी क्वालिटी की ओर अधिक ध्यान नहीं देता है।

(5) भविष्य में उनके द्वारा मूल्य वृद्धि कर अधिक लाभ कमाने का प्रयत्न किया जाता है।