अति-पूँजीकरण के अर्थ एवं कारणों को समझाइये। अति पूँजीकरण को ठीक करने की विधि का विवेचन कीजिए।

63

अति-पूँजीकरण का अर्थ एवं परिभाषा (Definition of Over-capitalisation)

जब कोई कम्पनी कुल विनियोजित पूँजी द्वारा इतनी आय प्राप्त करने में निरन्तर असफल रहती है जिससे कि वह साधारण अंश-पूंजी पर उचित दर से लाभांश नहीं दे पाती, तो ऐसी दशा को अति-पूँजीकरण कहते हैं। दूसरे शब्दों में यह कहा जाएगा कि कम्पनी में विनियोजित कुल सम्पत्ति का वास्तविक मूल्य उसके लेख मूल्य या पुस्तकों में दिखाये गये मूल्य से कम हो जायेगा। फलतः उसके साधारण अंशों का बाजार मूल्य भी कम हो सकता है।

गेस्टर्नबर्ग के अनुसार, “किसी कम्पनी को अति पूँजीकृत उस समय कहा जाएगा जब उसकी आय निर्गमित प्रतिभूतियों पर उचित दर से प्रत्याय देने के लिए अपर्याप्त हो अथवा जब उसकी देय प्रतिभूतियों का लेख-मूल्य उसकी सम्पत्तियों के वर्तमान मूल्य से अधिक हो।” गिलबर्ट के अनुसार, “यदि कोई कम्पनी अपनी आय देय प्रतिभूतियों पर बाजार में प्रचलित वर्तमान दर से प्रत्याय अर्जित करने में निरन्तर असमर्थ रहती है तो उसे अति-पूँजीकृत कहा जाता है।” अति-पूँजीकरण का परीक्षण—इस बात का पता कैसे लगाया जाय कि कोई कम्पनी अति-पूँजीकृत है ? यह प्रश्न उठाया जाना स्वाभाविक है। वस्तुतः व्यवसाय के लेख-मूल्य एवं उसके वास्तविक मूल्य की तुलना करके उसे ज्ञात किया जा सकता है। यदि लेख मूल्य वास्तविक मूल्य से अधिक है (अथवा वास्तविक मूल्य लेखे मूल्य से कम है) तो यह माना जाएगा कि कम्पनी में अति-पूँजीकरण की स्थिति है।

अति पूँजीकरण के कारण (Causes of Over-capitalisation)

1. आय के प्रारम्भिक अनुमान में त्रुटि-मान लीजिए कि आरम्भ में आय का अनुमान 27,500 रुपये औंका गया जिसे 10 प्रतिशत की प्रचलित दर से पूँजीकृत करके पूँजीकरण की कुल मात्रा 2,75,000 रुपये निश्चित की गयी। बाद में यह ज्ञात हुआ कि आय अनुमान के विपरीत केवल 21500 रुपये ही है। अतः पूँजीकरण की मात्रा 10 प्रतिशत से केवल 2,15,000 रुपये ही है। अतः पूँजीकरण की मात्रा 10 प्रतिशत से केवल 2,15,000 रुपये ही होनी चाहिए थी। ऐसी त्रुटि का फल यह होगा कि कम्पनी 60,000 रुपये से अतिपूँजीकृत हो जायेगी।

2. सम्पत्ति का बड़े मूल्य पर हस्तान्तरण- प्रायः यह देखने में आता है कि प्रवर्तन के समय प्रवर्तकों अथवा विक्रेताओं द्वारा प्रस्तावित कम्पनी को हस्तांतरित की जाने वाली सम्पत्ति का मूल्यांकन उसके वास्तविक मूल्य से अधिक राशि पर किया जाता है फलतः आरम्भ से ही कम्पनी की पूंजी जलयुक्त हो जाती है और आय उपार्जन करने की क्षमता दिखाये गये मूल्य या लेखे मूल्य के अनुपात में बहुत कम होती है।

3. उदार लाभांश नीति-कुछ कम्पनियों में अपनी साख जमाने के उद्देश्य से यह प्रवृत्ति पायी जाती है कि वे प्रारम्भ में ऊँची दर से लाभांश घोषित करती है और इस कारण ह्रास एवं सुरक्षित कोषों की मदों में समुचित प्रावधान नहीं किया जाता। फलतः कुछ काल के बाद ही कम्पनी में अति-पूँजीकरण के लक्षण दिखायी देने लगते हैं।

4. हास नीति में दोष-कुछ कम्पनियों लाभ को अधिक दिखाने के उद्देश्य से आवश्यक, प्रतिस्थापन एवं अप्रचलन के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं कर पातीं। अतः कुछ के बाद स्थिर सम्पत्ति की उपयोगिता एवं उनके वास्तविक मूल्य में कमी हो जाती है तथा वह अपने लेखे-मूल्य के अनुपात में आय उपार्जित करने सहायक नहीं होती। लेखे मूल्य की तुलना में वास्तविक मूल्य कम हो जाने के कारण अति-पूंजीकरण की अवस्था उत्पन्न हो जाती है।

अति-पूँजीकरण को ठीक करने की विधि (Methods of Corecting Over-capitalisation)

अति-पूँजीकरण का उपचार करना बड़ा कठिन कार्य है। किसी कम्पनी के जीवन काल के प्रारम्भिक वर्षों में लाभ का कम होना एक स्वाभाविक बात है और इसे अति-पूँजीकरण का लक्षण नहीं माना जाना चाहिए। ऐसी कम्पनियाँ कुछ वर्षों की प्रगति के बाद ही अपनी आय बढ़ा देती हैं तथा आय एवं पूंजी की मात्रा में सामंजस्य स्थापित कर लेती हैं, किन्तु यदि अति-पूँजीकरण की सीमा इतनी अधिक हो गयी है कि रोग असाध्य प्रतीत होता है तो फिर इसके लिए कोई ऐसा अचूक निदान नहीं है जिसे रामबाण कहा जा सके। इसके लिए कई उपचारों का सहारा लेना होगा और उसके बाद भी यह आवश्यक नहीं है कि मुक्ति मिल ही जाए। अनेक कम्पनियाँ अति-पूँजीकरण के उपचार की प्रक्रिया में असफल रहती है और बाध्य होकर उन्हें या तो समापित कर दिया जाता है अथवा उन्हें पुनर्संगठन या समामेलन का सहारा लेना पड़ता है।

यदि अति-पूजीकरण असाध्य प्रतीत होता है और इस बात का विश्वास हो जाता है कि उसे लाभ के पुनर्विनियोग अथवा स्वयं वित्त पोषण के द्वारा ठीक नहीं कहा जा सकता, तो ऐसी दशा में पूंजीकरण अथवा अपूँजीकरण में तरीकों को काम में लाना होगा। यह एक दुःखदायी प्रक्रिया है। और अंशधारी एवं ऋणदाता दोनों ही इसके लिख सरलता से सहमत नहीं होते। अधिक लाभांश एवं बोनस अंशों को पाकर अंशधारी जितने प्रसन्न होते हैं उतने ही दुःखी वे अवपूँजीकरण अथवा उनके अंशों के मूल्य में कमी किये जाने से होते हैं।

जैसे कि सम्पूर्ण शरीर की रक्षा के लिए किसी सड़े हुए अनावश्यक अंग को काटकर अलग कर दिया जाय या छोटा कर दिया जाय। यह प्रक्रिया दुःखदायी अवश्य है, किन्तु यह स्वयं कम्पनी, अंशधारी एवं ऋणदाता आदि निहित वर्गों के हितों के अनुकूल है। समय रहते यदि रोग के उपचार के लिए दृढ़तापूर्वक निरन्तर प्रयत्न किया जाए तो पूँजी के बचे हुए भाग को नष्ट होने से बचाया जा सकता है।


Meaning and Definition of Over-Capitalization

When a company continuously fails to generate such income from the total capital employed so that it is unable to pay dividend on the ordinary share capital at reasonable rate, then such condition is called over-capitalisation. In other words, it will be said that the actual value of the total assets appropriated in the company will be less than its book value or the value shown in the books. As a result, the market value of its equity shares may also fall.

According to Gasternberg, “A company is said to be over-capitalized when its income is insufficient to provide a reasonable rate of return on the securities issued or when the article value of its securities payable exceeds the present value of its assets.” According to Gilbert, “A company is said to be over-capitalized if it continues to be unable to earn a return on its earnings payable securities at the current rate prevailing in the market.” Over-capitalization test—how to find out if a company is over-capitalized? It is natural for this question to be raised. In fact, it can be found by comparing the article-value of the business and its actual value. If the article value is more than the actual value (or the actual value is less than the account value), the company will be deemed to be in a state of over-capitalisation.

Causes of Over-capitalisation

1. Error in the initial estimate of income- Suppose that initially the estimate of income was estimated at Rs 27,500 which was capitalized at the prevailing rate of 10 per cent and the total amount of capitalization was fixed at Rs 2,75,000. Later it was found that the income as against the estimate is only Rs.21500. Hence the quantum of capitalization is 10% to Rs. 2,15,000 only. Hence the quantum of capitalization should have been only Rs 2,15,000 from 10 per cent. The result of such error would be that the company would become overcapitalized by Rs.60,000.

2. Transfer of property at a higher value- It is often seen that at the time of commissioning, the property to be transferred by the promoters or sellers to the proposed company is valued at a higher amount than its actual value, as a result of which the capital of the company from the beginning becomes waterlogged and the earning capacity is very less in proportion to the value shown or the account value.

3. Liberal Dividend Policy – In order to establish their credibility, some companies have a tendency to declare dividend at a higher rate in the beginning and due to this, proper provision is not made in the items of depreciation and reserve funds. As a result, after some time, signs of over-capitalization start showing in the company.

4. Defects in Depreciation Policy- Some companies are not able to make adequate arrangements for replacement and obsolescence, necessary for the purpose of showing more profit. Therefore, after some time the usefulness of fixed assets and their real value decreases and they are not helpful in earning income in proportion to their account-value. Over-capitalisation occurs when the actual value falls short of the account value.

Methods of Correcting Over-capitalisation

Remedying over-capitalization is a very difficult task. Loss of profits in the initial years of a company’s life is a natural phenomenon and should not be considered a symptom of over-capitalisation. Such companies increase their income only after a few years of progress and reconcile the amount of income and capital, but if the extent of over-capitalization has become so high that the disease appears incurable, then there is no cure for it. There is no perfect solution that can be called a panacea. For this, you will have to resort to many remedies and even after that it is not necessary that you get liberation. Many companies fail in the process of remediation of over-capitalization and are forced to either liquidate or resort to reorganization or amalgamation.

If over-capitalization appears to be intractable and there is a belief that it cannot be justified by profit re-appropriation or self-financing, then capitalization or de-capitalization methods will have to be employed. It is a painful process. And both the shareholder and the creditor do not readily agree on its writing. The more happy the shareholders are by getting more dividend and bonus shares, the more sad they are due to decapitalization or reduction in the value of their shares.

For example, to protect the whole body, a rotten unnecessary part should be cut off or shortened. This process is definitely painful, but it is in favor of the interests of the vested classes like the company itself, the shareholders and the lenders. If persistent efforts are made for the treatment of the disease in time, then the remaining part of the capital can be saved from destruction.