फुटकर विक्रय के विभिन्न तरीको को बताइए। भारत में कौन-सा तरीका लोकप्रिय है ?

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बड़े पैमाने के फुटकर विक्रेता (Large Scale Retailers) : आधुनिक युग में बड़े पैमाने पर उत्पादन होने लगा है। वर्तमान समय में बड़े पैमाने के उत्पादक बड़े पैमाने के फुटकर व्यापार में रुचि लेने लगे हैं। इसके अतिरिक्त कुछ विक्रेता भी बड़े पैमाने पर फुटकर व्यापार करने लगे हैं। बड़े पैमाने के फुटकर व्यापार के अन्तर्गत विभागीय भण्डार, बहुसंख्यक दुकानें, उपभोक्ता सहकारी भण्डार, सुपर बाजार, डाक द्वारा व्यापार, गृह, क्रय-विक्रय तथा किश्त भुगतान वाली दुकानों को सम्मिलित किया जाता है।

वर्तमान समय में विश्व के लगभग सभी देशों में निम्न कारणों से बड़े पैमाने पर फुटकर व्यापार काफी बढ़ता जा रहा है 

(1) जनसंख्या का केन्द्रीयकरण-ज्यों बड़े-बड़े शहरों में जनसंख्या का केन्द्रीयकरण हुआ है। त्यों-त्यों बड़े पैमाने की फुटकर संस्थाओं की स्थापना हुई है क्योंकि बड़े पैमाने का फुटकर व्यापार तभी सफल हो सकता है जबकि क्रेताओं की संख्या अधिक हो। अतः जनसंख्या के केन्द्रीयकरण के कारण बड़े-बड़े शहरों में विभागीय भण्डार, श्रृंखलाबद्ध दुकानें, सुपर बाजार आदि संस्थाओं की स्थापना हुई है।

(2) बड़े पैमाने पर उत्पादन- जब से बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाली संस्थाओं एवं कम्पनियों का विकास हुआ है तब से बड़े पैमाने के फुटकर व्यापार को प्रोत्साहन मिला है क्योंकि बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाली संस्था अपने माल को शृंखलाबद्ध दुकानों के माध्यम से उपभोक्ता को आसानी से बेच सकती है और वितरण सम्बन्धी मितव्ययितायें प्राप्त कर सकती है।

(3) परिवहन सुविधाओं में सुधार परिवहन सुविधा के विकास के कारण उपभोक्ता केन्द्रित भण्डारों तक आसानी से पहुँच जाते हैं और इन सुविधाओं के विकास के कारण उत्पादक भी उपभोक्ताओं से सम्पर्क स्थापित कर सकते हैं। इस कारण भी बड़े पैमाने के फुटकर व्यापार को प्रोत्साहन मिलता है।

(4) उच्च जीवन स्तर-आधुनिक युग में उपभोक्ता अपना जीवन स्तर ऊँचा उठाने के लिए विभिन्न प्रकार की वस्तुओं की माँग करने लगे हैं और प्रायः एक ही स्थान पर वस्तुयें खरीदना पसन्द करते हैं। इसी कारण बड़े-बड़े शहरों में उपभोक्ताओं की माँगों को पूरा करने के लिए विभागीय भण्डार और सुपर बाजार की स्थापना हो रही है।

(5) वस्तुओं की किस्मों में वृद्धि-आधुनिक युग में वस्तुओं की किस्मों में वृद्धि हुई है। एक छोटा फुटकर दुकानदार वस्तु की सभी किस्मों का स्टॉक रखने में असमर्थ होता है। अतः इस कारण भी बड़े पैमाने के फुटकर व्यापार का विकास हुआ है।

(6) कम दाम पर सर्वोत्तम सेवा- बड़े पैमाने के फुटकर व्यापार करने से व्यापारी या संस्था को अनेक मितव्ययितायें प्राप्त होती है जिस कारण वे वस्तु की कीमत को कम निर्धारित करते हैं। अतः बड़े पैमाने से विक्रेताओं को तो अधिक बिक्री होने के कारण अधिक लाभ प्राप्त होते हैं और उपभोक्ताओं को भी लाभ होता है क्योंकि उनकी अपनी आवश्यकता की वस्तुयें कम दाम पर मिल जाती है।

बड़े पैमाने के फुटकर व्यापार के प्रमुख रूप (Main Forms of Large Scale Retailing)

पिछली शताब्दी में बड़े पैमाने पर फुटकर व्यापार हेतु अनेक संस्थाओं का विकास हुआ है। इनके विकास के पूर्व यह समझा जाता था कि बड़े पैमाने पर फुटकर व्यापार किया ही नहीं जा सकता लेकिन सन् 1900 के पश्चात् स्थापित हुए विभागीय भण्डार बहुसंख्यक या श्रृंखलाबद्ध दुकानों, सुपर बाजारों ने इस धारणा को गलत सिद्ध कर दिया है। विकसित देशों जैसे-अमेरिका, इंग्लैण्ड आदि में तो सन् 1900 के बाद बड़े पैमाने की फुटकर व्यापार करने वाली अनेक संस्थाओं की स्थापना हुई है। इन देशों में कुल फुटकर व्यवसाय का लगभग 90% भाग इन बड़े पैमाने की फुटकर व्यावसायिक संस्थाओं के हाथ में है। वर्तमान समय में बड़े पैमाने पर फुटकर व्यापार के हमें निम्न रूप देखने को मिलते हैं

  • विभागीय भण्डार-विभागीय भण्डार से आशय ऐसे विशाल भण्डार से है जिसमें अनेक विभाग होते हैं एवं प्रत्येक विभाग में भिन्न-भिन्न वस्तुओं का विक्रय किया जाता है तथा इन विभागों का नियन्त्रण एवं संचालन प्रायः एक ही स्थान पर ग्राहकों की सम्पूर्ण आवश्यकताओं की सन्तुष्टि करना होता है। इन विभागीय भण्डारों में सुई से लेकर मोटरकार तक की वस्तुओं का विक्रय किया जाता है। इन विभागीय भण्डारों की स्थापना सर्वप्रथम फ्रांस, अमेरिका तथा यूरोपीय देशों में हुई। भारत में व्हाइट वे लेडला लि. मुम्बई में, आर्मी एवं नेवी स्टोर्स लि. चेन्नई में, कमलालय स्टोर्स लि. कोलकाता में तथा कानपुर में के. जी. ठाकुर दास दण्ड कं. आदि प्रमुख विभागीय भण्डार हैं।
  • श्रृंखलाबद्ध अथवा बहुसंख्यक दुकाने-शृंखलाबद्ध अथवा बहुसंख्यक दुकानों से तात्पर्य ऐसी दुकानों से है जो कि एक ही स्वामित्व के अन्तर्गत होती हैं और एक नगर के भिन्न-भिन्न भागों में अथवा विभिन्न शहरों में कई प्रकार की वस्तुयें बेचने के लिए अनेक दुकानें स्थापित की जाती है। प्रायः ऐसी दुकानें बड़े-बड़े निर्माताओं या थोक विक्रेताओं द्वारा खोली जाती हैं। इन दुकानों में सामान्यतः सजातीय वस्तुओं में व्यवहार किया जाता है। प्रायः ऐसी दुकानों में एक-सी सजावट होती है। भारत में गाँधी आश्रम, उषा कम्पनी, बाटा शू कम्पनी, रेमण्ड, ग्वालियर शूटिंग आदि की दुकानें इस प्रकार की दुकानों के स्पष्ट उदाहण है।
  • डाक द्वारा व्यापार गृह-डाक द्वारा व्यापार से आशय ऐसे व्यापार से है जिसमें ग्राहक अपना आदेश डाक द्वारा भेजते हैं और विक्रेता ग्राहकों के पास माल डाक द्वारा भेजता है। यह पद्धति तथ अपनायी जाती है तब कि क्रेता दूर-दूर बिखरे रहते हैं। ऐसे व्यापार में लेन-देन का माध्यम डाकघर ही रहता है। इस पद्धति के विकास का प्रमुख उद्देश्य निर्माता और उपभोक्ता के मध्य अनावश्यक मध्यस्थों को समाप्त करना है। भारत में अनेक संस्थाएँ डाक द्वारा व्यवहार करती है।
  • सुपर बाजार-सुपर बाजार एक बड़ी फुटकर दुकान होती है जिसमें भिन्न-भिन्न प्रकार की उपभोग की वस्तुयें बेची जाती हैं। इन वस्तुओं में खाद्य सामग्री एवं घरेलू सामान मुख्य होते हैं। सुपर बाजार बिना विक्रेताओं की सहायता के चलाये जाते हैं अर्थात् ग्राहक स्वयं सेवा (Self Service) सिद्धान्त के अनुसार इनसे क्रय करते हैं। ग्राहकों को अपने लिये वस्तु चुनने का पूर्ण अवसर मिलता `है। वह वस्तुओं को चुनने के पश्चात् उनको बाहरी दरवाजे पर लाता है जहाँ पर एक क्लर्क बैठता है जो ग्राहकों से वस्तुओं का मूल्य ले लेता है। सुपर बाजार का मुख्य उद्देश्य ग्राहकों को अच्छी वस्तुयें सस्ते मूल्य पर बेचना होता है। भारत में सुपर बाजार प्रचलित हैं लेकिन इनकी संख्या बहुत कम है।
  • उपभोक्ता सहकारी भण्डार-उपभोक्ता सहकारी भण्डार उपभोक्ता सहकारी समितियों द्वारा खोले जाते हैं। ये उपभोक्ताओं के ऐसे ऐच्छिक संगठन हैं जिनका प्रमुख उद्देश्य अपने सदस्यों तथा अन्य ग्राहकों को सस्ते मूल्यों पर वस्तुयें उपलब्ध कराना है। ये निर्माता या थोक व्यापारियों से माल खरीदते हैं और उचित मूल्यों पर वस्तुयें बेचते हैं। इनका विकास फुटकर व्यापारियों द्वारा उपभोक्ताओं का शोषण करने के कारण हुआ है। भारत में सहकारी भण्डारों का प्रचलन है लेकिन इनकी संख्या बहुत कम है।
  • किराया क्रय तथा किश्त भुगतान वाली दुकानें- ये ऐसी दुकानें होती हैं जो ग्राहकों को माल बेचते समय उनके साथ एक अनुबन्ध करती हैं, जिसे किराया-क्रय या किश्त भुगतान अनुबन्ध कहते हैं। इस अनुबन्ध के अन्तर्गत क्रेता को माल दे दिया जाता है और क्रेता उसके मूल्य को निश्चित अवधि में किश्तों में चुकाता है। इस विक्रय पद्धति में ग्राहकों से नकद बिक्री मूल्य लिया जाता है। यह अधिक मूल्य किश्तों के व्याज के रूप में लिया जाता है। इस पद्धति में क्रेता एवं विक्रेता दोनों लाभान्वित होते हैं। विक्रेता का माल बिक जाता है और क्रेता को किश्तों पर माल खरीदने की सुविधा मिल जाती है। भारत में यह पद्धति कुछ टिकाऊ वस्तुओं के सम्बन्ध में प्रचलित है।

भारत में बड़े पैमाने के फुटकर व्यापार की प्रगति (Progress of Large Scale Retailing in India) : भारत में बड़े पैमाने के फुटकर व्यापार का अधिक विकास नहीं हो पाया है। जहाँ तक विभागीय भण्डारों का प्रश्न है-इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि भारत में बहुत कम संख्या में विभागीय भण्डार हैं जिनको अंगुलियों पर गिनाया जा सकता है। भारत में विभागीय भण्डार इसलिए लोकप्रिय नहीं हो पाये हैं क्योंकि यहाँ की अधिकांश जनता गरीब है और वह गाँवों में निवास करती है तथा शहरों में रहने वाले व्यक्ति भी आस-पास की फुटकर दुकानों से वस्तुयें खरीदने के अभ्यस्त हो गये हैं अतः भारत में इन प्रमुख कारणों से विभागीय भण्डारों का विकास नहीं हो पाया है। भारत में सुपर बाजार और उपभोक्ता सहकारी भण्डारों का भी अधिक प्रचलन नहीं है क्योंकि अधिकांश सुपर बाजार और उपभोक्ता सहकारी भण्डार सरकारी प्रेरणा से सहकारी क्षेत्र में स्थापित किये गये हैं

जो केवल सरकारी दुकानें बनकर रह गये है। भारत में डाक द्वारा व्यापार का भी अधिक प्रचलन नहीं है क्योंकि यहाँ की अधिकांश जनता अशिक्षित एवं अन्धविश्वासी है। जहाँ तक श्रृंखलाबद्ध या बहुसंख्यक दुकानों का प्रश्न है इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि इनका भारत में काफी प्रचलन है। बाटा शू कम्पनी, उषा इन्जीनियरिंग उद्योग, रेमण्ड, गाँधी आश्रम, आदि अनेक संस्थायें बहुसंख्यक दुकानों को सफलतापूर्वक चला रही है। भारत में किराया-क्रय और किश्त भुगतान पद्धति का भी काफी विकास हुआ है। भारत में ऊषा के पंखे, सिलाई मशीन, अनेक कम्पनियों के टेलीविजन, रेफ्रीजरेटर आदि किराया-क्रय और किश्त भुगतान पद्धति पर बिक रहे हैं।