रोकड़ प्रबन्ध के विभिन्न चरणों की विस्तृत व्याख्या कीजिए।

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रोकड प्रबन्ध के चरण (Steps of Cash Management) : रोकड़ प्रबन्ध के विभिन्न चरणों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) रोकड़ नियोजन एवं नियन्त्रण (Cash Planning and Control) रोकड़ नियोजन व नियन्त्रण की आवश्यकता इसलिए पड़ती है ताकि रोकड़ शेष को न्यूनतम रखते हुए अधिकतम लाभ कमाया जा सके। रोकड़ नियोजन से तात्पर्य रोकड़ प्राप्ति की मात्रा का अनुमान लगाना एवं भुगतानों को व्यवस्थित करने से होता है। रोकड़ नियन्त्रण से अभिप्राय यह देखने से है कि रोकड़ की प्राप्ति व भुगतान नियोजन के अनुसार हो रहा है या नहीं। रोकड़ नियोजन व नियन्त्रण हेतु निम्न विधियों का प्रयोग किया जाता है

(a) रोकड़ बहाव विश्लेषण (Cash Flow Analysis) –यह विधि एक निश्चित अवधि में रोकड़ के विभिन्न स्रोतों एवं रोकड़ के विभिन्न प्रयोगों का विवेचन करती है। इसके अन्तर्गत रोकड़ बहाव का पूर्वानुमान लगाया जाता है। इस प्रकार के पूर्वानुमान द्वारा यह पता लगाया जाता है कि संस्था को कब और कितनी रोकड़ राशि की कमी पड़ेगी और कितनी राशि अल्पकाल के लिए अधिक होगी। अल्पकालीन रोकड़ बहाव में सुधार के लिए अनेक तकनीकियों (जैसे ताला सन्दूक पद्धति, फ्लोट, नकद छूट की प्राप्ति और अल्पकालीन विनियोग करना) का सहारा लिया जा सकता है। सांख्यिकीय रीतियों के प्रयोग द्वारा रोकड़ प्राप्ति एवं रोकड़ भुगतान का पूर्वानुमान सरलता से लगाया जा सकता है।

(b) रोकड़ बजट ( Cash Budget) रोकड़ बजट, रोकड़ नियोजन का एक महत्वपूर्ण यन्त्र है। इसके अन्तर्गत प्रबन्धकों को भावी माहवार प्राप्तियों (Future monthly receipts) एवं भावी माहवार भुगतानों (Future monthly payments) का विश्लेषण प्राप्त हो जाता है। रोकड़ बजट बनाते समय भावी प्राप्तियों एवं भावी भुगतानों को आधार मानकर रोकड़ की आवश्यकता एवं कमी का पूर्वानुमान लगाया जाता है तथा इस आधार पर रोकड़ का नियोजन किया जाता है।

(c) अनुपात विश्लेषण (Ratio Analysis)– विभिन्न अनुपातों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में नकदी के उचित प्रबन्ध पर ध्यान दिया जा सकता है। इन अनुपातों में मुख्य रूप से रोकड़ आवर्त अनुपात (Cash Turnover Ratio), दैनिक नकद भुगतान अनुपात (Daily Cash Payment Ratio), रोकड़ प्रवाह व्याप्ति अनुपात (Cash Flow Coverage Ratio), आधारभूत रक्षक अन्तर (Basic Defensive Invterval) तथा नकद स्थिति अनुपात (Cash Position Ratio) को सम्मिलित किया जाता है।

(d) रोकड़ प्रबन्ध प्रतिमान (Cash Management Models) इनकी सहायता से अनुकूलतम रोकड़ शेष का निर्धारण करके रोकड़ को जियोजित एवं नियन्त्रित किया जा सकता है। इनका वर्णम इसी अध्याय में रोकड़ प्रबन्ध के तीसरे चरण के अन्तर्गत किया गया है।

(2) रोकड़- प्रवाहों का प्रबन्ध (Managing the Cash-Flows)- कुशल रोकड़ प्रबन्ध तरलता एवं लाभदायकता दोनों उद्देश्यों को ध्यान में रखकर किया जाता है जिसके लिए रोकड़ प्रवाहों का समुचित नियन्त्रण आवश्यक है। रोकड़ प्रवाहों में रोकड़ अन्तर्वाह (Cash inflows) तथा रोकड़ बहिर्वाह (Cash Outflows) दोनों को सम्मिलित किया जाता है, जिनकी संक्षिप्त विवेचना अय प्रकार है

(a) रोकड़ अन्तर्वाहों का प्रबन्ध (Managing the Cash Inflows) रोकड़ प्रबन्ध के इस चरण के अन्तर्गत प्रबन्धक रोकड़ वसूली की गति को तीव्रतम बनाने के साथ-साथ उसे और अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास करते हैं। इसके अन्तर्गत प्रबन्धक विक्रय नीति में आमूल-चूल परिवर्तन करते हैं। नकद विक्रयों (Cash Sales) पर अधिक बल दिया जाता है तथा उधार नीति में परिवर्तन करके कठोर वसूली नीति (Strict Realisation Policy) अपना कर ग्राहकों से शीघ्र अति शीघ्र रोकड़ एकत्र करने का प्रयास किया जाता है। दूसरी ओर प्राप्त चेकों प्राप्य बिलों, ड्राफ्टों, हुण्डियों आदि के माध्यम से प्राप्त वसूली को शीघ्र अतिशीघ्र तरल रूप में बदलने के सभी आवश्यक उपाय किए जाते हैं। संक्षेप में, रोकड़ वसूली की गति को तीव्रतर करने के लिए कोई भी संस्था दो तरीके अपना सकती है-इसके लिये एक तरीका तो ग्राहकों को जल्दी भुगतान करके के लिए प्रोत्साहित करने का है तथा दूसरा तरीका ग्राहकों से प्राप्त भुगतान को जल्दी-से-जल्दी नकदी में परिवर्तित करने का है। रोकड़ वसूली में तीव्रता लाने हेतु निम्न तरीकों को प्रयोग में लाया जाता है

(i) ग्राहकों द्वारा तुरन्त भुगतान। (ii) संग्रहण केन्द्रों की स्थापना।

(iii) लॉक बॉक्स की व्यवस्था । (iv) बड़ी राशि वाले चेकों के लिए विशेष व्यवस्था

(v) बैंक खातों की संख्या में कमी करना।

(b) रोकड़ बहिर्वाहों का प्रबन्ध (Managing the Cash Outflows )-रोकड़ प्रबन्ध के इस चरण के अन्तर्गत प्रबन्धक रोकड़ भुगतानों की गति को न्यूनतम करने के उपाय करते हैं। रोकड़ भुगतान में भुगतान की गति को न्यूनतम करने के प्रयास में प्रबन्धकों को हमेशा इस बात का यान रखना चाहिए कि इससे फर्म की ख्याति पर कोई विपरीत प्रभाव परिलक्षित नहीं हों। इसके अन्तर्गत प्रबन्धक अधिकाधिक सामग्री का उधार क्रय, प्रत्यक्ष व्ययों, मजदूरी एवं अन्य उपरिव्ययों के विलम्बित पर तो जोर देते ही हैं, साथ-ही-साथ भुगतान करने के ऐसे सभी उपायों को भी अपनाते हैं, जिससे भुगतान प्राप्त करने वाले पक्षकार को शीघ्रता से रोकड़ में भुगतान प्राप्त नहीं हो सकें। इन उपायों के अन्तर्गत चेक के माध्यम से भुगतान, हुण्डियों अथवा देय दिलों के माध्यम से भुगतान, दूरस्य बैंक के माध्यम से भुगतान, आगामी तिथि का चेक निर्गत करके एवं चेक का रेखांकन करके आदि माध्यमों से रोकड़ के भुगतानों को फर्म की ख्याति को यथास्थिर रखते हुए विलम्बित किया जाता है। स्पष्ट है कि रोकड़ भुगतानों में विलम्ब करके संस्था का समुचित उपयोग कर सकती है, परन्तु इसके लिए सुनिश्चित योजना होनी चाहिए। भुगतानों में विलम्ब करने के लिए निम्न तरीके अपनाये जा सकते हैं

  • (i) केवल चेकों के द्वारा ही भुगतान दिये जायें। (ii) जटिल भुगतान प्रक्रिया को अपनाना।
  • (iii) भुगतान दिवस व समय निश्चित करना।। (iv) विशिष्ट दिवसों व समयों पर भुगतान न करना।

(3) रोकड़ शेष के अनुकूलतम स्तर का निर्धारण (Determining Optimum Cash Level)— रोकड़ की वसूली एवं नियमित भुगतानों के पश्चात् फर्मों के समक्ष उचित रोकड़ शेष रखने की समस्या उत्पन्न होती है। यदि यह रोकड़ शेष कम रखा जाता है, तो आकस्मिकता के समय रोकड़ की आपूर्ति बाह्य साधनों से ऋण आदि लेकर पूर्ण की जायेगी जिसके लिए ‘लेन-देन लागत’ जिसे व्यवहार लागत (Transaction Cost) भी कहते हैं, को सहन करना पड़ेगा।

इसके विपरीत, यदि रोकड़ शेष आवश्यकता से अधिक रखा जाता है, तो आकस्मिकताओं को पूर्ण करने के पश्चात् भी रोकड़ का शेष निष्क्रिय रहेगा, जबकि यह पूर्व में भी बताया जा चुका है कि -रोकड़ एक गैर-अर्जन (Non-earning) वाली चालू सम्पत्ति है। निष्क्रिय रोकड़ शेष के आधिक्य से फर्मों को उस रोकड़ को कहीं दूसरी ओर विनियोग करने के अवसर से वंचित रहना पड़ता है, जिससे संस्था विनियोग आय अथवा व्याज की आय से वंचित रह जाती है। इसे अवसर लागत (Opportunity cost) कहा जाता है। इस प्रकार फर्म को एक ओर तो कम रोकड शेष रखने पर लेन-देन लागत को सहन करना पड़ता है, वहीं दूसरी ओर अधिक रोकड़ शेष रखने पर उसे ‘अवसर लागत से भी वंचित रहना पड़ता है इसलिए वित्तीय प्रबन्धक अनुकूलतम रोकड़ शेष को ही रखना अधिक पसन्द करते है। रोकड़ के अनुकूलतम शेष को ज्ञात करने हेतु निम्न प्रतिमानों (Models) को प्रयोग में लाया जाता है

(i) बाऊमोल प्रतिमान (Baumol Model) | (ii) मिलर-ओर प्रतिमान (Miller orr Model)।

(iii) रोकड़ चक्र प्रतिमान (Cash Cycle Model) (iv) स्टोन प्रतिमान (Stone Model)।

रोकड़ प्रबन्ध

(4) अतिरिक्त रोकड़ का विनियोजन (Investment of Additional Cash)– का यह अन्तिम चरण है। अधिक या अतिरिक्त कार्यशील रोकड़ शेष (More or Surplus Working Cash Balance) भी एक समस्या है। अतिरिक्त रोकड़ शेष को सुरक्षा स्टॉक में रखने के स्थान पर उसे विपणन योग्य तरल प्रतिभूतियों (Marketable Liquid Securities) में विनियोजित कर देना चाहिए जिससे कि फालतू रोकड़ से ब्याज अर्जित किया जा सके। अतिरिक्त रोकड़ शेष को विपणन योग्य तरल प्रतिभूतियों के अतिरिक्त ऐसी मदों में भी विनियोजित किया जा सकता है जो अल्पकालीन हो। इस प्रकार के विनियोजन करते समय प्रवन्धकों को प्रतिभूतियों की तरलता, जोखिम एवं विपणनशीलता को ध्यान में रखना चाहिए ताकि भविष्य में रोकड़ की आवश्यकता होने पर प्रतिभूतियों को बिना विलम्ब दिना नुकसान के बाजार में आसानी से विक्रय किया जा सके।

  • (ii) लॉक बॉक्स व्यवस्था (iii) बाऊमोल मॉडल (iv) मिलर ओर मॉडल।

(i) रोकड़ अन्तर्वाहों का प्रबन्ध (Managing the Cash Inflow) रोकड़ प्रबन्ध के इस कार्य के अन्तर्गत प्रबन्धक रोकड़ वसूली की गति को तीव्र बनाने का प्रयास करते हैं। इसके अन्तर्गत प्रबन्धक विक्रय नीति में परिवर्तन करते हैं। नकद विक्रयों पर अधिक ध्यान दिया जाता है तथा उधार नीति में परिवर्तन करके कठोर वसूली नीति अपना कर ग्राहकों से अति शीघ्र रोकड़ प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। दूसरी ओर प्राप्त चेकों प्राप्य बिलों, ड्राफ्टों आदि को शीघ्र से शीघ्र तरल रूप में बदलने के सभी आवश्यक उपाय किए जाते हैं। सामान्यतः वसूली की गति को तेज करने के निम्न उपाय तरीके अपनाए जाते हैं

(a) ग्राहकों द्वारा शीघ्र भुगतान:- ग्राहकों को उधार विक्रय के पश्चात् ग्राहकों से शीघ्र भुगतान प्राप्त करने के प्रयास किए जाते हैं। इसके लिए कठोर वसूली नीति के साथ-साथ नकद छूट का प्रस्ताव देकर जल्दी भुगतान करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

(b) संग्रह केन्द्रों की स्थापना सामान्यतया संस्था के प्रधान कार्यालय में वसूली केन्द्र होता है परन्तु संस्था में रोकड़ वसूली की गति में वृद्धि करने के लिए उन सभी स्थानों पर वसूली केन्द्र स्थापित कर सकते हैं जहाँ संस्था बड़ी मात्रा में व्यापार करती है। इस व्यवस्था से ग्राहक अपने निकटतम वसूली केन्द्र पर चेक जमा करता है जिससे ग्राहक द्वारा चेक को प्रेषित करने तथा बैंक द्वारा चेक वसूल करने में लगने वाला समय कम हो जाता है।

(c) बड़ी राशि के चेकों के लिए विशेष व्यवस्था बड़ी राशि वाले चेकों के लिए संस्था द्वारा विशिष्ट व्यवस्था की जा सकती है जिससे कि इनको शीघ्रातिशीघ्र बैंक में जमा किया जा सके। इसके अन्तर्गत व्यक्तिगत वसूली, हवाई डाक, कोरियर सेवा इत्यादि को सम्मिलित कर सकते हैं।

(d) आन्तरिक रोकड़ हस्तान्तरण पर नियन्त्रण- आन्तरिक रोकड़ हस्तान्तरण की उदार नीति से संस्था में विभिन्न विभागों में अनावश्यक रोकड़ फैंसी रहती है। अतः इस पर भी नियन्त्रण करके प्रवाह की गति को तीव्र कर सकते हैं।

(e) बैंक खातों की संख्या में कमी-जब संस्था एक ही शहर में विभिन्न बैंकों में खाते खोले रहती है तो इन छोटे-छोटे खातों में अनावश्यक रूप से संस्था की रोकड़ फैंसी रहती है। इन कई खातों के स्थान पर एक स्थान एक खाता खोलकर बैंकिंग सुविधाओं का लाभ उठाते हुए रोकड़ स्थिति को सुधारा जा सकता है।

(ii) लॉक बॉक्स व्यवस्था (Lock Box System) यह डाक समय, प्रयण और संग्रह समय को कम करने की एक तकनीक है। इस व्यवस्था में फर्म द्वारा अपने व्यापार के स्थानों पर डाकघर से पोस्ट बॉक्स किराये पर ले लिया जाता है तथा ग्राहकों से उस पोस्ट बॉक्स नम्बर पर अपने चेक भेजने के लिए कहा जाता है। एक स्थानीय बैंक को उस लॉक बॉक्स के परिचालन के लिए अधिकृत कर दिया जाता है। बैंक दिन में कई बाद डाक संग्रह कराती है और उसी दिन चेक को संग्रह के लिए भेज दिया जाता है तथा इस प्रकार एकत्रित राशि फर्म के खाते में जमा हो जाती है। इस प्रकार चेक प्राप्त करने, लेखा करने और बैंक में जमा करने के समय में बचत होती है।

(iii) बाऊमोल मॉडल (Bauml Model) इस मॉडल के जनक विलियन जे. बाऊमोल हैं। यह मॉडल स्कन्ध नियन्त्रण में प्रस्तुत मितव्ययी आदेश मात्रा (E.O.Q.) पर आधारित है। कार्यशील रोकड़ शेष का निर्धारण इस मॉडल के आधार पर उस समय किया जा सकता है, जब रोकड़ प्राप्ति व भुगतान की राशि निश्चित हो। उन्होंने अनुकूलतम रोकड़ शेष के निर्धारण हेतु निम्न सूत्र बताया है

Optimum Cash Balance = 26T

Where, b Stand for Transaction Fixed Cost Per Transaction T Stand for Requirement or Demand of Cost i Stand for Rate of interest on Marketable Securities in a Certain Period. उपर्युक्त मॉडल की यह मान्यताएँ कि प्राप्तियों एवं भुगतानों का क्रय एवं राशियों यथास्थिर रहेंगी तथा नकद लेन-देन पूर्ववत् रहेंगे। व्यवहार में सही नहीं उतरते हैं। अतः इस आधार पर यह सिद्धान्त अवास्तविक मान्यताओं पर आधारित है। इस मॉडल के अनुसार अनुकूलतम रोकड़ स्तर, रोकड़ का वह स्तर है जहाँ संग्रहण लागतें एवं लेन-देन लागतें न्यूनतम होती हैं।

(iv) मिलर-ओर मॉडल (Miller-Orr Model) जब रोकड़ की माँग अनियमित और परिवर्तनीय हो तथा उसका पूर्वानुमान लगाना सम्भव न हो तब यह मॉडल रोकड़ शेष के अनुकूलतम स्तर निर्धारित करने में सहायक होता है। मेर्टर मिलर एवं डेनियल ओर ने बताया कि स्कन्ध प्रबन्ध एवं रोकड़ प्रबंन्ध की समस्याओं में बहुत अधिक समानतायें है क्योंकि रोकड़ में भी स्कन्ध की भाँति सामयिक परिवर्तन होता है। उन्होंने एक ऐसा मॉडल विकसित किया है जो कि रोकड़ के उच्चतम एवं निम्नतम स्तर तथा विपण्य प्रतिभूतियों में विनियोजन की आने वाली रोकड़ का समय एवं मात्रा को निर्धारित करता है। मिलर और ओर ने इस मॉडल का नाम नियन्त्रण सीमा मॉडल रखा उनके अनुसार रोकड़ भुगतानों में अनिश्चितता के कारण स्कन्ध निर्णय मॉडल उपयुक्त नहीं रहता नियन्त्रण सीमा मॉडल में उच्चतम एवं निम्नतम सीमाओं का निर्धारण व्यवहार लागत तथा अवसर लागत के आधार पर किया जाता है। यह रोकड़ शेष के उच्चावचन से भी प्रभावित होती है।

यह मॉडल विनियोग खाता और रोकड़ खाता के बीच हस्तान्तरण का समय और आकार निर्धारित करता है। इस मॉडल में रोकड़ शेषों की दो नियन्त्रण सीमाएँ निर्धारित कर दी जाती है। इसमें ‘h’ उच्च सीमा (upper limit) होती है, ‘2’ वापसी बिन्दु होता है और निम्न सीमा (lower limit) T होती है।

अनुकूलतम रोकड़ शेष (Z) वापसी बिन्दु (Return Point) है जिससे ऊपर की ओर रोकड़ शेष होने पर प्रतिभूतियों का क्रय होता है और नीचे होने पर प्रतिभूतियों का विक्रय किया जाता है। जब रोकड़ शेष इन उच्च और निम्न सीमाओं के अन्तर्गत रहता है तो रोकड़ और विपण्य प्रतिभूतियों के बीच कोई लेन-देन नहीं किया जाता है। रोकड़ शेष की उच्च और निम्न सीमायें प्रतिभूति लेन-देनों से सम्बन्धित स्थिर लागतों रोकड़ रोकने की अवसर लागत रोकड़ शेषों में सम्भावित उच्चावचन की मात्रा के आधार पर निर्धारित की जाती है। ये सीमायें न्यूनतम सम्भव कुल लागत पर रोकड़ की माँग को पूरा करती है।