एक निगम में वित्तीय व्यवस्था के संगठन तथा वित्तीय प्रबन्धक के उत्तरदायित्वों की विवेचना कीजिए।

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वित्तीय प्रबन्ध का संगठन (Organisation of Financial Management)

वर्तमान व्यावसायिक युग में वित्तीय प्रबन्ध बड़ा ही महत्वपूर्ण है, कुशल वित्तीय प्रबन्ध द्वारा ही संस्था न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन करने में समर्थ होती है। इस समय जहाँ व्यावसायिक तकनीकों के विकास ने एक ओर प्रबन्धकीय विज्ञान का नया पथ प्रदर्शित किया है, वहीं दूसरी ओर वित्तीय प्रबन्ध के उत्तरदायित्वों में भी काफी वृद्धि कर दी है। व्यावसायिक संगठन के विभिन्न प्रारूपों में वित्तीय प्रबन्ध करने वाले व्यक्ति अलग होते हैं। एकल व्यवसाय के अन्तर्गत एक ही व्यक्ति वित्तीय प्रबन्ध करता है, साझेदारी व्यवसाय के अन्तर्गत साझेदारों द्वारा वित्तीय प्रबन्ध किया जाता है, जबकि कम्पनी प्रारूप के अन्तर्गत वित्तीय प्रबन्ध करने के लिये वित्तीय प्रबन्धक एवं विशेषज्ञों की नियुक्ति की जाती है।

वित्तीय प्रबन्धक के सम्पूर्ण कर्मचारियों में से कुछ निर्णयात्मक कार्य करते हैं तथा कुछ व्यावहारिक कार्य करते हैं। निर्णयात्मक कार्य उच्च अधिकारियों द्वारा किया जाता है, जबकि व्यावहारिक कार्य निम्न वर्ग के कर्मचारियों द्वारा किया जाता है। वित्त सम्बन्धी निर्णय लेने के लिये सभी कर्मचारियों को स्वतन्त्र नहीं रखा जाता, केवल कुछ कर्मचारी ही वित्त सम्बन्धी निर्णय लेने के लिये स्वतन्त्र रखे जाते हैं वित्तीय प्रबन्ध के संगठन का आशय विभिन्न वित्तीय अधिकारियों में कार्यों के वर्गीकरण एवं विभाजन से है। वित्त विभाग के संगठन का कोई निश्चित एवं स्थायी प्रारूप नहीं है। प्रत्येक संस्था अपने व्यवसाय के आकार के अनुसार वित्तीय प्रबन्ध के संगठन का निर्धारण करती है।

छोटे उपक्रमों में जिनकी परिचालन क्रिया सरल होती है तथा अधिकारों का भारार्पण (Delega (tion) बहुत कम होता है, वहाँ वित्त के कार्य को सम्पन्न करने के लिए कोई पृथक् विभाग की स्थापना की जाती है। यह कार्य किसी वरिष्ठ प्रबन्धक को सौंप दिया जाता है। इस वित्तीय नियन्त्रक या वित्तीय संचालक या वित्तीय प्रबन्धक के नाम से जाना जाता है। सभी महत्वपूर्ण वित्तीय निर्णय इसी प्रबन्धक द्वारा लिये जाते हैं तथा नैत्यिक निर्णय निम्न स्तरीय प्रबन्ध पर छोड़ दिये जाते हैं। वैधानिक एवं सैद्धान्तिक दृष्टि से कम्पनी या निगम के संगठन में व्यवसाय का स्वामित्व अंशधारियों (Shareholders) के हाथों में होता है, किन्तु उनकी संख्या एवं बिखराव को देखते हुए यह कार्य उनके द्वारा निर्वाचित संचालक मण्डल (Board of Directors) को सौंप दिया जाता है। संचालक मण्डल द्वारा वित्तीय समिति से वित्त सम्बन्धी परामर्श लिये जाते हैं तथा प्रबन्धक संचालक (Manag ing Director) द्वारा उन्हें सम्पादित करने का प्रयास किया जाता है। चूँकि प्रबन्ध संचालक को ‘उत्पादन, विक्रय वित्त, सेविवर्गीय आदि सभी से सम्बन्धित समस्याओं को सुलझाना पड़ता है, अतः उससे यह आशा नहीं की जा सकती है कि वह वित्तीय मामलों का विशेषज्ञ ही होगा, अतः प्रबन्ध संचालक अपने आधीन मुख्य वित्तीय प्रबन्धक (Financial Manager) की नियुक्ति करता है। मुख्य वित्तीय प्रबन्धक के अधीन वित्त कार्य का संगठन करने के लिए वित्तीय नियन्त्रक’ तथा ‘कोषाध्यक्ष’ की नियुक्ति की जाती है। वित्तीय नियन्त्रक नियोजन एवं नियन्त्रण, वार्षिक प्रतिवेदन तैयार करना, पूँजी बजटन, लाभ विश्लेषण, लागत एवं स्कन्ध प्रबन्ध एवं सामान्य लेखांकन आदि का कार्य करता है। कोषाध्यक्ष के मुख्य कार्यों में अतिरिक्त कोषों की प्राप्ति, रोकड़ व प्राप्यों का प्रवन्ध, अंकेक्षण, कोष एवं प्रतिभूतियों का संरक्षण, बैंक एवं अन्य संस्थाओं से सम्बन्ध बनाये रखना आदि सम्मिलित हैं। अतः एक कम्पनी या निगम में वित्तीय व्यवस्था का संगठन निम्न प्रकार किया जाता है

वित्तीय प्रबन्धक के उत्तरदायित्व (Responsibilities of a Financial Manager)

आधुनिक औद्योगिक युग में वित्तीय प्रबन्ध वर्तमान अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग बन गया है। एक अच्छे वित्तीय प्रवन्ध के द्वारा ही संस्था सफलता की चरम सीमा प्राप्त कर सकती है। वित्त सम्बन्धी निर्णय लेने में वित्तीय समिति महत्वपूर्ण योगदान करती है। इस प्रतिस्पर्धी औद्योगिक युग में वित्त प्रबन्ध के क्रमशः बढ़ते हुए कार्य क्षेत्र ने वित्तीय प्रबन्ध के कार्यों एवं उत्तरदायित्वों को और विस्तृत कर दिया है, जबकि वित्तीय प्रबन्ध वित्तीय समिति द्वारा लिये गये निर्णयों को क्रियान्वित करता है। एक वित्तीय प्रबन्ध के प्रमुख उत्तरदायित्व निम्नलिखित है

(1) वित्तीय आयोजन (Financial Planning)- वित्तीय प्रबन्धक का सबसे महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व वित्त सम्बन्धी योजना बनाना है। यदि योजना सही बन गई तो संस्था अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में निश्चित रूप से सफल हो जायेगी, किन्तु यदि योजना ठीक नहीं बन पायेगी तो संस्था के सामने वित्तीय कठिनाई उत्पन्न हो जायेगी। वित्तीय योजना बनाते समय संस्था को यह देखना पड़ता है कि वित्त न तो आवश्यकता से अधिक हो और न आवश्यकता से कम।

(2) कोषों का एकत्रीकरण (Collection of Funds) वित्तीय प्रबन्धक विभिन्न साधनों से कोयों को एकत्रित करता है। कोषों को एकत्रित करते समय वित्तीय प्रबन्धक यह ध्यान रखता है कि आवश्यक वित्त का कितना भाग अल्पकालीन स्रोतों से, कितना भाग मध्यकालीन स्रोतों से तथा कितना भाग दीर्घकालीन स्रोतों से एकत्रित किया जाये। यदि संस्था को थोड़े समय के लिये ही ऋण आवश्यक हो तो उसे अल्पकालीन ऋण ही प्राप्त करना चाहिये, भले ही ब्याज दर ऊँची हो

(3) ह्रास एवं कर का उचित प्रबन्ध (Fair Management of Depreciation and Tax) – वित्त का प्रवन्धक प्राप्त लाभ में से ह्रास एवं कर की उचित व्यवस्था करता है। यदि हास की उचित व्यवस्था न की जाये तो सम्पत्ति की पुनर्स्थापना में काफी कठिनाई उत्पन्न हो सकती है। प्रत्येक व्यावसायिक संस्था को अपनी आय पर आयकर का भुगतान करना पड़ता है, इसी प्रकार बिक्री पर बिक्री कर का भुगतान करना पड़ता है। बिक्री कर तो ग्राहकों वे वसूल कर लिया जाता है, किन्तु आयकर के भुगतान के लिये लाभ में से प्रबन्ध किया जाता है।

(4) वित्तीय उत्पादकता में वृद्धि (Increase in Financial Productivity)—वित्तीय उत्पादकता बढ़ने से कम-से-कम वित्तीय साधनों द्वारा अधिक से अधिक उत्पादन सम्भव हो पाता है। वित्तीय प्रबंन्धक का उत्तरदायित्व यह भी है कि वह वित्तीय उत्पादकता बढ़ाये। उत्पादकता बढ़ने से न्यूनतम लागत पर वस्तुएँ प्राप्त की जा सकती है तथा उपभोक्ताओं को सस्ती दरों पर अच्छी किस्म की वस्तुएँ प्रदान की जा सकती है।

(5) कोषों का विनियोजन (Investment of Funds) वित्तीय प्रबन्ध का एक उत्तरदायित्व यह भी है कि वह कोषों का सुरक्षित एवं लाभप्रद स्थानों पर विनियोजन करे। वित्तीय प्रबन्धक कोषों का उचित ढंग से विनियोजन करता है। इस सम्बन्ध में वह निर्णय लेता है कि वित्त का कितना भाग स्थायी सम्पत्तियों पर व्यय किया जाये तथा कितना भाग चल सम्पत्तियों पर व्यय किया जाये। संस्थाओं के लिये उचित होता है, कि यदि वे दीर्घकालीन साधनों से एकत्रित धन को स्थायी सम्पत्तियों पर तथा अल्पकालीन साधनों से एकत्रित घन को चल सम्पत्तियों पर व्यय करती है।

(6) आय एवं लाभांश का प्रवन्ध (Management of Income and Dividend) वित्तीय प्रबन्धक का एक उत्तरदायित्व यह भी है कि वह आय एवं लाभांश का उचित प्रबन्ध करे। संस्था की कुल आय का कितना भाग लाभांश के रूप में घोषित किया जाये तथा कितना भाग संचय के रूप में रखा जाये, इस पर विचार करने का उत्तरदायित्व वित्तीय प्रबन्धक का ही है।

(7) वित्तीय नियन्त्रण (Financial Control) वित्तीय प्रबन्धक उपलब्ध वित्त पर उचित नियन्त्रण बनाये रखता है। इससे वित्त का उचित प्रयोग सम्भव होता है, इसका दुरुपयोग नहीं हो पाता। किसी संस्था के पास चाहे कितनी भी अधिक मात्रा में वित्त उपलब्ध क्यों न हो यदि उस पर पर्याप्त नियन्त्रण नहीं है तो संस्था के वित्त का सही उपयोग नहीं हो सकता।

(8) सामाजिक उत्तरदायित्व (Social Responsibility)- वित्तीय प्रबन्ध का प्रमुख उद्देश्य कम्पनी निगम के लिए अधिकतम लाभ अर्जित करना ही नहीं है, बल्कि समाज की श्रेष्ठतम सेवा करना भी है। समाज की श्रेष्ठसम सेवा तब ही की जा सकती है, जबकि उपभोक्ताओं को सस्ती दरों पर उत्तम वस्तुओं की प्राप्ति निरन्तर होती रहे। इस उत्तरदायित्व का निर्वाह एक वित्तीय प्रबन्धक सुदृक वित्तीय नीतियाँ एवं प्रभावशाली वित्तीय नियन्त्रणों के सहयोग से करता है।