पूँजी विनियोग प्रस्तावों के मूल्यांकन की विभिन्न विधियों का वर्णन कीजिए।

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पूँजी बजटिंग की तकनीकें या पूँजी बजटन की विधियाँ या विनियोग प्रस्तावों का मूल्यांकन या परियोजना मूल्यांकन विधियाँ (Techniques of Capital Budgeting or Method of Capital Budgeting or Evaluation of Investment Proposals or Project Appraisal Methods)

विभिन्न विनियोग प्रस्तावों में से उपयुक्त प्रस्ताव का चयन करने के लिए पूँजी बजटन की तकनीकें प्रयोग की जाती हैं जो इस प्रकार हैं

(1) अपरिहार्यता विधि (Urgency Method) व्यावसायिक संस्थाओं में अनेक बार ऐसी परिस्थितियाँ आ जाती है जहाँ पर इन संस्थाओं को शीघ्र से शीघ्र निर्णय लेना पड़ता है जिससे उत्पादन बाधित न हो। वहाँ पर विनियोग प्रस्तावों का मूल्यांकन करने के लिए अपरिहार्यता विधि का प्रयोग किया जाता है। शीघ्रता से लिया गया निर्णय इन संस्थाओं के लिए लाभकारी भी हो सकता है और नहीं भी। इस विधि के अनुसार लिए गये निर्णयों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता इसलिए कभी-कभी ये निर्णय अलाभकारी हो जाते हैं। जैसे यदि कोई मशीन चलते-चलते खराब हो जाती है तो वहाँ पर शीघ्र यह निर्णय लेना होता है कि मशीन की.. मरम्मत करायी जाये या नयी मशीन खरीदी जाये अतः ऐसा निर्णय अपरिहार्यता के आधार पर किया जाता है। यह विधि अत्यन्त सरल तो है लेकिन दीर्घकालीन परियोजनाओं, अधिक विनियोजन में यह विधि सही नहीं है क्योंकि इस विधि में निर्णय का कोई उचित मापदण्ड नहीं होता अतः इस विधि का प्रयोग विनियोग प्रस्तावों के लिए बहुत कम किया जाता है।

(2) पे-बैक पीरियड विधि (Pay-Back Period Method). प्रत्यावर्तन अवधि समय की उस अवधि को कहते हैं जिसके अन्दर किसी स्थिर सम्पत्ति पर किये जाने वाले निवेश की राशि व्यवसाय द्वारा पुनः वसूल कर ली जायेगी। यह विधि वस्तुतः एक ओर इस प्रकार किये गये पूँजी निवेश तथा दूसरी ओर उससे प्राप्त होने वाले सम्भावित लाभों के मध्य समय के रूप में सम्बन्ध स्थापित करती है। प्रायः यह स्वीकार किया जाता है कि किसी पूँजी निवेश की प्रत्यावर्तन अवधि जितनी लम्बी होगी, पूँजी निवेश में निहित जोखिम उतना ही अधिक हो सकता है, क्योंकि लम्बे काल में उत्पादन तकनीक माँग की प्रकृति तथा उपभोक्ता की रुचियों आदि में परिवर्तन होने की आशंकाएँ एवं उपलब्ध स्थिर सम्पत्ति की उपयोगिता में कमी की सम्भावनाएँ हो सकती हैं, अतः प्रबन्धक ऐसी सम्पत्तियों में निवेश करना उचित समझते हैं जिनकी प्रत्यावर्तन अवधि तीन अथवा पाँच साल से अधिक न हो। प्रत्यावर्तन अवधि ज्ञात करने के लिए निवल-निवेश की राशि और उससे व्यवसाय को प्राप्त होने वाली वार्षिक खरी बचत का सही अनुमान लगाना होता है। निवल-निवेश स्थिर सम्पत्ति में किये गये वास्तविक निवेश में से उस सम्पत्ति के घिस जाने के बाद उसके विक्रय से प्राप्त होने वाले निस्तारण मूल्य को घटाकर ज्ञात किया जाता है। उससे प्राप्त होने वाली वार्षिक खरी-आय या बचत उस नकद प्रवाह के बराबर होती है जो उस सम्पत्ति के उपयोग द्वारा व्यवसाय को प्राप्त होता है। इसे ज्ञात करने के लिए उस सम्पत्ति से होने वाले कर-रहित निवल लाभ की राशि में ह्रास के लिए किया गया प्रावधान जोड़ दिया जाता है।

पे-बैक पीरियड की गणना इस दशा में अदायगी अवधि के गुण (Merits of Pay-back Period)

(1) सरल-यह विधि अत्यन्त सरल है इसका प्रयोग करना एवं समझना बड़ा सरल है।

(2) रोकड़ की कमी होने पर महत्वपूर्ण यह विधि उन संस्थाओं के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है जिनमें रोकड़ की कमी हो और वह संस्था वित्त की व्यवस्था ऋण लेकर करती है। इस विधि से यह मालूम पड़ जाता है कि जो रुपया निवेश किया है वह कितने समय में वापस मिलेगा जिससे कम समय वाली परियोजना पर विचार किया जा सके ?

(3) अप्रचलन का भय -कुछ उद्योग ऐसे होते हैं जिनमें प्राप्ति बड़ी तेजी से होती है वहाँ अप्रचलन का भय रहता है अतः इस विधि में उन्हीं परियोजनाओं को चुना जाता है जिनकी प्रत्यावर्तन अवधि कम हो, यह पद्धति अप्रचलन का भय कम करने में सहायक है।

अदायगी अवधि के दोष (Demerits of Pay-back Period)

(1) जोखिम की माप नहीं-इस विधि में परियोजना की जोखिम पर विचार नहीं किया जाता है क्योंकि कभी-कभी अदायगी अवधि कम होने पर अधिक जोखिमपूर्ण परियोजना भी स्वीकार कर ली जाती है जो सही नहीं है। से होने वाली

(2) समय कारक पर ध्यान न देना-वैसे देखा जाये तो विभिन्न परियोजनाओं आय को तुलनात्मक बनाने के लिए उनका समय अनुसार वर्तमान मूल्य ज्ञात करना आवश्यक है लेकिन इस विधि में ऐसा नहीं होता है।

(3) प्रारम्भिक निवेश की प्राप्ति के बाद आय पर ध्यान न देना-इस विधि में जो रुपया किया जाता है इसके प्राप्त हो जाने के पश्चात् क्या आय होगी उस पर यह विधि ध्यान नहीं देती है ?

निवेश पुनर्भुगतान अवधि या अदायगी अवधि में सुधार (Improvement in Pay-back Method)

अदायगी अवधि विधि में उन कमियों को दूर करने के लिए इसमें निम्न सुधार आवश्यक

(1) अदायगी अवधि के पश्चात् की लाभप्रदता (Post Pay-back profitability) – अदायगी अवधि में यह सबसे बड़ा दोष है कि इसमें बाद की अवधि, बाद की लाभदायकता, लाभदायकता निर्देशांक पर ध्यान नहीं दिया जाता है यह उसका सुधार है। अतः अदायगी अवधि के पश्चात् की लाभप्रदता के तीन रूप किये जा सकते हैं

(a) अदायगी अवधि के पश्चात् की अवधि (Post pay back period)-रोकड़ अन्तर्वाह चाहे समान हो अथवा असमान दोनों दशाओं में इसकी गणना निम्न सूत्र से करेंगे और इस परियोजना का चुनाव करेंगे जिसकी अवधि अधिक हो।

Post pay-back period = Life of the machine – Pay-back period (b) अदायगी अवधि के पश्चात् की लाभदायकता (Post pay-back profitability) – रोकड़ अन्तर्वाह चाहे समान हो अथवा असमान दोनों ही स्थितियों में प्रत्यावर्तन अवधि के बाद का लाभ निम्न सूत्र से निकालेंगे और उस परियोजना का चुनाव करेंगे जिसका लाभ अधिक हो ।

Post pay-back profit (P.P.B.P.) = Total profit + Scrap value – Investment (c) अदायगी अवधि के पश्चात् की लाभदायकता निर्देशांक (Post pay-back profit (Index) – रोकड़ अन्तर्वाह चाहे समान हो अथवा असमान इसकी गणना दोनों ही स्थितियों में निम्न सूत्र से करेंगे और उस परियोजना का चुनाव करेंगे जिसका सूचकांक अधिक हो।

विनियोग पर प्रत्याय दर विधि के अनुसार प्रस्तावों का चुनाव- इस विधि के अनुसार विभिन्न प्रत्ययों में उस विनियोग प्रस्ताव को स्वीकार करेंगे जिसकी प्रत्याय दर सर्वाधिक हो । – यह रीति प्रत्यावर्तन अवधि रीति से इस रूप में उत्तम कही जा सकती है कि

गुण (Merits) यह लाभदायकता का माप करती है। अनेक प्रबन्धक स्थिर सम्पत्ति में निवेश करते समय विनियोजित राशि पर प्रतिफल की औसत दर को ही प्रतिफल का उचित आधार मानते हैं विशेषतः उत्तम तरल स्थिति वाली ऐसी कम्पनियों में जनिक उत्पादनों की माँग में अथवा उनके स्वरूप में आये दिन परिवर्तन नहीं होते हैं और जिनकी आय में वर्ष प्रतिवर्ष अधिक घट-बढ़ नहीं होती है, प्रत्यावर्तन अवधि के बजाय इस रीति को अधिक महत्व दिया जाता है कि इसमें वार्षिक ह्रास के लिए उचित समायोजन करने के पश्चात् ही लाभदायकता का मापन किया जाता है। इस विधि के प्रमुख गुण निम्न हैं

(1) सरल-यह विधि सरल है और प्रत्यावर्तन अवधि का सुधारा हुआ रूप है।

(2) सम्पूर्ण जीवनकाल पर विचार-इस विधि में परियोजना के सम्पूर्ण जीवनकाल को ध्यान में रखा जाता है जो उचित है। (3) ह्रास के पश्चात् शुद्ध आय पर विचार-इस विधि में वार्षिक बचत या आय की गणना करने के लिए ह्रास की रकम घटा दी जाती है जो सैद्धान्तिक दृष्टि से उचित है।

(4) दीर्घकालीन परियोजना के विश्लेषण में उपयोगी यह विधि दीर्घकालीन परियोजना के लिए, उपयोगी रहती है क्योंकि इस विधि में सम्पूर्ण जीवनकाल को ध्यान में रखा जाता है।

दोष (Demerits)-इस रीति का सबसे बड़ा दोष यह है कि यह समय-कारक की अवहेलना करती है। आज जो नकद राशि प्राप्त होती है, उसका मूल्य भविष्य में प्राप्त होने वाली उतनी ही राशि से अधिक होता है। इस विधि के प्रमुख दोष निम्न प्रकार है

(1) समय कारक पर ध्यान नही बैक पीरियड विधि की तरह इस विधि में भी समय कारक पर ध्यान नहीं दिया जाता है जो उचित नहीं है।

(2) विनियोग की उचित दर का निर्धारण सम्भव नहीं-इस विधि में प्रत्याय की उचित दर निर्धारित नहीं हो पाती है जिसमें परियोजना का चुनाव करने में परेशानी होती है।

(3) व्यावसायिक लाभों पर पड़ने वाले सूक्ष्म प्रभावों की जाँच सम्भव नहीं है-इस विधि में व्यवसाय के कुल लाभों पर पड़ने वाले सूक्ष्म प्रभावों को नहीं मापा जा सकता है क्योंकि यह विधि लाभों के औसत को देखती है

वर्तमान मूल्य रीति (Present Value Method)

यह रीति डिस्काउण्टेड रोकड़ बहाव या समय-समायोजित रीतियों में से एक है। यह रीति मानती है कि विभिन्न समयावधि पर होने वाले रोकइ आगमन व बहिर्गमन का मूल्य भिन्न-भिन्न होता है और उसकी तुलना तभी की जा सकती है जब उन्हें वर्तमान मूल्य पर परिवर्तित कर दिया। जाय। इसी रीति में निम्न कदम उठाने पड़ते हैं।

(i) विभिन्न अवधि के लिये रोकड़-बहिर्गमन तथा रोकड़ आगमन निर्धारित करना। (ii) कटौती दर को निर्धारित करना (यह सामान्यतः पूँजी की लागत के बराबर मान लिया।