उपभोक्ता सम्वर्द्धन की आधुनिक विधियों का वर्णन कीजिए।

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उपभोक्ता सम्वर्द्धन विधियाँ (Consumer Promotion Method)

उपभोक्ता सम्वर्द्धन विधियों से आशय विक्रय संवर्द्धन की उन विधियों से है जो प्रत्यक्ष रूप से उपभोक्ता को माल के क्रय के लिए प्रेरित करती है। उपभोक्ता सम्बर्द्धन विधियों को उपभोक्ता के घर-घर अथवा मध्यस्थों की दुकानों पर क्रियान्वित किया जा सकता है। उपभोक्ता सम्वर्द्धन की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं

(1) नमूने (Samples) वस्तुओं के नमूने का वितरण विक्रय सम्बर्द्धन विधियों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। एक प्रसिद्ध विद्वान के अनुसार, “वस्तु की जाँच के समान अन्य कोई बात अच्छी वस्तु के उपभोग को इतना प्रभावपूर्ण रूप से नहीं बढ़ा सकती है।” एक वस्तु के नमूनों का सम्भावित उपभोक्ताओं में वितरण करने से वे उस वस्तु के गुणों का अध्ययन एक-दूसरी संस्था की बनी वस्तुओं से तुलनात्मक रूप में कर सकते हैं। जब उपभोक्ता नमूनों की जाँच में विश्वास हो जाते हैं, तो वे माल का क्रय अधिक विश्वास के साथ करते हैं। भारत में नमूनों का वितरण कर विक्रय सम्वर्द्धन का प्रयोग किया जाता रहा है। कपड़े धोने का पाउडर, बीड़ी, औषधियों के नमूनों का वितरण काफी समय से प्रचलन में है और काफी लाभप्रद भी रहा है। नमूनों का वितरण, उपभोक्ताओं के घर पर या कार्यालय में पहुँचकर किया जा सकता है। मेलों, प्रदर्शनियों, त्यौहारों पर भी नमूनों का वितरण किया जा सकता है। कभी-कभी कम्पनी के व्यक्ति सड़कों के किनारे खड़े होकर भी नमूनों का वितरण करते हैं।

(2) प्रीमियम (Premium) प्रीमियम विक्रय संवर्द्धन का दूसरा महत्वपूर्ण माध्यम है। प्रीमियम एक वस्तु होती है जो उत्पादन की किसी वस्तु के क्रय करने पर दी जाती है। इस प्रीमियम की वस्तु के मूल्य एवं किस्मों से कोई सम्बन्ध नहीं होता है। वस्तु का मूल्य बाजार में प्रचलित मूल्यों के समान ही होता है, परन्तु उत्पादक अपने माल के क्रय के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से ही यह प्रीमियम देता है। प्रीमियम प्रायः मुफ्त दी जाती है, परन्तु यदि प्रीमियम के रूप में दी जाने वाली वस्तु बहुत कीमती है तो उत्पादक उसके लिए कुछ कीमत भी वसूल कर सकता है। प्रीमियम के रूप में दी जाने वाली वस्तु का चुनाव करते समय निम्न बातें ध्यान में रखनी चाहिए

(1) प्रीमियम गौरवपूर्ण होना चाहिए। (2) प्रीमियम की वस्तु एक विशिष्ट वस्तु होनी चाहिए। (3) प्रीमियम की वस्तु प्रीमियम प्राप्त करने वाले व्यक्ति के लिए उपयोगी होनी चाहिए। (4) प्रीमियम बहुत सस्ती एवं सामान्य रूप से उपलब्ध होने वाली वस्तु नहीं होनी चाहिए। (5) प्रीमियम आकर्षक होनी चाहिए। (6) प्रीमियम की वस्तु आसानी से लायी, ले जायी जा सकने वाली होनी चाहिए।

• प्रीमियम के लालच से व्यक्ति अनायास ही वस्तु को क्रय करने के लिए तत्पर हो जाता है अथवा आवश्यकता से कहीं अधिक मात्रा में वस्तु का क्रय करने के लिए तैयार हो जाता है। इससे विक्रय की मात्रा में भारी वृद्धि होती है। भारत में विक्रय संवर्द्धन की यह विधि अधिक लोकप्रिय होती जा रही है। (3) प्रतियोगिताएँ (Contests)-प्रतियोगिताओं का आयोजन मुख्य रूप से नवीन ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए अथवा नवीन उत्पादन को उपभोक्ताओं के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए किया जाता है। प्रतियोगिताओं के आयोजन में विभिन्न पुरस्कार आदि रखे जाते हैं तथा उपभोक्ताओं के समक्ष कोई एक आकर्षित प्रतियोगिता रखी जाती है, जैसे वस्तु से सम्बन्धित वाक्य पूरा कीजिए- “मैं गोल्ड स्पॉट पीता हैं, क्योंकि .।” वस्तु के बारे में एक पत्र लिखना, वस्तु के नाम का सुझाव, पद्म पूरा करवाना, वस्तु के नये प्रयोगों का सुझाव, पहेलियों को हल करना, रेडियो कार्यक्रमों के लिए सामग्री देना आदि।

प्रतियोगिता के आयोजन में निम्नलिखित बातें ध्यान में रखनी चाहिए (1) प्रतियोगिता को अन्तिम तिथि आरम्भ से ही निश्चित कर लेनी चाहिए।

(2) पुरस्कारों की सूची पहले से ही तैयार कर लेनी चाहिए। (3) प्रतियोगिता पूर्व निश्चित नियमों के आधार पर ही आयोजित करनी चाहिए। (4) प्रतियोगिता आयोजित करने से पूर्व देश के कानून व नियमों को ध्यान में रखना चाहिए।

(4) विक्रयशाला की साज-सज्जा ग्राहक विक्रयशाला में सर्वप्रथम एक दर्शक के रूप में प्रवेश करता है और इसके अन्दर जब वह किसी वस्तु की ओर आकर्षित होता है, तो क्रय करता है। अतः विक्रयशाला की साज-सज्जा उसके ध्यान को आकर्षित करने के लिए अत्यन्त आवश्यक है। आधुनिक युग में प्रदर्शन विशेषज्ञों ने मनोवैज्ञानिक अध्ययन के अन्तर्गत प्रदर्शन पद्धतियों के विषय में अत्यन्त प्रभावी तरीके ढूंढ लिये हैं जिनको अपनाकर व्यापारी ग्राहकों को विक्रयशाला की ओर खींच लेता है। यह प्रदर्शन बाह्य एवं आन्तरिक दोनों ही प्रकार का होता है। बाह्य प्रदर्शन सड़क पर चलते हुए व्यक्ति को अनायास ही विक्रयशाला की ओर आकर्षित करता है। आन्तरिक प्रदर्शन अन्दर आये हुए ग्राहक को वस्तुओं की ओर आकृष्ट कर इसे खरीदने को बाध्य कर देता है।

(5) कूपन (Coupons ) – कुछ कम्पनियाँ विक्रय सम्बर्द्धन के लिए कूपन पद्धति का प्रयोग करती है जिनके अन्तर्गत उपभोक्ता को वस्तु क्रय करने के लिए मूल्य में कुछ छूट दी जाती है अथवा कुछ मुफ्त वस्तु प्राप्त होने का प्रलोभन दिया जाता है। कभी-कभी कूपन अखबार में छपवा दिये जाते हैं जिन्हें लेकर फुटकर विक्रेता के पास जाने पर मूल्य में कुछ छूट मिलती है। कई बार इस विधि के अन्तर्गत वस्तु के पैकिंग में एक कूपन डाल दिया जाता है और उपभोक्ता जब उस वस्तु का पैकिंग खोलता है तो उसमें कूपन निकलता है। इस कूपन के बदले ग्राहक को या तो कुछ नकद राशि प्राप्त हो जाती है अथवा उसमें लिखित वस्तु प्राप्त हो जाती है। भारत में कूपन देने की विधि का उपयोग अगरवत्ती निर्माता, साबुन व तेल के निर्माता, चाय निर्माता आदि करते हैं। इसके द्वारा ग्राहक अनायास ही वस्तु के क्रय करने के लिए प्रेरित हो जाता है।

(6) मेले अथवा प्रदर्शनियाँ (Fairs and Exhibitions) मेले एवं प्रदर्शनियाँ भी विक्रय सम्वर्द्धन के महत्वपूर्ण साधन हैं। ये मेले एवं प्रदर्शनियाँ स्थानीय, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय अथवा अन्तर्राष्ट्रीय आधार पर आयोजित किये जाते हैं। इन मेलों में संस्था द्वारा निर्मित वस्तुओं का प्रदर्शन एवं विक्रय किया जा सकता है। इस माध्यम का उपयोग सरलता से किया जा सकता है। मेले एवं प्रदर्शनियों में कई लोग दूर-दूर से पहुँचते हैं। अतः विक्रय सम्वर्द्धन में बहुत बड़ी सहायता मिल सकती है। व्यापार के विकास के लिए मेले एवं प्रदर्शनकारियों का अपूर्व महत्व है।

(7) क्रियात्मक प्रदर्शनी (Demonstration)-क्रियात्मक प्रदर्शन भी विक्रय सम्वर्द्धन का एक साधन है। यह पूर्णतः ‘कहने से करना भला’ उक्ति पर आधारित है। ग्राहकों को वस्तुएँ कितनी ही दिखाकर उनके गुणों को स्पष्ट किया जाये, परन्तु जितना प्रभाव क्रियात्मक प्रदर्शन का होगा, अन्य किसी प्रकार के वर्णन से सम्भव नहीं है। क्रियात्मक प्रदर्शन का कार्य मेलों, प्रदर्शनियों, फुटकर व्यापार-गृहों पर अथवा घर-घर जाकर किया जा सकता है। इससे ग्राहक को यह स्पष्ट हो जाता है कि क्रय की जाने वाली वस्तु की प्रकृति कैसी है और इसका प्रयोग या उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है। यह वस्तुओं के प्रति ध्यान आकर्षित करता है एवं क्रय की इच्छा जाग्रत करता है।

(8) निः शुल्क प्रशिक्षण (Free Training)-वे उत्पादक जो ऐसी मशीनें बनाते हैं, जिससे कोई छोटा उद्योग शुरू किया जा सकता है तो उत्पादक इन मशीनों के क्रय करने वालों को निःशुल्क प्रशिक्षण भी दे सकते हैं। इससे मशीन क्रय करने वाले को मशीन पर कार्य करने के लिए किसी अन्य व्यक्ति पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है। इस प्रकार का प्रशिक्षण वास्तव में विक्रय सम्बर्द्धन में महान् योगदान दे सकता है।

(9) घटे मूल्यों पर विक्रय (Reduction Sale)-आजकल घंटे मूल्यों पर विक्रय द्वारा विक्रय सम्वर्द्धन का बहुत अधिक प्रचलन है। कभी-कभी क्लियरेंस सेल के नाम से घंटे हुए मूल्यों पर माल का विक्रय करते हैं। प्रायः घंटे मूल्यों पर विक्रय किन्ही विशेष अवसरों, जैसे-दीपावली, होली, गाँधी जयन्ती, संस्था के वार्षिक दिवस के दिनों पर किया जाता है। इसमें ग्राहक इन दिनों माल का अधिकाधिक क्रय करते हैं, परन्तु कभी-कभी घटे हुए मूल्यों पर ऐसी वस्तुओं का विक्रय किया जाता है जो काम में लेने योग्य नहीं होती हैं। इससे संस्था की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचती है। भारत में कपड़ों के प्रमुख उत्पादों, जैसे-बॉम्बे डाइंग, डी.सी. एम. केलिको, मफतलाल इत्यादि प्रायः घंटे हुए मूल्यों पर विक्रय करते हैं।

(10) विशेष पुरस्कार (Special Prizes) कभी-कभी विक्रेता विज्ञापन एवं विक्रय वृद्धि के दृष्टिकोण से विक्रय के साथ विशेष पुरस्कार देने का प्रस्ताव भी करता है। जैसे हिन्दुस्तान लीवर लि. ने कपड़े धोने के सर्फ पाउडर के दो डिब्बे खरीदने पर कम मूल्य पर एक प्लास्टिक की बाल्टी देने का प्रस्ताव किया और इस आकर्षण से प्रभावित होकर अनेक व्यक्तियों ने एक के बजाय दो डिब्बे एक साथ खरीदे। इसी प्रकार अनेक विक्रेता कलेण्डर, पैन या इनामी कूपन आकर्षण के रूप में देते हैं। कभी-कभी विक्रेता अपने ग्राहकों को यह भी प्रलोभन देते हैं कि यदि वर्ष भर उन्होंने एक निश्चित राशि का माल उसी दुकान से खरीदा तो उन्हें कुछ बोनस या पुरस्कार वर्ष भर के अन्त में दिया जायेगा।