अनुकूलतम पूँजी संरचना को परिभाषित कीजिये और इसके निर्धारकों का वर्णन कीजिये।

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अनुकूलतम पूँजी संरचना का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Optimum Capital Structure) वित्तीय आयोजकों द्वारा पूँजी प्राप्ति के विभिन्न साधनों के पारस्परिक अनुपात का निर्धारण अनेक मान्यताओं तथा परिस्थितियों के सन्दर्भ में किया जाता है। पूँजी-ढाँचे अथवा पूँजी मिश्रण का स्वरूप क्या हो यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। पूँजी प्राप्ति के विभिन्न साधनों की अपनी-अपनी विशेषताएँ होती हैं। विभिन्न विशेषताओं वाले पूँजी के अनेक साधनों का पूँजी-ढाँचे में सम्मिश्रण किस अनुपात में हो, यह इस बात पर निर्भर होगा कि व्यवसाय संचालन का मूल उद्देश्य क्या है ? चूँकि प्रत्येक व्यवसाय स्वामियों के हितों में वृद्धि के लिए संचालित किया जाता है, अतः पूँजी-ढाँचा इस प्रकार का होना चाहिए जिससे कम्पनी के अंशधारियों की अधिकतम आय प्राप्त हो सके। यह तभी हो सकेगा, जबकि पूँजी के विभिन्न साधनों की औसत लागत न्यूनतम हो। आय के अतिरिक्त ऐसे अनेक विचारणीय प्रश्न हैं जिन पर भी ध्यान केन्द्रित करना आवश्यक होगा, जैसे कि कम्पनी पर नियन्त्रण के वर्तमान स्वरूप को यथावत् बनाये रखने का प्रश्न, अथवा जोखिम की मात्रा को एक सीमा से अधिक न बढ़ने देने की समस्या आदि। इस प्रकार उन सभी कारकों पर विचार करना होगा जो पूँजी-ढाँचे को प्रभावित करते हैं। व्यवसाय के स्वामियों के हितों की सुरक्षा व अनुकूलतम लाभ की गारण्टी प्रदान करने वाला पूँजी मिश्रण ही अनुकूलतम पूँजी संरचना कहलाती है। स्वामियों के हितों के लिए यह आवश्यक है कि पूँजी की लागत कम हो और उनके द्वारा धारित अंशों का मूल्य अधिकतम हो।

  • ई. डब्ल्यू वाकर (E. W. Walker) के अनुसार, “एक अनुकूलतम पूँजी संरचना से तात्पर्य ऐसे प्रतिभूति मिश्रण से है, जो संस्था की पूँजी लागत को न्यूनतम करता है तथा उस संस्था के मूल्य को अधिकतम करता है।”

अनुकूलतम पूँजी संरचना के तत्व या विशेषताएँ या गुण (Qualities or Characteristics or Essentials of Optimum Capital Structure)

एक कम्पनी को उद्देश्यों की सफलतापूर्वक पूर्ति के लिए अनुकूलतम पूँजी संरचना को चुनना चाहिए। अनुकूलतम पूँजी संरचना का चुनाव कम्पनी विशेष के लिए दी हुई परिस्थितियों में किया जाता है एक पूँजी संरचना सभी कम्पनियों के लिए सभी समयों पर अनुकूल नहीं हो सकती। सामान्यतया, अनुकूलतम पूँजी संरचना में निम्नलिखित तत्व या विशेषताएँ या गुण होने चाहिए।

1. सरलता प्रबन्ध की सुविधा को ध्यान में रखते हुए वित्तीय ढाँचे को सरल रूप दिया जाना चाहिए। प्रारम्भ से ही यदि योजना जटिल होगी, तो भविष्य में अतिरिक्त पूँजी की व्यवस्था सरलता से न की जा सकेगी। यदि आरम्भ में ही कई प्रकार की प्रतिभूतियों को निर्गमित करके पूँजी की व्यवस्था की जाती है तो इससे विनियोक्ताओं में प्रस्तावित योजना के प्रति सन्देह उत्पन्न हो सकता है। अतः आरम्भ में केवल समता अंशों और यदि आवश्यक हो तो उनके साथ-साथ पूर्वाधिकार अंशों का निर्गमन उचित होगा। ऋणपत्रों के निर्गमन को आगे आवश्यकतानुसार सुरक्षित रखा जाना उचित हो सकता है। वैसे भी ऋणपत्र पहले से स्थापित ऐसी कम्पनियों द्वारा निर्गमित किये जाते हैं जिनका पिछला रिकार्ड उत्तम रहा हो। ऋण-पूँजी के लिए वित्तीय निगमों से विशेष अनुबन्ध नयी स्थापित की जाने वाली कम्पनियों के द्वारा किये जाते हैं तथा कुछ वर्षों बाद ऐसी कम्पनियाँ ऋणपत्रों का निर्गमन करने की स्थिति में आ जाती है।

2. न्यूनतम लागत–पूँजी उपलब्धि के विभिन्न साधनों की लागत समान नहीं होती हैं- कुछ साधनों से पूँजी प्राप्त करने में लागत अधिक एवं अन्य साधनों से पूँजी प्राप्त करने में कम लागत होती है, अतः पूँजी मिश्रण ऐसा होना चाहिए जिसे प्राप्त करने और व्यवसाय में प्रयोग में लाने की लागत न्यूनतम हो। पूँजी की भारयुक्त औसत लागत के आधार पर इसे निर्धारित किया जा सकता है। यह लागत वस्तुतः पूँजी के महँगे एवं सस्ते साधनों की एक औसत लागत का परिचायक होती है।

3. न्यूनतम जोखिम कम्पनी के व्यवसाय में कई प्रकार की जोखिम विद्यमान होती है; जैसे—करों में वृद्धि, मूल्यों में कमी लागत में वृद्धि, ब्याज की दर में वृद्धि आदि। ये जोखिमें पूँजी संरचना पर प्रभाव डालती है। पूँजी संरचना ऐसी होनी चाहिए जिससे ये जोखिमें न्यूनतम हो सकें।

4. लोचपूर्णता वित्तीय योजना एक तात्कालिक व्यवस्था न होकर एक दीर्घकालीन व्यवस्था है। अतः कम्पनी के सीमानियम के उद्देश्य खण्ड में उल्लिखित उद्देश्यों को ध्यान में रखकर ही इसे अन्तिम रूप दिया जाना चाहिए। तात्कालिक आवश्यकताओं की लोचपूर्णता का अभिप्राय यहाँ दीर्घकाल में व्यवसाय की बढ़ती अथवा घटती हुई आवश्यकताओं के अनुरूप पूँजी ढाँचे में समायोजन से है अर्थात् यदि कुछ वर्षों बाद व्यवसाय के विस्तार के लिए पूँजी की आवश्यकता हो तो उसे सुविधापूर्वक उपलब्ध करने की सम्भावनाओं का वित्तीय योजना में समावेश हो, अथवा यदि कम पूँजी की आवश्यकता प्रतीत हो तो वित्तीय योजना ऐसी हो कि उसे घटाया जा सके।

5. अधिकतम नियन्त्रण-कम्पनी पर साधारण अंशधारियों का नियन्त्रण होता है क्योंकि ऋणपत्रधारियों तथा पूर्वाधिकार अंशधारियों को मतदान का अधिकार नहीं होता है। परन्तु इन्हें विशेष परिस्थितियों में मतदान का अधिकार प्राप्त हो जाता है। इसलिये पूँजी संरचना में परिवर्तन ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे व्यवसाय का नियन्त्रण साधारण अंशधारियों पर न रहे।

6. अधिकतम लाभ—किसी कम्पनी में अनुकूलतम पूँजी संरचना वह होगी जिसके आधार पर कम्पनी की लाभदायकता में अधिकतम वृद्धि हो। पूँजी संरचना ऐसी होनी चाहिए जिससे पूँजी की लागत कम से कम हो। क्योंकि न्यूनतम लागत पर प्राप्त की गयी पूँजी लाभ में वृद्धि कर देगी तथा समय पर पर्याप्त पूँजी साधनों की सुविधा अनेक प्रकार के अपव्ययों को रोककर बचत में वृद्धि कर देगी।

7. पूर्ण उपयोगिता पूँजी की मात्रा एवं वित्तीय आवश्यकताओं में पूर्ण सामंजस्य होने पर ही पूँजी का अधिकतम उपयोग सम्भव हो सकता है। अपर्याप्त पूँजीकरण अथवा आवश्यकता से अधिक पूंजीकरण दोनों ही अवांछनीय हैं। अतः पूर्ण उपयोगिता के लिए उचित पूँजीकरण अनिवार्य है।

8. तरलता स्थिर सम्पत्ति एवं तरल सम्पत्तियों में क्या अनुपात रखा जाय यह प्रत्येक व्यवसाय की प्रकृति एवं प्रत्येक कम्पनी के आकार आदि कई परिवर्तनशील तत्वों पर निर्भर होता है। तरल सम्पत्तियों से यहाँ आशय चल सम्पत्तियों से है, किन्तु सही अर्थों में तरल सम्पत्तियों में रोकड़, बैंक में जमा राशियाँ, चालू विनियोग, देनदार आदि को सम्मिलित किया जाता है। आवश्यकता से अधिक तरलता, शोधन क्षमता में वृद्धि करके जोखिम को कम करती है, किन्तु साथ ही इससे लाभदायकता में कमी हो जायेगी और इसके विपरीत आवश्यकता से कम तरलता शोधनक्षमता कम करके जोखिम को बढ़ा देती है, किन्तु साथ ही यह लाभदायकता में वृद्धि कर सकती है। अतः तरल साधनों में कोषों के विनियोग को उचित सीमा में बनाये रखना आवश्यक होता है।