वित्तीय नियोजन को परिभाषित कीजिए। इसके उद्देश्यों एवं प्रक्रिया को समझाइये।

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वित्तीय नियोजन का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Financial Planning)

सामान्यतः वित्तीय नियोजन का आशय ऐसी भावी वित्तीय क्रियाओं के पूर्व निर्धारण से है, जो संस्था के मुख्य लक्ष्य की पूर्ति के लिए अनिवार्य रूप से की जाती है। कुछ अन्य लोगों ने वित्तीय नियोजन के दो प्रमुख पहलू बताए है―प्रथम, यह संस्था के पूँजी बँचे को इंगित करता है, और दूसरे, संस्था द्वारा अपनाई गई या अपनाई जाने वाली वित्तीय नीतियों को स्पष्ट करता है। व्यापक अर्थ में देखा जाए तो वित्तीय नियोजन में वित्तीय लक्ष्यों का निर्धारण, वित्तीय नीतियों का निर्धारण और वित्तीय कार्यविधियों का विकास करना शामिल किया जाता है।

आर्थर एस. डेविंग के अनुसार, वित्तीय नियोजन में निम्न क्रियाएँ शामिल होती है

(i) पूँजीकरण निर्धारित करना (अर्थात पूँजी की आवश्यक मात्रा का निर्धारण करना) (ii) पूँजी ढाँचा तैयार करना (अर्थात् पूँजी प्राप्ति के विभिन्न सामनों को निश्चित करना और विभिन्न प्रतिभूतियों का पारस्परिक अनुपात निर्धारित करना) (iii) पूँजी का उचित प्रबन्ध करना (अर्थात् सम्पत्तियों का प्रबन्ध करना) । आर. एम. श्रीवास्तव (R. M. Shrivastava) के अनुसार, “वित्तीय नियोजन, पूँजीगत आवश्यकताओं एवं उसके स्वरूपों को अग्रिम में निश्चित करने का कार्य है।”

बोनविले (Bounville) के अनुसार, “एक निगम के वित्तीय नियोजन के दो पहलू होते हैं, यह न केवल निगम के पूँजी ढाँचे की ओर संकेत करती है, बल्कि यह निगम द्वारा अपनाई गई अथवा अपनाई जाने वाली वित्तीय नीतियों को भी स्पष्ट करती है।”

चाकर एवं बाघन (Walker and Baughan) के अनुसार, वित्तीय नियोजन वित्त कार्य से ही सम्बन्धित है, जिसमें संस्था के वित्तीय लक्ष्यों का निर्धारण, वित्तीय नीतियों एवं अनुगमन तथा कार्यविधियों का विकास सम्मिलित है।

वित्तीय नियोजन की आवश्यकता एवं महत्व (Need and Importance of Financial Planning)

वित्तीय नियोजन एक आवश्यक एवं महत्वपूर्ण वित्तीय प्रक्रिया है। दीर्घकालीन, मध्यकालीन व अल्पकालीन वित्तीय योजनाओं के सभी पहलू संस्था की लाभार्जन शक्ति, लाभोत्पादकता एवं शोधन क्षमता को प्रभावित करते हैं। विवेकशील वित्तीय नियोजन व्यापार की सफलता की कुंजी है। किसी निगम की सफलता एवं समृद्धि के लिए यह नितान्त आवश्यक है कि उपलब्ध साधनों का अनुकूलतम ढंग से उपयोग किया जाए और जहाँ तक सम्भव हो पूँजी का निरर्थक उपयोग न हो। यह तभी सम्भव है जबकि वित्तीय नियोजन द्वारा संस्था की वर्तमान एवं भावी पूंजी की आवश्यकताओं का ठीक-ठीक अनुमान लगाया जाए।

सामान्यतः वित्तीय नियोजन की आवश्यकता एवं इसका महत्व निम्न कारणों से है (1) व्यवसाय का सफल प्रवर्तन एक नवीन उपक्रम का सफल प्रवर्तन उस समय तक नहीं हो पाता जब तक कि उस उपक्रम के प्रारम्भिक आकार व भावी विस्तार को ध्यान में रखकर एक लोचपूर्ण वित्तीय योजना तैयार न कर ली जाए। वस्तुतः एक सुदृढ़ वित्तीय योजना, प्रवर्तन का सफलता के लिए एक आवश्यक कार्य है।

(2) सम्पूर्ण उपक्रम की सफलता-यह तो विदित ही है कि वित्त कार्य प्रत्येक व्यावसायिक क्रिया व उपक्रिया को प्रभावित करता है। व्यवसाय की स्थापना के बाद सम्पत्तियों का क्रम, कच्चे माल का क्रय, माल का निर्माण, वितरण कार्य आदि के लिए समय पर उचित मात्रा में वित्त की उपलब्धि, कुशल वित्त नियोजन पर निर्भर करती है।

(3) संचालन में बचत और समन्वय वित्तीय नियोजन के माध्यम से संचालन में होने वाले अपव्यय को दूर करके बचत लायी जा सकती है। इसी प्रकार तकनीकी विकास, बढ़ती हुई तीव्र प्रतियोगिता, ऊँची ब्याज की दरें, करारोपण की ऊँची दरें, आदि कारक संस्था के प्रबन्ध को विवश करते हैं कि वे व्यवसाय की विभिन्न संचालनात्मक क्रियाओं में समन्वय स्थापित करें। यह कार्य भी वित्तीय नियोजन द्वारा ही सम्भव हो पाता है।

(4) पूँजी का संरक्षण–एक समुचित वित्तीय नियोजन से संस्था को अपनी पूँजी के संरक्षण में पर्याप्त सहायता मिलती है। आजकल यन्त्र तथा मशीन व अन्य संयन्त्र नवीन खोजों के कारण बहुत ही जल्द पुराने या कालातीत हो जाते हैं। सम्पत्तियों का एक बहुत बड़ा भाग निकट भविष्य में बेकार हो सकता है। अतः इन सम्पत्तियों में विनियोजित पूँजी को अधिकतम प्रयोग करने के लिए वित्तीय नियोजन अपरिहार्य होता है।

(5) व्यवसाय का विस्तार एवं विकास-प्रत्येक व्यावसायिक संस्था की स्थापना एक विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति के लिए होती है। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक होता है कि व्यवसाय का विस्तार एवं विकास अनुकूलतम स्तर तक किया जाए। इस प्रकार की विस्तार एवं विकास सम्बन्धी योजनाओं को सफल बनाने के लिए तथा इनमें आने वाली वित्तीय कठिनाइयों का सामना करने के लिए वित्तीय नियोजन आवश्यक हो जाता है।

(6) मूल्य-स्तर में परिवर्तन—एक व्यावसायिक संस्था जिस आर्थिक पर्यावरण में कार्य करती है, वह पर्यावरण गतिशील होता है और पर्यावरण के एक अंग में निरन्तर परिवर्तन होता है। विकासशील देशों में यह मूल्य-स्तर परिवर्तन वृद्धि के रूप में होता है। बढ़ते हुए मूल्य स्तर की दशा में सम्पत्तियों की प्रतिस्थापन लागत उनकी पुरानी मूल्य लागत से काफी अधिक होती है। अतः प्रबन्धः • के लिए केवल पूँजी का संरक्षण ही महत्वपूर्ण नहीं होता है बल्कि उनका बढ़े हुए मूल्यों पर प्रतिस्थापन भी महत्वपूर्ण होता है। इसके लिए भी वित्तीय नियोजन की आवश्यकता होती है।

(7) व्यवसाय में पर्याप्त तरलता-वित्तीय नियोजन के द्वारा व्यवसाय में पर्याप्त तरलता की स्थिति बनाई रखी जा सकती है। व्यावसायिक संस्था समय पर देनदारियों का भुगतान कर सकती है और अन्य व्ययों की अदायगी कर सकती है। अति-व्यापार की स्थिति से बचा जा सकता है।

वित्तीय नियोजन के उद्देश्य (Objects of Financial Planning)

वित्तीय नियोजन निम्न दो प्रमुख उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है (1) आवश्यकता के समय कोषों की उपलब्धता को सुनिश्चित करना (To ensure availability of funds whenever required) वित्तीय नियोजन का मुख्य उद्देश्य कम्पनी के विभिन्न कार्यों जैसे-सम्पत्ति का क्रय, रोजमर्रा के खर्चों आदि के लिए पर्याप्त कोषों की व्यवस्था है।

(2) वित्त की सन्तुलित मात्रा सुनिश्चित करना (To ensure proper balance of finance) यह सदैव सुनिश्चित करना चाहिए कि रोकड़ शेष न तो बहुत अधिक रहे न कम क्योंकि, यह दोनों ही अवस्थाएँ हानिकारक है। वित्तीय नियोजन दीर्घकालीन तथा अल्पकालीन दोनों तरह के नियोजनों की व्यवस्था करता है। दीर्घकालीन नियोजन पूँजीगत खर्चों पर ध्यान देता है जबकि अल्पकालीन योजनाओं को बजट कहा जाता है।

वित्तीय नियोजन की प्रक्रिया (Process of Financial Planning)

वर्तमान समय में वित्तीय योजना एक संस्था की कार्यप्रणाली एवं परिचालन के प्रत्येक पहलू से सम्बन्धित एक जटिल अनुष्ठान है। योजना बनाते समय इसमें भावी अनिश्चितताओं का समावेश आवश्यक है। यद्यपि विभिन्न संस्थाओं की प्रकृति एवं आकार में भेदभाव बिना वित्तीय योजना के मूल तत्व समान ही होंगे, फिर भी वित्तीय नियोजन प्रक्रिया में निम्नलिखित कदम उठाये जा सकते हैं (1) ऐतिहासिक विश्लेषण (Historical Analysis) संस्था की वर्तमान स्थिति के लिए उत्तरदायी घटकों एवं घरों की पहचान हेतु संस्था की गत निष्पत्ति का विश्लेषण आवश्यक है। उदाहरण के लिए गत कुछ वर्षों के लाभ-हानि खाते का विश्लेषण यह दर्शा सकता है कि

(1) संख्या की बिक्री में वृद्धि क्या रही है; (ii) संख्या के विभिन्न व्ययों की प्रवृत्ति एवं साभदायकता, निरपेक्ष मूल्यों एवं बिक्री के प्रतिशत, दोनों में क्या रही है। एक नयी संस्था की दशा जहाँ गत अभिलेख उपलब्ध नहीं है, किसी अन्य विद्यमान संख्या की गत निष्पत्ति पर विचार किया जा सकता है।

(2) दीर्घकालीन आवश्यकताओं का निर्धारण (Determination of Long-term Needa) संस्था की विकास नीति के सन्दर्भ में एक निवेश नीति तैयार करनी चाहिए योजना की क्रियान्वित के लिए कितने आवश्यकता होगी ? कोष कब प्राप्त किये जाने है ? इन कोषों की कुल आवश्यकता तथा समय की भी योजना बनानी चाहिये। ये सब पूँजी वजटन निर्णयों पर निर्भर करते हैं।

(3) वित्तीय स्रोतो का निर्धारण (Determination of the Sources of Finance) आवश्यक दीर्घकालीन कोषों की व्यवस्था विभिन्न स्रोतों से की जा सकती है। इस नियोजन के लिए संस्था की लक्ष्यांक पूँजी संरचना को ध्यान में रखना आवश्यक है। आन्तरिक उपार्जनों एवं लाभों के पुनर्विनियोजन पर भी विचार करना चाहिये।

(4) परिचालनात्मक क्रियाओं का विश्लेषण (Analysis of Operational Activities) संस्था की सम्भावित आगम एवं व्ययों के अभिनिर्धारण हेतु उनकी परिचालनात्मक क्रियाओं का विश्लेषण किया जाता है। परिचालनात्मक क्रियाओं में सभी कार्यशील क्रियायें यथा बिक्री, उत्पादन, विपणन, स्कन्ध आदि सम्मिलित है।

(5) विभिन्न योजनाओं में सामंजस्य (Harmony Armong Various Plans) वित्तीय नियोजन। के अन्तर्गत सभी प्रकार की व्यूह रचनाओं एवं नियोजन में सामंजस्य होना चाहिए। उदाहरणार्थ, बिक्री योजनाओं, उत्पादन योजनाओं, विपणन योजनाओं तथा स्कन्ध योजनाओं में पूर्ण तुलनीयता होनी चाहिए। इन योजनाओं में किसी प्रकार का मुकाबला नहीं होना चाहिए।

एक श्रेष्ठ वित्तीय नियोजन की विशेषताएँ (Characteristics of Good Financial Planning)

किसी भी व्यावसायिक संस्था की सफलता या असफलता तथा भावी उब्बति-अवनति सेक वित्तीय योजना पर निर्भर करती है। अतः एक श्रेष्ठ वित्तीय नियोजन में निम्न विशेषताएँ लक्षित हैं—

पूर्णरूप

1) सरलता-संस्था की वित्तीय योजना इस प्रकार की होनी चाहिए जिसका आधार उचित हो व अनुमान सरलता से लगाया जा सकता हो और साथ ही उस योजना का प्रबन्ध एवं नियन्त्रण सरलतापूर्वक किया जा सकता हो। वित्तीय योजना का प्रमुख अंग अर्थात् पूँजी ढाँचे का प्रतिरूप भी सरल होना चाहिए ताकि विनियोक्ता स्वतः ही उसकी ओर आकर्षित हो सके।

(2) दूरदर्शिता एक सुदृढ़ वित्तीय योजना में वर्तमान आवश्यकताओं के साथ-साथ भावी आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखा जाता है। वित्तीय योजना इस प्रकार की हो कि व्यापार का संचालन पर्याप्त समय तक सुचारू रूप से हो सके। वित्तीय योजना का प्रथम अंग इतना होना चाहिए। कि उस धनराशि से सभी प्रकार के स्थायी व चालू व्यय पूरे किए जा सकते हो। इस योजना का स्वरूप ऐसा हो कि भविष्य में होने वाले उत्थान व पतन में वित्तीय स्थिति सन्तुलित रह सके और समय-समय पर आने वाली वित्तीय कठिनाइयों का वित्तीय योजना अच्छी तरह सामना कर सके।

(3) कोषों का पूर्ण उपयोग- सुदृढ़ वित्तीय योजना उसे ही कहा जा सकता है जो कोषों के पूर्ण उपयोग को सम्भव बना पाती हो ऐसा तभी सम्भव है जब पूँजी की मात्रा एवं वित्तीय आवश्यकताओं में पूर्ण सामंजस्य हो अर्थात् उचित पूंजीकरण की स्थिति हो। अति पूंजीकरण अथवा अल्प पूँजीकरण दोनों ही स्थिति नहीं होनी चाहिए। साथ ही कार्यशील पूँजी एवं स्थायी के मध्य उचित सम्बन्ध होना चाहिए।

(4) लोचपूर्णता वित्तीय योजना ऐसी होनी चाहिए जो विस्तार, संकुचन तथा अन्य परिवर्तन को आत्मसात् कर सके। व्यवसाय को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए यह नितान्त आवश्यक है कि वित्तीय ढाँचा कठोर न हो, क्योंकि कठोरता के कारण अनेक दोष व कठिनाइयाँ उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में वित्तीय नियोजन सहायक यन्त्र न बनकर भार बन जाती है। अतः यह आवश्यक है कि वित्तीय नियोजन में लोचपूर्ण हो ताकि समयानुसार परिवर्तन को समायोजित किया जा सके।

(5) तरलता वित्तीय नियोजन में पर्याप्त तरलता की व्यवस्था होगी अनिवार्य होती है। इसके लिए कार्यशील पूँजी का एक निश्चित भाग नकदी में रखा जाना चाहिए। यह सत्य है कि नकदी का भाग संस्था के आकार, साख-स्थिति, व्यापार चक्र की दशा और उसके व्यवसाय की प्रकृति पर निर्भर करता है। अतः इन सभी तत्वों को ध्यान में रखकर वित्तीय योजना में नकदी का प्रावधान किया जाना चाहिए। इस प्रकार तरलता होने से दैनिक कार्यों के निष्पादन में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होती है और किसी आकस्मिक घटना के घटित होने पर उसका सरलता से सामना किया जा सकता है।

(6) मितव्ययिता वित्तीय नियोजन में पूँजी प्राप्त करने व प्रतिभूतियों के निर्गमन के सम्बन्ध में किए जाने वाले व्ययों को न्यूनतम रखा जाना चाहिए। पूँजी निर्गमन में अनेक प्रकार के व्ययः जैसे छपाई, अभिगोपन, कमीशन, दलाली आदि करने पड़ते हैं। वित्तीय नियोजन सफल कहा जाएगा जब सभी खर्चों में बचत किया जाए।

वित्तीय नियोजन के प्रकार (Types of Financial Planning)

वित्तीय नियोजन के प्रकारों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है (अ) अल्पकालीन वित्तीय नियोजन अल्पकालीन वित्तीय नियोजन के अन्तर्गत सामान्यतः एक वर्ष की अवधि के लिए योजनाएँ बनाई जाती है। इस प्रकार की योजनाएँ मुख्य रूप से कार्यशील पूँजी के प्रबन्ध हेतु प्रक्षेपित लाभ-हानि खाता या चिठ्ठा, फण्ड की प्राप्ति व उपयोग का विवरण,

कार्यशील पूंजी का अनुमान आदि अल्पकालीन वित्तीय नियोजन के महत्वपूर्ण उपकरण माने जाते हैं। (ब) मध्यकालीन वित्तीय नियोजन-सामान्यतः एक वर्ष से अधिक, परन्तु पाँच वर्ष से कम अवधि के लिए जब वित्तीय योजनाएँ बनाई जाती है तो उसे मध्यमकालीन वित्तीय नियोजन की प्रक्रिया कहते हैं। इसके अन्तर्गत सम्पत्तियों के रख-रखाव, उनका प्रतिस्थापन, शोध एवं विकास कार्यों को चलाने, विशेष कार्यशील पूँजी की व्यवस्था करने, आदि आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु मध्यमकालीन वित्तीय नियोजन की आवश्यकता पड़ती है। इस नियोजन के माध्यम से ऐसे पूँजी स्रोत को प्राप्त करने की चेष्टा की जाती है जिससे पूँजी लागत में कमी आए और संस्था का वित्तीय ढाँचा तरल रहे।

(स) दीर्घकालीन वित्तीय नियोजन दीर्घकालीन वित्तीय नियोजन का सम्बन्ध उन सभी वित्तीय योजनाओं से होता है जो पाँच वर्ष से अधिक अवधि के लिए बनाई जाती हैं। दीर्घकालीन वित्तीय लक्ष्यों का निर्धारण, पूँजीकरण की मात्रा निर्धारित करना, पूँजी ढाँचा तैयार करना, भावी विस्तार योजना हेतु अतिरिक्त पूँजी की व्यवस्था करना आदि को दीर्घकालीन वित्तीय नियोजन में शामिल किया जाता है।

वित्तीय योजना को प्रभावित करने वाले कारक (Affecting Factors of Financial Planning) वित्तीय योजना बनाते समय अनेक कारकों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। इसके प्रमुख कारक निम्नलिखित है

(1) व्यवसाय की प्रकृति-वित्तीय योजना के निर्माण में व्यवसाय की प्रकृति का काफी प्रभाव पड़ता है। पूँजी प्रधान उद्देश्यों में अधिक पूँजी की आवश्यकता पड़ती है, जबकि श्रम प्रधान उद्योगों में पूँजी की आवश्यकता कम होती है। इसके अतिरिक्त विकास की सम्भावनाएँ, उत्पादित वस्तु की माँग में सम्भावित उच्चावचन, वैज्ञानिक उन्नति आदि का भी पूंजी के स्रोतों पर प्रभाव पड़ता है।

(2) प्रवन्धकों की अभिवृत्ति-वित्तीय योजना का प्रारूप (draft) प्रबन्धकों की अभिवृत्ति से भी प्रभावित होता है। यदि प्रबन्धकगण व्यवसाय का नियन्त्रण अपने ही हाथों में केन्द्रित करना चाहते हैं. तो सम अंशों का अधिक निर्गमन नहीं करेंगे या बहुत कम करेंगे। सामान्य जनता की अपेक्षा संस्थागत विनियोक्ताओं को प्रोत्साहन देंगे और ऋण द्वारा वित्त की व्यवस्था करेंगे। इसी प्रकार एक रूढ़िवादी प्रबन्ध भावी विस्तार कार्यक्रमों एवं आधुनिकीकरण योजनाओं के लिए कभी-कभी नए निर्गमन को पसन्द नहीं कर सकता है।

(3) विस्तार योजनाएँ वित्तीय योजना बनाते समय भावी विस्तार कार्यक्रमों एवं योजनाओं को भी ध्यान में रखना पड़ता है। यदि प्रारम्भ में ही वित्तीय योजना में यह गुंजाइश नहीं छोड़ी जाती है तो भविष्य में समायोजन करने में बाधाएँ पड़ सकती है।

(4) उच्च श्रेणी की प्रतिभूतियों में पूँजी ढाँचा वित्तीय योजना के प्रमुख अंग पूँजी ढाँचे को विविध, सन्तुलित व रूढ़िवादी बनाना चाहिए। विभिन्न प्रकार की प्रतिभूतियों में उचित सन्तुलन रखना चाहिए और ख्याल रखना चाहिए कि संस्था पर पूंजी सम्बन्ध कि संस्था पर पूँजी सम्बन्धी कोई प्रबल व स्थायी भार न उत्पन्न होने पाये

(5) बाह्य पूँजी की इच्छित मात्रा व्यवसाय के क्रमिक विस्तार की दशा में वित्त प्रबन्ध इस प्रकार की। से किया जाना चाहिए कि बाह्रा साधनों से थोड़ा-थोड़ा धन एकत्र किया जाए। यदि कुछ ही समय के लिए धन आवश्यकता हो तो शोध्य अधिमान अंश या शोध्य ऋण-पत्रों का ही निर्गमन करना चाहिए जहाँ तक बन सके, थोड़ी-थोड़ी रकम के अंश निर्गमन के झंझट से बचना चाहिए, क्योंकि इसका प्रतिकूल प्रभाव संस्था की ख्याति व पूँजी लागत दोनों पर ही पड़ता है।

(6) सरकारी नियन्त्रण वित्तीय योजना का निर्माण करते समय सरकारी नीतियों, वित्त नियन्त्रणों व अन्य वैधानिक व्यवस्थाओं को भी ध्यान में रखना चाहिए।

(प) जोखिम की मात्रा किसी विशेष उपक्रम के उत्पादन में निहित जोखिम व अनिश्चितता भी वित्तीय योजना को प्रभावित करती है। अधिक जोखिम वाले उद्योगों की दशा में अधिक पूँजी प्रदान करने में ऋणदाता संकोच करते हैं और इसलिए इन उद्योगों को अपनी पूँजी उगाहने के लिए स्वामित्व प्रतिभूतियों अधिक निर्भर रहना पड़ता है। इसके विपरीत कम जोखिम वाले उद्योगों की दशा में ऋण पूँजी पर पर अधिक विश्वास किया जाता है। ये उद्योग ऋण लेकर समता पर व्यापार का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

(8) व्यवसाय की प्रस्थिति आकार वित्तीय योजना की तैयारी में व्यवसाय की प्रस्थिति; जैसे–व्यवसाय लगी इकाई की आयु, आकार, कार्यक्षेत्र, प्रवर्तकों एवं प्रबन्ध की साख व ख्याति, आदि को भी ध्यान में रखना पड़ता है। बड़े आकार वाली संस्थाओं को पूँजी उगाहने में अधिक कठिनाई नहीं होती है, परन्तु उनकी पूंजी की आवश्यकता अधिक होती है। छोटे आकार वाली संस्थाओं को पूँजी की आवश्यकता कम होती है। परन्तु उनको पूँजी उगाहने में कठिनाई होती है। पुरानी व अच्छी साख व ख्याति वाली संस्थाओं में हरेक विनियोक्ता विनियोजन के लिए तत्पर होता है, परन्तु नव प्रवर्तित संस्था को पूँजी एकत्र करने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

(9) वैकल्पिक वित्तीय साधनों का मूल्यांकन-योजना को तैयार करते समय पूँजी बाजार में उपलब्ध वैकल्पिक वित्तीय साधनों का सापेक्षिक मूल्यांकन करके सबसे श्रेष्ठ विकल्प का ही चुनाव करना चाहिए। वैकल्पिक साधनों के मूल्यांकन हेतु बाजार में प्रचलित तथा लोकप्रिय प्रतिभूतियों के अंकित मूल्य, निर्गमन लागत तथा तथ्यों का विश्लेषणात्मक अध्ययन करना चाहिए। इसके साथ-ही-साथ यह भी देखना चाहिए कि ऐसी प्रतिभूतियों के निर्गमन का समय अनुकूल है या नहीं।

(10) अन्य कारक- नव-प्रवर्तित संस्था के लिए या विद्यमान संस्था के विस्तार हेतु वित्तीय नियोजन के निर्माण में अन्य घटकों, जैसे—मुद्रा बाजार की दशाएँ, तेजी या मन्दी की स्थिति, विनियोक्ताओं का दृष्टिकोण, ब्याज दरों का स्तर, करारोपण की नीति आदि को भी ध्यान में रखना पड़ता है। इन सभी कारकों का वित्तीय योजना पर प्रभाव पड़ता है।

वित्तीय नियोजन की सीमाएँ (Limitations of Financial Planning)

यद्यपि वित्तीय नियोजन व्यवसाय ही सफलता में महत्वपूर्ण योगदान करता है, परन्तु भविष्य से सम्बन्धित होने के कारण इसकी कुछ सीमाएँ भी है जिनकी संक्षिप्त विवेचन अग्र प्रकार है

1. पूर्वानुमान की त्रुटियाँ वित्तीय नियोजन भविष्य में सम्बन्धित वित्तीय पूर्वानुमानों पर आधारित होता है। अतः वित्तीय पूर्वानुमानों में कोई त्रुटि रह जाती है तो वित्तीय नियोजन भी प्रभावहीन हो जाता है।

2. सहयोग एवं समन्वय का अभाव-वित्तीय नियोजन की सफलता के लिए संस्था के विभिन्न अधिकारियों के मध्य सहयोग एवं समन्वय नितान्त आवश्यक है। अतः कभी-कभी इन अधिकारियों में सहयोग व समन्वय न होने के कारण अच्छी वित्तीय योजना भी असफल हो जाती है।

3. आर्थिक परिस्थितियों एवं राजकीय नीतियों में परिवर्तन देश की आर्थिक परिस्थितियों एवं राजकीय नीतियों में परिवर्तनों का भी वित्तीय योजना की सफलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

4. वित्तीय प्रबन्धक का दृष्टिकोण-कभी-कभी यह देखने में आता है कि कम्पनी या निगम के वित्तीय प्रबन्धक वित्तीय योजना के प्रति कठोर दृष्टिकोण अपनाते हैं; जैसे-वित्तीय प्रबन्धक, वित्तीय योजना में समयानुकूल परिवर्तन करने में भी हिचकिचाते हैं, ऐसी स्थिति में वित्तीय योजना असफल सिद्ध हो सकती है।