‘पूँजी की लागत’ की परिभाषा दीजिये। विभिन्न स्रोतों से प्राप्त पूँजी की लागत का निर्धारण आप किस प्रकार करेंगे ?

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पूँजी लागत का अर्थ एवं परिभाष (Meaning and Definition of Cost of Capital)

पूँजी की लागत का आशय उस मूल्य से है जो पूँजी के उपयोग के लिये चुकाया जाता है। यह वह न्यूनतम दर है जिसे पूँजी पर अर्जित करना प्रबन्धकों के लिए आवश्यक होता है ताकि पूँजी के उपयोग के मूल्य तथा उससे सम्बद्ध अन्य व्ययों की पूर्ति होती रहे। यह लागत प्राप्त की गयी पूँजी की खरी-खरी राशि के प्रतिशत के रूप में व्यक्त की जाती है।

  • एम. जे. गोर्डन (M..J. Gordon) के अनुसार, “पूँजी की लागत का तात्पर्य उस प्रत्याय दर से है जो कि एक कम्पनी को अपना मूल्य यथावत् रखने हेतु विनियोग पर अर्जित करनी चाहिए।”
  • डब्ल्यू. जी. लैवेलियन (W. G. Lawellen) के अनुसार, “एक फर्म की तथाकथित पूँजी की लागत जिसे सामान्यतया वार्षिक प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जाता है-सरल रूप में वह प्रत्याय दर है जो उस फर्म की सम्पत्तियों को अपना विनियोग औचित्य प्रदर्शित करने के लिए अर्जित करनी चाहिए।”
  • जॉन जे. हैम्पटन (John J. Hampton) के अनुसार, “पूँजी की लागत प्रत्याय की उस दर को कहा जायेगा जिसे किसी निवेश पर फर्म इसलिए प्राप्त करना चाहती है ताकि बाजार में उस फर्म के मूल्य में वृद्धि हो सके।
  • लुट्ज (Lutz) के अनुसार, “पूँजी की लागत पूँजी के प्रयोग के लिए दिया जाने वाला पुरस्कार है।”
  • सोलोमन इजरा (Solomon Ezra ) के अनुसार, “पूँजी लागत अपेक्षित अर्जनों की न्यूतम दर अथवा पूँजी व्ययों की विच्छेद दर है।” उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि पूँजी की लागत वह न्यूनतम प्रत्याय दर है जो एक फर्म को अपने विनियोग से अवश्य अर्जित करनी चाहिए जिससे फर्म उस विनियोग के लिये प्राप्त किये गये कोषों की लागतों का भुगतान कर सके।

‘पूँजी की लागत’ अवधारणा का महत्त्व (Importance of The Concept of The Cost of Capital)

1. पूँजी बजटिंग के निर्णय किसी फर्म की पूँजी की औसत लागत उस काट-बिन्दु अथवा प्रत्याय की उस न्यूनतम दर का परिचायक है जिससे कम पर पूँजी निवेश के किसी भी प्रस्ताव को स्वीकृति नहीं दी जानी चाहिए। डिस्काउण्टेड कैश-फ्लो विधि के अन्तर्गत किसी परियोजना से भविष्य में होने वाले नकद प्रवाहों के वर्तमान मूल्य को ज्ञात करने के लिए फर्म की पूँजी की औसत लागत को कटौती-दर के रूप में प्रयोग किया जाता है। किसी परियोजना के पक्ष में प्रबन्धकों द्वारा निर्णय तब ही लिया जाता है जबकि उसका शुद्ध वर्तमान मूल्य ऋणात्मक है तो पूँजी निवेश के ऐसे प्रस्ताव को अस्वीकृत किया जाना चाहिए। यही नहीं किसी परियोजना की प्रत्याय की आन्तरिक दर तथा फर्म की पूँजी की औसत लागत की तुलना करके भी पूँजी निवेश के प्रस्तावों की स्वीकृति अथवा अस्वीकृति के विषय में उचित निर्णय लिए जा सकते हैं। इस सन्दर्भ में यह उल्लेख करना पर्याप्त होगा कि पूँजी-बजटिंग के क्षेत्र में पूँजी की लागत की का प्रयोग निश्चयीकरण के रूप में अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हो रहा है।

2. पूँजी ढाँचे के आयोजन के निर्णय-प्रत्येक व्यावसायिक फर्म के प्रबन्धक एक अनुकूलतम पूँजी-ढाँचे का निर्माण करना चाहते हैं। दूसरे शब्दों में, उनका प्रयास ऋण पूँजी एवं इक्विटी पूँजी के एक अनुकूलतम मिश्रण के आधार पर व्यवसाय का संचालन करने की दिशा में होगा जिससे फर्म की पूँजी की औसत लागत को न्यूनतम रखते हुए उसके अंशों के बाजार मूल्यों को अधिकतम स्तर पर रखा जा सके। चूँकि ऋण पूँजी का एक सस्ता साधन है पूँजी ढाँचे में ऋण की मात्रा में क्रमशः वृद्धि फर्म को वित्तीय-लीवरेज का लाभ प्रदान करती है। बशर्ते कि फर्म की आय नियमित रूप से पर्याप्त स्तर पर बनी रहती है किन्तु क्या व्यवहार में पूँजी की लागत फर्म के पूँजी दावे को वास्तव में प्रभावित करती है ? इस विषय में विद्वानों में पर्याप्त मतभेद हैं। इस बारे में दो प्रमुख विचारधाराओं का उल्लेख नीचे किया जा रहा है

(i) परम्परागत विचारधारा-इस विचारधारा या सिद्धान्त के अनुसार कुल पूँजी में ऋणपूँजी का उपयोग उस फर्म के बाजार मूल्य को निश्चित रूप से प्रभावित करता है। दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि ऋण-पूँजी अनुपात में यदि कोई परिवर्तन होता है तो उसके कारण फर्म की पूँजी की समग्र लागत में निश्चित ही परिवर्तन होता है। कुल पूँजी में अधिक ऋण-पूँजी का समावेश फर्म की पूँजी की औसत लागत में कमी का कारण होगा।

(ii) मोदिगलियानी तथा मिलर का सिद्धान्त-इसके अनुसार किसी फर्म की पूँजी की समग्र लागत का उसके पूँजी-ढाँचे या ऋण पूँजी अनुपात में परिवर्तन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अतः फर्म के पूँजी ढाँचे के आयोजन एवं निर्माण के निर्णयों पर पूँजी की लागत कोई प्रभाव नहीं डालती है। इससे फर्म के कुल बाजार मूल्य तथा उसकी पूँजी की लागतों का उसके पूँजी-ढाँचे से कोई सम्बन्ध नहीं होता है। इस तरह पूँजी ढाँचे के निर्णयों से उसकी प्रासंगिता नहीं होती है। इसे पुष्ट या • सिद्ध करने का प्रमुख तर्क इस प्रकार है कि ऋण-पूँजी की मात्रा में की जाने वाली प्रत्येक वृद्धि इक्विटी या समता अंशधारियों की अपेक्षाओं में भी वृद्धि करती है। अतः पूँजी लागत पर पड़ने वाला प्रभाव बेअसर हो जाता है। उदाहरण के अनुपात में वृद्धि की जाती है तो इससे एक ओर पूँजी की समग्र लागत में कमी होगी, किन्तु साथ ही अंशधारियों की प्रत्याशाओं या अपेक्षाओं में भी वृद्धि हो जाएगी और वे प्रबन्धकों से बढ़े हुए जोखिम के विरुद्ध क्षतिपूर्ति किए जाने की प्रत्याशा करने लगेंगे, अतः इससे पूँजी की औसत लागत में जो कमी होगी वह अंशधारियों की प्रत्याशा में वृद्धि के कारण बेअसर हो जाएगी। सिद्धान्त के अनुसार पूँजी-ढाँचे में होने वाला कोई परिवर्तन निवेशकों द्वारा किए जाने वाले व्यक्तिगत लीवरेज में परिवर्तन के कारण तटस्थ हो जाता है।

3. वित्तीय स्रोतों के तुलनात्मक मूल्यांकन में सहायक किसी समय विशेष पर एक फर्म अनेक स्रोतों से वित्त प्राप्त कर सकती है। विभिन्न स्रोतों में से किस स्रोत को चुना जाए, इसका मूल्यांकन पूँजी की लागत के आधार पर किया जा सकता है। ऐसे निर्णयों में पूंजी की लागत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है, परन्तु स्वामित्व नियन्त्रण एवं जोखिम तत्व भी महत्वपूर्ण होते हैं।

4. उच्च प्रबन्धकों की वित्तीय कुशलता के मूल्यांकन में सहायक उच्च प्रबन्ध विभिन्न विनियोग परियोजनाओं के लिए बजट बनाता है। इस बजट में परियोजना की सम्भावित लाभदायकता तथा लागतों का अनुमान लगाया जाता है। परियोजना को लागू करने के बाद पूंजी की अनुमानित लागत तथा वास्तविक लागत की तुलना करके यह ज्ञात किया जा सकता है कि उच्च प्रबन्ध अपनी परियोजनाओं की लागतों को बजट अनुमानों के अनुसार रखने में कहाँ तक सफल हुआ।

5. अन्य विविध वित्तीय निर्णय-पूँजी की लागत की अवधारणा का अन्य अनेक प्रकार से भी महत्व होता है। यह अवधारणा कार्यशील पूँजी के उचित प्रबन्ध की दिशा में प्रबन्धकों को उपयुक्तः दिशा-निर्देश प्रदान करती है। पूँजी की लागत के सिद्धान्त का उपयोग अल्पकालीन कोषों की व्यवस्था एवं उनके चल सम्पत्तियों में निवेश की प्रक्रिया में भी अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ है। इसके अतिरिक्त, लाभांश एवं प्रति धारण नीतियों के निर्धारण में भी पूँजी की लागत का सिद्धान्त प्रबन्धकों का उचित मार्गदर्शन करता है। यही नहीं, फर्म की विलीन कार्य-निष्पत्ति के मूल्यांकन में भी पूँजी की लागत का सिद्धान्त सहायक होता है।

पूँजी की लागत की गणना (Computation of Cost of Capital)

पूँजी की लागत की गणना निम्न दो प्रकार से की जाती है (A) विभिन्न स्रोतों से पूँजी की लागत; (B) पूंजी की भारांकित औसत लागत।